त्रिलोक सिंह नंगन्याल (तिंका नंगन्याल प्रथम) के वंशजों का दारमा प्रतिनिधित्व काल

इतिहास-कथा
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
दारमा घाटी के जिस ग्राम की खूबसूरत चोटियों के कारण दिन में सात बार सूर्य दिखता व सात बार सूर्य छिपता है, उस ग्राम नागलिंग में त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी का जन्म 1750 के आसपास हुआ। त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी की सोच- आकांक्षाएं, आधुनिक भविष्य की जीवन जीने की सोच रखने वाले व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। ऐसा माना जाता है कि त्रिलोक सिंह जी के पूर्वज कत्यूर राज्य से दारमा आए थे। त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी को तिंका प्रथम के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। त्रिलोक सिंह जी के चार पुत्र हुए, जिनके नाम- बालों, चतुवा, बंगा और जसपाल थे। श्री तिंका नंगन्याल प्रथम जी की प्रभावशाली छवि, ज्ञानी व्यक्तित्व के कारण उन्होंने अपने चारों पुत्रों को अलग-अलग कार्य क्षेत्रा सौंपे, सबसे बड़े पुत्र बालों सिंह को राजनीतिक रणनीतिकार, दूसरे पुत्र चतुवा सिंह को समाज सुधारक, तीसरे पुत्र बंगा सिंह को व्यापारिक कार्य एवं सबसे छोटे पुत्र जसपाल सिंह को खेती कार्य क्षेत्र सौंपा।
इस प्रकार चारों पुत्रों की कार्य क्षेत्र की यश कीर्ति पूरे रं लुंग्बा में प्रचलित थी। श्री त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी का अस्कोट राज परिवार और तिब्बती राजाओं के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध् थे। ऐतिहासिक समय रं लुंग्बा, दारमा परगना (परगना दारमा) में श्री कित्ती सिंह ग्वाल ‘फौजदार’ ‘‘रं प्रतिनिधित्वकर्ता’’ ग्वाल एकाधिकार के बाद श्री त्रिलोक सिंह नंगन्याल जी के सबसे बड़े पुत्र बालों सिंह जी दारमा लुंग्बा रं प्रतिनिधित्व कर्ता के रूप में उबरे और उन्होंने यह जिम्मेदारी निभाई। ग्वाल फौजदार परिवार का एकाधिकार के बाद अब दारमा का सभी प्रकार के न्याय कार्य ग्राम-गो की जगह ग्राम-नांगलिंग से होने लगा। नंगन्याल परिवार ने अपना प्रशासनिक अधिकार एवं व्यावसायिक कार्य ग्राम-नांगलिंग से ही शुरु किया। कुमाउँ ब्रिटिश शासन में अंग्रेजों का आगमन जब दारमा घाटी में हुआ। श्री बालों सिंह का प्रभावशाली व्यक्तित्व, जन लोकप्रियता, न्यायप्रियता व शानों- शौकत और साथ ही भवन की भव्यता को देखकर अंग्रेज आश्चर्यचकित हो गये। श्री बालों सिंह नंगन्याल जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने बालों जी को अपने पक्ष में करने के लिये उन्हें तीन प्रकार के अंग्रेजी हथियार और तीन खून माफ का अधिकार प्रदान कर कूटनीति चाल चली, श्री बालों सिंह नंगन्याल जी ने उस काल में अपने भव्य भवन निर्माण कार्य करवाने के लिये बागेश्वर, अल्मोड़ा, हल्द्वानी, पड़ोसी देश नेपाल के राजमिस्त्रियों को आमन्त्रित किया। इस भवन निर्माण में बड़े-बड़े पत्थरों, खड़िया पत्थरों के जोड़ को मजबूती प्रदान करने के लिये चूना व उड़द ;मासद्ध दाल के घोल बनवाकर चिनाई करवायी गयी। भवन राजमिस्त्राी कारीगरों के नाम दीपार के पत्थरों पर आज भी अंकित हैं। मकान में प्रयोग की गयी बड़े-बड़े पत्थरों की कटाई-छटाई में उस समय चाँदी-सिक्का (सवा रुपये) की लागत आई। जब-जब ब्रिटिश आला अधिकारी दारमा घाटी में आते थे, उक्त भव्य भवन में रहना व इसकी प्रशंसा करना नहीं भूलते थे।
श्री बालों नंगन्याल जी के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री तिंका नंगन्याल (तिंका द्वितीय जी ;1860-1940) ने अपना राजपाठ के साथ दारमा प्रतिनिधि/प्रतिनिधिकर्ता कार्यभार संभाला। श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी के सामय जब सम्पूर्ण भारतवर्ष में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार हो रहा था, तब दारमा घाटी में उन्होंने ईसाई धर्म प्रचार-प्रसार के लिये अंग्रेजों का प्रवेश निषेध् कर दिया था, जब ब्रिटिश रेजीमेन्ट को इस बात की सूचना मिली तो वे श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी से अत्यधिक नाराज हो गये। पर दारमा घाटी एक अत्यन्त दुर्गम व उनकी प्रभावशाली छवि के कारण कुमाउँ ब्रिटिश अंग्रेज प्रशासक श्री तिंका नंगन्याल जी पर कोई कार्यवाही नहीं कर सके। बाद में कुछ समय उपरान्त अंग्रेज अधिकारियों ने श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी को याद दिलाया कि उनके पिता बालों नंगन्याल को अंग्रेज प्रशासन ने तीन प्रकार हथियार करतूस और तीन खून माफ का अधिकार दिया था। उनके समय के घनिष्ठ सम्बन्धें की भी याद दिलाई। साथ ही तिंका नंगन्याल जी को अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें तीन की जगह सात खून माफ करने का शासनादेश और सम्पूर्ण रं लुंग्बा का ब्रिटिश मेम्बर नियुक्त किया गया और अल्मोड़ा जिला परिषद का मनोनीत सदस्य चुना एवं कुछ अन्य रं लुंग्बा के सुरक्षा से सम्बन्धित प्रभावी अधिकार भी दिये गये, तब जाकर अंग्रेजों का दारमा घाटी में पुनः प्रवेश और ईसाई ध्र्म का प्रचार-प्रसार हेतु अनुमति तो दी पर उनके प्रचार में कोई सहायता नहीं की। अंग्रेजों को इस प्रचार-प्रसार पर कोई फायदा नहीं मिला, न ही रं लुंग्बा दारमा घाटी के किसी भी परिवार ने ईसाई धर्म स्वीकार किया, इससे स्पष्ट होता है कि उस समय दारमा घाटी के प्रत्येक परिवार, प्रत्येक ग्राम व पूरे रं जनों में कितनी एकता-सक्षमता थी, पर दारमा घाटी में ईसाई प्रचारकों का आवागमन होते रहा, बाद में श्री नंगन्याल जी के स्वभाव, बुद्धिमत्ता व क्षेत्र में उनके प्रभाव के कारण ब्रिटिश शासकों से अच्छे सम्बन्ध् हो गये। श्री तिंका द्वितीय ‘मेम्बर साहब’ ने रं लुंग्बा दारमा प्रतिनिधित्वकर्ता का कार्य बखूबी निभाते हुए बहुत से कार्य करवाये और दारमा लुंग्बा का प्रथम ठेकेदारी मार्ग कार्य उन्होंने 1500/- रुपये का ठेका लेकर सन् 1923 में कार्य करवाया, यह ठेका कार्य मार्ग ग्राम- खेला से दारमा तक का था। उस समय ग्राम- खेला, दारमा, व्यास दोनों घाटी कुन्चाजनों का मुख्य पड़ाव केन्द्र के साथ-साथ तीनों रं घाटी जनों का प्राचीन व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था, जहाँ से पश्चिम तिब्बत, नेपाल और निचले भारतीय क्षेत्रों में जाने के लिए व्यापारिक विनिमय गतिविधियों से सम्बन्धित कार्य योजना संचालित होता था। श्री तिंका सिंह नंगन्याल (तिंका द्वितीय) ने ब्रिटिश प्रशासन द्वारा दिए गए अधिकारों का खूब प्रयोग किया, माना जाता है। श्री तिंका द्वितीय जी ने रं-शौका जनों के प्राचीन व्यापारिक पड़ावों का अधिकार बरकरार रहे इस सम्बन्ध् में पड़ाव क्षेत्रीय शासन-प्रशासन तक अपनी बात रखते हुए उन पड़ावों को बचाने की कोशिश की। उन्होंने तिब्बती प्रान्तीय राजाओं, नेपाल सीमान्त प्रशासक और अस्कोट राज्य ‘राज परिवार’ से घनिष्ठता बढ़ाने के साथ-साथ पूर्व से ही चली आ रही मित्रता को और अधिक घनिष्ठता में परिवर्तित किया। श्री तिंका नंगन्याल (तिंका द्वितीय) बुद्धिमान, प्रभावशाली छवि और चतुर व्यक्तित्व के धनी थे। इन कारणों के कारण वे तीन महीने तिब्बती प्रान्तीय राजाओं, राज प्रशासकों के साथ तिब्बती प्रान्तों और महीने उक्कू- बांकू, जौलजीवी, नेपाल में अस्कोट राजाओं के साथ आनन्दमयी जीवन व्यतीत करते थे। इस समय एक अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक घटना घटित हुई। पिथौरागढ़ व्यापारी ‘मालदार परिवार’ के सदस्य जब तिब्बत व्यापार के लिए गए थे। अनजाने में तिब्बती कानून का उल्लंघन होने के कारण तिब्बती प्रशासन ने उन्हें कारावास की सजा दे दी, तब मालदार व्यापारी परिवार के सदस्य सीमान्त अस्कोट राज्य के राजा के पास इस सम्बन्ध् में मदद हेतु गए तो ‘राजा रजवार’ राज प्रशासन ने इस पर असमर्थता जताते हुए उन्हें श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी से मदद मांगने का सुझाव दिया और वे नंगन्याल जी पास गये। अपनी समस्या से अवगत कराया। इस समस्या समाधन हेतु नंगन्याल जी ने तिब्बती राजा को अनुरोध् पत्र लिखा। इसी पत्र द्वारा मालदार व्यापारी को तिब्बती कारावास से मुक्त किया गया।
श्री तिंका सिंह नंगन्याल (तिंका द्वितीय) ने अपने पिता से अधिक नाम कमाया और इसी कारण सम्पूर्ण रं क्षेत्र में वे ‘मेम्बर साहब’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। ऐसा माना जाता है कि समय के साथ-साथ श्री तिंका द्वितीय नंगन्याल जी आकांक्षाओं महत्वाकांक्षा के कारण उनका अस्कोट राज्य के राजघराने से सम्बन्ध् बिगड़ते गए, स्यांकुरी से उपर दारमा घाटी, व्यास घाटी और चैदास घाटी पर अपना प्रतिनिधित्व अधिकार परिक्षेत्र मानते हुए, इन क्षेत्रों रे ‘रं लुंग्बा व्यवस्था-प्रबन्धन’ से सम्बन्धित कार्य हेतु वसूली करते थे और इन सम्पूर्ण क्षेत्र को परगना दारमा नाम दिया गया। बाद में अस्कोट राज्य राज परिवार से कर वसूली से सम्बन्धित विवाद हो गया। जब तिंका द्वितीय नंगन्याल जी अपने सेवकों के साथ वर्मा (म्यांमार) गये थे, और वापसी में अस्कोट पहँुचे