जैं श्री ह्या छूड.ग सैं ‘इष्ट देव’ ग्राम तिदंग

इतिहास कथा

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
तिदांग में सर्वप्रथम ‘जैं रंचिम सैं’ का युग था। फिर सुम कच्यरों पैं (तीन कच्यरों भाई) का युग आया। उसके बाद तिदांग में ‘ह्या छूड.ग सैं’ का युग आया। ह्या छूड.ग से जब अपने मूल निवास स्थान- किदांग, तिब्बत से पश्चिम-दक्षिण हिमालयी क्षेत्र में भ्रमण करने निकले, तिदांग की अलौकिक सुन्दरता यहाँ से चारों ओर दिखाई देने वाला प्राकृतिक नैसर्गिकता और ग्राम जनों का परस्पर स्नेह को देखकर तिदांग को ही अपना निवास स्थान बनाने का निश्चय किया। तब ग्राम- तिदांग, नदी के पास का उच्च मैदानी भू-भाग ‘आधा नमीयुक्त हरियाली और आधा बंजरनुमा भूभाग’ हुआ करता था। समय बीतने के साथ-साथ हरियाली नुमा बंजर (सूखते जा रहे) होते जा रहे खेतीनुमा भू-भाग के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने जाना कि इस भू-भाग के नीचे बड़ा सा पत्थर है। इस पत्थर के नीचे एक साँप (खोबू) रहता है, जिसके तासीर (ताप) से तिदांग गाँव का मैदानी खेती युक्त भू-भाग बंजर होते जा रहा था, इस साँप को मारने के लिये ह्या छूड.ग सैं ने ‘चूहा और गरुड़ पक्षी’ का रूप धारण कर साँप को बाहर निकालकर उसे मार डाला और मरे हुए साँप को अपनी चोंच में पकड़कर आस-पास के ग्रामों में घुमा-घुमाकर हवाई रास्ते से किदांग (तकलाकोट )क्षेत्र ले जाकर दफना दिया। इस दौरान जब ह्या छूड.ग सैं वापस दितांग गाँव में पहुंचते हैं तो तिदांग की 30 प्रतिशत बजंर (सूखते) मैदानी भू-भाग, हरा-भरा खेतीनुमा मैदानी भू-भाग में बदल गया। जिस हरा-भरा खेती नुमा मैदानी भू-भाग में साँप की तासीर का प्रभाव अत्यधिक पड़ा उस भू-भाग में आज से 300-400 साल पहले तक उसका प्रभाव साफ दिखाई देता था। ऐसा बड़े-बुजुर्ग जनों का कहना है।
इस भौगोलिक परिवर्तन को देखकर सभी ग्रामजन खुश हुए और ह्या छूघग सैं की दिव्य शक्ति को देखकर ग्रामजनों ने उनका धन्यवाद किया। और उन्हें यहीं रहने का आग्रह करते हुए उनको प्रतिष्ठित कर पूजा-अर्चना का विशेष आयोजन किया। ग्रामजनों की श्रद्धापूर्वक भक्ति को देखकर ह्या छूड.ग सैं ने ग्राम तिदांग को ही अपना स्थाई निवास बनाने का निर्णय किया।
तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ के युग के दौरान बौन-ग्राम में एक शक्तिशाली तंत्र-मंत्र ज्ञाता (विद्वान) ‘हबा लाटौ’ रहता था। दारमा के ग्राम्य जनों के द्वारा देवी-देवताओं को पूजा-पाठ के माध्यम से चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा, बौन के तंत्र-मंत्र ज्ञाता हबा लाटौ इस चढ़ावा को देवी-देवताओं से पहले स्वतः ग्रहण कर लेते थे, जिससे देवी-देवताओं को यह चढ़ावा उन तक नहीं पहुंच पाता था। इस समस्या को हल करने के लिए भोले शिव के अवतारक दाँतू (दंग्तो) ‘‘ह्या गबला देव’’ ने अपने तपोस्थली ग्राम दाँतू के दं थं प्रांगण में दारमा के सभी देवी-देवताओं को निमंत्रित किया। सभी देवी-देवतागण निमंत्रण मिलते ही सोंग (ग्राम) दं थं प्रांगण में उपस्थित हो गए। तिदांग ह्या छूड.ग सैं भी साधारण व्यक्ति के समान तिब्बती पहनावा व टेढ़ी टोपी पहनकर टट्टू (गधा) में सवार होकर सभा प्रांगण में पहुंचे।
