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‘अरमानों का मेला’ श्रीमती मंजू पांगती की कलम से निकले छन्दों का एक ऐसा रेला है जो कई तिहाईयों के बाद सम में आने जैसा सकून देता है।
यह मानव प्रवृत्ति है िक वह कविताओं, गीतों, तुकों......रंगों, चित्रों......कहानियों, नाटकों........संगीत के द्वारा अपनी व्यथा-कथा को आकार देता है।
आकार देने का यह क्रम बचपन, युवावस्था, प्रौढ़ अवस्था तक सभी के जीवन में चलता रहता है किन्तु उसे लिपिबद्ध कर उसकी प्रस्तुति करना हर किसी के बस में नहीं होता।
श्रीमती मंजू को समय की धारा के साथ जिस प्रकार जाना पड़ा और उन्होंने अपने को उस अनुरूप ढाला, उसी दर्द के आभास को उन्होंने इस पुस्तक में कविताओं के रूप में संकलित किया है।
पुस्तक मात्र 100 रुपये मूल्य की है।