बौद्ध धर्म-बौंन धर्म-कैलास मानसरोवर

न्यौला पंचाचूली
दार्शनिक विद्वानों का मानना है कि तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार भारत से लगभग 7-8वीं शताब्दी में से हुआ। उससे पहले पश्चिम तिब्बत में स्थानीय धर्म बौंन धर्म ही था, पर 8-9 सदी के मध्य में अधिकांश राजकीय समर्थक बौद्ध धर्म लामाओं की ओर मुड़ गये और बौंन धर्मालम्बियों के साथ भेदभाव बरता जाने लगा। धीरे-धीरे वहाँ के जन मानस बौद्ध धर्म को ही अधिकतम मान्यताएं और धर्म काण्ड अपनाने लगे, जिससे यह मूल बौंन धर्म समूह जन बुद्धिजम का ही एक सम्प्रदाय लगने लगा। जिस प्रकार कालान्तर में तिब्बती बौद्ध परम्परा कई धाराओं में कट गयी, जैसे- निम्न द्येलुक, न्यिंगमा, कान्ग्यु, शाक्य, बौद्ध सम्प्रदाय हैं।
तिब्बत में बौंन धर्म के ऐतिहासिक लिखित प्रमाण 11 वीं सदी से मिलते हैं और 14 वीं शताब्दी में बौंन धर्म का धर्मिक पुनर्गठन हुआ। यह बौंन धर्म ‘तोनपा-शेन-रब’ के द्वारा स्थापित किया गया था, जो शाक्य मुनि गौतम से भी पहले के युग से बौद्ध थे। बौन धर्म का मूल विहार मेनरी मोनेस्ट्री है। जो दुनिया भर के बौंन धर्म अनुयायियों का सबसे बड़ा केन्द्र है। मेनरी का अर्थ- औषधियों का पर्वत होता है। इस मोनेस्ट्री की स्थापना सदियों पहले पश्चिम तब्बत में हुई थी। चीनी कब्जे के बाद कई बचे बौंन धर्मावलम्बी भारत और सीमान्त देशों में भाग आए। दोलाजी का मौजूदा विहार, मूल मेनरी विहार के नाम से फिस नामक स्थान में बनाया गया। सन् 1969 में यहाँ मौजूद ‘पुंगडुंग बौंन पुस्तकालय’ बनाया गया, जहाँ दुनिया भर के बौंन साहित्य का सबसे बड़ा संग्रह है। बौंन धर्म का अनुयायी प्रमुख देवाल्या ‘मिवो-शेन-रब’ ‘शेन-रब-मिवोचे’ को मानते हैं। अनुयायी इन्हीं की पूजा अर्चना करते हैं।
जी-टुची के अध्ययन वर्णन में ‘मिये-शेन-रब’ का स्वरूप बुद्ध की तरह ही एक पाषाण कमल पर आसीन चित्रण किया गया है। स्नेल ग्रोव ने मूल बौंन देवाल्या ‘कुन्तु-जाग्पो’ तो ‘म्वै-शेन-रब गुरु शेन-रब’ को बताया। बौंन धर्म का गढ़ (केन्द्र) ‘ख्युग-लुग व छपराड़’ दोनों प्रान्त के मध्य स्थित ‘शाग-शगु’ प्रान्त माना, जहाँ कैलास मानसरोवर स्थित है। कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग का उल्लेख हिन्दू साहित्य ‘स्कन्द पुराण’ के मानस खण्ड के अध्याय 1 में भी वर्णन किया गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार कैलास पर्वत पर तपस्थल ब्रह्मा, वशिष्ट तथा दधिची के पुत्रों ने प्रतिदिन मन्दाकिनी नदी की स्नान यात्रा से मुक्ति पाने के लिये ब्रह्मा से कैलास पर्वत पर स्थान की व्यवस्था करने की मांग की तब देव ब्रह्म ने अपनी मानसिक-शक्ति के मानसर (मानसरोवर ताल )का सृजन किया। उस आदि काल से ही प्रतिवर्ष उत्तराखण्ड हिमालय पर्वतों को पार कर बड़ी संख्या में हिन्दू तीर्थयात्री भोले कैलाशपति के दर्शन के लिये कैलास मानसरोवर तीर्थ की यात्रा में जाते हैं।
दार्शनिक जी-टुजी ने अपने पुस्तक Tibet land of Snow में ब्रह्मा का उल्लेख करते हुए कहा, कैलास मानसरोवर हिन्दुओं, बौद्धों और बौंन तीन धर्म , धर्मावलम्बियों का मुख्य तीर्थ स्थल है।
18वीं शताब्दी में तिब्बत के बौंन अनुयायी क्षेत्रों पर दजुन्गर कबीलों का कब्जा हो गया। लामाओं और बौंन धर्मावलम्बियों को पकड़ कर जेल में ठूंस दिया गया। उस समय बौंन धर्मावलम्बियों अनुयायियों का लगातार मन्त्र पढ़ने से जीभ का रंग काला पड़ जाता था। इस लिये दजुन्गर अधिकारी इन बौंन अनुयायियों से मिलने आये। हर व्यक्ति को अपनी जीभ दिखानी पड़ती थी ताकि दोनों व्यक्तियों का परस्पर पहचान कर सकें कि वहाँ लाया है या नहीं। कालान्तर में लोगों के बीच यही अभिवादन का तरीका बन गया था। आज भी तिब्बत में लोग एक दूसरे का अभिवादन जीभ दिखाकर ही करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *