मुंशी रायबहादुर हरिप्रसाद टम्टा

हरिप्रसाद टम्टा – 26.08.1887 से 23.02.1962)

डॉ दुर्गा प्रसाद
26 अगस्त 1887 को अल्मोड़ा के ताम्र शिल्पियों के परिवार में हरिप्रसाद टम्टा का जन्म हुआ. गोविन्द प्रसाद टम्टा और गोविंदी देवी का यह पुत्र बचपन से ही मेधावी और प्रखर बुद्धि का था. बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने की वजह से हरिप्रसाद टम्टा को अपने छोटे भाई व बहन के साथ मामा कृष्ण टम्टा के संरक्षण में आना पड़ा.

उस समय अछूतों के लिए शिक्षा हासिल करना बहुत ज्यादा कठिन हुआ करता था. इसके बावजूद हरिप्रसाद ने मिडिल तक की शिक्षा हासिल करने के बाद उर्दू-फारसी में भी महारथ हासिल कर मुंशी की उपाधि प्राप्त की.

अपने मामा की प्रेरणा से वे 1903 से कुमाऊँ की अछूत जातियों के उद्धार में लग गए और 26 फरवरी 1960 में जब 73 साल की उम्र में उनका देहांत हुआ तब तक इस मिशन में डटे रहे. कुमाऊँ के अछूतों में सामाजिक चेतना जाग्रत करने के मकसद से उन्होंने 1905 में टम्टा सुधारक सभा की स्थापना की, जो आगे चलकर 1914 से ‘कुमाऊँ शिल्पकार सभा’ के नाम से जानी गयी. सभा ने शिल्पकार उत्थान के लिए कई आन्दोलन किये. इसी के बैनर तले अवांछित व अपमानजनक शब्दों से कुमाऊँ के अछूतों को संबोधित किये जाने के खिलाफ भी एक व्यापक आन्दोलन की शुरुआत 1920 से की गयी. ‘कुमाऊँ शिल्पकार सभा’ के 6 सालों के आन्दोलन के बाद शासन-प्रशासन ने उत्तराखण्ड के अछूतों को ‘शिल्पकार’ नाम से संबोधित किया जाना स्वीकार किया.

हरिप्रसाद टम्टा ने उत्तराखण्ड के अछूतों के बीच शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किये. उन्होंने अल्मोड़ा में कई रात्रिकालीन स्कूल खुलवाने के अलावा गरीब छात्रों को वजीफा भी दिया. शिक्षा के लिए उनके कामों को लीडर व अन्य राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने भी प्रकाशित किया.

हरिप्रसाद टम्टा ने शिल्पकारों के बीच फैली सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए भी व्यापक जनजागरण किया. उनके प्रयासों से ही शिल्पकारों के बीच मद्यपान, फुलवारी, आतिशबाजी, बरातों में फिजूलखर्ची जैसी कई गलत परम्पराएं बंद हुईं.

1 जून 1934 को ‘समता’ के प्रकाशन की शुरुआत के साथ ही वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अछूतों का प्रतिनिधित्व करने में जुट गए. 26 सालों तक समता का संचालन करने के साथ-साथ वे लीडर, हिंदी हरिजन, भारती, कमल, अधिकार जैसे कई राष्ट्रीय अख़बारों में भी शिल्पकारों की समस्याओं को उठाते रहे.

उत्तर प्रदेश के कुमाऊँ में सार्वजनिक परिवहन की शुरुआत करने वाले प्रमुख उद्यमियों में भी हरिप्रसाद टम्टा का नाम उल्लेखनीय है. उन्होंने 1920 में ‘हिल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी’ की स्थापना की. इसके साथ ही वहां चालकों के लिए कुमाऊँ का पहला प्रशिक्षण केंद्र भी हल्द्वानी में शुरू किया. कुमाऊँ में मोटर वाहन का चक्का घुमाने वाले शुरुआती व्यक्तियों में हरिप्रसाद टम्टा एक थे.

जिस घटना ने हरि प्रसाद टम्टा को शिल्पकार अस्मिता का योद्धा बनाया

यही नहीं हरिप्रसाद टम्टा ने 1907 और 1935 के युद्ध के बाद अकालग्रस्त भारत में पूरे कुमाऊँ में सस्ते राशन की दुकानें खुलवायीं. युद्ध के बाद जब इन्फ्लुएंजा का प्रकोप बढ़ा तो हरिप्रसाद टम्टा ने हजारों स्वयंसेवकों की सेना तैयार कर गांव-गांव दवाएं बंटवाई. इस तरह के कई अन्य सामाजिक कामों में भागीदारी करते हुए उन्होंने कभी भी धन व्यय की चिंता नहीं की.

सार्वजनिक जीवन में हरिप्रसाद टम्टा की लोकप्रियता ने उन्हें 3 बार म्युनिसिपलिटी के मेंबर-अध्यक्ष और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड अल्मोड़ा का वाइस चेयरमैन बनाया.

लेखक:
डॉ दुर्गा प्रसाद
सामाजिक चिन्तक एवं शिक्षाविद
जिलाउपाध्यक्ष भाजपा अनु.मो.पिथौरागढ़ उत्तराखंड

कित्ती फौजदार: प्रथम रं लुंग्बा प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि)

इतिहास-कथा

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
दारमा घाटी में आज से लगग 18वीं शताब्दी के मध्य से 19वीं शताब्दी के मध्य तक ग्राम-गो में एक प्रखर बुद्धिमान, आर्थिक सम्पन्न तथा दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति रहते थे, जिनका नाम कित्ती सिंह ग्वाल (कित्ती फौजदार) था, वे उस काल के सबसे प्रतिभावान, प्रभावशाली व्यक्ति थे और लीक से हटकर सोच रखते थे। शायद उन्होंने ही रं लोगों को उस समय तिब्बत देश से लेकर नेपाल देश और पश्चिम कुमाउँ तक व्यापार करना सिखाया हो।
उस समय भी दारमा, चैंदास तथा व्यास घाटी रं लुंग्बा प्राीचन भोंट देश का भोंट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था। इस कारण केन्द्रीय तिब्बत राज शासक- प्रशासक इस प्राचीन भोंट प्रान्त को ‘रं लुंग्बा’ के तिब्बत सीमान्त (रं लुंग्बा) क्षेत्र को जबरदस्ती अपना मानते हुए, दारमा व्यापारियों से जबरदस्ती कर वसूलते थे। साथ ही तिब्बत का प्रशासक कित्ती फौजदार को उसके प्रभावशाली छवि, आर्थिक सम्पन्नता के कारण इस रं क्षेत्र (रं लुंग्बा दारमा) का क्षेत्राीय तरजम (एस.डी.एम.), छयासों (कर अधिकारी) साथ ही ज्युस्यों (व्यापारी मुखिया) भी उन्हीं को मानते थे। जबकि दारमा वासी फौजदार जी को दारमा घाटी क्षेत्र का व्यवस्था प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि) समझते थे और उनका आदर सम्मान कर उनकी बातों को मानते थे। श्री कित्ती फौजदार जी के प्रभावशाली छवि के परिणामस्वरूप 18वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी के मध्य तक की ज्ञानिमा-सिल्दी व्यापार मण्डी का व्यापार दर (कमिशन दर) तब तक तय नहीं होता था जब तक ग्वाल व्यापारी लोग वहाँ नहीं पहँुच जाते थे।उस बात का फायदा उठाकर ग्वाल व्यापारी देरी से व्यापार मण्डी स्थल पर कई दिनों पहले पहुंचते थे और अन्य ग्राम व्याापारियों को व्यापार मण्डी स्थल पहँुचने के बाद भी कई दिनों तक इन्तजार करना पड़ता था। इस कारण अन्य व्यापारी परेशान होते थे। बाद में ब्रिटिश राज के मसय इस गटतोक (कमीशन रेट) की बात दारमा व्यापारियों ने मिलकर कुमाउँ कमीश्नर प्रशासन के संज्ञान में लाया गया, तत्पश्चात ग्वालों का व्यापार दर तय करने का एकछत्र राज (अधिकार) समाप्त हुआ।
श्री कित्ती फौजदार अपने रं प्रतिनिधित्वकर्ता काल में अपने क्षेत्र के लिए उन्नति/ प्रगति का अवसर ढूंढते रहते थे, वे रं लुंग्बा से बाहर अन्य क्षेत्रों तक व्यापार का अवसर देखना चाहते थे। यह व्यापारिक सोच चाह के मुताबिक जल्दी सम्भव हीं था, क्योंकि उस समय इस रं क्षेत्रों का किसी भी प्रकार का अपना स्थायी शासनिक-प्रशासनिक ढांचा नहीं था। रं धरोहित बुजुर्गों के कहने के अनुसार आज से 250-300 साल पूर्व तक रं लुंग्बा जन जाड़ों के मौसम में (जब अत्यधिक ठण्ड पड़ी थी) दारमा घाटी वासी ‘सोबला-कंच्योति, व्यास घाटी वासी लामारी-मालिपा-लोलंको नामक स्थापन पर तीन-चार महीने जानवरों को पालने के वास्ते आते थे। फिर वापस अपने मूल ग्राम की ओर चले जाते थे। इन निम्न स्थानों से नीचे के क्षेत्र अस्कोट राज परिवार अपना जबरदस्ती भू-क्षेत्र अधिकार मानता था। तब दारमा, चैंदास और व्यास का रं लुंग्बा प्राचीन भोट देश का भोट प्रान्त ‘संयुक्त रं लुंग्बा’ कहलाता था। उस समय इस प्राचीन भोट प्रान्त- ‘रं लुंग्बा’ क्षेत्रा से बाहर ब्रिटिश राज कालीन भारतीय क्षेत्रों तक जाने के लिए सर्वप्रथम अस्कोट रजवार ‘राजशाही’ के अनुमति की आवश्यकता पड़ती थी। इस कारण को देखते हुए एक दिन कित्ती फौजदार जी ने अपनी योजना बनाई। श्री कित्ती फौजदार ने विशेष जयन्ती के अवसर का चयन कर एक दिन अपने अच्छे-अच्छे ढोल-नगाड़े ‘दमो-छेलंग’ बाजकों के साथ अस्कोट रजवार के समारोह स्थल- जनता दरबार पर अनुरोध् प्रार्थना पत्रा और उपहार लेकर पहँुचे। महोदय हमारे रं जनों को आपके सीमान्त राज क्षेत्रों में जाड़ों के मौसम में 4-5 महीने धूप सेकने, जानवरों को चराने तथा व्यापार करने की अनुमति दी जाए। शायक रजवार ने कहा- राजकाज के नियमानुसार बिना किसी स्पद्धा/द्वन्द प्रतियोगिता जीते बिना ऐसी अनुमति देने का कोई प्रावधान नहीं साथ ही कहा- कित्ती, कुश्ती, दमो बाजा और क्षलिया नाच निम्न से किसी एक प्रतियोगिता का चयन कर तैयार रहना। फौजदार ने उस समय की परिस्थिति को देखते हुए डोल- नगाड़े (दमों) बजाने की प्रतियोगिता स्वीकार की ली। प्रतियोगिता अगले दिन करवाई गई और दोनों टीम/पक्ष का घण्टा परस्पर बाजा द्वन्द्व चलता रहा, उस वर्तमान परिस्थिति को समझते हुए, काका फौजदार ने अपने कलाकारों ‘दमों बाजकों’ का रं बोली में ‘जन्सु ला छयानी’ अर्थात (ग्वन संस्कार/ मृत्यु संस्कार वाला बाजा बजाने का संकेत दिया) यह कहते ही इन दमों (बाजे)कों ने उल्टा दमों बाजा बजाया। इन दमों बाजा की कला पर रजवार पक्ष प्रतियोगिता टक्कर नहीं दे पाये, (वे इस कला से दमों बना नहीं पाये) और वे हार गये। ‘दमो बाजा’ की कला केवल रं समाज में ही मृत्यु संस्कार में बजाये जाते हैं। इस प्रकार डोल-नगाड़े (दमों) प्रतियोगिता में श्री कित्ती फौजदार कलाकार पक्ष की जीत हुई। अस्कोट रजवार राजशाही को उनकी बात माननी पड़ी। तब से रं जनों को कंच्योति से नीचे रजवार परिसीमन जौलजीवी तल्लाबगड़ तक जाड़ों में बसने की अनुमति मिली, उस समय गोरी नदी की सरहद से लेकर एलागाड़ तक तक क्षेत्रा को मल्ला अस्कोट क्षेत्रा कहते थे।
रं लोग सन् 1950 तक रजवार क्षेत्रों में अस्थायी झोपड़ी बनाकर रहते थे और दारमा वापस जाते समय झोपड़ी जला देते थे। धीरे-धीरे स्थायी घर बनने लगे। उसी के परिणाम स्वरूप आज धारचूला तहसील से जौलजीवी तक अनेक रं गाँव बसे हुए हैं। अस्कोट दमों प्रतियोगिता विजय के बाद गोरखा शासन काल में श्री कित्ती फौजदार, नेपाल देश की राजधानी-काठमाण्डू राजशाही दरबार तक पहँुचे। श्री कित्ती जी, रं लुंग्बा के वे पहले व्यक्ति थे, जो इतने सुदूर से काठमाण्डू पहुंचे और अपनी क्षेत्रा की बात रखी। उनकी ‘प्रखर वक्ता’, अपने क्षेत्र के प्रभावशाली छवि, अस्कोट रजवार से सम्बन्ध्, तिब्बत से व्यापारिक सम्बन्धित के नाते उन्हें अपने पक्ष में लेने के लिए नेपाल राजशाही दरबार ने उनको ‘फौजदार’ की पदवी से सम्मानित किया। साथ ही उनकी कार्य कुशलता, कार्य प्रबन्धन नीति को देखते हुए उनको नेपाल की ओर से दारमा घाटी में शासन चलाने के लिये सन् 1813 में लाल मुहर और काला मुहर प्रदान कर न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों की आधिकारिक जिम्मेदारी सौंपी। उनके अनुरोध् पर रं लोगों को नेपाल के दार्चुला क्षेत्र में जाड़ों में रहने तथा अपने क्षेत्रों में व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी। सही मायने में श्री कित्ती फौजदार जी ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने रं लोगों को अपने क्षेत्रों से बाहर नये अवसरों को ढूंढने के लिए प्रेरित किया। इसके फलस्वरूप धारचूला तहसील क्षेत्रा के सैकड़ों गाँवों में से मात्रा रं समुदाय के लोग ही दूर-दूर तक व्यापार के लिए जाते रहे। जब भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत से व्यापार बन्द हुआ तब रं लोगों का व्यापर विकल्प नेपाल के सिलगड़ी, धनगड़ी, बेतड़ी, आछम, बयालमाटा, बजंग आदि और अन्य महत्वपूर्ण व्यापारिक सहयोग रहा। हम मानें या न मानें इसका श्रेय श्री कित्ती फौजदार जी को जाता है। क्योंकि उन्होंने ही लीक से हटकर, निडर होकर नया अवसर ढूंढ़ना और सफल होना सिखाया। इस कारण प्राचीन भोट प्रान्त रं लुंग्बा से बाहर व्यापारिक पटकथा के भूमिगत रचना/भूमिगत आधर तैयार करने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति वे ही थे। हमारी ओर से उन्हें नमन, उन्हें हमेशा याद कर रखना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
रं प्रतिनिधि श्री कित्ती फौजदार की मृत्यु के बाद उनका राजपाठ कार्यभार उनके उत्तराधिकारी पुत्र श्री मुंडवा सिंह ग्वाल ने सम्भाला। श्री मुंडवा ने अपनी दारमा प्रतिनिधि काल में उतनी ख्याति प्राप्त नहीं की, जितनी ख्याति पिता कित्ती जी की रही। फिर भी वे रं लुंग्बा परिसीमन के लिए लड़े, अस्कोट राज्य रजवार के साथ हुए परिसीमन विवाद को लेकर अंग्रेज शासन-प्रशासन के न्यायालय तक पहँुचे। ग्वाल जी ने अल्मोड़ा जिला न्यायालय में ठोस साक्ष्यों के साथ अपने पक्ष को रखा। न्यायालय ने तथ्यों पर गहन विचार विमर्श कर अन्त में श्री मुंडवा ‘ग्वाल साहब’ को सीमा विवाद पर विजय घोषित किया। इस विजय फैसले पर ग्वाल साइब पक्ष समूह जन जब विजय उल्लास के साथ लौट रहे थे उस समय अस्कोट-जौलजीवी के मध्य ग्राम गर्जिया, गोरी नदी पुल से अस्कोट राज्य षड्यन्त्रकर्ताओं ने विश्वासघात कर ग्वाल साहब को नदी में धकेल कर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार रं लुंग्बा ग्वाल प्रतिनिधित्वकर्ता का शासन काल समाप्त हुआ। लेकिन इतिहास की यह बातें हमेशा के लिये अमर हैं।

