कमला: वह वीरांगना थी

महेश पाण्डे
सबसे कठिन होता है अपने किसी नजदीकी के बारे में लिखना। जिसको आप बचपन से से देखते-सुनते आये हैं उसके बारे में लिखना तो और भी मुश्किल होता है। फिर कमला पाण्डे-उप्रेती के बारे में कलम कितनी निरपेक्ष होकर लिखेगी, कहना मुश्किल है। रानीखेत में एक ही मोहल्ले खड़ी बाजार में आमने-सामने मकानों में पाँच मकान छोड़कर कमला का घर था। उन दिनों पूरी खड़ी बाजार एक परिवार की तरह था। जाति-धर्म भाषा का विभेद कोई मायने नहीं रखता था। सब रिश्ते सहज और आत्मीयता लियेे हुए थे। हमारी ईजा, चाची या जड़जा ताई जी थी। हमारी एक बहन जानकी ताउजी की लड़की थी। जानकी के बहाने सभी का घर में आना-जाना लगा रहता था। जानकी की देखा-देखी हमारी ईजा और हम लोग एक रिश्ते में बंध्े हुए थे। कब कमला और उसकी बहनों ने मुझसे दाज्यू कहना शुरु किया, याद नहीं पड़ता लेकिन यह रिश्ता आज तक अटूट बना हुआ है। इसी रिश्ते की डोर से मैं आज पंकज, ध्ीरू और मीनाक्षी का मामा बना हुआ हँू। कमला से अन्तिम मुलाकात वर्ष 2018 में रानीखेत में उमेश डोभाल स्मृति समारोह में बस चन्द मिनटों के लिए हो पायी थी। उसे सपरिवार गंगोलीहाट अपनी ससुराल और हाटकालिका मन्दिर जाना था। इसके बाद दो-तीन बार पफोन से अशल-कुशल का आदान-प्रदान हो पाया। उसके निधन के बाद 22 सितम्बर 2018 को परिवार को शोक सम्वेदना व्यक्त करने घर गया था।
रानीखेत में कमला की परवरिश एक भरे-पूरे और सम्पन्न परिवार में हुई। किसी चीज कर कोई अभाव नहीं था। शादी के कुछ वर्षों में ही तीनों बच्चे पैदा हो गए थे। सभी 7-8 साल से कम वय के थे। उप्रेती जी का फक्कड़पन कमला ने ससुराल आते ही पूरी तरह समावेषित कर लिया था। उनका घर शक्ति प्रेस गाँव-देहात के लोगोें की आश्रय स्थली हुआ करती थी। कितने ही लोगों ने वहाँ प्रेस का काम सीखा। अखबार निकालना सीखा। वहाँ जो भी आया वह आत्मनिर्भर होकर निकला।
जिन दिनों उत्तराखण्ड चिपको आन्दोलन से गुंजायमान था उन दिनों ‘उत्तर उजाला’ के बाद ‘शक्ति प्रेस-पिघलता हिमालय’ आन्दोलनकारियों का केन्द्र बने हुए थे। रात-विरात आन्दोलन के पर्चे-पोस्टर छापने का काम उप्रेती दम्पति के जिम्मे था। उन्होंने कभी किसी से माँगा भी नहीं। उल्टे चाय-नाश्ते की जिम्मेदारी भी उनके ही हिस्से जाती थी। कमला बीमार कैसे पड़ी यह भी एक अलग किस्सा है। किस्सा क्या बहुत त्रासदी है। इसने हँसते-खेलते उप्रेती परिवार को जबरदस्त संकट में डाल दिया। यह संकट आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक तीनों ही मोर्चों पर उभरकर सामने आया। हुआ यों कि एक दिन शाम को दोनों लोग घूमने गए हुए थे। आइसक्रीम वाले को देखकर कमला ने आइसक्रीम खाने की इच्छा जताई। आइसक्रीम खाने के बाद उसे हल्की-फुल्की खाँसी आती रही। जब दो-तीन दिन में भी खाँसी नहीं रुकी तो चिन्ता होने लगी। हल्द्वानी में इलाज चलता रहा, लेकिन खाँसी ठीक नहीं हुई, कुछ महीनों बाद उसने बिस्तर पकड़ लिया तो भवाली एडमिट करना पड़ा। उसके भवाली जाने से पूरे परिवार पर संकटों का पहाड़ टूट गया। बच्चे छोटे थे, उनको ननिहाल रानीखेत भेजना पड़ा। उप्रेती जी को प्रेस और अस्पताल के बीच लगातार चक्कर काटने पड़े। परिवार के भरण-पोषण के साथ ही दवा और कमला के पौष्टिक आहार के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी। डेढ़-दो साल तक बच्चों की परवरिश रानीखेत व गंगालीहाट घर में हुई। जब कमला का स्वास्थ्य कुछ सुध्रने लगा