
कोरोना की घातक हवा ने दुनिया में जो जहर घोला है, उससे हमारे कई परिचित और बहुत सारे अपरिचित लोगों को असमय इस दुनिया से विदा होना पड़ा है। दुःख की इस घड़ी में पिघलता हिमालय परिवार भी इन सभी परिवारों के साथ है और ईश्वर से प्रार्थना करता है कि इन परिवारों को दुःख सहने की शक्ति प्रदान करे। साथ ही विपदा की इस घड़ी में पूरी दुनिया को बचाए।
ईश्वर से प्रार्थना के लिये हजारों हाथ उठ रहे हैं, सभी खुशहाली और शान्ति चाहते हैं। इसके लिये प्रयास और बचाव किये जा रहे हैं। लगातार डर-भय वाले समाचारों के बाद अब आशाजनक परिणाम भी मिलने लगे हैं। कोरोना की लहर को चीरते हुए बड़ी संख्या में लोगों ने इससे लड़ना सीख लिया है और स्वस्थ्य होकर अपने घरों को लौटे हैं। संकट की इस घड़ी में भयानक समाचार और डरावने विचारों से बचते हुए उर्जावान बने रहने की जरूरत भी है।
इस समय भले ही कारोबार और सामाजिक ताने-बाने में बिखराव दिखाई दे रहा है लेकिन यह दूरी सिर्फ स्वस्थ्य रहने के लिये हैं। हर कोई चाहता है कि खुले में घूमे, अपनों और अपने साथियों से मिले, बच्चे स्कूल जाना चाहते हैं, अपने साथियों से मिलना चाहते हैं, खिलाड़ी स्टेडियम और जिम जाना चाहते हैं, श्रमिक चाहते हैं कि वह अधिक से अधिक श्रम कर अर्जन करें, दुकानदार चाहता है कि वह अपने प्रतिष्ठान को खूब सजाए ताकि ग्राहकों की भरमार हो परन्तु यह सब तब ज्यादा अच्छा लगता है जब मौसम सुहावना हो, लोग निरोगी हों। इस समय कोरोना की मार से वातावरण टूटन भरा है। यही कारण है कि सरकार के ऐलान से पहले ही व्यापारियों, कारोबारियों, श्रमिकों, नौकरी पेशा लोगों ने अपने आप को समेट लिया। अपने बच्चों को सुरक्षित करने के लिये स्कूलों, कोचिंग सेन्टरों ने पहले ही बन्द का ऐलान कर दिया।
यह कोरोना संक्रमण से लड़ने के लिये सभी का योगदान है। चिकित्सकों, पुलिस व सुरक्षा कर्मियों, पर्यावरण मित्रों, समाज सेवियों की निष्ठा से इस लडाई को लड़ना आसान बना हुआ है अन्यथा भीड़ में अराजकता वाली स्थिति हो जाती। हालातों से परेशानी जरूरी है लेकिन उम्मीद इसकी खुराक है। यही कारण है कि एकदम सीजन की दिहाड़ी पर टिके श्रमिक भी अपने को समेट चुके हैं। ग्रीष्म के सीजन में उत्तराखण्ड के पौराणिक ऐतिहासिक मन्दिरों के कपाट खुले और दुकानें भी सजीं लेकिन कोविड-19 की दूसरी हवा ने ठहरने का संकेत दिया। ग्रीष्म सीजन में दो-चार पैसा कमाकर अपने परिवार को पालने वालों के सामने रोटी का संकट है। छुटपुट दुकानें, होटल, ढाबे, मौसमी फल-सब्जी बेचकर गुजारा करने वाले, पर्यटकों को गाइड करने वाले, नाव चाालक, टैक्सी ड्राइवर, पफेरी लगाकर रोजी-रोटी का जुगाड़ करने वालों के सामने संकट है। ठेकेदारों के सामने भी दिक्कत है क्योंकि मजदूरों की अनुपस्थिति में क्या किया जा सकता है। स्कूल, ट्रेनिंग सेन्टर, कोचिंग इत्यादि चलाने वाले आॅनलाइन किसी प्रकार काम कर पा रहे हैं लेकिन भारी नुकसान उन्हें हुआ है। प्राइवेट संस्थानों को ऐसे में बहुत कष्ट उठाने पड़ रहे हैं। अपने स्टापफ को बनाये रखना, उनकी देखभाल कठिन काम है। ऐसे में फैक्ट्रियों बड़े होटलों में कर्मियों की छंटनी की गई है। शहरों में बदहाल कई परिवार किराये-भाड़े की व्यवस्था कर अपने गांव का रुख कर चुके हैं और छुटपुट कामकाज कर रहे हैं ताकि समय बीतने पर वह पिफर से अपने को व्यवस्थित कर सकें।
कोविड संक्रमण की चैन तोड़ने के लिये प्रदेश सरकार ने साप्ताहिक कफ्रर्यू के अलावा बाजार खुलने का समय निर्धारित किया है। टीकाकरण के लिये भी लोग सक्रिय हंै और टीकाकरण टीमें जुटी हुई हैं। जरूरी चीजों को छोड़कर अन्य दुुकानें दोपहर दो बजे तक ही खुलने का फरमान है। उत्तराखण्ड में बाहर से आने वालों को कोविड की निगेटिव रिपोर्ट और पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद प्रदेश के दूरस्थ इलाकों में कोविड टेस्टिंग बढ़ाने के लिए वैन और मोबाइल टीम गठित की गई हैं।
कोरोना की इस दूसरी लहर में तमाम तरह की आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं लेकिन जब प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं अपने सम्वाद में कहा कि देश को लाॅकडाउन से बचाना है। राज्यों को इससे बचना चाहिये। जब ज्यादा ही दिक्कत हो तो अन्तिम विकल्प के रूप में लाॅकडाउन लगाया जाए। साथ ही यह बताने के बाद कि देश में बैक्सीन की कमी नहीं है। आम जनता में उम्मीेदंे जगी हैं। सरकार सहित सभी चाहते हैं कि आर्थिक गतिविधियों सहित टीकाकरण चले। मई का यह महीना बेहद नाजुक है, इसके लिये सभी को सतर्क रहना है।
नुकसान तो नुकसान है। ठहरने के अलावा हम और आप कर भी क्या सकते हैं? वैश्विक महामारी के इस दौर में प्रतिदिन मौत के डरावने सपने और समाचार सुनने के बजाए नवनिर्वाण पर विचार होना चाहिये। पहाड़ का ग्रीष्म सीजन चैपट है और तालों में सैलानियों को घुमाने वाली नाव किनारे लग चुकी हैं, टैक्सी स्टैण्ड शान्त हैं, होटल-रिसोर्ट खाली हैं, सांस्कृतिक दल मौन हैं, सबका हौंसला बढ़ाने वाले मौन हो चुके हैं। बहुत बड़ी भीड़ सोशल मीडिया में जरूर उलझी है। कार्यालयों की कार्य संस्कृति, स्कूलों का पठन-पाठन सब प्रभावित है। इस समय होने वाले मेले-उत्सवों का रंग फीका पड़ चुका है। घरेलू आयोजनों में भी रश्म अदायगी हो रही है।……….यही सब हो जाने दो फिलहाल। आने वाले बेहतर कल के लिये अभी ठहरना हमारी मजबूरी है।
