क्वीरीजिमिया का द्योल ढुड.

सीमान्त क्षेत्र में प्राचीन धार्मिक दर्शनीय स्थल
जगदीश सिंह बृजवाल
जहाँ त्रिदेव के रूप में एक साथ भीमकाय पाषाण खण्ड खुबसूरत जलाशय, कुण्ड बालचन देवता का प्राचीन काल से ही पाषाण निर्मित मन्दिर प्रतिष्ठापित है। इस स्थल का जुड़ाव अवश्य ही अतीत में भी धार्मिक आस्था से है। देवल पाषाण खण्ड का शाब्दिक अर्थ ‘देवताओं का पत्थर’ से है। जिस पावन पाषाण की पवित्रता आज के सात्विक पूजा विधि-विधान से स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं। प्रतिवर्ष बैशाख पूर्णिमा को पूजा पाठ के लिए श्रृद्धालु द्योल ढुघ पहुँचते हैं। जहाँ पहुँचने पर श्रृद्धालुओं के तन-मन में अलौकिक शक्ति की अनुभूति होती है।
मुनस्यारी तहसील मुख्यालय मुख्यालय से उत्तर दिशा की की ओर जोहार मोटरमार्ग के चिलमधार से लगभग 2 किमी दूरी पश्चिम की ओर लिंक मोटरमार्ग से क्वीरी जिमीया = क्वीरीजिमिया है भारत-तिब्बत सीमा का भी अन्तिम स्थाई गाँव है। यह तहसील मुख्यालय से लगभग 15 किमी की दूरी पर है, जहाँ तक मोटरमार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। क्वीरी गाँव के पश्चिम दिशा की ओर घने जंगलों से कुछ चढ़ाई चढ़ते पैदल मार्ग से लगभग 4 किमी दूरी पर द्योल ढुड. अवस्थित है। जहाँ पहुँचने पर आश्चर्य व अद्भुतता का दर्शन होता हैं। तीन आश्चर्य अवस्थित तीनों का देवत्व के रूप में सदियों से पूजा-अर्चना की जाती है।
क्वीरीजिमिया शब्द में दो गाँवों का समुच्चय बोधक सम्बन्ध स्थापित है। पूर्व मे आने वाला गाँव जिमिया जहाँ के मूल निवासी जिमियाल अब वर्तमान में एक भी परिवर का वसासत यहाँ नहीं है। कालान्तर में ये सब नामिक गाँव के अतिरिक्त अन्य गाँव में विस्थापित हो गये हैं।
जिमियाल जाति के गाँव छोड़ने की जो कहानी के पीछे का राज आज भी लोगों के बीच प्रचलित है। जिमियाल बरपटिया जनजाति जो मुनस्यारी के भी मूल जनजातियो में से एक है, अपने जनजाति लोकदेवता भरारी देव की पूजा-अर्चना करते थे। कारण बस, कुछ दिनों पश्चात उनके कोपभाजन के शिकार भी हो गये थे। लोगो का कथन है कि मन्दिर के पास स्थिति केमू(शहतूत) के बड़े पेड़ के बीचों-बीच लोहे की कील गाढ़ दिया था। जिनका मकसद पेड़ को बढ़ने से रोका जाना था। भरारी देव को यह कार्य रास न आया जिमियालां में खुजली की बीमारी का प्रकोप पफैल गया। जिनको मजबूरी में गांव छोड़ने को भी मजबूर होना पड़ा था। दिवास्वप्न भविष्य में इस गाँव का अस्तित्व मिट जायेगा। आज जीमिया का जमीदोज होना तथा जिमियालो का एक भी परिवार अपने मूल स्थान पर न मिलना, कुछ तो संशय पैदा करता है। आज भी साक्ष रूप में केमू;शहतूत का पेड़ मोटरमार्ग पर हरा-भरा मौजूद है।
क्वीरीयाल अब जो बाद में दोनों गांवों में रहने लगे। तत्पश्चात रावत, मर्तोलिया, लस्पाल, ल्वांल, बृजवाल क्वीरी में बरपटिया पछाई परिवारों की बसासत भी सदीयों पुरानी है।
बालचन देवता के विषय में कहा जाता है कि वह नेपाल से आया हुआ माना जाता है। स्यांकुरी नेपाल में हुस्कर देवता उनके पिता का मंदिर प्रतिष्ठापित है। धारचूला के जुम्मा रांती में भी हुस्कर मन्दिर प्रतिष्ठापित है। जहाँ अजबलि से पूजा-पाठ का विधि-विधान है। बालचन देवता को हुस्कर देवता क पुत्र माना जाता है। पिता के त्याग देने पर जोहार की ओर रुख कर लिया था। जिनका प्रभाव जोहार क्षेत्र में काफी रहा है। आज भी तल्ला जोहार क्षेत्रा में डुंगरी, डोर नामीक गाँव में बालचन देवता का मन्दिर प्रतिष्ठापित है धूम-धाम से पूजापाठ कही बलि प्रथा का चलन भी परम्परागत है। किन्तु द्योल ढुड. स्थित मन्दिर में सात्विक पूजा की ही परम्परा पुरातन काल से चली आ रही है। फल फूल, धूप नवैध, प्रसादी चढ़ावा की मान्यता है जिस पावन भूमि की पवित्रता की परम्परा को यथावत रक्खी गई है।
क्वारी जिमीया से जब आगे लगभग 2 किमी पैदल चलने के पश्चात सुलाधार जगह पड़ता है। जहाँ घने जंगलों के बीच समतल खुबसूरत मैदान लगभग 100 मी लम्बा चौड़ा मैदान जिसके चारों ओर थूनेर, खरसु तिमसू, बांज-बूरांश के घने जंगल, निगाल की कयी प्रजाति की झाड़ियां तथा अति प्राकृतिक नैसर्गिक सौंदर्यता, रमणीक स्थान दृष्टिगोचर होती है। जहाँ से दूर गोरी नदी पार का हिमाच्छादित हिमश्रृंखलाएं राजरम्भा, नागनी चोटी, रालमघाटी, पंचचूली हिमालय का विहंगम बर्फानी दृश्य का चित्त को शान्त तथा मन-मस्तिष्क को प्रपफुल्लित कर देती है।
यदि भविष्य में इस स्थल को मुनस्यारी क्षेत्र के पर्यटन व धार्मिक पर्यटन स्थल के स्वरूप में विकसित देखते हैं तो मुनस्यारी के पास नन्दा देवी मन्दिर डाडांधार से प्रकृति का जो विहंगम दृश्य अवलोकन करने का मौका मिलता हैं उसी के सापेक्ष में द्योल ढुड., सुलाधार की सौन्दर्यता को भी आंकलन करेंगे। जिस क्षेत्र का इतिहास भी पौराणिकता से जुड़ा है।
सुलाधार से आगे बढ़ने पर घने जंगलों के बीच स्थित द्योल ढुड., जब दर्शन होता है तो पहले पहल अद्भुत दृश्य देखकर मन के अन्दर कुछ भय सा भी आ जाता है। जहाँ जिसकी सम्भावना ही न हो वहाँ भीमकाय विशाल पाषाण खण्ड, जिसके किनारे जलाशय लम्बाई लगभग 50 मी व चौड़ाई 30 मी दिखाई देती है कुण्ड के बीच में स्थल का कुछ उभरा भाग जिसमें हरा घास उगा हुआ है। सामने छोटा सा प्राचीन पाषाण निर्मित मन्दिर बालचन देवता का जिसे ग्वाला ;पशुपालकद्ध पशुओं का देवता भी माना जाता है।
भीमकाय पाषाण खण्ड (स्तूपनुमा टीलाद्) जिसके तलहटी में चारों ओर से सपाट पाषाण स्पष्ट दिखाई देती है, तथा सिरे वाले भाग में थूनेर के वृक्ष, निगाल की झाड़ियां, दुर्लभ वृक्ष रतङोली जो औषधीयुक्त पर जो छोटा गोलाकार लिए छिद्र से दो भागों में विभाजन करते आधा सुर्ख लाल व आधा काले रंग का होता है फल के रस को आँखों में डालने से आँख के सपफाई तथा रोशनी में इजाफा होने की बात बुजर्गों के मुंहवाणी से आज भी सुनी जा सकती हैं। देवतुल्य पाषाण खण्ड के लोग चारों लोग परिक्रमा कर प्रार्थना, आराधना करते हैं वास्तव में यदि उस पाषाण खण्ड की परिगणना करेंगे तो देश ही नहीं विदेश में भी इसे प्रथम स्थान आसानी से प्राप्त हो सकता है।
जब द्योल ढुड. स्थित प्राचीन धरोहर का दर्शन कर वापस आते हैं तो दुसरे मार्ग का चुनाव करते हैं। अन्य मार्ग से ढलान की ओर बढ़ते हैं तो तब भी हमें एक अलग अंचभित दृश्य देखने को मिलता है लगभग 1 किमी के ढलान के अन्तर में 100 भी लम्बी व 50 भी चौड़ाई का जलाशय ;कुण्डद्ध स्थापित है, जिसे रागस कुंड (राक्षस जलाशय) नाम से भी जाना जाता ह। विशेषता द्योल कुण्ड से इस कुण्ड तक सर्पीली आकार से जल निकासी दिखाई देती है जो ऊपर से नीचे कुण्ड तक जुड़ा हुआ है इसके विषय में भी जो जनश्रुति है की इन जलधाराओं को नागों (सरिसर्प) द्वारा ही खुदवाया गया है, जो नागवंशी लोगों से सम्बन्ध होने का घोतक भी दिखाता है।
बालचन देवता के विषय में जो अनुश्रुति, प्राचीन काल से चली आ रही है उसे उल्लेखित करना भी आवश्यक है।
