उत्तराखण्ड की रामलीला का संगीत

डाॅ.पंकज उप्रेती
विश्व रंगमंच पर राम के चरित्र को लेकर अनगिनत नाट्य खेले जाते हैं। वर्षों के काल क्रम बीतने पर भी विद्वानों ने नायक के रूप में राम को स्वीकारा है। इन्हीं की देन है- राम काव्य परम्परा तथा इसके आदिकवि हैं- वाल्मीकि। वेद-पुराणों में रामकथा के बीज देखने को मिलते हैं।
कल्याण के श्रीराम भक्ति अंक में रामकाव्यों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भगवान श्रीराम जैसे स्थावन-जंगमात्मक जगत् में सर्वत्र व्याप्त हैं, वैसे ही रामचरित्र भी किसी न किसी रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध है। रामचिरत्र के विषय में आर्ष ग्रन्थ के रूप में श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, आध्यात्म रामायण, आनन्द रामायण, अद्भुत रामायण, भुशण्डिरामायण, श्रीरामचरित मानस आदि कतिपय ग्रन्थ सर्वाधिक मान्य हैं। इसके साथ ही विभिन्न पुराणों में, विभिन्न सम्प्रदायों में तथा विभिन्न भाषाओं में रामकथा का निरूपण बड़े समारोह से हुआ है। राम काव्य को लोकनाट्य के रूप में ऐसी मान्यता मिली कि जन-जन मर्यादापुरुषोत्तम की लीला मंचन करने और देखने में विश्वास करता है। रामलीला के रूप में इसका जगह-जगह मंचन होता है।
लोकनाट्य के रूप में रामलीला और इसके संगीत पर चर्चा करने से पूर्व रामकथा के प्रारम्भिक रूप के विषय में जानना आवश्यक है। वैदिक साहित्य में अनेक व्यक्ति, जिनका चरित्र रामायण में वर्णित है, उनका निर्देश उपलब्ध होता है। इक्ष्वाकुवा निर्देश ऋगवेद संहिता में यह मिलता है- जिस जनपद के इक्ष्वाकु राजा है, उनके रक्षा स्वरूप कर्म में वह प्रदेश बढ़ता है। अर्थवेद में भी इक्ष्वाकु के नाम का उल्लेख मिलता है- औषधे! जिस प्रसिद्ध प्राचीन इक्ष्वाकु राजा ने तुम्हें सभी व्याधियों के नाश के रूप में जाना।3 ‘मन्त्ररामायण’ नामक नामक ग्रन्थ जो पं.नीलकण्ठ ने लगभग चार सौ वर्ष पूर्व लिखा है, में ऋगवेद के मन्त्रों से रामायण कथा निकाली है। सायण आदि भाष्यों में यह अर्थ उपलब्ध नहीं है। इसका कारण यह है कि भाष्यकारों ने मन्त्रों का भाष्य यज्ञ-परक किया है। वेदों के अनेक अर्थ होते हैं। अतः इतिहासपरक नीलकण्ठ का भाष्य भी उपयुक्त है। जब रामायण को वेद का अवतार माना जाता है, तब मन्त्रों का रामपरक भाष्य निर्मूल है। ऋगवेद की ऋचा में रामायण का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि भगवान राम-सीता के साथ तपोवन में आये। दूसरे चरण में बताया गया है कि राम और लक्ष्मण पीछे रावण छिपकर सीता के पास आया और उसने उनका हरण कर लिया। तीसरे तरण में यह बताया गया है कि हनुमान ने लंका में आग लगा दी और चैथे चरण में कहा गया है कि रावण युद्ध के लिये राम के सम्मुख आ गया। दशरथ का उल्लेख भी ऋगवेद में मिलता है- ‘लाल रंग और भूरे रंग के दशरथ के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का नेतृत्व करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में कैकेय का उल्लेख इस रूप में है- ‘उन्होंने कहा कि ये अश्वपति कैकेय इस समय वैश्वानर को जातने हैं।’ जनक का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में बहुधा हुआ है। ब्रहम्पुराण में रामकथा के अंश सर्वत्र विखरे पड़े हैं। अठारह पुराणों के गणनाक्रम में ब्रह्मपुराण की गणना सबसे पहले होती है, इसलिये इसे आदि पुराण भी कहा जाता है। देवताओं व दानवों के युद्ध में कोई निर्णय न हो पाने की स्थिति में आकाशवाणी होती है कि जिस पक्ष की ओर से राजा दशरथ लड़ेंगे, उसी की विजय होगी। पद्मपुराण में रामकथा का उल्लेख कई बार हुआ है। इसके सृष्टि खण्ड में भगवान की वनयात्रा, तीर्थयात्रा तथा पुष्कर में श्राद्धादि का वर्णन है। उत्तरखण्ड में 242 अध्याय से 246 अध्याय तक रामकथा पूरी कह दी गयी है।9 महापुराणों की के गणनाक्रम में शिव पुराण चैथे स्थान पर परिगणित है। इसमें श्रीराम की कथा कई स्थानों पर आयी है। एक उदाहरण प्रस्तुत है- रावण द्वारा सीता के हरण के बाद राम-लक्ष्मण जब सीता की खोज में निकलते हैं, उस समय शिव अपने आराध्य श्रीराम को देखते हैं और कहते हैं, ये मनुष्य नहीं साधुओं की रक्षा तथा हमारे कल्याण के लिये स्वयं परब्रह्म के रूप में अवतरित हुए है, इनके छोटे भाई लक्ष्मण शेषावतार हैं।
यद्यपि वेद पुराण में रामकथा के कई कथासूत्र मिलते हंै तथापि महर्षि वाल्मिकी ने रामायण काव्य में राम के सम्पूर्ण जीवन पर पहली बार प्रकाश डालते हुए संसार को राम-कथा महाकाव्य के रूप में अमूल्य निधि दी। भारतीय रामकाव्य के विकास में रामायण के पश्चात कई अन्य रामकाव्यों का उल्लेख मिलता है, उनमें आध्यात्म रामायण प्रमुख है। इसके अतिरिक्त अनेक रामायणों का योगदान रामकाव्य में है। जैसे- लोमेश रामायण, मन्जुल रामायण, सौहार्द रामायण, श्रवण रामायण, दुरन्त रामायण, देव रामायण इत्यादि परन्तु ‘श्रीमद्भागवत’ में श्रीराम के चरित्र का संक्षेप वर्णन होते हुए भी लालित्यपूर्ण है। इसके नवम् स्कन्ध में कहा गया है कि जिन्होंने भगवान राम का दर्शन और स्पर्श किया, उनका अनुगमन किया, वे सब तथा कौशलादेश के निवासी भी उसी लोक में गये, जहाँ बड़े-बड़े योगी योग साधना द्वारा जाते हैं। रामकाव्य की इस धारा में तुलसीदास ने जो अद्भुत कार्य किया वह गेय रूप में अमर है। रामचरित पर तुलसीदास का मंतव्य है कि कवितारूपी मुक्तमणियों को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित रूपी सुन्दर तागे में पिरोकर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं, जिससे अत्यन्त अनुराग रूपी शोभा होती है, वे अत्यन्त आनन्द को प्राप्त करते हैं। काव्य के बाद मर्यादापुरुषोत्तम राम के चरित्र को लेकर नाट्य रूप में इसका प्रस्तुतिकरण भी होने लगा। इसी क्रम में उत्तराखण्ड की रामलीला है। जिसका मंचन गेय नाट्य के रूप में होता है। पहाड़ की रामलीला का सबसे महत्वपूर्ण अंग इसका संगीत ही है। इसीलिये सबसे अधिक ध्यान गेयता पर ही दिया जाता है। भारतीय शास्त्राीय संगीत का इसमें गहरा प्रभाव है। कई शास्त्रीय रागों की बहुलता इसके गीतों में दिखाई देती है। जैसे- विलावल, पीलू, देश, विहाग, जयजयवन्ती, भैरवी, झिंझोटी, मालकोंस आदि। मंचन के दौरान सम्वादों में प्रभावोत्पादकता लाने के लिये पात्र सस्वर मानस की चैपाईयों का पाठ भी करते हैं। तुलसीदास की चैपाईयों के साथ सम्वादों में प्राचीन कवित्त, सवैया आदि छन्दों, राधेश्याम की रामायण के उद्धरणों तथा नौटंकी शैली की लोकप्रिय धुन ‘बहरे तवील’ भी सुनने को मिलती है।