पंचेश्वर से उत्तरकाशी तक पैदल यात्रा करने वाले टी.सी.पपनै

परिचय
पर्यावरण संरक्षण के लिये जसपुर-टनकपुर में भी किया प्रदर्शन
डाॅ. पंकज उप्रेती
पर्यावरण संरक्षण व जनचेतना के नाम पर हो-हल्ला मचाती भीड़ से हटकर ठोस कार्य करने वालों में त्रिलोचन पपनै अग्रणीय हैं। 89 वर्ष के श्री टी.सी. पपनै ने सुन्दरलाल बहुगुणा के साथ पंचेश्वर से उत्तरकाशी तक पैदल यात्रा करते हुए पर्यावरण का सन्देश दिया था। तराई-भाबर में यूकेलिप्टस के विरोध् में आन्दोलन छेड़ने वाले इस समाजसेवी ने जसपुर से टनकपुर तक पदयात्रा करते हुए समाज को चेताया था। सरकारी सेवा में तहसीलदार पद से सेवानिवृत्त पपनै जी अपनी राजकीय सेवा में भी कर्मठ और उर्जावान बनकर समाज को जोड़ते रहे। सामाजिक सरोकारों से जुड़े श्री पपैन ने हर हमेशा समाज को संरक्षक के रूप में संवारा। हल्द्वानी के जजफार्म क्षेत्रा को नियोजित तरीके से बसाने में वह सक्रिय रहे। क्षेत्रवासियों के साथ बैठकें करते हुए नित कोई न कोई गतिविधि वह करते रहे हैं। उनका त्याग-तपस्या उनके परिवार के रूप में समाज के सामने है। उन्हें कभी भी किसी पद-प्रतिष्ठा का गुमान नहीं रहा है, वह सीधा-सादा जीवन व्यतीत करने पर विश्वास करते हैं और समाज को भी उनका यही सन्देश रहा है। लोक चेतना मंच, हिमालय संगीत शोध् समिति सहित कई संस्थाओं में वह संरक्षक के रूप में रहे हैं। उनका लेखक रूप भी है, उन्होंने 1982 में कमल साहित्यालंकार (कृतित्व एवं व्यक्तित्व) पुस्तक का प्रकाशन करते हुए पहाड़ के साहित्यकार के परिचय के बहाने अपने पहाड़ अनुराग को प्रकट किया। पहाड़ की संस्कृति, कला, बोली-भाषा को उन्होेंने नई पीढ़ी के लिये प्रस्तुत किया। ‘धरती पर दूधातोली’, ‘झुरमुट’ कविता संग्रह, ‘मेरा गाँव’ उनकी कृतियां हैं। इस समय उनका कविता संग्रह ‘फुहार’ भी तैयार हो चुका है, जो अप्रकाशित है।
6 अगस्त 1931 को जन्मे त्रिलोचन पपनै (त्रिलोक चन्द्र पपनै) का मूल निवास ग्राम घुग्ती केलानी अब चेक केलान, पट्टी मल्ला चैकाटे, देघाट जिला अल्मोड़ा है। पिता स्व.ईश्वरीदत्त पपनै व माता शारदा देवी घर जन्मे त्रिलोक चन्द्र पपनै राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त कर अध्यापन कार्य से कर्म क्षेत्र में पर्दापण कर चुके थे, जो बाद में राजस्व विभाग में तहसीलदार पद से सेवानिवृत्त हुए। राजकीय सेवा के बाद विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर पर्यावरण, नशामुक्ति, महिला एवं वाल विका आदि कार्यों में भाग लेकर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन हैदराबाद, उदयपुर सहित राज्य व क्षेत्रीय सम्मेलनों में मुख्य भूमिका में रहे। ़क्षेत्र पंचायत हल्द्वानी के बीडीसी सदस्य रहे श्री पपनै को उत्कृष्ट सेवाओं के लिए राष्ट्रपति पदक सहित अनेकों प्रशस्ति पत्र मिल चुके हैं। हल्द्वानी के विकास पुरम् जजफार्म रहने वाले टी.सी.पपनै जी की पत्नी श्रीमती सावित्री पपनै भी बहुत ही उदार महिला हैं। इनके पुत्र- स्व.विनोद, बहु ललिता (अध्यापिका), पौती दीप्ती (अमेरिकाद), पौता दिव्यांशु (दुबईद्ध, दूसरे पुत्र अशोक (जसपुर शूगर मिल में),बहू मंजू, पौता दीपक (एयरफोर्सद), भारतेन्दु (;ताइवान में), तीसरे पुत्र कैलाश पपनै (शिक्षक), बहू श्रीमती हंशा, पौता पौती- मेघा व देवांश हैं।