तो वहाँ राज परिवार प्रशासन से अपने-अपने अधिपत्य सीमान्त क्षेत्रा की कर वसूली पर मतभेद होता चला गया, श्री तिंका नंगन्याल (तिंका द्वितीय) जी रं लुंग्बा के राज परिवार (राजा) न होते हुए अपने वंशजों में सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले रं प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि) रहे। बाद में तिंका नंगन्याल द्वितीय जी भाबर भारत, नेपाल देश व्यापारसे वापसी के समय टनकपुर के आस-पास अपने पड़ाव में उनकी मृत्यु हो गई। श्री तिंका द्वितीय के बाद उनके बड़े पुत्र श्री बाल बहादुर जी ‘प्रथम दारमा सरपंच’ ;बालो द्वितीय जी 1916-1969द्ध ने कार्यभार सम्भालते हुए दारमा क्षेत्रजनों के लिए बहुत कार्य किए। श्री बालो द्वितीय जी ने शासन-प्रशासन से अनुरोध् कर क्षेत्रीयजनों को शिक्षा-पत्राचार प्रदान करवाने के लिए ग्राम दुग्तू स्कूल (दारमा प्रथम स्कूल), दारमा लुंग्बा प्रथम पोस्ट आफिस ग्राम नांगलिंग में खुलवाने का महत्वपूर्ण कार्य किये और वे जौलजीवी तीर्थ मेले में भी सामाजिक भूमिका अदा करते रहते थे। एक बाद उन्होंने दो चवर गाय ‘याक’ और कुछ कम्बलों को मेला कमेटी को सहयोग रूप में भेंट दिया।
श्री तिंका नंगन्याल द्वितीय जी अस्कोट राजा भांति राजा तो नहीं था परन्तु सम्पन्नता धन-दौलत एवं शानों-शौकत अस्कोट राजा से कम नहीं थे।
रं लुंग्बा दारमा घाटी ग्राम नांगलिंग की सम्पूर्ण सम्पत्ति का आध भाग इसी वंश के उत्तराधिकारियों के अधिकार में है। साथ ही ग्राम- चल, सेला, वर्थिंग, बोगलिंग, दर, सोबला, न्यू सोबला सुवा, बैती, गलाती, गस्थला, दोबाट, धारचूला, पिथौरागढ़, हल्द्वानी, देहरादून, लखनउ, दिल्ली, म्यांमार तक में भी इनकी सम्पत्ति रही है, ऐसा कहा जाता है। जब इस वंश के व्यापारी तिब्बत व्यापार, टनकपुर व्यापार, नेपाल व्यापार हेतु निकलते थे तो इनके कापिफले के दिन-समय कोई दूसरा व्यापारी इस मार्ग से नहीं गुजरता था। इसकी सूचना पूर्व में ही लोगोें को दे दी जाती थी।
मुख्य ध्रोहरित सामग्रियाँ-
ब्रिटिश कालीन दो नाली कारतूस वाली बन्दूक, अन्य भरवा बन्दूक और इटालियन राइपफल ;जिसे बाद में बेच दिया गयाद्ध, चाँदी का बना इटालियन टार्च, चाँदी की छड़ी।
ब्रिटिश कालीन राजशाही चाँदी के बर्तन और सिक्के हैं तथा कत्यूरी शैली की बनी खिड़कियाँ व दरवाजों पर बनी नक्काशी दर्शनीय है।
बड़े-बड़े चार पफुर्मा तोली (फुर्मा तावी और चार फुर्मा कढ़ाई जो 40-40 किलोग्राम के हैं)। ये ‘तोली-कढ़ाई’ लगभग 300 वर्ष पूर्व की मानी जाती हैं। ये तोली-कढ़ाई तिब्बत से लायी गयी थी।
दर्जनों ऐतिहासिक ‘ढाल तलवार’ और पुरुष-स्त्री परिधान। साथ ही महिलाओं के अनेक श्रृंगार आभूषण मौजूद हैं।
नंगन्याल भवन के भीतरी भाग में एक विशाल आकार का शिवलिंग स्थित है। साथ ही हस्तिनापुर की महारानी ‘कुन्ती गान्धरी’ के शिलालेख भी मौजूद हैं।
श्री नंगन्याल राज में जिस प्रकार से इस बंशजों की शानो-शौकत, रहन सहन, सम्पूर्ण क्षेत्र में फैली शक्तियाँ और अधिकारों को सुनकर तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे राज परिवार का न होते हुए भी एक राजा की ही भाँति रं लुंग्बा में एकाधिकार रखते थे।

