उत्तराखण्ड की ताज़ा खबरें पढ़ें • पिघलता हिमालय - साप्ताहिक पत्रिका स्थापित 1978 •
हल्द्वानी से प्रकाशित • हिमालय संगीत शोध समिति के कार्यक्रम देखें •
ई-पेपर डाउनलोड करें • नवीनतम अंक उपलब्ध है
📅 26 April 2026✉️ pighaltahimalay@gmail.com | 📍 हल्द्वानी, नैनीताल⚙️ प्रशासन
साप्ताहिक समाचार पत्र • स्थापित 1978
संस्थापक: स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया, स्व. आनंद बल्लभ उप्रेती, स्व. श्रीमती कमला उप्रेती |
संपादक:श्रीमती गीता उप्रेती |
स्थापित वर्ष: 1978
📚 पुस्तकें
पिघलता हिमालय प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकें और साहित्य
मुखपृष्ठ›पुस्तकें›उत्तराखण्ड आन्दोलन में गधों की भूमिका और उनका भविष
उत्तराखण्ड आन्दोलन में गधों की भूमिका और उनका भविष्य
✍️ आनन्द बल्लभ उप्रेती
🏛️ पिघलता हिमालय | वर्ष: 2012
पुस्तक परिचय / विवरण
यह इतिहास नहीं है उत्तराखंड राज्य आन्दोलन का। यह एक ऐसा सच है जैसा किसी जमाने में संजय ने अंधे धृतराष्ट्र के सामने बड़े विनीत भाव से व्यक्त किया था।
राज्य आन्दोलन के पीछे सब की अपनी अलग-अलग मंशा है। यदि ऐसा न होता तो राज्य प्राप्ति का अनुभव सबको एक सा ही हो रहा होता।
उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन अपने आप मेें विश्व के आन्दोलनों में एक अनूठा आन्दोलन था। लेकिन इतने महत्वपूर्ण आन्दोलन को जितने हल्केपन से सड़कों में लाया गया उसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव तो पड़ेगा ही।
गली-गली से सड़कों पर आगजनी करती, शोर मचाती मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों की जमात किस मंशा की प्रतीक है? राज्य के लिए आन्दोलन बिल्कुल अलग बात है लेकिन उस कथित राज्य का भूत अपने उफपर अवतरित कर लेना किस बात का परिचायक है?
गधों के इर्दगिर्द आन्दोलन को समेट कर चलना कितना बड़ा मजाक है एक महत्वपूर्ण बात को व्यक्त करने का? इसे आदिमगर्दी कहा जाये या गधागर्दी? और यदि इस आदिमगर्दी या गधागदी को उसी गर्द-गुबार की शैली में कहा जाए तो क्या हर्ज है?
सबकी अपनी-अपनी मंशा है। बुद्धिजीविओं की अपनी मंशा है, राजनेताओं की अपनी मंशा है, अधिकारियों की अपनी मंशा है, आन्दोलन के लिए अलग-अलग मंचों से आये लोगों की अपनी मंशा है। जिनकी कोई मंशा नहीं, उनकी भी एक मंशा है, आन्दोलन को कुचलने वाले, तोड़ने वाले जमातों की भी एक मंशा है। केवल मंशाहीन है तो वह है गधा, जिसे माध्यम बनाया गया है राज्य आन्दोलन का, अपनी बात कहने के लिए।