झुमली आक्रमणकारियों का दारमा लुंग्बा पर प्रथम और अन्तिम आक्रमण

इतिहास-कथा
———————————————————————
बाबरे-बाबरे,
कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो खानदा छन
————————————————————————–
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त/प्रदेश) के व्याँस और चाौंदास दोनों घाटी में ‘हुमला झुमला’ प्रान्त के झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित-लूटपाट समय- अन्तराल (समय-समय) में होता रहता था।
इस घटनाक्रम के बारे में दारमा घाटी के जन भी परस्पर पारिवारिक सम्बन्ध् होने के नाते समय-समय पर सुनते रहते थे, क्योंकि दारमा रं जन का सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक सम्बन्ध् आदि समयकाल से ही व्याँस और चाौंदाँसियों से होता रहा है। ये उस समय की बात है जब दारमा घाटी के निवासी कन्चोती तथा व्याँसी लोग लोंलको नामक स्थान के आसपास से नीचले क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से आ-जा नहीं सकते थे। क्योंकि इसके नीचे का परिक्षेत्र अस्कोट राज्य के अधीन माना जाता था, जबकि उस समय दारमा व्याँसी और चाौंदासियों का क्षेत्र स्वतंत्र भोट देश का भोट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ कहलाया जाता था। भोंट प्रदेश ‘रं लंुग्बा’ का उस समय अपना मजबूत प्रशासनिक ढाँचा नहीं था। इस कारण पड़ोसी देश नेपाल के प्रान्तीय शासक इस क्षेत्र पर अपना जबरदस्ती परिसीमन समझता था और गाये-बगाये उनके कर्मचारी इस भोंट प्रदेश ‘रं लुंग्बा’ परिक्षेत्र में आकर जबरदस्ती कर वसूलते थे, मना करने पर आतंकित लूटपाट करते थे। व्याँस-चाौंदास दोनों घाटी के लोग बार-बार जबरदस्ती कर वूसूली-आतंकित लूटपाट से तंग आ चुके थे। इस कारण वसूली व लूटपाट से पार पाने के लिए दोनों घाटी के लोगों ने सामूहिक परस्पर समूह में झुमली मुकाबला कार्यक्रम कर झुमलियों का दमन योजना बनाते थे। फिर भी ये क्षेत्रा वर्तमान-नेपाल के नजदीक के नजदीक परिसीमन होने के कारण ये अत्याचारी झुमला आक्रमण कारियों की टोली जबरदस्ती कर वसूली करके और न मानने पर आतंकित लूटपाट कर तुरन्त बिना हमारे क्षेत्र काली नदी वार ठहरे, काली नदी पार कर वापास नेपाल क्षेत्र में लौट जाते थे।
उस समयकाल में जैसे-जैसे झुमलियों का जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित लूटपाट क्षेत्रा बढ़ता जा रहा था। तब हम दारमावासियों ने सोचा एक दिन ये झुमली लोग हमारे लुंग्बा में भी जबरदस्ती कर वसूली और आतंक कर सकते हैं। ये सोच कर दारमावासियों ने समय रहते एक रणनीति बनाते हुए व्यास-चाौंदास झुमली दमन योजना के तर्ज पर दारमा वासियों ने झुमली से मुकाबले की योजना बनाई। रणनीति अनुसार दारमा झुमली संहारक योद्धाओं की टीम तैयार कर झुमलियों से मुकाबला करने के लिए स्थान का चयन किया गया। यह स्थान ‘बालिंग से गंबैनाती’ की ओर ‘गंबैनाती से बालिंग’ की ओर का लगभग मध्य स्थान ‘जैं गुरु सैं’ स्थल के नजदीक का स्थान चुना था, जो अत्यधिक संकरा और अत्यधिक खतरनाक चट्टानी मार्ग था, इस संकरे चट्टानी रास्ते का चयन करने का मुख्य लाभ यह था कि इस रास्ते के उपर 40-50 मी. की उफँचाई पर एक सुरंगनुमा गुफा है, जिसे हम सब रं जन गंबैनाती फु के नाम से जानते हैं। यह फु /गुफा आश्रय के लिए सुरक्षित गुफा है। इसी गुफा के नजदीक और संकरे चट्टाननुमा रास्ते के 20-25 मी. उपर से झुमलियों पर आक्रमण करना सबसे उचित और सुरक्षित रहेगा, यह समझते हुए हमारे धरोहित बुजुर्ग रणनीतिकारों ने इस स्थान को झुमलियों से मुकाबले के लिए चुना। कहा जाता है कि इस सुरंगनुमा गुफा (गंबैनाती फु) में सुरक्षित वातावरण में आराम से लगभग 5-6 ग्रामवासी रहने तक का स्थान था, ये गुफा सर्वप्रथम प्राचीन काल में तकरीबन ढाई से तीन किमी. दूर ग्राम बालिंग ब्यैंक्से बुग्याली नामक स्थान तक खुलता था। ‘दारमावासी वीर रक्षक योद्धाओं ने नदी से बड़े-बड़े गोल पत्थर लाकर गुफा में इकट्ठे किए।
एक दिन ऐसा समय आ ही गया, झुमली आक्रमणकारियों की टोलियों ने व्यास-चाौंदास के ग्राम-रिमझिम की चोटी को पार कर दारमा, दैर्रीयंग/हैर्री, लांगदारमा फकल नामक प्राचीन ग्राम स्थान से बोंगलिंग नदी पार कर बोंगलिंग-वर्थिंग होते हुए, दारमा के अन्य ग्रामों में प्रवेश करने वाले हैं। इसकी सूचना सुदूर दारमा में मिलते ही यहाँ के दारमावासियों ने ‘झुमली संहारक योद्धाओं की पूरी टीम सदस्यों’ ने झुमली मुकाबला चयन स्थान में अपने-अपने ढाल, तलवार, हथियार, गोलनुमा पत्थर और खाने-पीने का सामान, हमी (सत्तू के आटे से तैयार चर्पा/लड्डूनुमा खाद्य पदार्थ और अन्य खाद्य सामग्री एकत्रित कर सभी दारमा के नौजवान योद्धा एकत्रित होकर झुमलियों के मुकाबले के इन्तजार मंे एकत्रित हो गए। 4-5 दिन इन्तजार करने के बाद अगले दिन झुमलियों का काफिला बालिंग से गंबैनाती की ओर आते देखा गया। जैसे ही दारमावासियों के द्वारा चयनित गुफा के ठीक नीचे चट्टानी संकरे रास्ते झुमलियों की टोली 10-15 मीटर चट्टानी रास्ते के मध्य सीध्े-आगे गुजरने ही वाली थी, तुरन्त सभी नौजवानों ने झुमली संहारक योद्धाओं ने उन पर एकाएक लगातार देर तक पत्थरों के गोले बरसाये, अचानक हुए इस खतरनाक हमले से झुमली लोग घबरा गए, कुछ झुमली इस हमले में गम्भीर रूप से घायल हो गए, बांकी झुमलियों ने अपने रास्ते से पीछे हटना ही ठीक समझा और वे सभी पीछे हट गये। आगे बढ़ना पीछे लौटने से कहीं ज्यादा खतरनाक था क्योंकि आगे बढ़ने-पीछे हटने के लिए वही एकमात्रा रास्ता था, नीचे नदी उपर बिल्कुल खतरनाक चट्टान।
झुमली लोग जान बचाते हुए, कुछ दूर वापस जाकर उपर खतरनाक चट्टानी गुफा के नजदीक में एकत्रित हुए लोगों को देखा कि वे लोग एक हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हें। इस क्रियाकलाप को देखकर वे चकित रह गए और वे यह कहते वापस भागे ‘बाबरे-बाबरे कस्तो मान्सा छन, एक हाथ ले डुंगो (पत्थर) लफान्दा छन, अरखो हाथ ले डुंगो (पत्थर) खानदा छन’ (अरे ये कैसे लोग हैं कए हाथ से पत्थर का गोला फेंक रहे हैं और दूसरे हाथ से पत्थर का गोला खा रहे हैं) जबकि वे योद्धाओं दूसरे हाथ से सत्तू/हमी और लड्डूनुमा चर्पा का गोलनुमा खाद्य पदार्थ खा रहे थे। दूसरे हाथ से पत्थर खाने की ऐसी खतरनाक क्रिया समझकर वे झुमली लोग भाग गए। फिर दोबार उन्होंने इस प्रकार का जबरदस्ती कर वसूली-आतंकित लूटपाट करने की स्वतंत्र भारत गणराज्य बनने तक कोई कोशिश नहीं की। उस समय झुमली आतंकित लुटेरे-आक्रमणकारियों के द्वारा किया गया यह झुमली आक्रमण 20वीं शताब्दी से पहले का और पिछले ‘प्राचीन काल में हुआ जैं श्री हुरबी पहलवान-झुमली मुकाबला’ के बाद का लुंग्बा में किया गया प्रथम और अन्तिम आतंकित लुटेरे झुमली आक्रमण का मुकाबला था।
ऐसा मैंने बड़े बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी और अमटीकर लेखों से पढ़ी सही कथनों के निष्कर्ष निकालते हुए यह संक्षिप्त विवरण दिया है।
यह 17वीं-18वीं शताब्दी के मध्य की घटना मानी जाती है बाद में कूर्मांचल (कुमाउ) को गोरखा शासन ने अपने अधीन कर लिया था तब भी प्राचीन भोंट प्रान्त- रं लुंग्बा स्वतंत्र था।
हमारे पूर्वज जनों का हम पर यह कर्ज हमेशा रहेगा जिन्होंने हमें सुरक्षित रखा। जय हो हमारे पूर्वज ध्रोहर रणनीतिकार, जय हो हमारे रक्षक वीर योद्धा (झुमली संहारक योद्धा))।