कित्ती फौजदार: प्रथम रं लुंग्बा प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि)

इतिहास-कथा

नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
दारमा घाटी में आज से लगग 18वीं शताब्दी के मध्य से 19वीं शताब्दी के मध्य तक ग्राम-गो में एक प्रखर बुद्धिमान, आर्थिक सम्पन्न तथा दूरदर्शी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति रहते थे, जिनका नाम कित्ती सिंह ग्वाल (कित्ती फौजदार) था, वे उस काल के सबसे प्रतिभावान, प्रभावशाली व्यक्ति थे और लीक से हटकर सोच रखते थे। शायद उन्होंने ही रं लोगों को उस समय तिब्बत देश से लेकर नेपाल देश और पश्चिम कुमाउँ तक व्यापार करना सिखाया हो।
उस समय भी दारमा, चैंदास तथा व्यास घाटी रं लुंग्बा प्राीचन भोंट देश का भोंट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था। इस कारण केन्द्रीय तिब्बत राज शासक- प्रशासक इस प्राचीन भोंट प्रान्त को ‘रं लुंग्बा’ के तिब्बत सीमान्त (रं लुंग्बा) क्षेत्र को जबरदस्ती अपना मानते हुए, दारमा व्यापारियों से जबरदस्ती कर वसूलते थे। साथ ही तिब्बत का प्रशासक कित्ती फौजदार को उसके प्रभावशाली छवि, आर्थिक सम्पन्नता के कारण इस रं क्षेत्र (रं लुंग्बा दारमा) का क्षेत्राीय तरजम (एस.डी.एम.), छयासों (कर अधिकारी) साथ ही ज्युस्यों (व्यापारी मुखिया) भी उन्हीं को मानते थे। जबकि दारमा वासी फौजदार जी को दारमा घाटी क्षेत्र का व्यवस्था प्रतिनिधित्वकर्ता (प्रतिनिधि) समझते थे और उनका आदर सम्मान कर उनकी बातों को मानते थे। श्री कित्ती फौजदार जी के प्रभावशाली छवि के परिणामस्वरूप 18वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी के मध्य तक की ज्ञानिमा-सिल्दी व्यापार मण्डी का व्यापार दर (कमिशन दर) तब तक तय नहीं होता था जब तक ग्वाल व्यापारी लोग वहाँ नहीं पहँुच जाते थे।उस बात का फायदा उठाकर ग्वाल व्यापारी देरी से व्यापार मण्डी स्थल पर कई दिनों पहले पहुंचते थे और अन्य ग्राम व्याापारियों को व्यापार मण्डी स्थल पहँुचने के बाद भी कई दिनों तक इन्तजार करना पड़ता था। इस कारण अन्य व्यापारी परेशान होते थे। बाद में ब्रिटिश राज के मसय इस गटतोक (कमीशन रेट) की बात दारमा व्यापारियों ने मिलकर कुमाउँ कमीश्नर प्रशासन के संज्ञान में लाया गया, तत्पश्चात ग्वालों का व्यापार दर तय करने का एकछत्र राज (अधिकार) समाप्त हुआ।
श्री कित्ती फौजदार अपने रं प्रतिनिधित्वकर्ता काल में अपने क्षेत्र के लिए उन्नति/ प्रगति का अवसर ढूंढते रहते थे, वे रं लुंग्बा से बाहर अन्य क्षेत्रों तक व्यापार का अवसर देखना चाहते थे। यह व्यापारिक सोच चाह के मुताबिक जल्दी सम्भव हीं था, क्योंकि उस समय इस रं क्षेत्रों का किसी भी प्रकार का अपना स्थायी शासनिक-प्रशासनिक ढांचा नहीं था। रं धरोहित बुजुर्गों के कहने के अनुसार आज से 250-300 साल पूर्व तक रं