महादेव गुफा ‘प्राचीन महादेव ध्यान साधना गुफा’ ग्राम सीपू

नरेन्द्र न्यौला ‘पंचाचूली’
‘हिम गिरी-देव भूमि’ उत्तराखण्ड देव- देवियों, सन्यासियों, रिषि-मुनियों व लामाओं का ध्यान साधना ‘तप केन्द्र भूमि’ आदि काल से ही रहा है। इस हिम देव भूमि में ऐसा भी एक ग्राम है। जहाँ देवाधिदेव जी का ‘साक्षात पदचिन्ह व आध्यात्मिक ध्यान साधना गुफा’ विद्यमान है। यह उस समय की बात है। जब दिव्य शक्ति प्राप्त विशेष व्यक्ति सन्यासी और भगवान देवों में विशेष क्षण पर परस्पर साक्षात्कार होता था। देवाधिदेव महादेव जी हिमालय क्षेत्रों से बाहर के ‘शिवालयों प्रवास’ से वापसी के दौरान दारमा से होते हुए जब वे अपने मूल निवास स्थान ‘कैलास मानसरोवर’ वापस जा रहे थे। इसकी सूचना मिलते ही दारमा लुंग्मा के सभी स्थानीय ‘सैं समा-देवी देवताओं’ व क्षेत्र जनों ने सैं ह्याजंगरी जी के मार्गदर्शन में अतिथि तपस्वी बाबा जी का न्यौंला पंचाचूली हिम शिखर के निकट भव्य रूप से स्वागत किया।
तपस्वी भोले बाबा शिव ने स्थानीय देवी-देवताओं के प्रेम भाव और ग्राम जनों की आस्थामय पाठ-पूजन के साथ- साथ ग्राम सीपू क्षेत्र के आस-पास के प्राकृतिक, नैसर्गिकता, रंग बिरंगे पफूलों की फुलवारी भोज वृक्षों की सिलसिलेवार नर्सरी, जड़ीबूटी की सुगन्धता, कस्तूरी मृगों (देव मृगों) के विचरण और यहाँ की भौगोलिकता से प्रसन्नचित्त होकर उन्होंने ग्राम सीपू में अपने पद को विराम दिया। इस क्षेत्र की ‘आध्यात्मिक ध्यान साधना ’ को महसूस करने के लिए यहीं रुके, ग्राम सीपू से कुछ दूर एकान्त क्षेत्रा में ध्यान साधना हेतु एक ही रात में ‘ध्यान साधना गुफा’ का निर्माण करवाया जिसे हम रं लुंग्बा जन ‘महादेव गुफा’ के नाम से सम्बोधित करते हैं। इस ‘ध्यान साधना गुफा’ में महादेव जी ने महत्वपूर्ण दारमा प्रवास के लगभग तीन माह बिताए। बाद में रं लुंग्बा के सभी देवी-देवताओं ने सदा दारमा लुंग्बा को ही अपना स्थायी तपस्थली बनाने का बहुत अनुरोध् किया लेकिन महादेव जी स्थायी तपस्थली वाली बात को न मानते हुए, यहाँ प्रवास में प्रत्येक साल आने की बात पर सहमति दी और महादेव जी ने दारमा से दूसरे दिन प्रस्थान की तैयारी की परन्तु स्थानीय तपस्वी सै। ह्याजंगरी जी अपने तंत्रामंत्रा शक्तिबल से जिस दिन महादेव जी कैलास पर्वत जा रहे थे उसी दिन लगातार तेज बर्फबारी व ओलावृष्टि करा दी। महादेव जी जैसे-जैसे आगे कैलास की ओर जा ही रहे थे, ग्राम ढाकर के सामने बर्फीला पहाड़ी मार्ग से पैर फिसल कर गिर गये, जिससे उनका एक पैर जख्मी हो गया। तदोपरान्त ‘सैं ह्याजंगरी जी’ ने महादेव जी की मदद करते हुए उनको ग्राम सीपू महादेव तपस्थली गुफा की ओर वापस लौटे। वापस लौटते समय ग्राम सीपू क्षेत्र मार्ग पर स्थित पौराणिक शिलाखण्ड पर भोले शिव जी के पद पड़े और उस शिलाखण्ड पर पद चिन्ह के निशान पड़ गये, जो आज भी उस शिलाखण्ड पर विद्यमान है।
महादेव जी के इस ‘पद चिन्ह युक्त पौराणिक शिलाखण्ड’ के पास ही मन्दिर स्थापित कर ग्राम जन सदियों से पूजा अर्चना करते आ रहे हैं व महादेव जी आशीर्वाद ग्राम जनों को ‘सुरक्षा सुख समृद्धि के रूप में प्राप्त होता रहता है। सैं ह्याजंगरी जब जब महादेव जी को ‘महादेव तपस्थली गुफा’ में छोड़कर लौट रहे थे। उस वक्त महादेव खौला के प्रवेश स्थल के पास में ही सैं ह्याजंगरी ने अपने हाथ में लिए सूखे भोज वृक्ष से बनी लट्ठी वाले ठण्डे पर मंत्रणा कर उसे रोप दिया और ग्राम जनों की उपस्थित में कहा कि अगर महादेव जी इस गुफा में प्रवेश के बाद भी हमेशा किसी भी रूप में यहाँ वास करेंगे-रहेंगे तो यह सूखी भोजवृक्ष लट्ठी ‘मेरा हमसफर भोज वृक्ष लट्ठी’ हरा-भरा होकर पेड़ का रूप ले लेगा अगर महादेव जी का अंश का वास यहाँ नहीं होगा तो यह रोपित भोजवृक्ष लट्ठी हरित नहीं होगा। लेकिन चमत्कार