उत्तराखण्ड में गीतनाट्य रामलीला का शुभारम्भ अल्मोड़ा नगर से माना जाता है। इसका शुभारम्भ 18वीं सदी के अन्तिम भाग में कुमाऊँ की राजधानी अल्मोड़ा में हुआ। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के उदीयमान कलाकार स्व.प्रगति साह ने अपने शोध प्रबन्ध में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रवक्ता स्व.मोहन उप्रेती की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए बताया था- ‘‘सन् 1886 में अल्मोड़ा के श्री देवीदत्त जोशी ने पहले पहल रामलीला का प्रस्तुतीकरण गेयनाटक के रूप में किया। पहले अल्मोड़ा में केवल दशहरे के ही दिन राम जुलूस निकलता था और खुले मैदान में रावण का पुतला जलाते थे। सम्भव है कि श्री जोशी ने उत्तर भारत में रामलीला प्रदर्शनों की लोकप्रियता को देखकर स्वयं राम भक्त होने के नाते अपने निवास स्थान अल्मोड़ा में भी उसे आरम्भ करने का निश्चय किया हो और यह भी सम्भव है कि गेय शैली में प्रस्तुत करने की प्रेरणा उन्हें अपने संगीत प्रेम के कारण मिली होगी। अल्मोड़ा से प्रारम्भ हुई उनकी यह गेय रामलीला शीघ्र ही समूचे कुमाऊँ-गढ़वाल क्षेत्र में दशहरे के उत्सव का प्रमुख आकर्षण का केन्द्र बन गई।’’ कुमाऊँ की सर्वप्रथम रामलीला के बारे में मतभेद हैं किन्तु सन् 1860 में प्रथम बार अल्मोड़ा में रामलीला के पक्ष में अधिक लोगों का मत है। वर्तमान में सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में लोकनाट्य के रूप में जो रामलीला मंचन होता है उसका मूल स्वरूप इसके कर्णप्रिय गीत-संगीत को लेकर है। राम सेना और रावण सेना के पात्रों के मुंह से विभिन्न राग-तालों में जिस प्रकार गीत, चैपाई, छन्द, सम्वाद सुनाई देते हैं वह लोकनाट्य होते हुए भी शास्त्रीय पक्ष को अपने में समेटे हुए है। प्रस्तुत हैं उत्तराखण्ड में मंचित होने वाली रामलीला के कतिपय गीत-
यमनकल्याण
सीता रावण से- अरे रावण तू धमकी दिखाता किसे,
मुझे मरने का खौफो खतर ही नहीं।
मुझे मारेगा क्या अपनी खैर मना,
तुझे होने की अपनी खबर ही नहीं।।
तू जो सोने की लंका का मान करे,
मेरे आगे वह मिट्टी का घर ही नहीं।
मेरे दिल का सुमेरू डिगे वो कहाँ,
मेरे मन में किसी का डर ही नहीं।।
उक्त गीत को कई बार ‘बहरे तवील’ नौटंकी की धुन में भी सुना जाता है परन्तु अभ्यास के लिये दीपचन्दी ताल में इसे यमन में पिरोया है और गाया जाता है।
भैरवी
राग भैरवी में कई गीत रामलीला नाट्य मंचन में सुनने को मिलते हैं। उदाहरण के लिये राम-कौशल्या सम्वाद का यह गीत प्रस्तुत है, जो कहरवा ताल में है-
आज पिता ने वनों का राज हमे दीन्हा।
पिता वचन नहिं टालना, यही हमारा काम।।