द्योल ढुड. में कुण्ड(जलाशय) निर्मित किए जाने के बिषय में अनुश्रुति इस कुण्ड का निर्माण पहले पहल साईंपोलू जिमिया गार (नदी) को रेणु नदी के नाम का उल्लेख श्री केदार विष्ट जी द्वारा 1987 के अपने लेख में किया गया था। पार के गाँव जहाँ सांई-पोलू से ऊपर स्थिति साई धुरा में देवताओं के द्वारा किया जा रहा था। जिस स्थल की सौन्दयता, भौगोलिक बनावट द्योल ढुड. समान ही है आज साई धूरा में बिष्ट जाति के लोगों की बसासत है। यह पूर्व मे पशुओं का चारागाह स्थल भी रहा होगा। पशुचारक अपने पशुओं को चुगाने के लिए जब-तब पहुँचे होंगे। जब जलाशय के निर्माण में देवता तथा उनके गण लगे ही थे। बालचन देवता को पशुओं का देवता भी माना जाता है, जिस कारण पशुओं के लिए जलापूर्ति हेतु जलाशय का निर्माण किया जा रहा था। अचानक साई पोलू गाँव के ही बिष्ट जाति की महिला का उस स्थान पर अपने पशुओं के साथ पहुँचना, अजनबियों द्वारा किए जाने वाले दुस्साहसिक कार्य की जानकारी से हतप्रभ रह जाती है। कुछ समझ से परे था। तब देवताओं के द्वारा इस विषय की जानकारी किसी को न बताने का अनुरोध महिला से किया गया था तथा उसे मुंह मांगी वरदान प्राप्ति के लिए आग्रह किया किन्तु महिला का गाँव प्रेम आशंकित खतरे से गाँव की ओर मुंह करके जोर-जोर से आवाज देकर गाँव के लोगों को घटना से अवगत कराया जाने लगा। जिससे क्रोधित देवताओं द्वारा महिला को पाषाण शिला खण्ड में तब्दील कर दिया गया। जिसका प्रमाण साक्ष के रूप साईधूरा में आज भी है।
लोगो के कथनानुसार तब सम्प्रति साईधुरा जिमिया गार के पार क्वीरीजिमिया के द्योल ढुङघ स्थान पर कुण्ड का निर्माण किया गया। देवताओं के कोपभाजन का शिकार बिष्ट जाति के लोगों का अपने ईष्ट देव के रूप में स्वीकारते पूजा-अर्चना करने लगे।
द्योल ढड. स्थित बालचन देवता की पूजा पूर्व में केवल साईं पोलू के बिष्ट जाति के द्वारा ही की जाती थी। गाँव के लोग गाजे-बाजे के साथ क्वीरीजिमिया अवस्थित मन्दिर तक पहुँचकर पूजा आराधना करते थे। धूप-नवैध, फल- फूल, महाभोग प्रसादी चढ़ावा तथा देवतरण प्रथा भी थी। लोगों का वन देवता (बालचन) यक्ष देवता (कुण्ड) प्रकृति देवता (महापाषाण खण्ड) के रूप में असीम आस्था सदैव बनी रही थी। प्रकृति देवता को अनावृष्टि से बचाने की प्रार्थना करते रहते थे। इन्द्र देवता के रूप में भी बारिश से होने वाले कार्य से किसी प्रकार का बिघ्न बाधा न पहुँचे प्रार्थना करते थे। एक भव्य मेले का आयोजन भी होता था, जो प्रथा आज समाप्त हो चुकी है।
एक अन्य जनश्रुति सांई के निवासी बिष्ट जाति के लोग द्योल ढुड. स्थित बालचन मन्दिर में समय समय पर सामुहिक पूजा हेतु गाजे-बाजे के जाते रहते थे मन्दिर में सात्विक पूजा-पाठ देव अवतरण भी हो या कहा जाता है कि एक बार जब मन्दिर में बाजे गाजे के साथ देव अवतरण हो रहा था तो अचानक अवतारी व्यक्ति द्वारा जलकुण्ड में छलांग लगाकर जलसमाधि ले ली गईं। सभी श्रद्धालु इस घटना से हतप्रभ रह गये क्योंकि अवतारी व्यक्ति का सम्बन्ध किसी से पिता, पुत्रा, पति का मानवीय रूप में सम्बन्ध था। सभी निराशा लिए अपने घर वापस आ गए। अवतारी व्यक्ति के घर न पहुँचने पर पत्नी ने लोगों से रहस्य को बताने की अपील की तब लोगों ने घटना की सम्पूर्ण जानकारियों से अवगत कराया। अपनी पति के दुःख से द्रवित महिला को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका पति उससे बिछुड़ चुका है। उसका अन्तर्मन भरोसा दिलाते रहता कि वह एक दिन अवश्य लौट कर घर आयेगा। तब से कुछ वर्षों तक पूजा-पाठ बन्द हो चुका था।
लोगों द्वारा पुनः द्योल ढड. में पूजा-अराधना किया जाने लगा तो बाजे की आवाज के साथ-साथ जलाशय का पानी हिलने लगा तब कुण्ड के बीच से लम्बी दाढ़ी मूंछें वाला जिसके शरीर पर मुंगा घास (मुलायम बारीक घास) उगे थे बाहर आ गया, जिनकी शक्ल अवतारी समाधि लेते व्यक्ति से मिलता-जुलता था। जिसे दूसरा नाम ‘फूकनी बूबू’ दिया गया। जलसमाधि लिए अवतारी व्यक्ति के पत्नी ने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था जो अपने साथ दिव्य पात्र ‘कांसे का कटोरा’ (ब्या्ल) भी संग लाया था।
पति के इन्तजार में लम्बा अर्सा बीतते, महिला का धैर्य भी अब टूटने लगा था। अचानक बारह बरस बीत जाने के उपरान्त महिला का पति अवतारी व्यक्ति पुनः प्रकट हो गया। पत्नी का अपने पति प्राप्ति से प्रशन्नता कोई ठिकाना न रहा। पति के शरीर पर मुगा (बारीक घास) उगे हुए थे। पत्नी ने आदर सत्कार भोजन ग्रहाणादी के पश्चात इतने समय तक कहा रहने के विषय में जानना चाहा किन्तु पति द्वारा उस विषय में किसी प्रकार की बात न करने को कहा गया। पत्नी ने अपने हठ के आगे पति को जुबान खोलने को मजबूर कर दिया। तब पति द्वारा पत्नी से अपने संग लाया कटोरे (ब्याल) में दही लाने की बात कही गई। पत्नी द्वारा दही का कांसे का बड़ा सा कटोरा (ब्याल) पति के सामने रख दिया। पति स्वरूप मानव ने दही में फूंक मारते ही स्वयं भी कटोरी में ही समाहित हो गया पिफर वापस कभी नहीं आया। तब से अनुश्रुति है कि आगे फुकनि बूबू के रूप में देवतुल्य होकर चमत्कारों से प्रभावित करने लगा था। आज भी सांई पोलू गाँव में कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व घर में स्थापित फूकनी बूबू का पूजा-अर्चना सफेद टोपी मन्दिर में चढ़ाये जाने का रीति-रीवाज है।
फूकनि बूबू द्वारा भेंट दिव्य पात्रा जो लोगों के लिए वरदान स्वरूप बन गया था। धूप व वर्षा के रूप में लोगों कथन- जब गाँव में कोई शुभ कार्य के दिन बारीष की सम्भावना पर बारीष को रोकने हेतु तुरन्त कटोरी को सुल्टा कर दिया जाता था, तुरंत मौसम सुहावना, धूप खिलने लगती थी तथा यदि कृषि हेतु बारिश की आवश्यकता होती तो कटोरी को उल्टा कर दिया जाता था. आसमान से बारीश होने लगती थी। चमत्कारी कटोरी का रहस्य के विषय में आसपास के गाँवों के लोगों को आज भी भली-भांति मालूम हैं कि फूंकनी बूबू का कटोरा कितना चमत्कारी था। सदियों का इतिहास, कथा-कहानी जनश्रुति के परम्पराओं ने आज भी लोगों के दिलों में अपना स्थान बनाया है।
पूर्व का जिमिया गाँव जो तीस-चालीस 40 वर्ष पहले आपदा की भेंट चढ़ गया है। जिस क्षेत्र की उपजाऊ कृषि आलू, राजमा, राई-गौबी मूली सब्जीयां पूरे क्षेत्र में एक अलग नाम क्वीरीजिमिया का होता था। आज केवल क्वीरी गाँव अपने पुराने अस्तित्व को बचाए है। कभी दो बैल की जोड़ी के समान दो गाँव दो होते हुए भी एक जैसे थे। जोडी की विछिन्ता, जोड़ीदार के बिछुड़ जोने से अकेले दूर निगाह लगाए टकटकी शून्य में अपने साथी को निहारते क्वीरी गाँव कल्पनातीत हो जाता है। उसे ऐसा लग रहा है कि कहीं मेरा मित्र भी देव कोपभाजन का शिकार तो नहीं हो गया? जिमिया गाँव में कोई भी सम्भावित आपदा की गुंजाइश ही नहीं थी। चारों ओर से बाज, बुरांश, खरसु तिमसू, निगार के घने जंगलों से घिरा जिमिया गाँव इस तरह भरभराकर कुछ ही समय में सारा गाँव जमीदोज हो जाना इतिहास के पन्नों को भी उलट-पलट देता है।
आज जिमिया गाँव के अधिकांश निवासी अपने गाँव को छोड़कर अन्यत्रा भी चले गए हैं किन्तु कुछ असहाय, गरीब तथा कुछ वे लोग जो अपने गाँव से आत्मीयता से घनिष्ठ सम्बन्ध रखत थे, वे आज भी गाँव के आस-पास बंजर भूमि को आवाद कर अपनी वसासत बनाने में कामयाब हो गए हैं। मेहनत मजदूरी, कृषि,पशुपालन, कार्य कर अपनी आजिविका को साधन बनाकर जीवटता से जीवन व्यतीत करते हैं। द्योल ढुड. (देववल पाषाण खण्ड )शाब्दिक अर्थ ‘देवताओं का पत्थर’ है। क्वीरीजिमिया से लगभग तीन, चार किमी दूरी पर स्थित है। जिसकी सिन्धु तल से ऊंचाई लगभग 5000 फिट है। जिसे मुनस्यारी का खूबसूरत पर्यटन व धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित किया जा सकता है। द्योल ढुड. से ही पर्वतारोहियों के लिए ट्रेकिंग रूट हीरामणि ग्लेशियर, हिमानी नामिक जाने का भी आसान रास्ता है। पर्वतारोही इस मार्ग से अपना अभियान चलाते रहते हैं। आलेखन के लेखन में क्वीरी निवासी प्राध्यापक श्री भगत सिंह पछाई, श्री गोकुल सिंह लस्पाल इंस्पेक्टर आईटीबीपी, मूल निवासी सांई- पोलू के महत्वपूर्ण सहयोग से अतीत की जानकारियां को आप तक पहुँचाने में कामयाब हो सका हूँ। अतीत के सांस्कृतिक परम्पराओ को लिपिबद्ध कर संजोए रखना हम सभी का कर्तव्य बनता है. किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है।

‘शक्ति प्रेस’ हल्द्वानी के इतिहास में प्रमुख गढ़ रहा है

डाॅ. पंकज उप्रेती
‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी।
कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा।
‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’
27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत शक्ति प्रेस डाॅ. पंकज उप्रेती
‘शक्ति प्रेस’ छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। भाबर का यह छापाखाना कई आन्दोलनों का गढ़ रहा है। ‘पिघलता हिमालय’ का मुद्रण सहित कई दस्तावेजों को मुद्रण इसमें हुआ। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ले में 1969 में शुरू हुआ ‘शक्ति प्रेस’ अब जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। कालाढूंगी रोड की हालत और जर्जर भवन को देखते हुए पिघलता हिमालय परिवार ने इसे दो साल पहले ही शिफ्रट करने की तैयारी कर ली थी।
कथाकार-पत्रकार स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती ने कालाढूंगी रोड में जब छापाखाना खोला था, बुद्धिजीवियों का एक केन्द्र यह बन चुका था। शहर के जन आन्दोलनों से लेकर राज्य आन्दोलन तक तक में आन्दोलनकारियों का मुख्य अड्डा यही हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच हल्द्वानी का आरम्भिक कार्यालय भी यही था जब महामंत्री के रूप में आनन्द बल्लभ उप्रेती थे। सभी राजीतिक पार्टियों के लोगों के अलावा शिक्षत व श्रमिक जनों का यह ऐसा अड्डा था जहाँ दिन-रात ताला नहीं लगा।
‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झखोखे से’ पुस्तक में स्व. उप्रेती ने लिखा है- ‘‘1969 में जब मैंने शक्ति प्रेस नाम से कालाढूंगी रोड पर अपना मुद्रण संस्थान खोला था कुछ समय के लिये मुझे लेखन व पत्रकारिता से हट कर अपने व्यवसाय को स्थापित करने में समय लगाना पड़ा। मुद्रण सम्बन्धी तत्कालीन सारी तकनीकों को भी मैंने सीखा ताकि कारीगरों के ही भरोसे न रह जाउँ। यह दौर भी मेरे संघर्षों का दौर था। इस दौर में वर्तमान में जगदम्बा नगर निवासी एन.सी.तिवारी ने एक सच्चे सहयोगी की तरह मेरा साथ दिया। तब हल्द्वानी में कागज की कोई दुकान नहीं हुआ करती थी। श्री तिवारी ने सिरपुर पेपर मिल की एजेंसी लेकर यहाँ कागज की दुकान खोली और कापियाँ बनाने का काम भी शुरू किया। मैंने दिल्ली जाकर रूलिंग का कार्य भी सीखा और एन.सी. तिवारी जी के साथ कापियाँ बनाने में सहयोगी की तरह लगा रहा। हम दोनों इस काम में एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते थे।’’
27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट हो चुका है। ऐसे में यादों की अनगिनत लहरें मस्तिष्क में हैं। कालाढूंगी रोड में ऐशबाग सुन्दर सा मोहल्ला था, जिसमें पर्वतीय समाज के कुछ परिवार रहते थे। यहीं पर पिता जी ने जगह लेकर अपना व्यवसाय शुरू कर दिया था। वह बताते थे जब ‘शक्ति प्रेस’ शुरू हुआ और ट्रेडिल मशीन में छपाई आरम्भ हुई उसे देखने के लिये भीड़ जुट जाती थी। उस समय के शिक्षत बेरोजगारों से लेकर तमाम प्रकार के साथी भी यहाँ आने लगे। शहर में गिने हुए मात्रा चार छापेखाने थे। आरम्भ में खुला बरामदा और अन्दर एक कक्ष था, उसके बाद लकड़ी के बड़े-बड़े टाल और ठेकेदारों की आवत-जावत। बाद में जरूरत
पड़ने पर अन्य कमरे भी प्रेस में जुड़ गये और छापेखाने का कार्य विस्तार पा गया। तब हमारा पूरा परिवार भी यहाँ रहता था। रूलिंग मशीन की सरसराहट के बीच शानदार बाइडिंग का कार्य, प्रिंटिग कार्य, बाद के दिनों में शादी कार्ड की छपाई भी होती। उस छोटे आकार की पुस्तकें जैसे भजन संग्रह, होली संग्रह इत्यादि भी छपते रहे। यहीं 30 अक्टूबर 1978 में साप्ताहिक पिघलता हिमालय का प्रकाशन भी आरम्भ हुआ। 19 दिसम्बी 1979 में इसे दैनिक समाचार पत्रा का रूप दे दिया गया था। कुछ अड़चनों के बाद 1 दिसम्बर 1986 को पुनः यहीं से पिघलता हिमालय जारी हुआ, जिसका प्रकाशन पता पिता आनन्द बल्लभ उप्रेती के निधन के बाद 2013 में जे.के.पुरम् सेक्टर डी, मुखानी हल्द्वानी में कर दिया गया था और प्रयास था कि ‘शक्ति प्रेस’ को भी पूरी तरह इसी जगह लाया जाए। 2018 में पिघलता हिमालय की सम्पादक और उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी माता जी श्रीमती कमला उप्रेती के निधन के बाद से लगातार यह विचार था कि अपने प्रेस को भी वहीं स्थापित करें जहाँ परिवार रहने लगा है लेकिन जिस जगह वर्षों की यादें जुड़ी हों उसे एकदम छोड़ना शायद हमारे लिये भी कठिन था। अन्ततः 27 जनवरी 2024 को हमारा ‘शक्ति प्रेस’ जे.के.पुरम्, सेक्टर डी, छोटी मुखानी हल्द्वानी में शिफ्रट होना परिवार को सुखद लगा है। और इस बीच हमें कई नये अनुभव और सीख मिली कि कौन हमारे कितने करीब है। ऐशबाग मोहल्ले के पुराने पड़ोसी तो सब पहले ही जा चुके थे और जो दो-चार परिवार मकान मालिक की हैसियत से रहते हैं, उनकी इच्छा भी यही रही है कि अब समेट लिया जाए। समेटने की इस होड़ में वह भी अकेले हो चुके हैं। फिलहाल हम खुशनुमा माहौल में ऐसबाग से विदा हो गये। यह जरूरी भी था क्योंकि हल्द्वानी शहर की घिचपिच के बीच जिस प्रकार से सड़क चैड़ीकरण इत्यादि हो रहा है उसमें बदलाव तो होना ही है। ऐसे में हमेशा से पूरे सम्मान के साथ मान्यता रखने वाला ‘शक्ति प्रेस’ भी अच्छी जगह शिफ्रट हो जाए, खुशी की बात है।
बात पुरानी है कालाढूंगी रोड स्थित ऐशबाग मोहल्ला जिसमें हमारा प्रेस था, तब शहर में ही बहुत कम वाहन हुआ करते थे। रोड के दोनों ओर आम के बड़े-बड़े पेड़ सुन्दरता बढ़ाते थे। प्रेस से थोड़ा आगे एक बड़ा सा नाला हुआ करता था, जो घिर चुका है, इसी से होकर नालियों का पानी-कचरा निकासी होता था। वर्तमान की कालाढूंगी रोड बरसात में भर जाती है। प्रेस के सामने ही हल्द्वानी फर्नीचर मार्ट पुराने प्रतिष्ठानों में से रहा है। इस मोहल्ले की कई यादों को पिता जी ने अपनी कृति ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ में लिखा है।
पुराने हल्द्वानी में जब मुख्य मार्ग सिंगल रोड के थे, सड़क से लगा हमारा मोहल्ला ऐशबाग कुछ परिवारों का गुलदस्ता था। घरों में ताले नहीं लगते थे, ‘शक्ति प्रेस’ में ताले कभी नहीं लगे क्योंकि दिन-रात गपोड़ियों, आन्दोलन कारियों के अलावा विचारवान लोगों की बैठकें और प्रिंटिंग का कार्य होता था। पड़े लिखे बेरोजगार भी इसे अपने संरक्षण का अड्डा मानते रहे हैं। कई ऐसी लड़ाईयां भी यहीं से शुरू हुई जिन्हें सुनकर आश्चर्य हो सकता है। एकदम शान्त रहने वाले पिता जी गलत पर झल्ला जाते। फिर चाहे कोई नेता या कोई अधिकारी हो, वह अपना विरोध् दर्ज करते। समय बदलता रहा और सड़क से बहुत उपर होने वाले मकान गड्ढों में ध्ंसते दिखाई देने लगे। हमारा घर/प्रेस भी सड़क से एक सीढ़ी नीचे हो गया था और बरसात में पानी भरने लगता था। पहले समय में पूरा मोहल्ला गर्मी के दिनों में खुले में सोता था। अपनी-अपनी चारपाई में मच्छरदानी लगाकर सारे परिवार सड़क किनारे ही दिखाई देते। सन् 2000 के बाद से थोड़ा बदलावा आया और मोहल्ले में पुराने परिवार दूसरे स्थानों पर अपना निवास स्थान बनाकर जा चुके थे। ‘शक्ति प्रेस’ के बाहर पाखड़ का पेड़ लग चुका था, जिसकी आड़ में बैठने वाले कम हो गये। सड़क भी सिंगल से चैड़ी होकर इसमें डिवाइडर बन गया। याद आ रहा है कि पुराने समय में संचार व्यवस्था भी सीमित थी। ‘शक्ति प्रेस’ में डायल करने वाला पुराना फोन था। ‘193’ नम्बर के इस पफोन पर सुख-दुःख भरी सूचनाओं के लिये दूर-दूर से लोग आया करते थे। कई लोगांे ने अपने सगे-सम्बन्ध्यिों-मित्रों को इस पफोन नम्बर को दिया था ताकि विशेष स्थिति में पफोन कर जानकारी मिल सके। रामनगर, काशीपुर, बाजपुर को जाने वाली बसों का प्राइवेट बस अड्डा भी इस प्रेस के पास खुला तो कालाढंूगी चकलुवा इत्यादि से लोग प्रचलन के हिसाब से शादी कार्ड छपवाने यहीं आते थे। कुछ वर्षों के अन्तराल में छपाई के तरीके बदले और छापेखानों में मशीनरी का तरीका भी बदलने लगा। तब स्क्रीन प्रिटिंग का कार्य भी शक्ति प्रेस में होने लगा और पहली बार कार्डों में ऐपण के डिजाइन बनाए गए। इस प्रकार के प्रयोग पिता जी किया करते थे, इन सबके बीच संगीत सभा का होना भी कम आश्चर्य नहीं था। हम भाई-बहन भी अपने बचपन से उबर कर युवा अवस्था में थे और खुला आसमान बना ‘शक्ति प्रेस’ हमारा घर था। इसी में पढ़ाई और संगीत का रियाज करना बहुतों को आश्चर्य ही लगता होगा। पुराने जमाने के छोटे-छोटे कमरे वाले मकान में रेलगाड़ी जैसा हमारा आवास हमें संरक्षित करता रहा। हमें ही नहीं, उन आन्दोलनकारियों को भी पनाह मिली जिनकी तलाश होती थी। कई आन्दोलनों में जब पकड़-धकड़ होती तो अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ से तक प्रदर्शन करने वाले यहाँ आ जाते। सीमान्त क्षेत्रा से लेकर मैदान तक के व्यापारियों के मिलन का अड्डा यह बन गया। जम्बू-गन्द्रायणी से लेकर रिंगाल तक के कारोबारियों का पता शक्ति प्रेस था, इनकी व्यापारिक बैठक धर्मशाला में होती थी क्योंकि बिजनौर इत्यादि जगह से व्यापारी धर्मशालाओं में आकर रुकते थे। इसी प्रकार गंगावली क्षेत्रा से आने वालों के लिये हमारा घर ही मुख्य केन्द्र बना हुआ था। छोटे से शहर में तब लोग अपनों को तलाशते हुए मिलते-जुलते थे। प्रेम-व्यहार के उस समय में सभी जगह यह रिवाज रहा है। आज भी पुराने परिवार अपने रिवाजों को बनाए हुए हैं। शहर होने का कतई यह मतलब नहीं है कि मेहमानों को होटल में रुकवाया जाए या मेहमान चुपचाप होटलों में रुककर चले जाएं। वर्तमान में सुविधाओं को देखते हुए बहुत बदलाव हुआ है और हल्द्वानी जैसा सुन्दर शहर भी एकदम बदलने जा रहा है। इसमें पहाड़ और मैदान से आकर बसने वालों की भीड़ ने इतना दबाव बना दिया है कि मुख्य शहर में पैदल चलना भी दिक्कत भरा होता जा रहा है। यही सब देखते हुए सड़क चैड़ीकरण करण सहित अन्य तोड़पफोड़ होनी ही है।
जिस सिंगल सड़क पर कोई भी व्यक्ति उतर कर किसी के घर या दुकान पर जा सकता था, उस सड़क पर अब दिनभर दौड़ रहे वाहनों व डिवाइडर के कारण कोई रुकना पसन्द नहीं करता है। बदलते शहर में आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रा जुड़ चुके हैं और खेत-खलिहानों का कार्य बहुत कम हो चुका है। ऐसे में अपराधिक गतिविधियों भी बहुत तेजी से बड़ी हैं। बाजारबाद और सोशल मीडिया के प्रभाव में नई पीढ़ी को हल्द्वानी शहर की पुरानी तहजीब का पता ही नहीं है जब इस गुलस्दते में होली-रामलीला से लेकर हर रंग था और एक-दूसरे की मदद को लोग आगे आते थे। दानपुण्य करते लोगों के अलावा गर्मी में प्याउ अपनी ओर से लगवाने वाले भी थे। वर्तमान का हल्द्वानी दिखावे में डूबा है। कुछ दिनों के अन्तराल में कोई न कोई महोत्सव या जुलूस होने लगे हैं। चहक रहे युवाओं को इससे कोई मतलब नहीं की क्या हो रहा है। सोशल मीडिया के लिये फोटो-रील उनका लक्ष्य लगता है।
‘शक्ति प्रेस’ में बैठकर स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से’ हमेशा दस्तावेज के रूप में कार्य करेगी। इस शहर के बनने से लेकर वर्तमान तक में कौन लोग किन-किन स्थानों से आए और किस तरह से एक सुसज्जित शहर बसासत हुई। किस समय में कौन कितना प्रभावशाली था और कौन नगर पालिका चैयरमैन, कौन बड़ा व्यापारी था और कौन समाजसेवी, सबकुछ इस कृति में है। यही कारण है कि इसकी मांग भी लगातार बढ़ रही है। जब शहर का स्वरूप ही बदलने जा रहा हो तो यह जानना और भी जरूरी हो जाता है कि आंखिर किसी शहर में दबाव के बाद किस प्रकार से बदलाव होता है। लिखने के लिये बहुत है लेकिन इतना भर कहना है कि प्रेम भाईचारा के जो पुराने दिन थे, वह सभी स्थानों पर बना रहे।
कालाढूंगी रोड स्थित शक्ति प्रेस का एक कक्ष