पलायन की मार झेल रहे हैं सीमान्त के गाँव

तिब्बत तथा भारत के बीच सीमान्त क्षेत्र में रहने वाले मानव समूहों के लिये ‘भोटिया’ शब्द प्रयुक्त किया गया है परन्तु वास्तव में इससे भ्रम होने लगता है। कई संस्कृतियों के इस हिमालय में निरन्तर शोध् होते रहे हैं। इसी विषय पर पी.एन.जी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रामनगर के एसो.प्रोफेसर डाॅ.गिरीश पन्त का एक शोधपत्र प्रस्तुत है। -सम्पादक
———————————————————————————-
भोटिया वास्तव में कोई जाति नहीं है। ये इस जातीय सम्बोधन को पसन्द भी नहीं करते हैं। अंग्रेज प्रशासकों ने इनकी बसासत और तिब्बत से सम्बन्धों के चलते इन्हें गलती से भोटिया पुकारना शुरु कर दिया जबकि इन्हें मारछा, ताल्छा, जोहारी, शौक, दारमी, चैंदासी और व्याॅसी के नाम से सम्बोधित किया जाना चाहिये था। -डाॅ.आर.एस.टोलिया
————————————————————————————
डाॅ.गिरीश चन्द्र पन्त
भारत और तिब्बत के बीच का सीमान्त क्षेत्रा अत्यन्त दुर्गम और हिमाच्छादित पहाड़ी क्षेत्रा होने के कारण ही भारत ने सामरिक कारणों से भोटियों को जनजाति का दर्जा दिया था। इस तथ्य के पीछे धारणा थी कि ये लोग अपने स्थानों पर बने रह कर, अपना विकास कर सकें और सामरिक दृष्टि से अति सम्वेदनशील इस इलाके को निर्जन न होने दें। ये लोग प्राचीन काल से भारतवर्ष की उत्तरी सीमा की प्रहरी जाति रही हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत के लिए व्यापार बन्द हो जाने के कारण इन लोगों का इन दुर्गम एवं जीवन के लिए अति कठिन क्षेत्र में निवास करना निरर्थक हो गया है, ऐसी स्थिति में भारत सरकार ने भी नहीं सोचा कि बिना आजीविका के कोई भी आबादी ऐसे विकट भौगोलिक परिस्थिति वाले और शेष दुनिया से कटे दुर्गम क्षेत्र में कैसे टिक सकेगी। हालांकि इन जीवट कर्मवीरों ने उस हालात में भी जीने का काफी कुछ साजो सामान जुटा ही लिया, दूसरी ओर सम्पन्न होते जाते इन लोगों के लिए शीत मरुस्थलीय गाँवों में टिके रहने की मजबूरी भी जाती रही। इस सीमान्त क्षेत्र से बहुत तेजी से जनसंख्या का पलायन होने के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पुनः खतरा उत्पन्न हो गया है। पड़ोसी देश चीन द्वारा इस सामरिक क्षेत्रा में सीमा का उल्लंघन करना आम बात हो गयी है। यह विचारणीय प्रश्न आज भारत राष्ट्र के सम्मुख है कि इन पर्वत पुत्रों का अपनी थाती-माटी से पलायन कैसे रोका जाए। चीनी आक्रमण के बाद तिब्बत से व्यापार बन्द होने से यहाँ के निवासियों के पुश्तैनी व्यापार पर तो असर पड़ा ही है, साथ ही उत्तराखण्ड के लोगों को सस्ते एवं सुलभ उनी वस्त्रों से भी वंचित होना पड़ा है। पर्वतीय समाज के द्वारा प्रयोग किया जाने वाला चट्टानी नमक की आपूर्ति भी बन्द हो गयी है। तिब्बत से व्यापार बन्द होने के कारण भोटियों की लाखों बकरियाँ उन पर बोझ बन गयी हैं। इसलिए अब उनकी बकरियों की संख्या लाखों की जगह मात्रा हजारों में रह गयी है। इसका सीधा असर उत्तराखण्ड के उनी उत्पादन पर भी पड़ा है। मांग और पूर्ति में भारी अन्तर होने के कारण ठण्डे पहाड़ों के लिये अति आवश्यक उनी कपड़े आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गये हैं, उनकी जगह सिन्थैटिक धागों के वस्त्रों ने ले ली है जो कि पर्यावरण की दृष्टि से खतरनाक होने के साथ ही स्वास्थ्य के लिए भी अनुपयुक्त माने गये हैं।
तिब्बत से व्यापार बन्द होने तथा बकरियों की संख्या में कमी के चलते यहाँ के निवासियों ने आजीविका के लिए नये विकल्प ढूँढ लिये। दूसरी ओर इनके द्वारा हस्तशिल्प के रूप में बनाए जाने वाले गलीचे, दन, थुल्मे, कम्बल, उनी वस्त्र आदि की परम्परागत कला के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा। वन एवं वन्य जीव संरक्षण के नाम पर सरकार ने फूलों की घाटी और नन्दादेवी बायोस्पफीयर जैसे कई बुग्याली क्षेत्र आरक्षित कर दिए, अतः चारागाहों से वंचित इन पशुपालकों का बकरी पालन भी अत्यन्त प्रभावित हो गया। जिसका सीधा असर हस्तशिल्प एवं प्राचीनतम कुटीर उद्योग पर पड़ा, जबकि इनका कुटीर उद्योग सम्पूर्ण पर्वतीयों के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय था। यहाँ के लोग स्थानीय उत्पादों से शराब बनाने में माहिर माने जाते हैं शराब इनके जीवन से जुड़ी हुई है। ठण्ड से बचने के साथ यह इनके देवी-देवताओं से जुड़ी हुई वस्तु भी है।
देश की आन्तरिक सुरक्षा पर 17 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री जी अध्यक्षता में दिल्ली मेें आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बताया कि पिछले 5 साल (सन् 2007 से 2012 तक) चीन के गश्ती दलों की ओर से भारतीय सीमा में 37 बार घुसपैठ हुई है। उन्होंने इसके साथ ही नेपाली सीमा पर वामपंथी उग्रवाद पनपने की आशंकाओं का हवाला देते हुए उत्तराखण्ड के 5 सीमावर्ती जिलों के सभी 34 विकासखण्डों को सीमावर्ती क्षेत्र विकास कार्यक्रम (बीएडीपी) में शामिल करने और पुलिस बल के आधुनिकीकरण के लिये पूरा धन केन्द्र की तरफ से उपलब्ध् कराये जाने की भी मांग की। उन्होंने उत्तराखण्ड में चीन से सटी 350 किमी लम्बी सीमा में चीन की तरफ से चमोली जिले के बाड़ाहोती इलाके में भारतीय दावे को विवादित करने की चीन की कोशिशों का प्रमुखता से उल्लेख किया। मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड ने इस बैठक में कहा कि चीन के गश्ती दलों ने 2006 में 6 बार, 2007 में दो बाद, 2008 में दस बार, 2009 में 11 बार, 2011 में 5 बार और 2012 में तीन बार सीमा सीमा उल्लंघन किया है। सीमावर्ती इलाकों में मजबूत सड़क सम्पर्क की जरूरतों पर जोर देते हुए उन्होंने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से ज्यादे रोड़े न अटकाए जाने की भी अपील की। उन्हेांने भारत से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर चीन की तरफ से सड़ राजमार्ग बनाए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें भी सीमावर्ती सड़कों के निर्माण की प्रक्रिया तेज करनी पड़ेगी। इसी तरह नेपाल से सटी 275 किमी लम्बी सीमा पर भी सुरक्षा की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश की अहम सामरिक स्थिति एवं सम्वेदनशीलता के मद्देनजर सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा और संचार तन्त्र स्थापित करना जरूरी है। नेपाली प्रान्त महाकाली अँचल में नेपाली माओवादी एवं यंग कम्युनिस्ट लीग सक्रिय है। महाकाली इलाके से लगे उत्तराखण्ड क्षेत्र में भाकपा (माओवादी) पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी तैनात करना चाहती है। खुफिया सूत्रों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि माओवादी इस इलाके में अपने आन्दोलन का विस्तार करना चाहते हैं। मुख्यमंत्री का सुझाव था कि सीमा पार से इस खतरों को ध्यान में रखते हुए अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर खुफिया नेटवर्क सुधाराजाए। साथ ही केन्द्रीय बल सतर्कता एवं निरीक्षण भी तेज किया जाए।
चीन द्वारा 2020 में लद्दाख एवं गलवान में दिखाया गया कपटपूर्ण व्यवहार एवं पड़ोसी देश नेपाल द्वारा चीन के साथ सुर से सुर मिलाना, उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्राी की उपरोक्त शंकाओं को सौ प्रतिशत सिद्ध करता है। पड़ोसी देशों की सेनाओं द्वारा की जा रही घुसपैठों को सदा सीमान्त के निवासियों ने पहले पकड़ा है चाहे वह घुसपैठ पाकिस्तान द्वारा की गयी हो, चीन, नेपाल अथवा बांगलादेशियों द्वारा। चिन्ता का विषय है कि आज उत्तराखण्ड का सीमान्त क्षेत्र दिन पर दिन जनविहीन होता जा रहा हे। यहाँ के मूल निवासी पर्वत पुत्र सुख सुविधाओं के आभाव में अन्यत्र जाकर बसने के लिए मजबूर होते जा रहे हैं ऐसी परिस्थिति में यक्ष प्रश्न उठता है कि कौन करेगा? इस सीमान्त क्षेत्र की रक्षा। उत्तराखण्ड राज्य के सीमान्त निवासियों को भोटिया नाम से जाना जाता है। डाॅ. आर.एस.टोलिया ने अपनी पुस्तक (गे्रेट ट्राइवल डाइवर्सिटी आॅफ उत्तराखण्ड) में उल्लेख किया है कि भोटिया वास्तव में कोई जाति नहीं है ये इस जातीय सम्बोधन को पसन्द भी नहीं करते हैं। उनका मानना है कि अंग्रेज प्रशासकों ने इनकी बसासत और तिब्बत से सम्बन्धों के चलते इन्हें गलती से भोटिया पुकारना शुरु कर दिया जबकि इन्हें मारछा, ताल्छा, जोहारी, शौक, दारमी, चैंदासी और व्याॅसी के नाम से सम्बोधित किया जाना चाहिये था। हिमालय गजेटियर में एटकिंसन ने कहा है कि भोटिया शब्द की उत्पत्ति भोट शब्द से हुई है जो कि ‘बोड’ शब्द का अपभ्रन्श है। इसका अर्थ तिब्बत से लगाया जाता है और इसी भोट शब्द ने भोटिया नाम को जन्म दिया है, जिसे कालान्तर में तिब्बत तथा भारत के बीच सीमान्त क्षेत्र में रहने वाले मानव समूहों के लिये प्रयुक्त किया गया। एटकिंसन ने इन्हें खस मानने से इन्कार करने के साथ ही इनकी भाषा के आधार पर इन्हें तिब्बत मूल का माना है। लेकिन इस समूह के विद्वानों का कहना है कि एटकिंसन एक प्रशासक था वह भाषा विज्ञानी नहीं था। बी.एस.चटर्जी ने लिखा है कि भोटिया शब्द का प्रयोग भारत-तिब्बत सीमा में निवास करने वाले अनेक नृःजातीय समूहों के लिए किया जाता है, जिनकी आदतें कुछ समान होते हुए भी अन्य मानव जातियों से भिन्न शारीरिक विशेषताएँ होती हैं। देखा जाय तो भोटिया भारत-तिब्बत सीमा पर सीमान्त प्रहरी की तरह बसे हुए हैं और अगर भारतीय के बजाय उन्हें तिब्बती कहा जाय तो उनकी भावनाओं का आहत होना स्वाभाविक ही हे। सम्भवतः तिब्बत से व्यापारिक सम्बन्ध् होने तथा वहाँ के निवासियों के साथ ‘ज्ञानकोषी’ और ‘पानकोषी’ (खानपान के रिश्ते) सम्मिलित होना सुदृढ़ मैत्री का यथार्थ प्रमाण माना जाता था। शिवराज सिंह रावत निःसंग का मानना है कि व्यापारिक समुदाय के सम्बन्ध् अतीत में वैदिक परम्पराओं से जुड़े थे। कालान्तर में इस जाति ने विष्णुगंगा क्षेत्र माणा, धवल गंगा क्षेत्र में नीती-गमसाली, जान्हवी क्षेत्र में डुण्डा, हरसिल नेलंग, धारचूला और व्यास- चाौंदास जैसे उपयोगी मार्गों के सिरोभाग में अपना निवास स्थान चुना। उत्तराखण्ड की विभिन्न घाटियों में सदियों से निवास कर रही भोटिया जनजाति को विभिन्न नामों से जाना जाता है। धारचूला के रं, मुन्स्यारी के शौका, माणा के मारछा, नीती घाटी के तोल्छा तथा उत्तरकाशी के जाड़ भोटियों का रहन-सहन, बोली भाषा तथा वेशभूषा भिन्न है। पूर्व में इनमें से एक समूह दूसरे से वैवाहिक सम्बन्ध् नहीं रखते थे। गढ़वाल में मारछा जनजाति के मूल गाँव माणा, गमसाली, नीति और बम्पा हैं, जबकि तोल्छा लोगों के मूल गाँव कोसा, कैलाशपुर, फकरिया, मलारी, जेलम, फाक्ती, द्रोणागिरी, लाता, रेणी, सुराईकोठा और सुबाई आदि हैं। सुबाई, मल्लागाँव और सुक्की जैसे कुछ गाँवों में दोनों जातियों की मिश्रित आबादी निवास करती है। तोल्छा स्वयं को उची जाति मानते हैं। उत्तरकाशी जिले के भटवाड़ी तहसील के भोटिया जाड़, निलंग तथा जाडुंग घाटियों के मूल निवासी हैं। इन सभी जातियों में अत्यधिक सांस्कृतिक भिन्नताएं हैं जैसे मारछा, तोल्छा स्वयं को क्षत्रियों के करीब मानते हैं तो जाड़ तिब्बतियों की तरह बौद्ध हैं। परन्तु दोनों का मूल एक ही माना जाता है। गढ़वाल के भोटिया स्वयं को राम का वंशज मानते हैं ये केवल क्षत्रियों से अपना सम्बन्ध् कायम रखते हैं। ‘वाल्टन’ ने भी माना है कि भोटिया किसी भी तरह से तिब्बतियों से समरूप नहीं हैं। हालांकि इनके गुण शक तातार जाति से मिलते हैं। राहुल सांस्कृत्यायन ने भी लिखा है कि भाषा, पहनावे तथा शारीरिक बनावट के साथ कतिपय अन्य समानताओं के चलते भोटियों को तिब्बती कहना उचित नहीं है।
भोटिया वास्तव में जाजीविका के लिए एक घुमन्तू और व्यापारिक मानव समूह रहा है। भारत तथा तिब्बत के बीच में रहनेे तथा दोनों भू-भागों में व्यापार करने के लिए उन्हें एक ऐसी विलक्षण भाषा की जरूरत पड़ी जो कि न दुनिया के अन्य क्षेत्रों में बोली जाती हो और ना ही दूसरा व्यापारिक वर्ग उसे समझता हों। इसीलिए इनकी बोली को सांकेतिक भाषा भी कहा जाता हे। भोटिया अन्य हिमालयी जनजातियों की तरह खेती या वनों पर आधारित कभी भी नहीं रहे। उनकी आजीविका का मुख्य साध्न व्यापार रहा हे। सन् 1962 से पहले व्यास घाटी के व्यापारी लिपुलेख दर्रे से तकलाकोट, दारमा घाटी के व्यापारी न्यू धूरासे छाकरा, जोहार के उटाधूरा होते हुए ज्ञानिमा, नीति वाले बाड़ाहोती से दाबा, माणा के व्यापारी थोलिंग और निलंग के व्यापारी चपराॅग आदि तिब्बती मण्डयों में जाकर व्यापार करते थे। उस समय नमक एवं सुहागा तिब्बत का मुख्य उत्पाद था। इनका तिब्बत से कई बहुमूल्यवस्तुओं का व्यापार होता था इनमें भेड़-बकरी, भोटिया घोड़े, भारद्वाज घोड़े, हुण्डेर, च्यालपू, चॅवर पूंछ, तिब्बती उन (पश्मीना) तिब्बती कालीन, चमड़ा, सुहागा, राॅगा, तिब्बती नमक, मूंगा, हींग, लालजड़ी, जहरमोहरा और वन ककड़ी आदि जड़ी-बूटियाँ शामिल थीं। इनके सीमावर्ती गाँव हर तरह से व्यापार के डिपो थे। भोटिया व्यापारियों ने तिब्बत से ही उनी कारोबार करना सीखा था। उनी वस्त्रों में थुलमा, गुदमा, दन्न, चैपट्टा पट्टू, लावा,ख् आॅगड़ा, कालीन, पंखी एवं शटन आदि तथा चाॅद या राँछ पर उनी वस्त्र बुनना भी भोटियों ने तिब्बत से ही सीखा था। कुछ अन्य जातियों की तरह भोटिया जनजाति एक जगह पर स्थिर नहीं रही फिर भी इन्हें खानाबदोश नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि इनकी बसासत साल में कुछ निश्चत स्थानों में ही होती थी। तिब्बत नजदीक होने के कारण नीती, माणा, चैदास और जोहार जैसी उफँचाई वाली घाटियों में भीषण भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद भोटिया वहाँ रहते थे। वे क्षेत्रा गर्मियों के लिए भोटियों की बकरियों के हिसाब से अनुकूल थे और वहाँ व्यापारिक वस्तुओं का संग्रह भी कर लेते थे। सीमान्त की विकट जलवायु का भोटिया जनजाति के खानपान, रहन-सहन पहनावा, जीवन शैली एवं व्यवहार पर गहरा प्रभाव रहा है। प्राकृतिक पर्यावरण का उनकी शारीरिक बनावट पर भी असर पड़ा है। उत्तराखण्ड राज्य के जिस क्षेत्र में ये भोटिया रहते हैं उस भू-भाग का एक चैथाई भाग 6 माह बर्फ से ढका रहता है। हवा अधिक चलने के कारण यहाँ गर्मियों में भी तापमान अत्यधिक घट जाता है इसीलिए इनकी बस्तियाँ प्रायः ऐसी धूप वाली ढलानों पर होती हैं, जिन पर सूर्य की सीधी किरणें पड़ती हैं। भारी हिमपात को ध्यान में रखते हुए घरों की छतें तिरछी या शंक्वाकार होती हैं ताकि बर्फ फिसल कर नीचे आ जाए। इनके परम्परागत मकान मिट्टी, पत्थर से बने होते थे। पश्चिम में मारछा, तोलछा और जाड़ भोटियों की बसासतों में पत्थर के स्लेटों की कमी के कारण मकान की छातें भोजपत्र वृक्ष की मोटी छालों से या देवदार के तख्तों से ढकी जाती थी।