बरस चैदह वन जाइके पुनः मिलेंगे आय।
करो तुम पत्थर का सीना, वनों का राज हमें दीना।।
राग भैरवी का एक और गीत भी प्रस्तुत है जो वन जाने से पूर्व राम माता कौशल्या को समझाते हुए कह रहे हैं-
क्यों तू रुदन मचावे जननी, आँसू थाम-थाम-थाम।
नहिं दोषु मातु का माता, लिख दिया था यही विधाता।
अब क्या हाथ मले से आता, है विधि बाम-बाम-बाम।
लिखते हैं वेद अरु गीता, सब झूठी जग की रीत।
सदा रहा है नहिं कोई जीता, है एक नाम-नाम-नाम।
सिन्धभैरवी ताल दादरा का एक गीत प्रस्तुत है जिसे मन्थरा द्वारा गाया जाता है। मन्थरा रानी कैकयी को राम के विरुद्ध भड़काते हुए कहती है-
क्यों तुम हो भूल बैठी सुनिये हो राजरानी।।
कल राम राज पावें, राजा ने मन में ठानी।
संकट भरत को होगा, नहिं पावे राजधानी।।
इसी प्रकार सिन्ध भैरवी में एक और उदाहरण प्रस्तुत है जब बालक राम-लक्ष्मण वाटिका में भ्रमण करते हैं तो लक्ष्मण सीता को देख राम से कहते हैं-
देखो जी देखो महाराज यह ललनी।
संग सखी मिल मंगल गावें,
सिर पर सोहे देखो ताज यह ललनी।।
ललित मधुर चितवन अति नीकी,
फिरत है कौन से काज यह ललनी।।
खमाज
रामलीला की चैपाईयों में खमाज राग का प्रभाव है। एक उदाहरण (राग खमाज ताल विलम्बित कहरवा) प्रस्तुत है जब जनक दरवार में गुरु विश्वामित्र अचानक आ जाते हैं। दशरथ पूछते हैं-
केहि कारण आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लाउब बारा।
कृपा करहु मोहिं देहु बताई। कीन्ह पवित्र मोर गृह आई।
राम तर्ज के अलावा राक्षसी तर्ज भी गीतों के उदाहरण हैं। वन में राम-लक्ष्मण को देख ताड़िका कहती है-
बिलावल, ताल- कहरुवा
रे नृप बालक काल ग्रसाये। क्यों तुम सन्मुख मेरे आये।
जिनके आये करन सहाई। ते डरपोक विप्र मुनि राई।।
बिलावल में एक अन्य उदाहरण प्रस्तुत है जब सूर्पनखा राम-लक्ष्मण को वन में अकेला पाकर रिझाती है-
प्रभु जी हमें वर लेओ, हमें वर लेओ।
एक तो मैं नीकी नार, हमें वर लेओ।
एक तो मैं बाली मैं बाली, मैं भोली मैं भोली।
दूजे भाई दसशीश, हमें वर लेओ।
दूजे मस्त जवानी, हमें वर लेओ।
गारा
विभीषण रावण को सझाते हुए कहते हैं राम से युद्ध मत करो-
मेरी मानो कहँु भईया, वे तो हैं रघुवीर।।
मैं तुमसे कहँू समुझाई, चित्त करके सुनो मम भाई,
पर नारी न लावो चुराई, तुम तो हो रणधीर।।
उस कुमति बसी विपरीती, ताते तुम करहु अनीती,
हित अनहित मानत प्रीती, सुनिये हो अति धीर।।
मांड
धनुषयज्ञ के समय जब रावण अभिमान के साथ सम्वाद करता है तब बाणासुर कहता है-
वृथा अभिमान क्यों करता अरे रावण सभा के बीच।
नहीं शिव धनु पुराना है, बनाया बज्र विधाता ने,
लिये पहचान भगवत को पिता बलिदान दिया उनको।।
इसी प्रकार वनवास के समय सीता जी कहती हैं। मांड-
पड़ी है धूप गरमी से,
लगी है प्यास अति भारी।
कहीं छाया नहीं दीखे,
मैं चलती नाथ अब हारी।।
झिंझोटी-
राम-लक्ष्मण को वन में देख सूर्पणखा मुग्ध हो जाती है और लक्ष्मण से झिंझोटी के स्वरों में गाती हुए कहती है-
मैं तो छोड़ आयी लंका का राज,
लखन लाल तेरे लिये।।
भाई भी छोड़ा मैंने, बहिना भी छोड़ी,