रघुनंदन टोलिया: उत्तराखंड में इस बहुप्रतिभा का दूसरा नौकरशाह नहीं हुआ पैदा

जगत मर्तोलिया
जोहार भूमि के ग्राम टोला निवासी डॉक्टर रघुनंदन सिंह टोलिया हिमालय राज्यों के विकास के लिए समर्पित एक नाम है। उत्तराखंड मूल के प्रथम मुख्य सचिव तथा मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर रहे उत्तराखंड ही नहीं भारत के प्रमुख नौकरशाहों में एक डॉक्टर टोलिया की पुण्यतिथि 6 दिसंबर 2023 को है। विकासखंड मुनस्यारी के ग्राम टोला के निवासी डॉक्टर रघुनंदन सिंह टोलिया का जन्म 15 नवंबर 1947 को दीवान सिंह टोलिया के परिवार में हुआ। डॉक्टर टोलिया ने एमएससी गणित, एमए इतिहास करने के बाद पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। रूरल विकास का इतना जूनून उनको था कि उन्होंने डिप्लोमा इन रूरल सोशियल डेवलपमेंट ( रीडिंग यूके ) की उपाधि को भी प्राप्त किया।
भारत के भारतीय प्रशासनिक सेवा में एक ऐसे नाम है, जिन्हें आज भी देश याद करता है। डॉक्टर टोलिया बिना आरक्षण के भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण कर 1971 के बैच के आईएएस अधिकारी बने।
डॉक्टर टोलिया ने उत्तर प्रदेश में रहते हुए पर्वतीय विकास विभाग का पृथक रूप से गठन करने में मुख्य भूमिका निभाई। इस विभाग के सचिव रहते हुए टोलिया ने हमेशा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिए कार्य किया। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद राज्य मूल्य के प्रथम मुख्य सचिव बनने के बाद उन्हांेने हिमालय क्षेत्र के विकास के लिए एक लंबी लकीर खींचने चाहते थे, प्रदेश के राजनेताओं के सहमत नहीं होने के कारण आज भी उनका सपना सपना ही बना हुआ है।
16 घंटा काम करने वाले डॉक्टर टोलिया को हिमालयवासियों का अभिभावक भी कहा जाता है। मुख्य सचिव के पद पर रहते हुए उन्होंने कभी भी अपने वाहन पर लाल बत्ती नहीं लगाई। पुलिस स्काउट व्यवस्था भी स्वीकार नहीं किया।
एक साधारण साधक के रूप में मुख्य सचिव के पद पर कार्य करते रहे। उनके आगे पीछे कभी काफिला भी नहीं रहता था। राज्य की नौकरशाही के उच्च पद पर रहते हुए सादगी के साथ उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। वह चाहते थे, कि हिमालय क्षेत्र के लिए विकास की अलग नीति बननी चाहिए। विकास की तकनीकी पर भी वे हिमालय के अनुरूप नीति चाहते थे। महिला स्वयं सहायता समूह के निर्माण में उनके योगदान को कोई भूला नहीं सकता है। उत्तर प्रदेश में रहते हुए महिला डेरी उन्हीं के दिमाग की उपज थी। आज उत्तराखंड में आंचल के नाम से जो दुग्ध उत्पाद हमें दिखाई देते है।
उसकी रचना भी उन्होंने ही की थी। रामबांस प्रोजेक्ट उनकी ही देन है। उत्तराखंड में इस बात को विशेषज्ञ कहते थे कि चीड के जंगल में कोई दूसरा पौधा पैदा नहीं हो सकता है। डॉक्टर टोलिया ने उत्तराखंड बनने के बाद चाय विकास बोर्ड का गठन किया। आज उत्तराखंड में चीड के जंगलों के नीचे चाय के लह लहराते बागान डॉक्टर टोलिया के उत्तराखंड के पर्वतीय प्रेम को दर्शाता है।
उत्तराखंड में वन विभाग को कार्यदायी संस्था का स्वरूप भी डॉक्टर टोलिया के द्वारा दिया गया। वन पंचायत के लिए नया वन पंचायत एक्ट लाकर डॉक्टर टोलिया ने इन पंचायत को नया जीवन दिया। उत्तराखंड राज्य निर्माण के समय ग्राम्य विकास आयुक्त तथा सचिव के रूप में कार्य करते हुए डॉक्टर टोलिया ने उत्तराखंड के पर्यटन, ऊर्जा, जड़ी बूटी, पशुपालन, कृषि और उद्यान, हस्तशिल्प को राज्य की इकोनमी का आधार बनाने के लिए योजना बनाई। एक नौकरशाह होते हुए राजनेताओं के साथ तालमेल करते हुए अपनी योजनाओं को धरातल में उतारना बेहद कठिन था। फिर भी डॉक्टर टोलिया ने इन शब्दों को आमजन का शब्द तो बना ही दिया। उन्हें घूमने, पढ़ने और लिखने का शौक रहा है।
एक व्यस्त नौकरशाह होने के बाद भी उनका अध्ययन इस स्तर का था, कि उन्हें आज भी एक चलता फिरता स्कूल कहा जाता है। उत्तराखंड के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त बनने के बाद उन्होंने सूचना के अधिकार को आमजन में लोकप्रिय बनाने के लिए कार्य किया। सेवानिवृत्ति के बाद इतने बड़े पदों में रहने के बाद भी उन्होंने मुनस्यारी स्थित ग्राम पंचायत सरमोली में अपना निवास बनाया।
मुनस्यारी में रहते हुए स्वध्याय और चिंतन के साथ राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में नियमित उनका लेखन जारी रहा। सेवानिवृत्ति के बाद हिमालय राज्यों को एकजुट करते हुए डॉक्टर टोलिया हिमालय नीति बनाने में जुटे हुए थे, कि उनका स्वास्थ्य खराब होने लगा।
6 दिसंबर 2016 को 69 वर्ष की आयु में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा बोल दिया।
डॉक्टर टोलिया जब भी मुनस्यारी आते थे, अपनी बैठक में जिलाधिकारी को पूछते थे कि वह मिलम गांव गए कि नहीं?
एक बार जब उनसे ही यह सवाल पूछा गया कि आप हर जिलाधिकारी से यह सवाल क्यों पूछते है, तो डॉक्टर टोलिया का जवाब था, कि जब नौकरशाह कठिन जिंदगी में रहने वाले लोगों के बीच जाएंगे, तभी वह समझ पाएंगे कि हिमालय क्षेत्र के लोग किन कठिनाइयों में रहते है।
डॉक्टर टोलिया का हमेशा यह मानना रहा कि प्रत्येक आईएएस तथा पीसीएस अधिकारियों को विकास की बारीकी समझने के लिए सबसे पहले खंड विकास अधिकारी के पद पर कम से कम 3 वर्ष कार्य करना चाहिए।
डॉक्टर टोलिया के निधन के बाद दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर 908 पेज का एक महाग्रंथ तैयार किया है। इस महाग्रंथ में डॉक्टर टोलिया द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण पुस्तक, रिपोर्ट्स, मोनोग्राफ्स, आलेख, नोट्स और सार्वजनिक व्याख्यान को स्थान दिया गया है।
“THE ESSENTIAL R.S.TOLIA”के नाम से संपादित इस महाग्रंथ में हिमालय क्षेत्र के विकास के स्वरूप को आज भी हम पढ़ व समझ सकते सकते है। एटीआई नैनीताल का नाम डाक्टर टोलिया के नाम पर रखा गया है। एटीआई नैनीताल में एक कक्ष में उनका प्रकाशित साहित्य रखा गया है। बताते है कि एटीआई नैनीताल को प्रशिक्षण संस्थान का स्वरूप तथा यहां पुस्तकालय का विकास इसके
महानिदेशक के रूप में उनके द्वारा ही किया गया।
उनके जीवन और उनके कार्यों पर वर्ष 2000 में उत्तराखंड सरकार के तत्कालीन ग्राम्य विकास मंत्री रहे डॉक्टर मोहन सिंह रावत गांववासी कहते है कि मंसूरी अकादमी में आईएएस अधिकारियों को प्रशिक्षण के दौरान डॉक्टर टोलिया पढ़ाया जाना चाहिए।
वे कहते है कि अकादमी में डॉक्टर टोलिया के दर्शन पर तीन दिवसीय व्याख्यान माला भी आयोजित की जानी चाहिए तभी उत्तराखंड की सेवा में आने वाले नौकरशाहों की दृष्टि उत्तराखंड के प्रति स्पष्ट होगी।
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डॉक्टर टोलिया के मुख्य प्रकाशित पुस्तक-
1- नैन सिंह अध्यापक, सर्वेक्षक व प्रशिक्षक
2- नैन सिंह रावत एवं जोहर का इतिहास
3- धामू बूढ़ा के वंशज
4- युग दृष्टा बाबूराम सिंह
5- जोहर इतिहास- समग्र
6- गढ़वाल की भूकंप त्रासदी
7- ब्रिटिश कुमाऊं-गढ़वाल(दो भाग)
8- फूड फॉर थॉट एंड एक्सन
9-पटवारी, घराट और चाय
10- इनसाइड उत्तराखंड
11- ए प्रैक्टिकल गाइड- राइट टू इनफॉरमेशन एक्ट 2005
12- ए हैंडबुक फॉर द पब्लिक इनफॉरमेशन ऑफीसर
13- फाउंडर्स आफ मॉडर्न एडमिसट्रेशन इन उत्तराखंड
14- सम एसपैक्स आफ एडमिनिस्ट्रेटिव हिस्ट्री ऑफ़ उत्तराखंड
15- ट्रांसपैरेंसी इन एडमिनिस्ट्रेशन
16- मल्ला जोहार- हंडेरस इयर ऐगो
17- द मरतोलिया लॉज
18- उत्तराखंड फिफ्टीन इयर्स आफ डेवलपमैंण्ट
19- माणा, मलारी एण्ड मिलम
20- ए प्लानिंग फ्रेमवर्क फॉर द माउंटेन स्टेट ऑफ़ इंडिया

संगीतकार नेत्र सिंह ल्वांल

गणेश प्रताप सिंह ल्वांल
श्री नेत्र सिंह ल्वांल पुत्र श्री चन्द्र सिंह जी का जन्म 1925 मैं मल्ला दुम्मर मैं हुआ,उनको घर गांव मैं उमेद सिंह के नाम से जानते थे, उनका पिताजी का नाम श्री चन्द्र सिंह और माता जी का नाम श्रीमती आमरा देवी, उनका प्रारंभिक शिक्षा कक्षा 5 तक मुनस्यारी में हुआ तद पस्चात 6 कक्षा के बाद पढ़ाई हेतु अल्मोड़ा गए परंतु पढ़ाई मैं उनका मन नहीं लगा और वाफिस घर आ गए। घर में भी उनका काम में मन नहीं लगता था, उस समय जीवन यापन बहुत कठिन था मुनस्यारी से जोहार और जोहार से हुंणदेश भेड़ बकड़ी, घोड़ों के साथ और वापिसी मुनस्यारी फिर नगड़ झलौरी जाते थे, एक बार उनका अपने पिताजी के साथ कुछ बात को लेकर बहस हुआ फिर घर से भागकर अल्मोड़ा चले गए थे। वहां 1944 मैं 1 कुमाऊं रेजिमेंट मैं भर्ती होकर रानीखेत गए। उनका लगाव बचपन से ही संगीत से था। खुद गीत की रचना कर उसे संगीत मैं पिरोते थे, उन्होंने 1950 को फौज की नौकरी छोड़ मुंबई की ओर चल दिए, मुंबई नगरी मैं काफी संघर्ष के पश्चात भी उन्हें कोई काम संगीत या गायकी मैं हासिल नहीं हुआ, क्युकी उनका कोई संगीत पृष्ठभूमि के नही था फिर उन्होंने 1957-1958 मैं गंधर्व महाविद्यालय पुणे से तबला वादन मैं डिप्लोमा किया और संगीतकार श्रीमती उषा खन्ना के साथ तबला वादन प्रारंभ किया। उनके साथ मैं मुनस्यारी क्षेत्र के श्री जवाहर राम जी थे जिसे उन्होंने उषा खन्ना के साथ बांसुरी वादन के लिए रखा था, बाद में जवाहर राम जी को चंद्र प्रकाश के नाम से जाने जाते थे। जवाहर राम जी के दो बिटिया है जो कि सम्पन्न परिवार मैं ब्याही है, जवाहर राम जी का मृत्यु हो चुका है। कुछ वर्ष के बाद श्री नेत्र सिंह जी ने उषा खन्ना जी संगीत टीम को भी अलविदा कर दिया था क्योंकि वे एक स्वतंत्र विचार के इंसान थे किसी भी गलत बात पर समझौता नही करते थे, संगीत उनके रग रग मैं बसा था और संगीत को जीते थे, उन्होंने अपना रचनाये, गीत कुमाउंनी बोली में शुरु किया और पहली बार 1960 के दौरान घाटकोपर मैं कुमाऊनी रामलीला की शुरुवात किया और उसमे संगीत दिया, वहां उनको नेत्र सिंह कुमाउंनी के नाम से जाना जाता था। उनके साथ सहायक के तौर पर चंद्र प्रकाश जी भी थे। संगीत का शौक तो था परंतु संगीत का शौक भूखे पेट तो नही भर सकता अतः उन्होंने मुंबई मैं लाइट हाउस लाइट शिप में बतौर सिक्योरिटी मैं नौकरी करना शुरु किया जिससे आजीविका और शौक दोनो पूरा हुआ। अपनी रचना कुमाऊनी बोली में लिखना शुरु किया मल्ला दुम्मर मेैंं हरी प्रदर्शनी में 1960 मैं पहली बार संगीत कार्यक्रम की शुरुवात किया गया जिसमें उनका प्रसिद्ध गीत ‘हरी सिंह ज्यु की यादगार’ है, उन्होंने अनेकों गीतों की रचना किया और जब सन 1961 मदकोट की किसान मेला मैं अपने गीतों को मेला मेैंं गया ‘ठंडो ठंडो पानी, हैमी छू कुमय्या हमारो कुमाऊं, आज क दिन छु मैं घर माज और एक गीत जो कि बहुत ही प्रसिद्ध है बरस को बार मैना इसके अलावा कई गीत ऐसे है जो उन्होंने लिखा,उनका संगीत और गीत से प्रभावित होकर तब उस समय का जिला अधिकारी श्री जीवन चंद पांडेय जी ने उनको पुरुस्कार से नवाजा, तब से पूरे मुनस्यारी मेैंं उन्हे लोग नेत्र सिंह कलाकार के नाम से जानते थे। उन्होंने शादी नही किया पूरा जीवन संगीत को जिया, उनके छोटा भाई स्वर्गीय प्रताप सिंह जो कि दुम्मर गांव मैं निवास करते थे उनके अभी दो पुत्र है बड़े का नाम गणेश और अनुज का नाम देवेंद्र दोनो फिलहाल हल्द्वानी में निवास करते है। श्री नेत्र सिंह जी 1984 मैं मुम्बई से सेवानिवर्ती हुये और दुम्मर गांव में रहने लगे परन्तु उनका स्वास्थ्य खराब होने के कारण 14 नवम्बर 1986 को हमेशा के लिए परमधाम को सिधार गए। मैं बचपन मैं 4 वर्ष तक उनके साथ मुंबई मैं रहा, उनका संगीत से लगाओ मुझे अभी याद आता है वे अधिकतर समय अपने संगीत मैं इतना तल्लीन रहते थे कि उन्हें पता नही चलता, कौन आ रहे जब ध्यान हट जाता तब पूछता था कब आये, परंतु वे नही चाहते कि मेरा संगीत लगाओ। वह कहते थे पढ़ाई करो और कुछ नही करना है, क्योंकि उन्हे वो मुकाम हासिल नहीं हुआ जिसमें वो काबिल थे इसलिए वे कहते थे कि संगीत मैं कुछ नही है। यदि आज की तरह सोशल मीडिया और अन्य होता तो शायद प्रसिद्धि मिलता।
(लेखक कलाकार नेत्र सिंह जी के भतीजे हैं)

अब यादें शेष : राजेंद्र प्रसाद जोशी

प्रोफेसर अनिल जोशी
पिछले दिनों उत्तराखण्ड की एक और विभूति हमसे दूर हो गयी।
उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक तथा इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख श्री राजेंद्र प्रसाद जोशी का 14 अक्टूबर को नोएडा के एक निजी अस्पताल में स्वर्गवास हो गया। वे लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे थे।
मूल रूप से अल्मोड़ा के सेलाखोला से ताल्लुक रखने वाले राजेंद्र प्रसाद जोशी का जन्म 1933 में मसूरी में हुआ था जहां इनके पिता सुरेश चंद्र जोशी बार्लाेगंज स्थित मशहूर सेंट जॉर्ज़ेज़ स्कूल में बर्सर थे। स्कूली शिक्षा यहीं से करने के उपरान्त इन्होंने उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की । 1955 में इनका चयन भारतीय पुलिस सेवा में हो गया और उत्तर प्रदेश में ही तैनाती मिली । यहां पर यह बताना आवश्यक है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के इतिहास में 1955 के बैच को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है जिसने देश को टी.एन.सेशन अनेक कुशल प्रशासक दिये ।
सेवा के दौरान श्री जोशी ने उरई,जालौन तथा सीतापुर में विभिन्न पदों पर कार्य किया, लखनऊ में पीए टू आईजी रहे,तथा समय समय पर उत्कृष्ट सेवा के लिए सम्मानित होते रहे । 1972 के पश्चात इंटेलिजेंस ब्यूरो की सेवा में पूर्वाेत्तर भारत में कई साल तैनात रहे।
अस्सी के दशक में कुछ वर्ष लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में कार्य किया। वहां से लौटने पर उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक नियुक्त हुए। इस पद पर आसीन होने वाले वे उत्तराखण्ड के पहले अधिकारी थे। ये समय बहुत चुनौतीपूर्ण था। मंडल और राम मंदिर के मसलों के कारण स्थिति अत्यंत संवेदनशील थी। साम्प्रदायिक सौहार्द्र तथा कानून व्यवस्था को बनाये रखने में भरसक प्रयास किये ।
1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा इंटेलिजेंस ब्यूरो का निदेशक बनाया गया जो कि आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद होता है। इसके पश्चात चेयरमैन ज्वाइंट इंटेलिजेंस कमिटी का पदभार संभाला। मार्च, 1992 में सेवानिवृत्त हो गये। इनकी छवि एक ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ नौकरशाह की रही।
स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद जोशी की पारिवारिक पृष्ठभूमि शिक्षकों तथा प्रशासकों की रही। जाने माने समाजशास्त्री तथा कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति प्रोफेसर भूपेंद्र कुमार जोशी,जो वर्तमान में दून लाइब्रेरी के अध्यक्ष हैं, इनके अनुज हैं। पूर्व कैबिनेट सचिव तथा राज्यपाल पद्म विभूषण स्वर्गीय भैरव दत्त पाण्डे, पूर्व कैबिनेट सचिव कमल पाण्डे,तथा केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सी.आर.पी.एफ.) के पूर्व महानिदेशक सतीश दत्त पाण्डेय, तीनों इनके साढ़ू भाई हैं। इनकी पत्नी डॉक्टर तारा जोशी (जिनका निधन अप्रैल, 2021 में हो गया था) के सबसे बड़े भाई प्रोफेसर गोविंद चंद्र पाण्डे विख्यात इतिहासकार थे तथा जयपुर और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। दूसरे भाई विनोद पाण्डे भी भारत के कैबिनेट सचिव रहे और बाद में बिहार एवं अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल।
स्वर्गीय जोशी जी अपने पीछे पुत्री रचना तथा पुत्र समीर को छोड़ गये हैं ।