लुंग्बा जन जाड़ों के मौसम में (जब अत्यधिक ठण्ड पड़ी थी) दारमा घाटी वासी ‘सोबला-कंच्योति, व्यास घाटी वासी लामारी-मालिपा-लोलंको नामक स्थापन पर तीन-चार महीने जानवरों को पालने के वास्ते आते थे। फिर वापस अपने मूल ग्राम की ओर चले जाते थे। इन निम्न स्थानों से नीचे के क्षेत्र अस्कोट राज परिवार अपना जबरदस्ती भू-क्षेत्र अधिकार मानता था। तब दारमा, चैंदास और व्यास का रं लुंग्बा प्राचीन भोट देश का भोट प्रान्त ‘संयुक्त रं लुंग्बा’ कहलाता था। उस समय इस प्राचीन भोट प्रान्त- ‘रं लुंग्बा’ क्षेत्रा से बाहर ब्रिटिश राज कालीन भारतीय क्षेत्रों तक जाने के लिए सर्वप्रथम अस्कोट रजवार ‘राजशाही’ के अनुमति की आवश्यकता पड़ती थी। इस कारण को देखते हुए एक दिन कित्ती फौजदार जी ने अपनी योजना बनाई। श्री कित्ती फौजदार ने विशेष जयन्ती के अवसर का चयन कर एक दिन अपने अच्छे-अच्छे ढोल-नगाड़े ‘दमो-छेलंग’ बाजकों के साथ अस्कोट रजवार के समारोह स्थल- जनता दरबार पर अनुरोध् प्रार्थना पत्रा और उपहार लेकर पहँुचे। महोदय हमारे रं जनों को आपके सीमान्त राज क्षेत्रों में जाड़ों के मौसम में 4-5 महीने धूप सेकने, जानवरों को चराने तथा व्यापार करने की अनुमति दी जाए। शायक रजवार ने कहा- राजकाज के नियमानुसार बिना किसी स्पद्धा/द्वन्द प्रतियोगिता जीते बिना ऐसी अनुमति देने का कोई प्रावधान नहीं साथ ही कहा- कित्ती, कुश्ती, दमो बाजा और क्षलिया नाच निम्न से किसी एक प्रतियोगिता का चयन कर तैयार रहना। फौजदार ने उस समय की परिस्थिति को देखते हुए डोल- नगाड़े (दमों) बजाने की प्रतियोगिता स्वीकार की ली। प्रतियोगिता अगले दिन करवाई गई और दोनों टीम/पक्ष का घण्टा परस्पर बाजा द्वन्द्व चलता रहा, उस वर्तमान परिस्थिति को समझते हुए, काका फौजदार ने अपने कलाकारों ‘दमों बाजकों’ का रं बोली में ‘जन्सु ला छयानी’ अर्थात (ग्वन संस्कार/ मृत्यु संस्कार वाला बाजा बजाने का संकेत दिया) यह कहते ही इन दमों (बाजे)कों ने उल्टा दमों बाजा बजाया। इन दमों बाजा की कला पर रजवार पक्ष प्रतियोगिता टक्कर नहीं दे पाये, (वे इस कला से दमों बना नहीं पाये) और वे हार गये। ‘दमो बाजा’ की कला केवल रं समाज में ही मृत्यु संस्कार में बजाये जाते हैं। इस प्रकार डोल-नगाड़े (दमों) प्रतियोगिता में श्री कित्ती फौजदार कलाकार पक्ष की जीत हुई। अस्कोट रजवार राजशाही को उनकी बात माननी पड़ी। तब से रं जनों को कंच्योति से नीचे रजवार परिसीमन जौलजीवी तल्लाबगड़ तक जाड़ों में बसने की अनुमति मिली, उस समय गोरी नदी की सरहद से लेकर एलागाड़ तक तक क्षेत्रा को मल्ला अस्कोट क्षेत्रा कहते थे।