भोटिया समूह विवाहोत्सव को बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं। विवाहोत्सव का जश्न शराब के बिना अध्ूरा माना जाता है। चमोली के भोटिया जनजाति पौणा नृत्य (बारात का नृत्य) इतना लोकप्रिय होता जा रहा है कि इसका आयोजन गैर भोटिया कार्यक्रमों में होने लगा है। शोध् कर्ताओं ने पाया कि जाड़, दारमी, व्यासी और चैदासी भोटियों में ममेरे, फुफेरों में वैवाहिक सम्बन्ध् हो सकते हैं जबकि अन्य में देवर और साली के साथ विवाह की अनुमति है। लेकिन जब से भोटिया लोगों ने गंगाड़ी ठाकुरों से रिश्ते कायम करने शुरू किये तब से वे अपने को राजपूत मानने लगे हैं, इनके कुछ उप समूहों में कन्या शुल्क लेने की प्रथा रही है जबकि मारछा, तोल्छा तथा जोहारियों में यह परम्परा कभी नहीं रही है।
डाॅ. आर.एस.टोलिया का कहना है कि अब भोटिया समाज में भी दहेज की बीमारी फैल रही है। भोटिया महिलाओं में माँग में सिन्दूर, गले में हार तथा नाक में नथ विवाहित महिला की पहचान होती है। अपनी पुस्तक ‘द शेड्यूल्ड ट्राइब्स’ में के.एस. सिंह ने लिखा है कि सिक्किम के उत्तरी जिलों में 1981 तक बहुपति प्रथा के मामले दर्ज हुए थे। सिक्किम के भोटिया अपने मुर्दे को उसे लेकर 49 दिन तक घर के अन्दर ही रखकर शोक मनाते हैं और इसके बाद मुर्दे का अन्तिम संस्कार किया जाता है। बरसी के अवसर पर लामचे संस्कार होता है।
जाड़ भोटिया समुदाय ने हिन्दू और तिब्बत की बौद्ध संस्कृति का एक अनूठा समन्वय स्थापित किया है। वे एक तरह से तिब्बती त्यौहार को हिन्दू तरीके से मनाते हैं। तिब्बत की सीमा से लगे हुए जाढुंग, नेलाॅग से विस्थापित कर डूंडा में बसाए गए और पहले से ही बगोरी में रह रहे जनजाति समुदाय के लोग डुंडा के वीरपुर में स्थायी रूप से बस गये हैं। कण्डाली त्यौहार रं भोटिया समुदाय के लिए महाकुम्भ जैसा है, जो कि पूरे 12 वर्ष बाद मनाया जाता है। इस अवसर पर देश-विदेश में फैले इस समुदाय के लोग अपने गाँवों में लौट आते हैं। सीमान्त की चाौंदास घाटी में हर बारह वर्षों बाद बुराई का प्रतीक मानी जाने वाली (कंडाली) पौधे को रं समुदाय द्वारा नष्ट किया जाता है। कहा जाता है कि इस पौधे में बारह वर्ष में एक बार फूल खिलते हैं। जोहारियों के अलावा शेष भोटिया समुदाय का साल में दो बार निवास परिवर्तन होता है। जबकि जोहारी भोटिया साल में तीन बार निवास बदलते हैं। उनका पहला निवास तिब्बत सीमा के एकदम निकट दस हजार से 19 हजार पिफट की उफँचाई पर होता है। मिलम, मर्तोली, बुपर्फू, माणा, लवन आदि बुग्याल हैं। जोहारियों के स्थाई घर 7000 से 7500 फिट की उचाई पर होते हैं। जहाँ अपेक्षाकृत कम ठण्ड पड़ती है। इनका तीसरा ठिकाना भाबर के निकट होता था जो कि समुद्र तल से 2500 से लेकर 3500 फिट की उचाई तक स्थित है। शेष दो बार जलवायु या मौसम के हिसाब से निवास बदलते हैं।
2011 की जनगणना से पहले अगर 12001 की जनगणना के आॅकड़ों पर ध्यान दें तो हमें उत्तराखण्ड में निवास करने वाली अन्य चार जनजातियों में से भोटिया जनजाति प्रत्येक क्षेत्र में सबसे आगे नजर आती है। वे उत्तराखण्ड की अन्य सामान्य जातियों की तुलना में भी तरक्की के मामले में सबसे आगे दिखाई देते हैं। 2001 की जनगणना के आॅकड़ों के अनुसार यद्यपि उत्तराखण्ड में जन जातियों की 93.8 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है लेकिन इनमें से सर्वाधिक 25.8 प्रतिशत आबादी नगरीय क्षेत्रों में रहती है। सन् 2001 में प्रदेश की जनजातियों का लिंगानुपात 950 स्त्री प्रति हजार था लेकिन भोटिया जनजाति में सर्वाधिक 1049 लिंगानुपात दर्ज किया गया है। उस दौरान सभी जन जातियों का साक्षरता प्रतिशत 63.2 था जबकि अकेली भोटिया जनजाति का प्रतिशत 79.9 था। उस दौरान जब राज्य की जनजातियों के 5 से लेकर 14 साल के 76.6 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते थे जबकि भोटिया जनजाति के 86.4 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते थे। जनगणना में प्रदेश की जनजातियों के 4.3 प्रतिशत लोग ही स्नातक और परास्नातक स्तर तक शिक्षित पाये गये। इनमें भी सर्वाध्कि 11.6 प्रतिशत स्नातक और उससे उपर की कक्षाओं के छात्र भोटिया (सीमान्त) जनजाति के थे। सन् 2001 की जनगणना मेें जन जातियों की 41.1 प्रतिशत आबादी कर्मकार में दर्ज की गयी। कुल कर्मकारों या कर्मियों में सर्वाधिक 41.1 प्रतिशत भोटिया और सबसे कम 34.9 प्रतिशत बुक्सा जनजाति के लोग थे। प्रख्यात इतिहासकार पद्मश्री प्रो.शेखर पाठक का मानना है कि सन् 1967 में आरक्षण मिलने के बाद भोटान्तिक क्षेत्रा की आबादी का बड़ा हिस्सा आरक्षण मिलने के बाद राजकीय नौकरियों में आना शुरु हुआ है जिससे भोटान्तिक में सदियों से विकसित विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक आर्थिक परिदृश्य एकदम बदल गया, बल्कि ध्वस्त हो गया है। उत्तरकाशी से लेकर पिथौरागढ़ तक लगभग 300 किमी लम्बी भारत तिब्बत सीमा के निकट नीति-माणा और व्यास-दारमा घाटियों में बसे भेटिया समुदाय के लोगों द्वारा बड़े पैमाने पलायन किये जाने से ये सीमान्त क्षेत्रा तेजी से निर्जन होते जा रहे हैं। यह पलायन नहीं रोका गया तो देश की सुरक्षा के सामने एक गम्भीर चुनौती खड़ी हो जायेगी। पिथौरागढ़ जिले में तिब्बत से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से जुड़ी व्यास, चैदास घाटियाँ खाली हो गयी है। इन घाटियों के नाबी, रौंगकौंग, गुंजी, गब्र्यांग, बूँदी, सीपू, मार्छा, तिदाँग, गो में, दातू में, दुग्तू, बाने में, बालिंग, चल में, नाग्लिंग में और सेला जैसे सीमान्त गाँव लगभग खाली हो गए हैं। महिलाओं का उल्लेख किये बिना इस समाज का मूल्यांकन अध्ूरा रह जाएगा। यहाँ की महिलाएं गर्म कपड़ों की बुनाई में सि(हस्त होती हैं। उनमें प्रोसेसिंग, डाइंग और उन बुनने की परम्परागत कला संस्कार के तौर पर माँ से बेटी के पास जाती है। अन्य पर्वतीय महिलाओं की तरह उन पर खेती की जिम्मेदारी नहीं होती है। उनमें पुरुषों के साथ काम का बंटवारा भी समान नहीं होता है, वे अन्य पहाड़ी महिलाओं की तरह पुरुषों के बाद भोजन करने की प्रथा को भी नहीं मानती क्योंकि उन्हें भोजन आदि कार्यों को निपटा कर बुनाई जैसे कार्यों में जुटना होता है। ये व्यापार के साथ घरेलू कच्ची शराब बनाने में भी माहिर होती हैं। समाज में शराब केवल जीवन एवं संस्कृति का अंग ही नहीं बल्कि आर्थिकी का भी अभिन्न अंग होती है। कठिन जलवायु के कारण ये शारीरिक रूप से अत्यन्त मजबूत, ताकतवर एवं जीवट होती हैं। ये अन्य पहाड़ी महिलाओं की तरह संकोची नहीं होती हैं। चिपको आन्दोलन के बगैर जिस प्रकार दुनिया भर में पर्यावरण की चर्चा अध्ूरी है, उसी प्रकार बिना गौरा देवी की चर्चा किए भोटिया महिलाओं की जीवटता, शौर्य और अदम्य साहस के साथ पर्यावरण चेतना की बातें भी अध्ूरी हैं। बेजुबान वृक्षों की रक्षक इन वीरांगनाओं ने हिमालय की उपत्यकाओं से वृक्षखोरों के खिलापफ जो गर्जना की वह दुनिया के कोने-कोने तक प्रतिध्वनित हुई, वह गौरा देवी भी कोई और नहीं बल्कि एक भोटिया महिला थी। जिसने सीमान्त नीति घाटी में स्थित रैणी गाँव की जनजाति महिलाओं के सहयोग से 26 मार्च 1974 को कुल्हाड़ियों तथा बन्दूकों से लैस वन ठेकेदार के मजदूरों, वन कर्मियों के साथ ठेकेदार के दबंगों को जंगल से इस तरह भगाया कि वे दुबारा पीछे मुड़कर न देख सके। गौरा देवी के साथ रैणी गाँव की उमा देवी, गुमती देवी, गोमा देवी, परसा देवी, मूसी देवी, हरकी देवी, तिलाड़ी देवी, संग्रामी देवी एवं बाली देवी जैसी वीरांगनाओं की टोली आजीवन बनी रही। हाथ में तकली, पीठ पर कपड़े से बंध बच्च और सामने एक डगर पहाड़ी पगडण्डी, लकड़ी के राॅच पर रंग-बिरंगे धगों के ताने-बानों में उलझी सीमान्त की ये नारियाँ सचमुच जिन्दगी के रंग-बिरंगे सपनों की प्रेरणा देती हैं, वे खाली कभी भी नहीं बैठती हैं। इन महिलाओं में वो अदम्य साहस होता है कि इतिहास उनके पीछे चलता है। गगनचुम्बी हिम शिखरों का गर्वमर्दन करने वाली बछेन्द्रीपाल और चन्द्रप्रभा ऐतवाल ये वो नारियाँ हैं जिन्होंने अपनी हिम्मत और हौंसले का डंका सारी दुनिया में बजाया है। पूर्व में जसुली देवी ने अपनी पूरी सम्पत्ति अंग्रेज कमिश्नर सर हेनरी रैमजे को पैदल यात्रियोें की सुविध हेतु धर्मशालाओं के निर्माणार्थ सौंप दी थी। उन्होंने लगभग तीन सौ धर्मशालाएं बनवाई जिनके अवशेष आज भी यत्र-तत्र पाये जाते हैं। इसी तरह गंगोत्री गरब्याल को शिक्षा के क्षेत्र में सन् 1964 मेें राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजा गया था। आज सीमान्त के गाँव वीरान होते जा रहे हैं जो सामरिक दृष्टि से अत्यन्त चिन्ता का विषय है। इस सीमान्त गाँवों में बच्चों के लिए प्राइमरी स्कूल तक न होने के कारण ये सीमान्तक लोग बच्चों की पढ़ाई की खातिर अब मूल गाँवों में लौटने के बजाय नीचे की घाटियों में ही स्थायी रूप से रहने लगे हैं। अपने विराट स्वरूप और सर्वाधिक उचाई जैसी विशेषताओं के कारण अगर हिमालय भारत वर्ष का ताज कहा जाता है तो इनके मूल निवासी उसकी जीवटता, उद्यमशीलता, प्रगतिशीलता तथा विशिष्ट संस्कृति को देखते हुए भारत वर्ष के आदिम जाति समूह का सरताज अवश्य ही कहे जा सकते हैं। मध्य हिमालय की भोटिया जनजाति इसी क्षेत्र की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत वर्ष की जनजातियों में सर्वाधिक विकसित तो है ही, इनकी खुशहाली एवं समृद्धि गैर जनजातीय लोगोें के लिए भी अनुकरणीय उदाहरण है। इस जनजाति का ऐसा विकास किसी दैवीय चमत्कार या खास प्राकृतिक सम्पदा के कारण नहीं हुआ है वरन इनकी हिम्मत, कठिन परिश्रम और लगन का परिणाम है। इन्होंने भीषणतम भौगोलिक परिस्थितियों एवं प्रतिकूल जलवायु में खुशी से जीने की कला भी सीखी औरर इन कठिनतम परिस्थितियों ने उनके अन्दर के पौरुष को ललकार कर उन्हें व्यापार के जरिये अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिये प्रेरित भी किया। ये जनजाति के लोग कुशाग्र बुद्धि, कड़ी मेहनत और जन्मजात विनम्रता का ही परिणाम है कि वे आज प्रत्येक क्षेत्र में अपना विशेष स्थान रखते हैं। ये उत्तराखण्ड राज्य ही नहीं भारत राष्ट्र की सेवा में अपना अतुलनीय योगदान प्रदान कर रहे हैं। उत्तराखण्ड राज्य गठन के मात्रा 20 वर्षों के अन्तराल में ही इस मानव समूह ने प्रदेश के मुख्य सचिव, सूचना आयुक्त देने के साथ दर्जनों आइएएस आईपीएस, आईएपफएस, पीसीएस, पीपीएस सैकड़ों डाक्टर, इंजीनियर तथा सहस्त्रों की संख्या में अन्य नौकरशाह देने के साथ ही प्रदेश के उद्योग और व्यापार में भी अहम भूमिकाा अदा करते हुए दूसरे समुदायों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण इस मानव समूह में किसी प्राचीन या अर्वाचीन श्रेष्ठ मानव नस्ल का अंश होने का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
पड़ोसी देश चीन एवं नेपाल की सीमा से लगे हुए सीमान्त गाँवों का निर्जन हो जाना भारत राष्ट्र की सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त चिन्ता का विषय है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही पड़ोसी देश चीन के साथ चल रहा सीमा विवाद, चीन द्वारा पड़ोसी देश तिब्बत को हड़प लेना, नेपाल जैसे शान्त देश को भारत के खिलाफ उकसाये रखना, उत्तराखण्ड की सीमाओं में घुसपैठ करना, सन् 2020 से चीन द्वारा सम्पूर्ण सीमा में विवाद खड़ा किए रखना। दूसरी ओर सीमान्त के गाँवों का उजड़ना एवं जन विहीन होना बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। उत्तराखण्ड सरकार एवं भारत रकार को समय रहते जागना होगा सीमान्त के जनविहीन गाँवों में पर्यटन हब विकसित करना होगा। अन्यथा की स्थिति में भारत राष्ट्र को सीमाओं की सुरक्षा एवं सामरिक महत्व के दृष्टिगत सीमान्त के इन निर्जन गाँवों को भारत तिब्बत सीमा पुलिस अथवा सेना को सौंपना होगा।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-
यात्राएं जीवन यात्राएं: लेखकर डाॅ. प्रयाग जोशी।
हिमलायन गजेटियर ग्रन्थ-2, भाग2, एटकिंसन। अनुवाद प्रकाश थपलियाल
हिमालय दर्शन: लेखक दिगम्बर दत्त थपलियाल
उत्तराखण्ड का सामाजिक एवं साम्प्रदायिक इतिहास: लेखक प्रो. डी.डी.शर्मा
उत्तराखण्ड जनजातियों का इतिहास लेखक जयसिंह रावत
हिमालयन गजेटियर ग्रन्थ-2, भाग-1, एटकिंसन, अनुवाद- प्रकाश थपलियाल
उत्तराखण्ड इयर बुक: सम्पादक लोकेश नवानी।
कुमाउ का इतिहास: लेखक बद्रीदत्त पाण्डेय
उत्तराखण्ड ज्ञानाकोष: लेखक प्रो. डी.डी.शर्मा
पहाड़ 14-15 अस्कोट-आरोकोट अभियान अंक। सम्पा.शेखर पाठक
पहाड़ 14-15 पिथौरागढ़-चम्पावत अंक, सम्पादक शेखर पाठक
पहाड़ स्मृति अंक: एक 20-21- 2019, सम्पादक शेखर पाठक
पहाड़ 18 हिमालयी समाज, संस्कृति, इतिहास 2012-13। सम्पा. शेखर पाठक
पहाड़ चम्पावत अंक-2
पहाड़ 19 गिर्दा के आयाम 2015