महान अन्वेषक पंडित नैन सिंह रावत

 19 वीं शताब्दी के महान अन्वेषक
जगत सिंह मर्तोलिया
19 वीं शताब्दी के महान अन्वेषक पंडित नैन सिंह रावत हिमालय तो क्या विश्व के रत्न हैं। अपनी जान को जोखिम में डालकर पंडित नैन सिंह रावत ने तिब्बत का सर्वे कर दुनिया को तिब्बत के बारे में जानने का अवसर दिया। पंडित नैन सिंह रावत के अन्वेषण तक तिब्बत के बारे में कोई भी बाहर वाला किसी भी प्रकार की जानकारी नहीं रखता था। 21 अक्टूबर 1830 को पैदा हुए पंडित रावत ने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया। भारत सरकार ने पंडित के नाम पर डाक टिकट जारी कर उन्हें सम्मान दिया।
पंडित में सिंह रावत के बारे में नई पीढ़ी को जानकारी देने के लिए इस इस वर्ष 2023 से मुनस्यारी में उनकी जयंती मनाई जा रही है।
19वीं शताब्दी में पैदा हुए महान अन्वेषकों में से पंडित नैन सिंह रावत का नाम एक है।
इनके अन्वेषण की ख्याति को देखते हुए इन्हें ष्द पंडितष् के नाम से संबोधित किया गया। परतंत्र भारतीय मूल के प्रथम व्यक्ति थे, जिन्हें
भू- वैज्ञानिक कार्य के लिए रॉयल ज्योग्रेफिकल सोसाइटी द्वारा उन्हें प्रथम विक्टोरिया पदक से विभूषित भी किया गया।
विकासखंड मुनस्यारी के ग्राम पंचायत बसंतकोट के भटकूड़ा गांव में 21 अक्टूबर 1830 को पंडित नैन सिंह रावत का जन्म हुआ।
इनके पिताजी का नाम लाटा था। पंडित नैन सिंह रावत के चचेरे भाई मान सिंह रावत ने भी इनके साथ अन्वेषण का कार्य किया।
कुशाग्र बुद्धि के होने के कारण पंडित बंधुओ ने 1855 से 1856 में श्लाघ इट वाइट बांधुओं के साथ दुभाषिये और सर्वेक्षक के रूप में तुर्किस्तान की यात्रा की।
तिब्बती भाषा का ज्ञान तथा कार्य कुशलता से प्रभावित होकर जर्मन बंधु उन्हें अपने साथ यूरोप ले जाना चाहते थे, लेकिन पहाड़ से प्रेम तथा चचेरे भाई मान सिंह रावत के विरोध के कारण दोनों भाइयों को रावलपिंडी से वापस लौटना पड़ा।
सन 1863 में इन्हें चचेरा भाई मान सिंह रावत के साथ देहरादून बुलाया गया।
सुपरिटेंडेंट कर्नल जे.टी. वाकर तथा ग्रेट ट्रिगोनोमैट्रिकल सर्वे में एक अन्वेषण के रूप में नियुक्ति किया गया।
भारतीय सीमा के बाहरी क्षेत्र में कार्य करने के लिए पंडित बंधुओ को टोपोग्रेफिकल आवजर्वेशन का प्रशिक्षण कार्य दिया गया।
तिब्बत की भौगोलिक स्थिति का ज्ञान बाहर वालों को नहीं था।
यूरोपीय जगत को तिब्बत में प्रवेश प्रतिबंधित होने के कारण मार्च 1865 को दोनों पंडित बंधुओ को नेपाल होते हुए लहासा के सर्वेक्षण हेतु भेजा गया।
पंडित के चचेरे भाई मान सिंह रावत को मध्य में ही अपनी यात्रा स्थगित कर स्वदेश लौटना पड़ा, लेकिन पंडित नैन सिंह रावत ने एक लद्दाखी की वेश में दावा नमग्यल के नाम से नौकर बनकर तिब्बत में प्रवेश करने पर सफल हो गया।
बुशहरी का वेश बनाकर लद्दाख के व्यापारी ल्होपच्याक के साथ 29 अक्टूबर 1865 को शिगात्से पहुंचे। केवल लद्दाखी और बुशहरी ही स्वतंत्र रूप से संपूर्ण तिब्बत में आवागमन कर सकते थे।
शिगात्से में पंडित नैन सिंह रावत टासी लाम्बो गोम्पा के रिंपोचे पंचेम लामा के दर्शन करने गये।उन्हें यह आशंका थी कि यह पवित्र पुरुष उनके गुप्त रहस्य को जान लेगा। परंतु यह जानकर आश्चर्य हुए कि पवित्र पद पर मात्र 11 वर्षीय बालक पदासीन है, जो प्रत्येक दर्शनार्थियों को प्रायरू केवल एक ही प्रकार के तीन प्रश्न पूछ रहा है।
शिगात्से में दो माह तक सर्वेक्षण कार्य करने के पश्चात 25 दिसंबर को हुए एक औद्योगिक नगर ग्यानत्से पहुंचे। 10 जनवरी 1866 को पंडित नैन सिंह ने ल्हासा पहुंचकर दो कमरे का एक मकान किराए पर लिया। उसके बाद आवजर्वेशन का कार्य प्रारंभ किया।
100 दिन तक ल्हासा में रहकर वहां की भौगोलिक, सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने की पश्चात उसी लद्दाखी व्यापारी के साथ ल्हास लद्दाख मार्ग का सर्वेक्षण करते हुए त्रादाम पहुंचे।
मार्ग व्यय की कमी के कारण उन्हें अपनी घड़ी भी बेचनी पड़ी।
21 जून 1866 को ऊंटा धुरा पार कर पंडित नैन सिंह रावत मिलम गांव पहुंचे और यहां से देहरादून वापस चले गए।
पंडित नैन सिंह रावत ने अपनी इस यात्रा द्वारा काठमांडू- ल्हास- मानसरोवर तक की 1200 मील लंबी दूरी का सर्वेक्षण तथा 21 स्थानों पर अक्षांश और 33 स्थान की समुद्र तल से ऊंचाई ज्ञात कर विश्व के लिए ऐतिहासिक कार्य किया।
साथ ही उन क्षेत्रों की रोचक तथा ज्ञानवर्धक वर्णन अपनी डायरी में अंकित किया।
संपूर्ण तथ्यों का सारांश कर्नल मान्टोगोमरी द्वारा सोसाइटी के जनरल में 38 वें खंड में किया गया है। इनकी इस महान यात्रा से प्राप्त उपलब्धियां के उपलक्ष में 1868 में सोसाइटी ने उन्हें एक स्वर्ण घड़ी घड़ी प्रदान की।

ऐसे थे हमारे दीवान दा ‘दीवान सेठ जी’

एम.एस.सयाना
दीवान सेठ जी मूलतः चिलकिया, पिथौरागढ़ के रहने वाले थे। उनके पिता स्व. चन्द्र सिंह पांगती समाजसेवी थे। उन्होंने अपने समय में गाँव में स्कूल खुलवाए, घराट बनवाए तथा रास्ते का निर्माण किया।
दीवान सेठ जी अपने समय के जोहार समाज के जानेमाने सेठ थे, तिब्बत व्यापार के समय बागेश्वर उत्तरायणी मेले में तिब्बती भेड़ का उन गांधी आश्रम वालों को बेचा करते थे। एक बार उन का दाम इतना बढ़ गया कि सूठ जी दो बक्सा नोट अपने खच्चरों में लाद कर चिलकिया गये, व्यापार घटने के बाद उन्होंने भैंसखाल में आरामशीन लगवाई परन्तु लकड़ी के अभाव से मशीन बन्द करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने जंगलात का कार्य किया, उसमें भी अपेक्षाकृत लाभ नहीं हुआ। इस कार्य को छोड़कर उन्होंने ‘दीवान ट्रान्सपोर्ट’ की स्थापना की। अपने समय में सेठ जी ने सभी गरीब तबके लोगों की खूब मदद की। किसी की बेटी की शादी हो या कोई दुःख बीमार हो, सेठ जी सभी को उधर दिया और कभी किसी से भी पैसे लौटाने के लिये तकाजा नहीं नहीं करते थे। जिसने लौटाया तो ठीक नहीं लौटाया तो उनको कहना तौहीन समझते थे। सेठ जी को अनेकों लोगों ने पैसे नहीं लौटाये। वे सही मायने में गरीबों के मसीहा थे। जब वे हल्द्वानी में आकर बसे तो भोटिया पड़ाव में 52 बीघा जमीन जोहार संघ के नाम से लीज पर थी, यदि वे चाहते तो कई बीघा अपने नाम कर सकते थे परन्तु उनकी इतनी महानता कि उन्होंने एक इंच जमीन अपने नाम नहीं की तथा औरों को जमीन दिलाई। जमीन के सम्बन्ध् में अनेक विवाद भी होते रहते, लोग अपनी समस्याएं लेकर सेठ जी के घर जाते थे, वे आसानी से उनका समाधान कर देते थे। उनका निर्णय सर्वमान्य हुआ करता था। सभी पड़ाववासी उनका आदर करते थे क्योंकि उनका कहीं पर भी किसी प्रकार लोभ लालच नहीं था। ऐसे निस्वार्थ व्यक्तित्व को जोहार रत्न से नवाजा जाना चाहिये।
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स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे’ में भी स्व.दीवान सिंह जी के सीमान्त ट्रान्सपोर्ट सहित तमाम रोचक जानकारियों का उल्लेख है।