रं लोग सन् 1950 तक रजवार क्षेत्रों में अस्थायी झोपड़ी बनाकर रहते थे और दारमा वापस जाते समय झोपड़ी जला देते थे। धीरे-धीरे स्थायी घर बनने लगे। उसी के परिणाम स्वरूप आज धारचूला तहसील से जौलजीवी तक अनेक रं गाँव बसे हुए हैं। अस्कोट दमों प्रतियोगिता विजय के बाद गोरखा शासन काल में श्री कित्ती फौजदार, नेपाल देश की राजधानी-काठमाण्डू राजशाही दरबार तक पहँुचे। श्री कित्ती जी, रं लुंग्बा के वे पहले व्यक्ति थे, जो इतने सुदूर से काठमाण्डू पहुंचे और अपनी क्षेत्रा की बात रखी। उनकी ‘प्रखर वक्ता’, अपने क्षेत्र के प्रभावशाली छवि, अस्कोट रजवार से सम्बन्ध्, तिब्बत से व्यापारिक सम्बन्धित के नाते उन्हें अपने पक्ष में लेने के लिए नेपाल राजशाही दरबार ने उनको ‘फौजदार’ की पदवी से सम्मानित किया। साथ ही उनकी कार्य कुशलता, कार्य प्रबन्धन नीति को देखते हुए उनको नेपाल की ओर से दारमा घाटी में शासन चलाने के लिये सन् 1813 में लाल मुहर और काला मुहर प्रदान कर न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों की आधिकारिक जिम्मेदारी सौंपी। उनके अनुरोध् पर रं लोगों को नेपाल के दार्चुला क्षेत्र में जाड़ों में रहने तथा अपने क्षेत्रों में व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गयी। सही मायने में श्री कित्ती फौजदार जी ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने रं लोगों को अपने क्षेत्रों से बाहर नये अवसरों को ढूंढने के लिए प्रेरित किया। इसके फलस्वरूप धारचूला तहसील क्षेत्रा के सैकड़ों गाँवों में से मात्रा रं समुदाय के लोग ही दूर-दूर तक व्यापार के लिए जाते रहे। जब भारत-चीन युद्ध के बाद तिब्बत से व्यापार बन्द हुआ तब रं लोगों का व्यापर विकल्प नेपाल के सिलगड़ी, धनगड़ी, बेतड़ी, आछम, बयालमाटा, बजंग आदि और अन्य महत्वपूर्ण व्यापारिक सहयोग रहा। हम मानें या न मानें इसका श्रेय श्री कित्ती फौजदार जी को जाता है। क्योंकि उन्होंने ही लीक से हटकर, निडर होकर नया अवसर ढूंढ़ना और सफल होना सिखाया। इस कारण प्राचीन भोट प्रान्त रं लुंग्बा से बाहर व्यापारिक पटकथा के भूमिगत रचना/भूमिगत आधर तैयार करने वाले सर्वप्रथम व्यक्ति वे ही थे। हमारी ओर से उन्हें नमन, उन्हें हमेशा याद कर रखना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
रं प्रतिनिधि श्री कित्ती फौजदार की मृत्यु के बाद उनका राजपाठ कार्यभार उनके उत्तराधिकारी पुत्र श्री मुंडवा सिंह ग्वाल ने सम्भाला। श्री मुंडवा ने अपनी दारमा प्रतिनिधि काल में उतनी ख्याति प्राप्त नहीं की, जितनी ख्याति पिता कित्ती जी की रही। फिर भी वे रं लुंग्बा परिसीमन के लिए लड़े, अस्कोट राज्य रजवार के साथ हुए परिसीमन विवाद को लेकर अंग्रेज शासन-प्रशासन के न्यायालय तक पहँुचे। ग्वाल जी ने अल्मोड़ा जिला न्यायालय में ठोस साक्ष्यों के साथ अपने पक्ष को रखा। न्यायालय ने तथ्यों पर गहन विचार विमर्श कर अन्त में श्री मुंडवा ‘ग्वाल साहब’ को सीमा विवाद पर विजय घोषित किया। इस विजय फैसले पर ग्वाल साइब पक्ष समूह जन जब विजय उल्लास के साथ लौट रहे थे उस समय अस्कोट-जौलजीवी के मध्य ग्राम गर्जिया, गोरी नदी पुल से अस्कोट राज्य षड्यन्त्रकर्ताओं ने विश्वासघात कर ग्वाल साहब को नदी में धकेल कर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार रं लुंग्बा ग्वाल प्रतिनिधित्वकर्ता का शासन काल समाप्त हुआ। लेकिन इतिहास की यह बातें हमेशा के लिये अमर हैं।