पर्यावरण और पेड़ पौधे- मजनू

जैसा नाम वैसा काम
–प्रयाग
वनस्पतियों का नाम हमारे भारतीयों विद्वानों वैज्ञानिकों सहित अन्य विश्व कर प्रसिद्ध वनस्पतिक बैज्ञानिको ने पेड़ पौधों की जीवन शैली रूप रेखा जीवन चक्र के अनुसार रखे हैं। इनके सुंदर भाग वृक्ष जड़, छाल, लतायें, कोपले, फल ,फूल, तना, अन्य अनगिनत शाखाएं होती है जो हमे हवा पानी देती है जीवन देती हैं। इन्ही में एक पेड़ है मजनू जिसको संसार मे अलग अलग नामो से जाना जाता है ।
मुंस्यारी क्षेत्र में इस वनस्पति को मंछयन के नाम से जानते हैं जिसका तातपर्य /मतलब भी हिंदी के प्रचलित शब्द मजनू का क्षेत्रीय नाम है इसकी साथी पेड़ को लैला नाम से जाना जाता मजनू पेड़ का वानस्पतिक नाम salix bebylomica है । यह वनस्पति वर्तमान में भूजल की कमी को पूरा करने में सक्षम है । अधिकतर जलश्रोतों में इसकी लटकी हुये लताये शाखाएं देखे जाते हैं ।
जलश्रोतों को पुनर्जीवित करना हो तो अन्य जल उतपन्न करने वाले वनस्पतियों के साथ मजनू के पौधों का भी लगाये सकारात्मक परिणाम आयेंगे मजनू के फूल और कोपले भी काफी असाध्य रोगों के उपचार में दवाओं अन्य औषधीय हर्बल उत्पादों के साथ मिश्रण कर उपचार में प्रयोग होता है मजनूं के फूल बीज मधुमखियों, पक्षियों के पसंदीदा भोजनो मे से एक है अधकितर पशु पक्षियों द्वारा ही हमारे विलुप्त हो रहे वनस्पतियों का संरक्षण किया जा रहा है
हम इंसान स्वार्थी है में खुद भी
लेकिन में अब प्रयास कर रहा हूं की जितना भौतिक लाभ मुझे मिले इन वनस्पतियों से मिलता है उसमें का 80% भाग तन मन धन इनके बचाव और सुरक्षा में खर्च करूंगा मेरे ओर टीम का प्रयास सम्पूर्ण वर्ष में वृक्षारोपण के साथ इनकी सुरक्षा देखभाल उपयोग ,स्वरोजगार, आत्मनिर्भर, ओर दोहन न करने पर भी रहेगा
हम जो धरातल के लोग हैं उन किसानों ,चरवाहों से लगातार वन उपज के दोहन ,सुरक्षा पर चर्चा करते हैं उनके बन परिसर में बिताये अनुभव का लाभ लेते हैं और वन्यजीव वनस्पतियों की जानकारी हेतु एक मार्गदर्शक के रूप में आंशिक पारिश्रमिक देकर भृमनशील जगहों पर लेके जाते हैं तब इन सयानो से हम कुछ सिख पाते हैं
पुनः टीम के साथ हिमालय के ग्रामीणों से विलुप्त हो रहे वन ,वनस्पतियों,वन्यजीव, पशु,पक्षियो को बचाया जाय
अगर अपना स्वार्थ है तो पशु, पक्षी मधुमक्खी भी हमे इन्हें बचाने, इनकी बीज उतपत्ति में योगदान देते हैं
कुछ पेड़ आर्थिक लाभ सजावट के लिये लगाएं
कुछ पेड़ जंगली जानवरों के भोजन निवाला हेतु लगाएं
कुछ पेड़ पक्षियो के खाने बसासत घोषलो हेतु लगाएं
हिमालय को हरा भरा करने में अपना योगदान दे
सलाह मार्गदर्शन हेतु सम्पर्क करें
टीम
जौहारी फ़सक मुंस्यारी हाउस
पिघलता हिमालय
95577771959761665084
9557777264/8394811110

हिमालय जैव विविधता का जनक


प्रोफेसर सुनील कुमार कटियार
हिमालय के जंगल जीवन की आश्चर्यजनक विविधता का पोषण करते हैं जो अनुदैर्ध्य और ऊंचाई वाले ढालों में समृद्धि बनाते हैं. और इस लिए उन्हें 36 वैश्विक जैव विविधता हॉट स्पॉट में से एक के रूप में वर्गीकृत किया गया है। जैवविविधता हॉटस्पॉट का विचार पहली बार 1988 में नॉर्मन मायर्स द्वारा रखा गया था। हिमालय पर्वतमाला दुनिया की पर्वत प्रणालियों में सबसे छोटी और सबसे ऊंची हैं। वे जैविक और भौतिक विशेषताओं दोनों के संदर्भ में एक अत्यधिक जटिल और विविध प्रणाली का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्राकृतिक और मानव.प्रेरित विक्षोभों के प्रति उनकी सुभेद्यता सर्वविदित है। जैवविविधता तत्वों की समृद्धि और विशिष्टता के कारणए इस क्षेत्र को 34 वैश्विक जैवविविधता हॉटस्पॉट में से एक के रूप में मान्यता दी गई है। यह पौधों की उत्पत्ति के 3 उप.केंद्रों (पश्चिम हिमालयए, पूर्वी हिमालय और उत्तरपूर्व क्षेत्र) का प्रतिनिधित्व करता है . जो क्रमशः 125, 82 और 132 प्रजातियों के जंगली रिश्तेदारों का योगदान करते हैं। पूर्वी हिमालय और उत्तरपूर्वी उप.केंद्र मूसा और साइट्रस विविधता में योगदान के लिए जाने जाते हैं। इस क्षेत्र में प्रचलित आदिम कृषि प्रणालियों और स्वदेशी कृषक समुदायों द्वारा सचेत और अचेतन चयनों ने भूमि दौड़ के रूप में आनुवंशिक विविधता के विशाल संवर्धन में योगदान दिया है। प्रतिनिधि प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र (घास के मैदान और जंगल) की विविधता और स्थानिक जैव संसाधनों की समृद्धि ने हिमालय के पारिस्थितिक महत्व को जोड़ा है। विशेष रूप से अल्पाइन घास के मैदान और क्षेत्र के जंगल अनूठी विशेषताओं का प्रदर्शन करते हैं। हिमालय के बुग्याल महत्वपूर्ण वन्य जीव प्रजातियों जैसे कस्तूरीमृग, हिमालयी भूरा भालू, हिमालयी थार और मोनाल का एक प्रमुख आवास भी है।
2000 के दशक की शुरुआत से पर्यटन और मानवीय गतिविधियों में वृद्धि ने इस प्राचीन भूमि की स्थलाकृति को बदलना शुरू कर दिया। वन्य जीव प्रजातियों जैसे कस्तूरीमृग, हिमालयी भूरा भालू, हिमालयी थार और मोनाल का एक प्रमुख आवास भी है। इसके अलावा औषधीय और जंगली खाद्य पौधे क्षेत्र के पारिस्थितिक और आर्थिक मूल्य में काफी वृद्धि करते हैं। हालांकि हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र और उनके घटक भूवैज्ञानिक कारणों से और जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण तनाव केकारण अत्यधिक संवेदनशील हैं। साथ ही इस बात के भी संकेत मिल रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण इन कारकों के दुष्प्रभाव और बढ़सकते हैं। यह ऊपरी और निचले इलाकों में रहने वाले स्वदेशी समुदायों के जीवन को प्रभावित करेगा। इसलिएए सभी प्रतिनिधि प्रणालियों के संरक्षण के लिए सचेत प्रयास करने की तत्काल आवश्यकता है। इस संदर्भ में क्षेत्र में मौजूदा संरक्षण क्षेत्र नेटवर्क जो देश के औसत से अधिक मजबूत प्रतीत होता है, एक स्वागत योग्य पहल है। हालाँकि इस नेटवर्क को सभी प्रतिनिधि पारिस्थितिक तंत्रों को पर्याप्त कवरेज प्रदान करने के लिए मजबूत करने की आवश्यकता है खासकर उत्तरपूर्व में।
हिमालयी जैव संसाधनों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए सामुदायिक समर्थन के माध्यम से और सतत उपयोग अवधारणा को बढ़ावा देने के माध्यम सेसंरक्षण दृष्टिकोण में एक प्रमुख बदलाव की आवश्यकता का सुझाव दिया गया है। प्राकृतिक विकासवादी प्रक्रियाओं को जारी रखने के लिए अद्वितीय, अक्सर स्थानिक तत्वों के महत्वपूर्ण भंडार को बनाए रखने के लिए यह महत्वपूर्ण है।
  ( राजकीय महाविद्यालय टनकपुर, चंपावत )