तहजीब-ए-मुनस्यार

जगदीश बृजवाल
हिमालय की गोद में बसा हिमनगरी, जिसे ‘सारा संसार एक मुनस्यार’ भी कहते है। उत्तर में हिमालय के तलहटी के मिलम ग्लेश्यिर से उदगम गोरी नदी निचले घाटी के में उतरकर वार-पार के बीचों बीच बहते मवानी-दबानी तक तथा पश्चिम में हीरामणि ग्लेशियर निकलने वाली नदी रामगंगा सीमा रेखा बनाते नाचनी, नौलड़ा तक मुनस्यारी तहसील का सीमांकन क्षेत्र है।
मुनस्यारी तहसील क्षेत्रफल की दृष्टि से कई जिलों से भी बड़ा है। जैसे जिला हरिद्वार। क्योंकि इस तहसील क्षेत्र की सीमा तिब्बत (चीन) तक जा लगती है। प्राचीन समय जोहार के शौका जनजाति तथा मुनस्यारी के मूल बरपटिया जनजाति के लोग जो यक्ष, किन्नर, किरात, नागवंशी तथा मंगोलियाड, मुख मुद्रा व तिब्बती बर्मी भाषा के समावेश से कुछ-न-कुछ सम्बन्ध अवश्य उनसे भी रहा है।
जोहार के इतिहास में तीनों कालखण्डों का अनुशासित वर्णन दिखने को नहीं मिलता, ऐसे में पाठकों को कुछ भ्रम की आशंका बनी रहती है। जबकि जोहार का इतिहास तीन कालखण्ड में वर्गीकृत दिखाई स्पष्ट है-
प्राचीन काल- हल्दु्वा-पिङंगलवा युग, मध्य काल पनज्वारी युग, आधुनिक युग धामू रावत का जोहार घाटी में प्रवेश व पंनज्वारियों का अवसान। तीन काल खण्ड जोहार के समग्र इतिहास की जानकारी देते हैं। इनमें आपस में रक्त सम्बन्ध भी स्थापित र्है अर्द यायावरी जनजाति मौसम के अनुसार अपने प्रवास बदलते रहते थे किन्तु सन 1962 में तिब्बत पर चीन का अधिपत्य हो जाने के कारण शौकाओं का व्यापार बन्द हो गया था, सभी लोग बेरोजगार हो गये। नए रोजगार की तलाश में अब एक स्थान पर स्थायी भी रहने लगे थे। शिक्षा, नौकरी, पद प्राप्त कर आज पुनः अच्छी स्थिति में देश के कौने कौने में बस गये हैं।
यहाँ के लोगों का व्यापार समाप्ति के वाद धीरे-धीरे लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया था। वर्तमान में अब शौकाओं की जनसंख्या क्षेत्र में न्यून है, कुछ ही गाँव तक सीमित परिवार निवास करते हैं।
व्यापारी जो सदैव अपनी व्यापार को उन्नत बनाने के लिए मृदु भाषा, व्यवहार कुशल, मिलनसार बनने का प्रयत्न करता है सुबह से शाम तक अपनी वाणी में संयम, भाषा की सौहार्दता का विशेष ध्यान रखते है जो बाद में उसकी आदत व्यवहार में अवश्य शुमार हो गया होगा। किसी भी घर, परिवार में कोई भी व्यक्ति जो घर के लिए आर्थिक योगदान देता है वह घर का मुख्य व्यक्ति हो सकता है इस कारण घर परिवार में उनकी बातों को हमेशा परिवार तबज्जू देता है, उनकी बातों को लोग अमल में भी लाते हैं। व्यक्ति की वाणी की सौम्यता, व्यवहार में मधुरता परिवार के लिए भी तथा व्यवसाय के लिए भी संजीवनी का काम करता है। शायद कोई अनुमान न लगा पाये, पर उनकी तहजीब सबके लिए जीवनोपयोगी सिद्ध हो चुका था।
तहजीब, जिसे हम कहते हैं किसी भी संस्कृति, सभ्यता के अवयव आचरण, आचार-व्यवहार, सदभाव, प्रेम गुण-धर्म की सीख व्यक्ति को घर या समाज से ही मिलता है। परिवार बालक की सर्व प्रथम पाठशाला होता है जहाँ से बच्चा संस्कारवान बनकर बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है। आपकी सहिष्णुताता आपके कई कामों को आसान बना देती है। शौकाओं का अपना व्यापार करने के एवज में उसे कई लोगों के साथ अपनी अच्छे सम्बन्धों को बढ़ावा देना पड़ता होगा, जिस कारण घर के सदस्य के साथ हो या बाहर के, वाणी में मधुरता यथावत रखनी पड़ती होगी, व्यापारी की मजबूरी सदैव तहजीब को बनाये रखना ही है। अन्यथा व्यापार में अवरोध आने की आशंका बनी रहती थी जिस कारण शौका व्यापारी को दैनिक जीवन में भी अपने पशुओं से लेकर परिवार व बाहर के लोगों से भी अच्छे व्यवहार सम्बन्धों को बनाये रखना आवश्यक था। इस कारण उसने अपने पास-पड़ोस, अपने बन्धु-बान्धवो के साथ मैत्राीपूर्ण व्यवहार बनाकर अच्छे वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान अवश्य किया होगा।
जोहार घाटी में अतीत में निवास करने वाले लोग सभी जोहारी कहलाये जाते थे। किसी भी जाति धर्म का क्यों न हो, जोहार में निवास करने के बाद जोहारी ही कहलाए, अपनी बुद्धि, क्षमता अनुसार कार्य कर आपसी सामंजस्यता प्रेम सदभाव से अपने कार्यों में मशगूल रहे, अनुमान/कल्पना तो आज के लोगों का कथन और सोचना है, उसी प्रकार तहजीब, संस्कार अग्रिम पीढ़ी को तथा पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार समाज को हस्तांतरण करते रहे हैं।
मुनस्यारी क्षेत्र के लोगों की ईमानदारी, विश्वास, स्वाभिमानी होने का प्रमाण तो सिद्ध है, यहाँ के लोग जुवान व उसूल के पक्के होते थे। सच्चाई, ईमानदारी, विश्वास के लिए कभी समझौता नहीं करते थे। तिब्बत व्यापार हेतु जाने वाले मार्ग में एक स्थान बोगडियार पड़ाव है, उससे कुछ नीचे दक्षिण दिशा की तरपफ रारगारी नामक अति दुर्गम स्थल माना जाता है, सत्यता यह भी है कि शौका लोग व्यापार के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री जो अपने पशुओं के पीठ पर लादकर तिब्बत तक पहुँचाते थे यदा-कदा उन्हें इन स्थानों में कहीं सड़क किनारे, गुफा आदि स्थान पर सुरक्षित मोटे कपड़े से (तिरपाल) ढक कर रख देना पड़ता था। अगले वर्ष उसे सुरक्षित सामान मिल जाता था, जो उस समय के समाज की अच्छी स्थिति की जानकारी देता है कि झूठ, चोरी-चकारी, बईमानी, अविाश्वास को समाज में कोई भी स्थान नहीं दिया गया था।
मुनस्यारी क्षेत्रा में रहने वाले सभी जाति विरादरी के बीच जो प्रेम, मित्राभाव अतीत में दिखाई देती देती है वो अब कहाँ! हमेशा आपस में एक दूसरे की प्रति अटूट विश्वास व सम्बन्ध बनाए रखना अपना परम कर्तव्य समझते थे तथा सम्बन्धों की प्रागढ़ता पीढ़ी दर पीढ़ी भी निरन्तर चलती रही। अतिथि सत्कार करना इस क्षेत्र के लोगों को कहीं से सीखने की आवश्यकता न थी। अपने गुण की पहिचान वह बखान अपने मुँह से कभी नहीं किया।
आपसी सामंजस्यता, खाना-पीना, उठना-बैठना, बोलचाल जिसने आपसी समानता को बनाये रक्खा, क्षेत्रा में सभी जाति धर्म के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य तहजीब-ए-मुनस्यार ने किया था तथा आपस में सदैव एक दूसरे का सहयोग कर काम आते रहे हैं, इस कारण मुनस्यारी क्षेत्रा की लोगों की वाणी ने लोगों को ध्यान आकर्षित कर अच्छी परम्परा की नींव रख दी। इस बात की समझ अनुमान/कल्पना आज करते हैं तो क्षेत्र में आने वाली बाहरी लोग जो सरकारी कार्मिक, अध्यापक गण नियुक्ति, पदोन्नति में आकर दूर दराज गाँव में लम्बे समय तक ठहराव करते हैं तो उन्हें यहाँ के लोगों का आचार-व्यवहार में अपनत्वता झलकता है तभी यहाँ से अन्यत्रा जाने के पर यदा-कदा जब उनके सन्देश मिलते तथा कभी मिलन हो जाने पर क्षेत्रा तथा वहाँ रहने वाले लोगों की प्रशंसा करते नहीं थकते हैं।
तहजीब की आवश्यकता तथा बनाये रखना जो शौका समाज के अच्छे संस्कारों के गुण धर्म को विकसित करना था। विरासत में मिला तहजीब व प्रकृति का अमूल्य उपहार प्राप्त कर सदैव यहाँ के वाशिन्दे अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