छोड़ आयी सारा परिवार, लखन लाल तेरे लिये।।
बाग भी छोड़ा, बगीचा भी छोड़ा
छोड़ आयी सारा संसार, लखन लाल तेरे लिये।।
तिलककामोद-
लक्ष्मण-परशुराम सम्वाद में यह गीत है-
लक्ष्मण परशुराम से- पिनाक पुराना, काहे रिस होत।।
ऐसे धनुष बहुत हम तोड़े, कबहँु न क्रोध नहिं कीन्हा।
या में ममता है केहि कारण, जो देखत भृगुनाथ रिसाना।।
बार-बार मोहे परशु दिखाकर, क्यों करते अभिमाना।
जो कायर तुम मिले मुनि जी, उन्हीं को तुम जा धमकाना।।
इस प्रकार कई राग-रागनियों, मिश्रित रागों, धुनों में रची-बसी उत्तराखण्ड का रामलीला नाटक अद्भुत है। ग्यारह दिनों तक रामलीला मंचन में जब गेयता चढ़ती जाती है तो श्रोता मुग्ध हो जाता है।

जैं श्री ह्या छूड.ग सैं ‘इष्ट देव’ ग्राम तिदंग

इतिहास कथा

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
तिदांग में सर्वप्रथम ‘जैं रंचिम सैं’ का युग था। फिर सुम कच्यरों पैं (तीन कच्यरों भाई) का युग आया। उसके बाद तिदांग में ‘ह्या छूड.ग सैं’ का युग आया। ह्या छूड.ग से जब अपने मूल निवास स्थान- किदांग, तिब्बत से पश्चिम-दक्षिण हिमालयी क्षेत्र में भ्रमण करने निकले, तिदांग की अलौकिक सुन्दरता यहाँ से चारों ओर दिखाई देने वाला प्राकृतिक नैसर्गिकता और ग्राम जनों का परस्पर स्नेह को देखकर तिदांग को ही अपना निवास स्थान बनाने का निश्चय किया। तब ग्राम- तिदांग, नदी के पास का उच्च मैदानी भू-भाग ‘आधा नमीयुक्त हरियाली और आधा बंजरनुमा भूभाग’ हुआ करता था। समय बीतने के साथ-साथ हरियाली नुमा बंजर (सूखते जा रहे) होते जा रहे खेतीनुमा भू-भाग के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने जाना कि इस भू-भाग के नीचे बड़ा सा पत्थर है। इस पत्थर के नीचे एक साँप (खोबू) रहता है, जिसके तासीर (ताप) से तिदांग गाँव का मैदानी खेती युक्त भू-भाग बंजर होते जा रहा था, इस साँप को मारने के लिये ह्या छूड.ग सैं ने ‘चूहा और गरुड़ पक्षी’ का रूप धारण कर साँप को बाहर निकालकर उसे मार डाला और मरे हुए साँप को अपनी चोंच में पकड़कर आस-पास के ग्रामों में घुमा-घुमाकर हवाई रास्ते से किदांग (तकलाकोट )क्षेत्र ले जाकर दफना दिया। इस दौरान जब ह्या छूड.ग सैं वापस दितांग गाँव में पहुंचते हैं तो तिदांग की 30 प्रतिशत बजंर (सूखते) मैदानी भू-भाग, हरा-भरा खेतीनुमा मैदानी भू-भाग में बदल गया। जिस हरा-भरा खेती नुमा मैदानी भू-भाग में साँप की तासीर का प्रभाव अत्यधिक पड़ा उस भू-भाग में आज से 300-400 साल पहले तक उसका प्रभाव साफ दिखाई देता था। ऐसा बड़े-बुजुर्ग जनों का कहना है।
इस भौगोलिक परिवर्तन को देखकर सभी ग्रामजन खुश हुए और ह्या छूघग सैं की दिव्य शक्ति को देखकर ग्रामजनों ने उनका धन्यवाद किया। और उन्हें यहीं रहने का आग्रह करते हुए उनको प्रतिष्ठित कर पूजा-अर्चना का विशेष आयोजन किया। ग्रामजनों की श्रद्धापूर्वक भक्ति को देखकर ह्या छूड.ग सैं ने ग्राम तिदांग को ही अपना स्थाई निवास बनाने का निर्णय किया।
तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ के युग के दौरान बौन-ग्राम में एक शक्तिशाली तंत्र-मंत्र ज्ञाता (विद्वान) ‘हबा लाटौ’ रहता था। दारमा के ग्राम्य जनों के द्वारा देवी-देवताओं को पूजा-पाठ के माध्यम से चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा, बौन के तंत्र-मंत्र ज्ञाता हबा लाटौ इस चढ़ावा को देवी-देवताओं से पहले स्वतः ग्रहण कर लेते थे, जिससे देवी-देवताओं को यह चढ़ावा उन तक नहीं पहुंच पाता था। इस समस्या को हल करने के लिए भोले शिव के अवतारक दाँतू (दंग्तो) ‘‘ह्या गबला देव’’ ने अपने तपोस्थली ग्राम दाँतू के दं थं प्रांगण में दारमा के सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया। सभी देवी-देवतागण निमंत्रण मिलते ही सोंग (ग्राम) दं थं प्रांगण में उपस्थित हो गए। तिदांग ह्या छूड.ग सैं भी साधारण व्यक्ति के समान तिब्बती पहनावा व टेढ़ी टोपी पहनकर टट्टू (गधा) में सवार होकर सभा प्रांगण में पहुंचे।
किसी देवी-देवताओं ने भी ह्या छूड.ग सैं की उपस्थिति पर ध्यान नहीं दिया। ह्या छूड.ग सैं सभा प्रांगण से कुछ दूरी पर बैठकर सुस्ताने लगे। अपने टोपू (हुक्का) में तम्बाकू भरकर गधा (बाँगजु) के त्यागा (काठी) से च्यामा (आग प्रज्जवलित करने का पदार्थ) रगड़ कर आग पैदा की और तम्बाकू सुलगा कर हुक्का पीने लगे, तत्काल अपनी प्यास बुझाने के लिए अपनी मुट्ठी तेजी से जमीन की ओर फैंका, उस स्थान से फव्वारे की तरह पानी निकल आया। जिससे ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने वह पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। सभा में उपस्थित सभी देवी-देवतागण इस अद्भुत दिव्य-शक्ति को देखकर अचम्भित हो गए। सभी देवी-देवता ह्या छूड.ग सैं की असाधारण दिव्य-शक्ति देकर सभा में स्थान ग्रहण करने को कहा, लेकिन ह्या छूड.ग सैं ने कहा- ‘मैं अपनी जगह पर ही ठीक हूं। आप अपनी सभा प्रारम्भ कीजिए।’ सभा में ‘हबा लाटो’ के विषय पर प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, इस समस्या का निवारण करने के लिए जैं श्री ह्या गबला देव ने सभा में उपस्थित प्रत्येक देवी-देवता गणों से पूछा/प्रश्न किया। ह्या छूड.ग सैं के अलावा सभी देवी-देवताओं ने इस विषय में असमर्थता व्यक्त की। आंखिर में ह्या छूड.ग सैं से प्रश्न किया। उन्होंने सिर हिलाते हुए हामी भर दी। साथ ही ‘होला दम्फू सैं’ ने भी हाथ खड़ा कर हामी भरा। तब ह्या गबला देव, होला दम्फू सैं से पूछता है कि तुमने हाँ किस लिये किया। तब दम्फू सैं ने उत्तर दिया कि ‘ह्या छूड.ग सैं मेरे मामा हैं। इस समस्या को हल करने में जो कार्य वे मुझे सौंपेंगे, मैं वह कार्य करूंगा।’ इस प्रकार सभा पूर्ण हुई। सभी देवी-देवता गण अपने-अपने निवास स्थान को चले गए। ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू में सवार होकर तिदांग के लिए रवाना हो गए। ह्या छूड.ग सैं की अद्भुत दिव्य शक्ति और हबा लाटौ विषय पर कार्य सपफलता की परीक्षा लेने के लिए ह्या गबला देव ने उनके पीछे से तीव्र आंधी-तूफान प्रहार किया। जैं श्री ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू को तेजी से दौड़ाते हुए इतनी तेजी से ढाकर ‘गिलीघ’ नामक मैदान मेें पहुंचे , कि आंधी-तूफान भी उन्हें छू नहीं सके और वह तूफान उनकी टेड़ी टोपी को भी हिला न सका। तभी इस घटनाक्रम से ह्या गबला देव को पूर्ण विश्वास हो गया कि ह्या छूड.