शौका बोली व भाषा

गजेन्द्र सिंह पांगती
जोहार से विस्थापन के बाद शौका संस्कृति जिस तरह विलुप्ति के कगार पर पहुँच गयी है उससे युवा व वृद्ध सभी शौका चिन्तित है। अन्य लोगों की तरह मैं भी मौका मिलते ही शौका संस्कृति के संरक्षण और समवर्धन की आवश्यकता पर अपने विचार प्रकट करता रहता हूँ। लेकिन अभी तक इस विषय में कुछ जागरूकता पैदा होने के अतिरिक्त कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पायी है। इसका बहुत बड़ा कारण भी है। यह कार्य उतना ही दुरूह है जितना सूखे जड़ वाले पेड़ को पुनर्जीवित करना लेकिन यह असम्भव भी नहीं है। आवश्यकता है तो केवल इस बात की कि प्रयाश सुनियोजित हो और उसमें निरन्तरता हो, प्रयास सार्थक हो इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि संस्कृति के वे मूल तत्व और कारक कौन है जिनके छूटने से संस्कृति बिलुप्त हो गयी/हो जाती है।
संस्कृति के मूल तत्व है भाषा, धर्म, परम्पराएं, आस्थाएं, रीतियाँ, कुरीतियाँ, विश्वास, अंधविश्वास, आर्थिक क्रिया कलाप, पहनावा, खानपान आदि आदि। ऐतिहासिक कारणों से शौका भाषा जहाँ कुमाउंनी की सहोदर रही है वहीं शौकाओं का धर्म वैदिक धर्म का सरलीकृत रूप रहा है। तिब्बत व्यापार बन्द हो जाने से शौकाओं का परम्परागत आर्थिक क्रियाकलाप पुनर्जीवित करना असम्भव है। जोहार की ठण्डी आबोहवा में उपयोगी पहनावे का अनुपयोगी हो जाना भी स्वाभाविक है. परम्पराए, आस्थाएं, रीतियाँ, कुरीतियाँ, विश्वास व अंधविश्वास, खान-पान आदि समय के साथ बदलती रहती हैं। संस्कृति के समवर्धन के किये इसके मूल तत्वों को संरक्षित करने के साथ ही कुरीतियों व अन्ध् विश्वासों को दूर करते रहना आवश्यक है। संस्कृति में भाषा व ध्र्म सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इन दोनों में भाषा का स्थान गुरुतर है। ध्र्म बदलने के बाद भी संस्कृति के संरक्षित रहने के कई उदाहरण मिल जायेंगे लेकिन भाषा छूटने के बाद संस्कृति के बचे रहने का शायद ही कोई उदाहरण मिल पाए। बंगाली मुसलमानों ने धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी भाषा नहीं बदली। यही कारण है कि उनमें बंगाली संस्कृति अब भी जीवित है। यही बात कुछ हद तक पंजाबी मुसल्वानों के लिए भी कहा जा सकता है। इसीलिए कहा जाता है, ‘भाषा छूटी तो संस्कृति छूटी।’ पलायन के साथ ही शौका अपनी भाषा पीछे छोड़ आये है। अब उनकी संस्कृति भी भूतकाल की बात होने के कगार पर है तो इसमें आश्चर्य ही क्या है।
इसलिए यदि शौका संस्कृति को संरक्षित करना हो तो हमें सबसे पहले उनकी भाषा व बोली को पुनर्जीवित व प्रचलित करना होगा। हमें उन कारकों का विश्लेषण करना होगा जिनकी वजह से शौका भाषा में लिखित साहित्य की रचना नहीं की जा सकी और उनकी बोली प्रचालन से बाहर हो गयी। कुमाउनी का सहोदर होने के कारण शौका भाषा को हिन्दी की उपभाषा कहा जा सकता है। मैं अपनी रचनाओं में इसका कई बार उल्लेख कर चुका हूँ कि यह कैसे बंगाली और नेपाली से मिलती है। कुमाउनी से इसमें जो भिन्नता है उसके मूल में उक्त दोनों भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। मैं तो यहाँ तक कहता रहा हूँ कि यदि बंगाली शब्दों में ओ की जगह अ का उच्चारण किया जाय या शौका बोली में अ की जगह ओ का उच्चारण किया जाय तो इन दो भाषी लोगों को एक दूसरे की भाषा समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यह मैं अपने कलकत्ता प्रवास के अनुभव के आधार पर दावे के साथ कह सकता हूँ। दुर्भाग्य से अबसे पूर्व राजस्थानी की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। दुर्भाग्य इसलिए कि जोहार के मूल पुरुष धम सिंह रावत के राजस्थान से होने पर भी मैं इस पर गौर नहीं कर सका। इसका एक कारण सम्भवतय यह भी रहा है कि जब मैं 2 वर्ष के लिए जयपुर में था तो मेरा कार्य क्षेत्र मध्य और पूर्व राजस्थान था जहाँ हिन्दी खड़ीबोली का अधिक प्रभाव है जबकि पश्चिम व दक्षिण राजस्थान में शुद्ध राजस्थानी बोली व भाषा का प्रभाव है। यही कारण है कि महान लेखक व साहित्यकार बिजयदान देथा ने जब अपना रचना साहित्य राजस्थानी में लिखने का निर्णय लिया तो उन्होंने जो पहला कार्य किया वह था जयपुर से जोध्पुर जाना और अपने मूल गाँव में रहना ताकि वे मूल राजस्थानी भाषा की आत्मा में रच-बस सकें। उन्होंने राजस्थानी में अनेकानेक उपन्यास, लेख, समालोचनाएँ, संस्मरण आदि और हजारों कहानियां लिखीं है. मुझे पूर्व में उनकी एक-दो रचनाएं पढने का सौभाग्य मिला था. उनके कथानकों की रोचकता और रचना की सरलता व सुन्दरता से मैं अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाया। इसलिए उनकी और रचनाएं पढ़ने की तमन्ना मेरे दिल में थी। कोरोना ने मेरी यह तमन्ना पूरी कर दी। इस महामारी से बचने के लिए मैं अपने पुत्र नवीन के आवास ‘मनाकार’, सल्ला, कसारदेवी, अल्मोड़ा आ गया। नवीन के भी बिजयदान देथा का प्रशंसक होने के कारण उसके पुस्तकालय में उनकी कई रचनाएँ उपलब्ध् थीं। उनमें से तीन-चार रचनाएं पढ़ने पर मुझे इस बात का आभास हुआ कि शौका भाषा व बोली राजस्थानी से अत्यधिक प्रभावित है। कई राजस्थानी शब्द, शब्दों का स्पेलिंग व उच्चारण, वाक्यों की संरचना आदि हिन्दी से भिन्न लेकिन हूबहू शौका बोली जैसी है। मुझे पक्का विश्वास है कि जब भी हम शौका बोली को संरक्षित करने का सुनियोजित प्रयाश करेंगे और शौका भाषा में लेखन के लिए उसके ब्याकरण, उच्चारण, स्पेलिंग आदि का मानकीकरण करेंगे तब मूल राजस्थानी भाषा से हमें बहुत मदद मिलेगी।
किसी भी भाषा व संस्कृति को जीवन्त रखने के लिए उसके मुहावरों व लोकोक्तियों का प्रचलन में रहना अति आवश्यक है क्योंकि इनमें उस संस्कृति की आत्मा बसती है। इनमें सम्बन्धित समाज का इतिहास, उसका अनुभव, उसका विस्वास, मान्यताएं, वर्जनाएं आदि का संकलन होता है। इसी प्रकार भाषा के जीवन्त रहने के लिए आवश्यक है उसका सरल व मध्ुर ;कर्णप्रियद्ध होना और उसका व्याकरण की शु(ता की परिध् िमें बोला और लिखा जाना। इसी अभीष्ट के लिए शौका लोग जब अपनी बोली में लिखते थे तो कुमाउनी शब्द और वाक्य रचना का सहारा लेते थे। इसके लिए बाबू राम सिंह के लेखों को पढ़ा जा सकता है। मेरे पिता जी भी मुझे हमेशा इसी तरह की शौका भाषा में पत्रा लिखा करते थे। अपनी बोली के प्रचलन और अपनी भाषा में स्वतंत्रा व उच्च कोटि के लेखन के लिए मूल भाषा का विश्लेषण, ब्याकरण का मानकीकरण, मुहावरों व लोकोक्तियों का संकलन, शब्दों का सरलीकरण आदि के लिए परिचर्चाओं, गोष्ठियों, शोधें आदि को आगे के लिए छोड़ते हुए मैं अभी केवल इस पर चर्चा करना चाहूँगा कि राजस्थानी भाषा में किस तरह हमारी भाषा से साम्यता है और राजस्थानी भाषा कैसे हमारे अभीष्ट में सहायक हो सकती है। जिन साम्यताओं का मैं उल्लेख करूंगा उनको पढ़ने और उन पर मनन करने के लिए यह बात हमेशा याद रखना होगा कि भाषा के सरल और मधुर (;कर्णप्रिय) होने के लिए संयुक्ताक्षरों के प्रयोग में नियंत्रण के साथ-साथ शब्दों के छोटे स्वरूपों का प्रयोग करना वांछनीय है। जैसे सुरेन्द्र दाज्यू और लक्ष्मण बूबू के स्थान पर सुरिदा व लछ्बू लिखना जितना सरल है उतनी ही मिठास है उसको बोलने और सुनने में। इस भूमिका के बाद अब बढ़ते हैं राजस्थानी और शौका संस्कृति और उनकी भाषा के अनेकानेक शब्दों में समानता ओर, साथ ही विचार करते हैं शौका बोली व भाषा को सरल तथा मध्ुुर बनाने के लिए राजस्थानी भाषा की कुछ विशेषताओं को अपनाने की आवश्यकता पर।
दोनों समाजों में समानताएं-
1-परदा प्रथा
2-महिलाओं द्वारा बिनाई वादन
3-हुक्के का प्रचलन
4-सत्तू का सेवन आदि आदि
दोनों भाषाओं में समान रूप से बोले व लिखे जाने वाले शब्द-
राजस्थानी शौका राजस्थानी शौका टिपण्णी
दीठ दीठ अदीठ —– अपनाए जाने योग्य
अदेर अबेर —– —– विपरीत अर्थ
मनचीती मनचितै,मनचैन अचीता —– अपनाने योग्य
कुछ वैसे ही शब्द-
अचैन, अच्यौत
बखत बखत, बखद ठौर ठोर जगह के अर्थ में
लच्छन लच्छन दरसन दरसन
भरम भरम दरद दरद
धरमी धरमी कौर कौर कौरगास के अर्थ में
बरस बरस जतन जतन
जत्ती जदी उनमान उनिजस उनमान अपनाने योग्य
जस तस जसे तसे किचकिच किचकिच
गार गारा, गौरो. लीपना लीपना
लोग बाग लोग बाग मुरकि मुरकि झुमका
चैमास चैमास ढील ढील देरी के अर्थ में
नौकर-चाकर नौकर-चाकर
राजस्थानी भाषा की शौका बोली-भाषा में अपनाए जाने योग्य विशेषताएं व शब्द-
राजस्थानी भाषा में संयुक्ताक्षरों का प्रयोग बहुत कम है। इस के कारण इसमें मिठास व सरलता है। शौका बोली में संयुक्ताक्षरों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इससे यह लिखने में कठिन तथा बोलने में कर्णकटु लगता है। राजस्थानी भाषा की मिठास का एक और कारण है उसे उसी रूप में लिखना जिस रूप में उसे बोला जाता है। जैसे श और ष का कम से कम प्रयोग और उसके स्थान पर स का प्रयोग। हमें भी यही करना होगा क्योंकि हमारी बोली में भी स का ही अधिक प्रयोग होता है। यही नहीं ड़ के स्थान पर जिस तरह हम र बोलते हैं उसी तरह उसे लिखना भी होगा। ऐसा न किया जाना भी शौका बोली-भाषा के चलन से बाहर होने का एक प्रमुख कारण है। यही वह कारण है जिसकी वजह से हमारे पूर्वज अपनी भाषा में लिखने के लिए अल्मोड़े की कुमाउनी जैसी शैली का प्रयोग करते थे।
राजस्थानी से अपनाए जाने योग्य कुछ शब्द-
ऐसे अनेकानेक शब्द है। उनमें से कुछ शब्द शौका बोली में प्रयुक्त होते रहे हैं। आवश्यकता है तो केवल उनको चलन में रक्खे रहना। नीचे कुछ उदाहरण मात्र दिए गये हैं-
राजस्थानी शौका हिंदी
दरसन दरसन दर्शन
बरस बरस वर्ष
भरम भरम भ्रम
परियाप्त कापफी पर्याप्त
नितनेम रोजक नियम नित्य का नियम
दीठ दीठ दृष्टि
उछाह उछाल उत्साह
बरसा बारिस वर्षा
दरसाना देखौन दर्शाना
दिसावर दिसावर देश
चंदरमा जोन चन्द्रमा
बिणज ब्योपार वाणिज्य
सरूप समान स्वरूप
पिरास्चित परास्चित प्राश्चित
मानुस मनख मनुष्य
बिरमांड बरमांड ब्रह्माण्ड
बिरछ रूख वृक्ष
आदि आदि
पुनश्चः- हामर बोलि पेंल औले या हामर संस्कृति पेंल बचुल? मुर्गी पेंल औले या आन। ते बतौ ते बतौ हनेरे भे। ‘‘ते ठग में ठग द्वार कु ढग’’ क्वेले त बौटो लैने भे। सुरिदा, लछ्बु और डाक्टर हरू आछ्याल ‘‘किछ ला’’ (Whats App) मा आबन बोलि में लेखी बेर बौट लैन में लैगि रन। आमा, बाबा, दादा, भूली सबे औस्या। ऊनि दाकारै हिटा। लेकिन मलि में मेंल जू लेखी रछुं वीक खयाल कया। यदि यस कलात तमर लेख व बोलि मो धे मिठु हे जौल। फिर चाया हामर बोलि कस के सबनक मूख व कलम में औंछ. आब ढील क्याक छ ला? -गजे पांगती