आधा संसार-एक मुनस्यार

देव सिंह बोरा
अनुपम सौन्दर्यमयी मुनस्यारी तहसील का पुराना नाम जीवार उर्फ जोहार है। मिलम ग्लेश्यिर के जिस स्थान से गोरी नदी निकलती है, उसके दाहिने तरफ बरफ से ढके पहाड़ का नाम जावार है। इसी जीवार पर्वत के नाम से इस क्षेत्र का नाम कालान्तर में जोहार हो गया। माना जाता है कि गोरी नदी इसी जीवार पर्वत के एक भाग को तोड़ कर हरलिंग (हंसलिंग) पर्वत को छूते हुए मुनस्यारी को दो भागों में सींचती हुई मदकोट जौलजीवी को चली जाती है। हरलिंग इतना उष्मावान है कि उसमें वर्फ टिक नहीं सकता। हरलिंग अर्थात शिवलिंग को गौरी (पार्वती) का नदी रूप में स्पर्श कर बह जाना रहस्यमीय है। शिव पार्वती की विवाह स्थली और पार्वती की तप स्थली हिमालय ही तो है। पहले जोहार एक पगरना थाा। विकट बन्दोबस्त, जो वर्ष 1863 में अल्मोड़ा जिले से प्रारम्भ हुआ था, के दौरान जोहार परगना को तल्ला देश जोहार व मल्ला देश जोहार दो पट्टियों में विभक्त किया गया। बाद में एक पट्टी गोरीपफाट बनया गया। जोहार-मुनस्यारी का एक पुराना नाम भोट प्रदेश भी है। यह भोट शब्द तिब्बत के बोध् शब्द से बना है। तिब्बत देश को वहाँ की स्थानीय भाषा में बोध् कहा जाता है।
कुमाउँ केशरी बी.डी.पाण्डे द्वारा लिखित कुमाउँ का इतिहास के अनुसार वर्ष 1790 तक मुनस्यारी में चंद वंश का शासन था। 1790 से 30 अप्रैल 1815 तक गोरखा राज (नेपालियों का) तथा 3 मई 1815 के बाद मुनस्यारी अंग्रेजों के अधीन हो गया।
प्रसिद्ध चंदवंशी राजा बाज बहादुर चंद ने वर्ष 1670 में भोट के रास्ते चल कर तिब्बतियों पर आक्रमण किया और तिब्बतियों से ताकललाखाल जीत कर आदेश जारी किए कि भोटिए लोग जो टैक्स तिब्बती राजा को देते हैं न दें। बाद में तिब्बत राजा द्वारा निवेदन करने व भविष्य में जोहारियों को रास्ते, व्यापार, धर्म के विषय में परेशान न करने का वचन देने पर पुनः टैक्स देने की सहमति बनी। राजा बाज बहादुर चंद के गाइड के रूप में जोहार भादू बूढ़ा तथा लोरू बिल्ज्वाल तिब्बत गए थे। राजा ने इनाम के रूप में इनको कुछ गाँव (पांछू, बुर्फू, पातू, धपा, तेली) जागीर में दिए। लोरू बिल्ज्वाल को कोश्यारी बाड़ा मिला।
मल्ला देश जोहार समुद्र तल से 330 मीटर से 4500 की उँचाई पर स्थित है। पहले इन दोनों पट्टियों के लोगों के रहन-सहन, खान-पान यहाँ तक कि वेशभूषा में भी अन्तर था। मल्लाजोहार का कुछ भाग 5 माह तक बर्फ से ढका रहता है शेष में शीत लहर का प्रकोप रहता है। लेकिन तल्लाजोहार घाटी में होने से मौसम के हिसाब से गरम रहता है। मुनस्यारी जो कि मल्लाजोहार व गोरी फाट पट्टियों का संयुक्त नाम था, अपने आप में विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम, प्राकृतिक सौन्दर्य, नदी-झरनों, हिमाच्छादित पर्वतों, जाति, वर्ण, धर्म आदि की विविधताओं के लिए प्रसि( रहा है। जो इस कहावत से सि( होता है- आध संसार-एक मुनस्यार।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जोहार के लोग अपने क्षेत्र को बहुत बड़ा समझते थे। यानि जोहारी लोग यह मानते थे कि आधे भाग में तो ईश्वर ने मुनस्यारी-जोहार ग्राम बनाए हैं और आधे भाग में शेष संसार को। लेकिन इतिहासकारों की यह टिप्पणी या व्याख्या सही प्रतीत नहीं होती। इस उक्ति के भावार्थ को इस क्षेत्रा से सम्बन्ध्ति विविधताओं को जोड़ कर समझा जाना चाहिये। मुनस्यारी छोटा क्षेत्र होने के बावजूद संसार के अनेक प्राकृतिक संरचनाओं, जातियों, वंशों की अनेकता को अपने में समेटे हुए है। संसार के अन्य भागों में पायी जाने वाली जातियां मंगोल, शक, गोरखा नेपाली, आर्य, तिब्बती, हूण, नाग, किरात, खस, राजस्थानी, हिमाचली, गढ़वाली, गुजराती आदि जाति धर्म के लोग इस छोटे से क्षेत्रा में रहते हैं। पूर्व में जाति धर्म के अनुसार बोली, भाषा जैसे तिब्बती, गोरखाली, पहाड़ी, गढ़वाली, हिमाचली आदि बोली जाती थी और उसी के अनुरूप विविध् पहनावा भी लोग पहनते थे। वर्तमान में मुनस्यारी में चारों वर्णों के लोग निवास करते हैं। मुनस्यारी तहसील में ब्राह्मणों व ठाकुरों की ही करीब 82 जातियां रहती हैं। यहाँ के शौका व्यापार के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं। तिब्बत व नेपाल के अतिरिक्त माल के लिए देश के सभी प्रमुख शहरों तक उनका व्यापार पफैला था। वे भारत का सामान ल्हासा, ज्ञानिमा मण्डी आदि तक बकरियों, घोड़ों से पहँुचा कर तिब्बती सामान भारत लाते थे। विकट रास्तों से कबरियों द्वारा सामान ढुलान करना खतरे से खाली नहीं था। इसलिए एक बकरी-दस ढकरी की आवश्कता होती थी। इस वंश के सुनपति शौका बहुत बड़े व्यापारी माने जाते थे। मुनस्यारी में विश्वविख्यात मिलम ग्लेश्यिर एवं पंचाचूली, राजरम्भा, हरलिंग, छिपलाकेदार, नन्दादेवी, नन्दाकोट आदि हिमालय पर्वत श्रृंखलाएं हैं। उनकी उपत्यकाओं में वनोषधि अतीश, कटिक, निरविष, गुग्गल, मासी, हाथजड़ी और कस्तूरीमृग, डफिया मुनाल आदि दुर्लभ पशु-पक्षियां पाये जाते हैं। बुग्याल में अनुपम छटा बिखेरते अनेकानेक पुष्प तथा ब्रह्मकमल जैसे नन्दन वन की शोभा बढ़ाते हैं। देवदार, भोजपत्रा, थुनेर, ल्वेंट आदि अनेक ज्ञात अज्ञात पादप तथा जलचर, थलचर व नभचर पाए जाते हैं।
मुनस्यारी रिषि मुनियों की तपोभूमि रही है। शान्ति के लिए रिषि मुनि यहाँ आते थे। प्रेम कथाओं में राजुला मालूशाही की प्रेम गाथा की गिनती- रोमियो-जुलियट, मालती-माध्व, हीर-रांझा की कोटि में होती है, जो इसी धरती से सम्बन्ध् रखते हैं।
उपरोक्त प्राकृतिक व सामाजिक विविधताओं के छोटे से क्षेत्र में विद्यमान होने के कारण आध संसार-एक मुनस्यार का पुरातन कथ्य प्रचलन में आया होगा, ऐसा प्रतीत होता है।

उनकी उपस्थिति मात्र से महफिल ठहर सी जाती थी

डाॅ.पंकज उप्रेती
25 फरवरी 2023 की प्रातः सीमा का फोन आया- ‘ददा, पिता जी नहीं रहे। मैं सीमा बोल रही हूं कपिल जी की बेटी।’
सीमा (भुवन कपिल जी की सुपुत्री), मैं एकटक सोच में डूब गया।
81 वर्षीय भुवन कपिल सच्चे रंगकर्मी थे, पहाड़ की होली और रामलीला में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा। हल्द्वानी शहर के मुखानी में रहने वाले कपिल परिवारों का शुरु से दबदबा रहा है। एक जमाने में जब मुखानी में दादाओं का नाम लेकर लोग डर जाते थे, खुली नहर में उफनते पानी को देख भयभीत हो जाते थे, भुवन कपिल का आवास सुरलहरियों में भीगा रहता था। मुखानी में होने वाली पर्वतीय रामलीला का बहुत नाम हुआ करता था। रात्रि में होने वाली रामलीला की तालीम से लेकर तैयारी तक इनके आवास पर होती। इसके अलावा मंगलवार को होने वाले सुन्दरकांड में युवाओं की टीम सक्रिय रहती। कपिल जी का आवास पूरी तरह अखाड़ा बना हुआ था, रात्रि को होली की महफिलों का जमजमा अब इतिहास बन चुका है। शायद ही कोई कलाकार रहा हो जो पहाड़ी ढब की होली को सुनने, सुनाने, देखने के लिये इनके आवास में न गया हो। पुराने जमाने के मकान में एक कमरा गोल आकार में था जिसमें लगातार होली की बैठक जमी रहती। बीच-बीच में चाय की चुस्की, पान-बीड़ी-सिगरेट………हर प्रकार के लोग जुटते और होली के भस्सी और उस्ताद भीमताल, नैनीताल, अल्मोड़ा से तक आया करते। इनमें कपिल जी का अपना स्टाइल था जो सबको सजग कर जाता। चाहे कोई किसी पद-कद का हो, गोल कमरे में सजने वाली महफिल में सब एक हो जाते। बाद में हिमालय संगीत शोध समिति का प्रशिक्षण केन्द्र इसी गोल कमरे में बना। उनका संरक्षण हम सभी के लिये रहा। होली की तीन-चार महीने तक चलने वाली खूबसूरत महफिलों में धुंआ- धुरमण्ड कोई मायने नहीं रखता था। श्रीमती ज्ञान कपिल की सेवा को भी नहीं भुलाया जा सकता है, जिन्होंने कपिल जी का पूरा साथ दिया और हर आने-जाने वाले मेहमान व कलाकारों होल्यारों को निभाया।
किन्हीं कारणों से मुखानी की रामलीला बन्द हो गई लेकिन होली की बैठकें वर्तमान तक जारी रही। उनके साथ ही बैठकों में इधर-उधर जाने का अवसर भी मिला। उनकी उपस्थिति मात्र से महफिल ठहर सी जाती थी। वह बैठक के बीच किसी भी प्रकार की आवाज बेकार को पसन्द नहीं करते और गाने से पहले कह देते ‘या तो आप ही बोलो या मुझे गा लेने दो।’ उनका स्वभावत सरल और कलाकार के रूप में मूडी था। वह खुले मन ने जीने वाले लोगों में से थे। कलाकार के अलावा अपनी संस्कृति संरक्षण के लिये वह समर्पित थे। स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद कपिल जी की अन्तिम चाह संगीत और महफिल रही। वर्तमान कें हल्द्वानी शहर में बहुत बदलाव आ चुका है, समय के साथ इस परिवार ने भी अपना को व्यवस्थित किया। जिस स्थान पर गोल कमरा हुआ करता था, उनके सुपुत्र मोहित का चिकित्सालय है और आवास कुछ ही दूरी पर है। अपने नये आवास में भी उन्होंने होली की बैठकें करवाई और पुरानी महफिलों की यादें को ताजा किया। स्वास्थ्य कारणों से वह लड़खड़ाए लेकिन उनकी धुन व जिद होली बैठक थी जिसके लिये वह हम दोनों भाई (पंकज-धीरज) को खूब याद करते और कहते- ‘मेरे हीरा-मोती हैं।’ महफिल सजती और होली के टीके की बैठक अनिवार्य रूप से की जाती। इस बार भी वह होली के लिये रुके थे लेकन ईश्वर की लीला को वही जाने। वह अपने पीछे पत्नी श्रीमती ज्ञान कपिल, सुपुत्र डाॅ.मोहित, विवाहित सुपुत्री सीमा सहित भरापूरा परिवार, मित्रों को छोड़ गये हैं। वह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी प्रेरणा से वह अभियान चलता रहेगा जो शुरु हुआ था