ग सैं के पास ही ऐसी शक्ति है जो हबा लाटौ जी के द्वारा देवी-देवताओं का प्रसाद जबरदस्ती ग्रहण करने की समस्या से निजात दिलाएगा। उस जमाने में तिब्बती लोग अपने भेड़-बकरियों, याक में नमक, सुहागा, छयूरा और अन्य सामग्री लादकर दारमा-पश्चिम तिब्बत सीमान्त परिक्षेत्र में व्यापार के लिए आया-जाया करते थे और दोनों क्षेत्र के व्यापारी परस्पर मित्रता रखा करते थे, ग्राम-बौन के हबा लाटौ का भी तिब्बती व्यापारियों से घनिष्ट मित्रता थी। तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने अपने अपनी दिव्य मंत्र-शक्ति का प्रयाग कर तिब्बती चन (भूत) का आह्वान किया और उसे हिदायत देते हुए कहा कि तुम अपने कुछ साथियों को लेकर सैकड़ों भेड़-बकरियों के साथ गो से आगे गोतो-रामा के मैदान में सही समय और मौसम को देखकर प्रकट हो जाना। एक दिन ह्या छूड.ग सैं को तिब्बती चन (भूत) ने रामा गोतो दं (उंचा स्थान) के मैदान में प्रकट होने का सन्देश भिजवाया और तभी ह्या छूड.ग सैं ने ‘लिंकम दं थं’ व ‘गोतो दं’ के बीच का चट्टानी रास्ता पूर्णतया बर्फ से ढकवा दिया और अपने भान्जे ‘होला दंफू सैं’ को ‘बौर बा लाटौ’ के पास व्यापारिक सूचना सूचित करने के लिए भेजा और हबा लाटौ जी से कहना तुम्हारे तिब्बती व्यापारिक मित्रगण अपने सैकड़ों भेड़-बकरियों और विनिमय सामान के साथ ‘रामा-गोतो दं’ (उंचा स्थान) के थं(मैदान) में डेरा लगाकर बैठे हैं, और तुम्हें जल्दी से जल्दी मिलने के लिए कहा है। इस पर हबा लाटौ जल्दी-जल्दी अपने मित्रों से मिलने के लिए अपने निवास स्थान से व्यापारिक परिक्षेत्र की ओर रवाना हो गया और जब ‘गोतो-लिंकम दं’ (उंचा स्थल) का पहाड़ी रास्ता बर्फ से ढका हुआ दिखाई दिया, तब ‘बौन हबा लाटौ’ बर्फ में डूबने व फिसलने से बचने के लिए तन्त्र विद्या का प्रयोग करते हुए, अपने जेब से ‘सरसों का दाना’ निकालकर अपने से आगे फैंकते गया, सरसों का दाना फेंकते ही सरसों के दाने का पत्थर बन गया। उन्हीं पत्थरों में छलांग लगाते हुए, आगे बढ़ते गए। जैसे ही बर्फीला आधा रास्ता तय कर लिया, तब उनका सरसों का दाना खत्म हो गया, अब ‘हबा लाटौ’ का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। साथ ही पीठ पीछे के सरसों से बना पत्थर भी अदृश्य हो गया, उसी समय तिदांग ह्या छूड.ग सैं ने उपर पहाड़ से बर्फ का बर्फीला तूफान करवाया और हबा लाटौ का अन्त हो गया। ऐसा कहा जाता है कि जिस स्थान पर हबा लाटौ दब गया था, वहाँ पर बहुत बड़ा टीला बन गया, जो अभी भी मौजूद है।
तंत्र-मंत्र ज्ञाता ‘हबा लाटौ’ को मारने के बाद इलाके के सभी देवी-देवतागणों को मनुष्यों के द्वारा चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा पूजा-पाठ खाद्य सामग्री सर्वप्रथम मिलना शुरु हो गया।
‘जैं हो किदांग जु (के)-
तदांग ह्या छूड.ग सैं’