किसी देवी-देवताओं ने भी ह्या छूड.ग सैं की उपस्थिति पर ध्यान नहीं दिया। ह्या छूड.ग सैं सभा प्रांगण से कुछ दूरी पर बैठकर सुस्ताने लगे। अपने टोपू (हुक्का) में तम्बाकू भरकर गधा (बाँगजु) के त्यागा (काठी) से च्यामा (आग प्रज्जवलित करने का पदार्थ) रगड़ कर आग पैदा की और तम्बाकू सुलगा कर हुक्का पीने लगे, तत्काल अपनी प्यास बुझाने के लिए अपनी मुट्ठी तेजी से जमीन की ओर फैंका, उस स्थान से फव्वारे की तरह पानी निकल आया। जिससे ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने वह पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई। सभा में उपस्थित सभी देवी-देवतागण इस अद्भुत दिव्य-शक्ति को देखकर अचम्भित हो गए। सभी देवी-देवता ह्या छूड.ग सैं की असाधारण दिव्य-शक्ति देकर सभा में स्थान ग्रहण करने को कहा, लेकिन ह्या छूड.ग सैं ने कहा- ‘मैं अपनी जगह पर ही ठीक हूं। आप अपनी सभा प्रारम्भ कीजिए।’ सभा में ‘हबा लाटो’ के विषय पर प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, इस समस्या का निवारण करने के लिए जैं श्री ह्या गबला देव ने सभा में उपस्थित प्रत्येक देवी-देवता गणों से पूछा/प्रश्न किया। ह्या छूड.ग सैं के अलावा सभी देवी-देवताओं ने इस विषय में असमर्थता व्यक्त की। आंखिर में ह्या छूड.ग सैं से प्रश्न किया। उन्होंने सिर हिलाते हुए हामी भर दी। साथ ही ‘होला दम्फू सैं’ ने भी हाथ खड़ा कर हामी भरा। तब ह्या गबला देव, होला दम्फू सैं से पूछता है कि तुमने हाँ किस लिये किया। तब दम्फू सैं ने उत्तर दिया कि ‘ह्या छूड.ग सैं मेरे मामा हैं। इस समस्या को हल करने में जो कार्य वे मुझे सौंपेंगे, मैं वह कार्य करूंगा।’ इस प्रकार सभा पूर्ण हुई। सभी देवी-देवता गण अपने-अपने निवास स्थान को चले गए। ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू में सवार होकर तिदांग के लिए रवाना हो गए। ह्या छूड.ग सैं की अद्भुत दिव्य शक्ति और हबा लाटौ विषय पर कार्य सपफलता की परीक्षा लेने के लिए ह्या गबला देव ने उनके पीछे से तीव्र आंधी-तूफान प्रहार किया। जैं श्री ह्या छूड.ग सैं अपने टट्टू को तेजी से दौड़ाते हुए इतनी तेजी से ढाकर ‘गिलीघ’ नामक मैदान मेें पहुंचे , कि आंधी-तूफान भी उन्हें छू नहीं सके और वह तूफान उनकी टेड़ी टोपी को भी हिला न सका। तभी इस घटनाक्रम से ह्या गबला देव को पूर्ण विश्वास हो गया कि ह्या छूड.