हुआ। कुछ दिनों बाद सैं ह्याजंगरी जी द्वारा वह रोपित भोजवृक्ष लट्ठी ने पौध्े स्थल में लोगों की आस्था केन्द्र के कारण पौराणिक पौध भोजवृक्ष विशाल हरा-भरा भोज वृक्ष के रूप में आज स्थित है। यह ध्यान देने वाली बात है कि उस विशाल पौराणिक भोज वृक्ष से लगभग डेढ़ किलो मीटर के परिक्षेत्र में कोई भी भोजवृक्ष का पेड़ नहीं है। इससे पूर्णतया प्रमाणित होता है कि यह भूमि भोले बाबा शिव की ‘ध्यान साधना तप भूमि’ रही है और उनका ग्राम सीपू व क्षेत्रा जनों के रक्षक रूप में हमेशा विराजमान रहता है।
ऐसा माना जाता है कि ग्राम सीपू का नाम हमारे ग्राम पूर्वज बुजुर्गों व देव दूत ‘धामी जी’ ने भगवान महादेव शिव जी की आध्यात्मिक ध्यान साधना की तपस्थली होने के कारण ‘शिव से सीपू’ रखा। पौराणिक कथाओं और गाथाओं के अनुसार उत्तर पूर्व भोंट प्रान्त के भोले बाबा शिव ने जिस महादेव ध्यान साधना गुफा में तपस्या की थी तभी से देवाधिदेव प्रत्येक साल साक्षात प्रवास पर ग्राम सीपू महादेव गुफा में आते हैं। बाद में ग्राम जनों ने महादेव ध्यान साधना गुफा में ही ग्राम रक्षक शिव पूजा स्थल का चयन किया और प्रत्येक साल में एक बार उस पूजा स्थल में जाकर देवाधिदेव महादेव जी पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। ग्राम सीपू, शिव स्थापित स्थल पर ग्राम जन छः वर्ष में एक बार महापूजन का आयोजन कर धूमधाम से महादेव महा महोत्सव मनाते हैं। इस महोत्सव में देश प्रदेश के सभी ग्राम परिवार जन उपस्थित रहते हैं। कुछ श्रद्धालु जन महादेव गुफा पूजा स्थल में जाकर महादेव जी की पूजा अर्चना करते हैं।
आज भी 500-600 साल पहले ग्राम बुजुर्ग जनों ने ग्राम रक्षक देवाधिदेव महादेव जी का ध्यान साधना भंग न हो व गुफा को संरक्षण प्रदान करने के वास्ते विशालकाय दरवाजे का निर्माण करवाकर गुफा के मुख्य द्वार पर लगवाया। इस प्राचीन महादेव ध्यान गुफा मुख्य द्वार में उस प्राचीन समय पर लगवाए गए दरवाजे के अवशेष वर्तमान समय में भी विद्यमान हैं। महादेव गुफा दुर्गम खतरनाक क्षेत्र में स्थित है। इस कारण आज से 120-130 साल पूर्व ग्राम जनों की एक राय बनाकर ‘शिव ध्यान गुफा’ से शिवलिंग लाकर गाँव के पश्चिमी छोर में मन्दिर की स्थापना कर पूजा अर्चना करने का निर्णय लिया। प्रत्येक साल ग्रामजन महादेव जी की पूजा अर्चना गाँव में स्थापित महादेव शिव स्थल में परम्परागत ढंग से करते हैं। महादेव जी की कृपा दृष्टि सदा सभी क्षेत्रा वासियों में बनी रहती है। इस महादेव गुफा के अन्दर अनेकों शिवलिंग विराजमान हैं।
ग्राम सीपू भ्रमण के दौरान श्रद्धालु जन बताते हैं कि ‘महादेव गुफा’ परिसीमन के आसपास में सच्चे स्वच्छ निर्मल मन से उँ मंत्र का जाप करें तो पर्यावरण से उँ की ध्वनि तरंगों की गूंज सुनाई देती है। हजारों साल पहले देवाधिदेव महादेव जी ने जिस स्थान पर बैठकर साक्षात आध्यात्मिक ध्यान तप किया। देवाधिदेव महादेव जी के इस पवित्र भूमि शिव स्थल पर पहँुचकर एक क्षण में ही आत्मा में ऐसी शुद्धता का महसूस होता है। मानो सांसारिक दुनिया से ‘आत्मा का परमात्मा’ के साथ परस्पर मिलन की अनुभूति होने लगती है। बहुत साल पूर्व गाँव वालों ने शिव अंश पंच धातु का त्रिशूल ‘शिव ध्यान साधना गुफा’ में स्थापित किया। समय-समय पर श्रद्धालु जन वहाँ पहँुचकर शिवमय हो जाते हैं। इन सभी पूर्व की घटना और वर्तमान में मन की आत्मीयता का अनुभव से सिद्ध होता है। सीपू महादेव जी की गुफा में महादेव शिव आदिकाल से ही विराजमान है और इस महादेव गुफा के अन्दर बहुत सारे शिवलिंग है।
कुछ लोग बताते हैं कि सीपू प्रथम साक्षात प्रवास के बाद देवाधिदेव महादेव जी महादेव ध्यान साधना गुफा के पिछले द्वार से आदि कैलास (छोटा कैलास), उँ पर्वत होते हुए कैलास मानसरोवर अपने स्थायी तपस्थली को चले गए।