सम्पादकीय
किसका भविष्य तैयार कर रहे हैं?
📅 26 April 2026
✍️ पिघलता हिमालय
गुरु-शिष्य परम्परा में सीधी सी बात है कि गुरु का दर्जा माता-पिता की तरह श्रेष्ठ है और गुरु अपने शिष्य को सबसे योग्य बनाना चाहता है। पठन-पाठन की यह विधा और पवित्राता अब धरी रह गई है क्योंकि शिक्षा के नाम पर जिस प्रकार का रुखा-सूखा सरकारी व्यवस्था में है, उतना ही तीखापन निजी व्यवस्था में है। ‘शिक्षा का मिशन’ वाली बात इसलिये भी बेइमानी हो चुका है क्यांकि शिक्षक के रूप में ज्यादातर वह भीड़ आ चुकी है जो मौका मिलने पर शिक्षक के रूप में है। बेरोजगारी और सरकारी नौकरी का लोभ काफी संख्या पदों को घेरे बैठा है। इसके अलावा अथाह पैसे वाले शिक्षा व्यवस्था में आकर इसे उद्योग बना चुके हैं। ऐसे में किसका भविष्य तैयार किया जा रहा है। कहना आसान होता है कि बच्चों का भवि