ग सैं के पास ही ऐसी शक्ति है जो हबा लाटौ जी के द्वारा देवी-देवताओं का प्रसाद जबरदस्ती ग्रहण करने की समस्या से निजात दिलाएगा। उस जमाने में तिब्बती लोग अपने भेड़-बकरियों, याक में नमक, सुहागा, छयूरा और अन्य सामग्री लादकर दारमा-पश्चिम तिब्बत सीमान्त परिक्षेत्र में व्यापार के लिए आया-जाया करते थे और दोनों क्षेत्र के व्यापारी परस्पर मित्रता रखा करते थे, ग्राम-बौन के हबा लाटौ का भी तिब्बती व्यापारियों से घनिष्ट मित्रता थी। तिदांग ‘ह्या छूड.ग सैं’ ने अपने अपनी दिव्य मंत्र-शक्ति का प्रयाग कर तिब्बती चन (भूत) का आह्वान किया और उसे हिदायत देते हुए कहा कि तुम अपने कुछ साथियों को लेकर सैकड़ों भेड़-बकरियों के साथ गो से आगे गोतो-रामा के मैदान में सही समय और मौसम को देखकर प्रकट हो जाना। एक दिन ह्या छूड.ग सैं को तिब्बती चन (भूत) ने रामा गोतो दं (उंचा स्थान) के मैदान में प्रकट होने का सन्देश भिजवाया और तभी ह्या छूड.ग सैं ने ‘लिंकम दं थं’ व ‘गोतो दं’ के बीच का चट्टानी रास्ता पूर्णतया बर्फ से ढकवा दिया और अपने भान्जे ‘होला दंफू सैं’ को ‘बौर बा लाटौ’ के पास व्यापारिक सूचना सूचित करने के लिए भेजा और हबा लाटौ जी से कहना तुम्हारे तिब्बती व्यापारिक मित्रगण अपने सैकड़ों भेड़-बकरियों और विनिमय सामान के साथ ‘रामा-गोतो दं’ (उंचा स्थान) के थं(मैदान) में डेरा लगाकर बैठे हैं, और तुम्हें जल्दी से जल्दी मिलने के लिए कहा है। इस पर हबा लाटौ जल्दी-जल्दी अपने मित्रों से मिलने के लिए अपने निवास स्थान से व्यापारिक परिक्षेत्र की ओर रवाना हो गया और जब ‘गोतो-लिंकम दं’ (उंचा स्थल) का पहाड़ी रास्ता बर्फ से ढका हुआ दिखाई दिया, तब ‘बौन हबा लाटौ’ बर्फ में डूबने व फिसलने से बचने के लिए तन्त्र विद्या का प्रयोग करते हुए, अपने जेब से ‘सरसों का दाना’ निकालकर अपने से आगे फैंकते गया, सरसों का दाना फेंकते ही सरसों के दाने का पत्थर बन गया। उन्हीं पत्थरों में छलांग लगाते हुए, आगे बढ़ते गए। जैसे ही बर्फीला आधा रास्ता तय कर लिया, तब उनका सरसों का दाना खत्म हो गया, अब ‘हबा लाटौ’ का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। साथ ही पीठ पीछे के सरसों से बना पत्थर भी अदृश्य हो गया, उसी समय तिदांग ह्या छूड.ग सैं ने उपर पहाड़ से बर्फ का बर्फीला तूफान करवाया और हबा लाटौ का अन्त हो गया। ऐसा कहा जाता है कि जिस स्थान पर हबा लाटौ दब गया था, वहाँ पर बहुत बड़ा टीला बन गया, जो अभी भी मौजूद है।
तंत्र-मंत्र ज्ञाता ‘हबा लाटौ’ को मारने के बाद इलाके के सभी देवी-देवतागणों को मनुष्यों के द्वारा चढ़ाया जाने वाला चढ़ावा पूजा-पाठ खाद्य सामग्री सर्वप्रथम मिलना शुरु हो गया।
‘जैं हो किदांग जु (के)-
तदांग ह्या छूड.ग सैं’

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