तो पहले पंकज-ध्ीरू और पिफर मीनाक्षी कुछ समयावधि के बाद हल्द्वानी आये। इनकी वापसी के साथ ही परिवार का आर्थिक संकट गहराने लगा। साप्ताहिक से दैनिक बना पिघलता हिमालय ने उनके सामने चतुर्दिक समस्याएं खड़ी कर दीं। मित्रों और परिचितों के सहयोग से उन्हें राहत मिली लेकिन तकादों की भरमार ने उन्हें काफी परेशान भी किए रखा। घर के जेवर तक उन्हें या तो गिरवी रखने पड़े या बेचने पड़े। परिवार की बड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें पिघलता हिमालय दैनिक से साप्ताहिक करना पड़ा। तब तक दुर्गा सिंह मर्तोलिया भी आर्थिक संकट से घिर चुके थे। किसी तरह उप्रेती जी, कमला और पंकज तब तक हाथ बँटाने और काम करने वाला हो गया था कड़ी मेहनत और घोर अभावों के बीच भी अखबार छापने से कभी पीछे नहीं हटे। यही कड़ी मेहनत आज भी पिघलता हिमालय के पीछे लगी हुई है।
बाद के वर्षों में शक्ति प्रेस बौद्धिक और सम्भ्रान्त नागरिकों का सबसे प्रिय केन्द्र बन चुका था। प्रसिद्ध रंगकर्मी बांकेलाल साह, साहित्कार गोबिन्द बल्लभ पन्त, डिग्री कालेज के शिक्षक, व्यापारी आदि वहाँ की बैठकी को अघोषित क्लब का स्वरूप दे चुके थे। इसी शक्ति प्रेस में कई दिनों की लम्बी बैठकों और विचार-विमर्श के बाद पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच ने आकार लेना शुरु किया। उन्हीं बैठकों का नतीजा आज हल्द्वानी की पहचान बन चुके पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच है। एक गृहणी के रूप में कमला भी कभी-कभार बैठकों में भाग लेती थी, उसके विचारों को भी लोग गम्भीरता से सुुनते थे। मंच में महिलाओं की भागीदारी का जो दृश्य आज हम देखते हैं उसके पीछे कमला की मेहनत भी है।
बाद के दिनों/वर्षों में कमला ने कई स्वैच्छिक संगठनों में काफी सक्रियता से भाग लिया, लम्बी यात्राएं भी कीं। उत्तराखण्ड आन्दोलन में उसकी सक्रियता से कोई अपरिचित नहीं है। उप्रेती दम्पति की संगीत के प्रति अत्यधिक लगाव ने तीनों बच्चों को अभावों के बीच भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से अलग-अलग विधाओं में दीक्षित कराया और आज तीनों की अपनी-अपनी विधाओं में अलग पहचान है। तीनों बच्चों और उप्रेती दम्पति के कठोर परिश्रम और साधना के रूप में हमें आज ‘हिमालय संगीत शोध् समिति’ जैसी बहुमुखी संस्था की विरासत मिली हुई है। उप्रेती जी के न रहने पर कमला ने तमाम शारीरिक कमजोरियों और बीमारी के बावजूद परिवार को एकजुट बनाये रखने में काफी दक्षता और कठिन श्रम से काम किया। वास्तव में वह वीरांगना थी। अभावों और कष्टों के बीच कैसे जिया जाता है कोई उससे सीखता। आज वह भौतिक रूप से जरूर हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी बोयी फसल अब सोने की तरह दमक रही है। माँ-बाप की विरासत को निरन्तर आगे बढ़ा रहे उनके बच्चों से यही उम्मीद है कि उनकी जलाई मशाल उनके साथ-साथ और लोगों के जीवन में भी उजाला करते रहे। जिस पिघलता हिमालय को वो छोड़ गये हैं उसकी पिघलन गंगा-यमुना का सदा नीरा जल हमेशा बहता रहे। आमीन।
9/1006 इन्दिरा नगर, लखनउ

2 Replies to “कमला: वह वीरांगना थी”

  1. बहुत ही खूबसूरती से बर्णन किया है उन कठिन परिस्थितियों का जिनका सामना करते हुए पत्रकारिता की ज्योत को जलाये रखा।

    1. आज भी उन चुनौतियों को स्वीकार रहे हैं। आप सभी सज्जन लोगों का संरक्षण मिलता रहे।

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