जैं श्री कल्या लोहार जी- विशालकाय दैत्तीय सर्प अजगर संहारक

इतिहास-कथा
नरेन्द्र ‘न्यौला पंचाचूली’
दारमा घाटी का ग्राम- नागलिंग दो शब्द नाग और लिंग से मिलकर बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ नाग /शिव सर्प एवं लिंग शब्द का शाब्दिक अर्थ भोले बाबा /शिव अंश से है। किवदंति है कि इस नागलिंग ग्राम में विशालकाय दैत्तीय सर्प अजगर रहता था।
यह साँप जिस प्रकार से मनुष्य मानवीय और अमानवीय दोनों प्रवृत्ति के होते हैं। ठीक इसी प्रकार यह विशालकाय अजगर सर्प भी जीव-जन्तु भक्षी/नरभक्षी आतंकित प्रवृत्ति का था, वह अजगर जीव-जन्तु के साथ नर भक्षण भी करता था। भूख की स्थिति में वह रास्ते में दिखाई देने वाले मनुष्य को निगल लेता। इस हाहाकार स्थिति से मुक्ति पाने का किसी के पास कोई ठोस उपाय नहीं था। उसी दौरान दारमा लुंग्बा नागलिंग गाँव में अंफरों /लोहार श्री कल्या लोहार जी भी रहते थे, जिनको रं लुंग्बा का ‘प्रथम रं विश्वकर्मा’ लोहार माना जाता है। उन्होंने अपनी बुद्धि, बहादुरी एवं पेशे की कुशलता के बलबूते पर दैत्याकार सर्प को मारने की रणनीति बनायी। जब दुश्मन शक्तिशाली ताकतबर बलवान होता है, उसे ‘शक्ति बल’ से नहीं ‘बुद्धि बल’ से हराया जा सकता है। इस सिद्धान्त की नीति को अपनाते हुए उन्होंने सर्वप्रथम दैत्य अजगर से मित्रता की, उसका गुणगान कर सच्चे मित्र के रूप में विश्वास जीता (यह युग पशु-पक्षी, सजीवों का आपस में बोलने व भावनाओं को समझने का युग था) और प्रार्थना की- आप विशाल काय हो, आपको उचे नीचे पथरीले राह में पेट भरने के लिए इतना कष्ट करना, मुझसे देखा नहीं जाता इसलिए आपसे विनम्र प्रार्थना करता हूँ कि आप आराम से यथा स्थान अपने क्षेत्र के आसपास में ही रहना, आज से आपके भोजन की व्यवस्था आपका सच्चा दोस्त मै। करुँगा। सभी ग्राम मिलकर बारी-बारी से जो भी उपलब्ध् खाद्य पदार्थ जैसे भेड़ बकरी और अन्य खाद्य पदार्थ दारमा लुंग्बा में होगा, यथाशीघ्र आपको उपलब्ध् कराता रहूँगा, बस आपसे एक छोटी सी विनती यह है कि आप भोजन ग्रहण करते समय अपनी आँखें बन्द रखना क्योंकि आपकी आँखें खुली रहने से भोजन उपलब्ध् कराने वाला दारमा लुंग्बा जन भयभीत रहते हैं। इस तरह विशालकाय अजगर सर्प को बिना मेहनत करे बैठे-बैठे भोजन मिलने लगा। इसी दौरान कल्या लोहार जी ने भी अपनी स्थायी आजीविका के लिए अपना अफरो को नागलिंग ग्राम से लगभग एक किमी दूर आगे ‘ताबुला’ नामक स्थान पर स्थापित किया और भविष्य की योजना को अंजाम देने हेतु दारमा जनों से मिलकर तैयारी शुरु कर दी। अपने अफरो/आफरों के आसपास नदी-नालों से अधिकतर गोलनुमा अण्डाकार और कुछ नुकिलानुमा पत्थरों को एकत्रित किया और करवाया। साथ ही एक शुभ अवसर त्यौहार का दिन चुना जहाँ निकट ग्रामों के प्रत्येक घर से विशेष पकवान बनवाये गये। इन पकवानों के साथ योजनानुसार बारुद रूपी उन पत्थरों को आफरों में अधिकतर गर्म यानी लाल सुर्ख करना शुरु किया, दैत्य अजगर से विनती की कि हमारे जंगली जीव-जन्तु, हम सबके रक्षक, महाराज आज हम सभी दारमा ग्रामजनों ने विशेष पर्व ;त्यार में विशेष पकवान बच्छी/पूरी, चुन्या/पकोड़ी, हलवा, चावल/छकु, स्या/ मीट, पलती गुढ़े, फाफर गन्दु, मर्ती-च्यक्ती तैयार कर रखा है। कृपया आप इन्हें ग्रहण करें।
सर्वप्रथम मर्ती-च्यक्ती (स्थानीय शुद्ध एल्कोहल) पिलाकर विशालकाय अजगर को मदहोश किया गया और मीट खिलाया गया। फिर ग्रामजनों द्वारा तैयार पकवानों साथ-साथ गोल गरम-गरम लाल सुर्ख पत्थरों को तब तक खिलाया गया, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो गया। दैत्य अजगर भर्ती-च्यक्ती (स्थानीय शुद्ध एल्कोहल ) के नशे में मदहोश होने के कारण उसे पता नहीं चला कि मैं कितना खा चुका हूँ। परिणामस्वरूप इन गरम-गरम लाल सुर्ख पत्थरों को तब तक खिलाया गया जब तक लक्ष्या की प्राप्ति न हो गया। दैत्य अजगर मर्ती-च्यक्ती (स्थानीय शुद्ध एल्कोहल) के नशे में मदहोश होने के कारण उसे पता नहीं चला कि वह कितना खाना खा चुका है। परिणाम यह हुआ कि गरम-गरम लाल सुर्ख पत्थरों ने अजगर के पेट में बारुद का सा काम किया और विस्फोट के साथ फट पड़ा। इस भयंकर विस्फोट में अजगर के शरीर से चीथड़े उड़ गये, जिससे इस दैत्यकार आतंकित सर्प का अन्त हुआ।
नागलिंग और चल गाँव के आर-पार अजगर की अंतड़ियां विशाल चट्टानों पर चिपकी पड़ी हैं। इस निशानी सफेद भूरे कालेनुमा आँतों की लकीरें दूर से आज भी स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। जय श्री कल्या लोहार जी के अफरों रूपी पत्थर के निशान आज भी उस स्थान पर विद्यमान हैं, जिनमें गोल बारुद रूपी पत्थरों को गर्म किया गया था। कल्या लौहार कोई साधरण व्यक्ति नहीं बल्कि अवतारी पुरुष थे। रं लुंग्बा में जय श्री कल्या लोहार जी, ‘प्रथम रं विश्वकर्मा’ के रूप में अवतार लेकर देवभूमि को इस दैत्याकार विशाल अजगर से बचाने को अवरित हुए थे।
एक कथा के अनुसार जब शिव भगवान अपनी स्थानीय तपस्थली की खोज में घूमते-घूमते दारमा घाटी के इस ग्राम में पहुँचे तो उन्होंने देखा कि इस घाटी के क्षेत्रवासी नरभक्षी/जीवभक्षी विशालकाय साँप अजगर के आतंक से आतंकित हैं। तब भोले बाबा के नाग ने यहाँ क्षेत्रवासियों को इस आतंक से मुक्ति दिलाने के लिये ‘जय श्री कल्या लोहार जी’ का रूप धरण कर इस आतंक रूपी अजगर का अन्त किया। तभी से दारमा के इस ग्राम का नाम शिवअंश के नाम से नागलिंग पड़ा।
विशेषता- ग्राम नांगलिंग, रं लुंम्बा, दारमा का ऐसा गाँव है, जहाँ दिन में सात बार धूप निकलती और छुपती है। इसका कारण सात चोटियों से होकर उसे गुजरना होता है।

असाधारण महिला थी डाॅ. इन्दिरा हृदयेश

यादें…..
स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुयण्तिथि पर उनके उपन्यास रजनीगंगा का विमोचन करती हुई । फोटो में दायं से सम्पादक स्व. कमला उप्रेती, डाॅ. इन्दिरा , स्व. दुर्गा सिंह रावत, श्री देवेन्द्र सिंह धर्मशक्तू, सत्यवान सिंह जंगपांगी, श्रीराम सिंह धर्मशक्तू ,श्री क्रान्ति जोशी
डाॅ. पंकज उप्रेती-
उत्तराखण्ड की राजनीति में हमेशा धुरी बनकर रहीं नेता प्रतिपक्ष डाॅ.इन्दिरा हृदयेश असाधारण महिला थी। मूल रूप से बेरीनाग क्षेत्र के दशौली की इन्दिरा जी ने हर विपरीत परिस्थिति को अपने अनुकूल बनाते हुए जमाने को बता दिया कि यदि आप आगे बढ़ना चाहते हैं तो कोई रोक नहीं सकता।
ऐसी धांकड़ इन्दिरा जी का 13 जून 2021 को प्रातः 10.30 बजे हृदयघात से निधन हो गया। 80 वर्षीय इन्दिरा ने जीवन-जगत के सच को समझते और देखते हुए जो तय किया वह असाधारण ही कर सकता है। हर विपरीत परिस्थितियों को अपना बनाने वाली इस नेता की बात यूपी के जमाने में भी पक्ष-विपक्ष हमेशा मानता था। शिक्षकों की नेता के रूप में एक शिक्षक का एमएलसी बनना और कांग्रेस सहित सभी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच शिष्टता के साथ अपनी बात रखने का इन्दिरा जी का लहजा उन्हें हमेशा श्रेष्ठता की श्रेणी में रखता है। वह जानती थी कि शासन किस प्रकार से चलता है और प्रशासन से कैसे कार्य करवाया जाए। हल्द्वानी के विकास में उनकी अमिट छाप हमेशा रहेगी। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्गज नेता स्व. एन.डी.तिवारी के निकट रही इन्दिरा जी उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भी सत्ता पक्ष और विपक्ष में शीर्ष आसन पर रहीं।
पिघलता हिमालय परिवार से डाॅ. इन्दिरा हृदयेश का निकट का सम्बन्ध् था। विलक्षण प्रतिभा की इन्दिरा जी जब शुरुआत में हल्द्वानी में आई तो वह स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती को जानती थीं। उस दौर के समाज और पत्रकारिता में जितना सच्चापन और मिठास थी, वह लोगों को जोड़ने वाला था। हल्द्वानी भी बाग-बगीचों का शहर था और हर जगह से लोग आकर बसने लगे थे। स्यौहारा बिजनौर के हृदयेश कुमार से इनका विवाह हुआ और वह हल्द्वानी में रहने लगे।
एक महिला जब समाज में आगे बढ़ना चाहती है तो उसे कितनी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, वह इन्दिरा जी के जीवन से समझा जा सकता है। उनकी इन्हीं खूबियों को स्व. आनन्द बल्लभ जी ने जाना और प्रोत्साहित किया। राजनीति की चतुर और विद्वान इन्दिरा भी जानती थीं कि आनन्द बल्लभ को किसी प्रकार का लोभ-लालच नहीं है इसलिये वह तमाम मुद्दों पर खुलकर सम्वाद कर लेती। सूचना, लोकनिर्माण विभाग, संसदीय कार्य तथा विज्ञान एवं टैक्नालाॅजी मंत्री वह रहीं। बाद में संसदीय कार्य विधायी वित्त, वाणिज्य कर, स्टाम्प व निबन्धन, मनोरंजन कर, निर्वाचन, जनगणना, भाषा व प्रोटोकाल मंत्रालयों को संभाला। नेता प्रतिपक्ष के रूप में भी वह लोकप्रिय रही हैं। वह जानती थीं कि सूचना मंत्री रहते हुए आनन्द बल्लभ ने कभी भी उनसे विज्ञापन या अन्य मदद के लिये हाथ नहीं फैलाए। यही कारण था कि वह पत्रकारिता विषय को लेकर भी बातचीत करती। बाद के सालों में पत्रकारिता के गिरते जा रहे स्तर पर वह चिन्तित थीं लेकिन राजनीतिक दांवपंेच में प्रेसवार्ता का आयोजन करती रहीं। अपना वाहन भेजकर उप्रेती जी को विशेष तौर से बुलाती थी लेकिन पत्रकारिता की रंगीन दुनिया में उप्रेती जी ने प्रेसवार्ता में जाना छोड़ दिया। वह जानते थे कि इन्दिरा जी बोलेंगी और पत्रकार लिखेंगे, सवाल पूछने का साहस कोई नहीं करेगा। ऐसे में इन्दिरा जी स्वयं ही प्रेस में मिलने आईं और सार्वजनिक रूप से कहती थीं कि ‘उप्रेती जी पत्राकार हैं।’ जमाने की रंगीनियत में रंगना और राजनीति में सबको मनाए रखना एक बात है लेकिन इन्दिरा जी आदमी का मिजाज जानती थीं। वह ‘पिघलता हिमालय’ के हर आयोजन में अतिउत्साह से भागीदारी करती थीं। ऐसी विद्वान, दिग्गज नेता, संरक्षक को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजलि।
——————————————————————-
;हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे से लेखक आनन्द उप्रेती की पुस्तक के
पृष्ठ संख्या 67 से 71 तक में पढ़ें- इन्दिरा जी के जीवन के अनछुए पहलू