दरवारी और सामंती सीमा लांघकर जनता के बीच पहाड़ की होली गायन परम्परा

डाॅ.पंकज उप्रेती
लोकमंच वह है जहाँ हमारी पुरातन कथाएं-गाथाएं गीत-संगीत मिलता है, यह श्रुति परम्परा है। एक पीढ़ी से दूसरी तक अपनी बात-व्यवहार, कला-संस्कृति, इतिहास को हस्तान्तरित करने का बड़ा उपक्रम ‘होली’ भी है। इसमें हमारे ग्राम्य जीवन का अल्हड़पन, अख्खटपन, अपनापन है। तभी हम आसानी से गाने लगते हैं-
आओ सनमुख खेलें होरी।
अब घर जाने न दूंगी लला हो। आओ.
कंकर मारि छयल जसो भाजै,
मैं तो लोंगी मों बदला हो। आओ.
स्योंनि के माथे बिन्दी बिराजे,
नैनन बीच हों कजरा हो। आओ.
ताल मृदंगा और डफ बाजै,
मजीरन को झनकार लला हो। आओ.
उत्तराखण्ड के लोक जीवन में होली ने जो रंग घोले हैं उसकी खड़ी और बैठकी शैली यहाँ दिखाई देती है। इसमें जहाँ ग्रामीण सामुहिकता के सुर-ताल हैं वही नागर रौबदारी। बैठकी होली की गायन शैली दरवारी और सामंती सीमा लांघकर जनता के बीच सुहा रही है। जिसने एक परम्परा को जन्म दिया जो बनारस की ठुमरी, पंजाब के टप्पे की तरह अपना निराला अंदाज रखती है। चैती, कजरी, माण की तरह इसमें भी इसका भी अपना अंदाज है। कन्नौज व रामपुर की गायकी का प्रभाव इसमें है। इसके लिये अनामत अली उस्ताद का नाम ठुमरी के रूप को सोलह मात्रा में पिरोने के लिये याद किया जाता है। उस्तादों, पेशेवर गायकों का योगदान इसमें रहा है। मुगल शासकों को भी होली की बैठकी रिझा गई। तभी तो आज तक गाते हैं- ‘किसी मस्त के आने की आरजू है’। दरवारी शान और बादशाह के हाल को बैठ होली में गाया जाने लगा- ‘केशर बाग लगाया, मजा बादशाह ने पाया’। वर्तमान मंे मनोरंजनों के तमाम साधनों और बदलती जीवन शैली का प्रभाव हमारे त्यौहारों में पड़ा है। इसकी परम्परागत ठसक को बनाये रखने लिये संस्थागत प्रयास भी पिछले दो दशकों से हो रहे हैं जिसके सुखद परिणाम दिखाई दे रहे हैं। हालांकि होली गायन की हमारी शैली को ‘होली गजल’ के रूप में भी प्रस्तुत करने का अटपटा प्रयोग हुआ है लेकिन वह हजम होने वाला नहीं है। इसी प्रकार हमारे लोक जीवन की खड़ी होली के अधिकांश दिखाये जाने वाले वीडियो प्रदर्शन मूल से मेल नहीं खाते हंै। क्योंकि उसमें यह मान लिया गया है कि झोड़े की तरह वृत्ताकार घूमने मात्र से होली हो जाती है। जबकि हमारी होली शैली की अपनी विधा है। यहाँ पुरुषों और महिलाओं की पृथक-पृथक होलियों का रिवाज पहले से है और कई गाँवों में तो होली होती ही नहीं है। ऐसे गाँवों में आठू-सातू को होली से भी जबर्दस्त तरीके से मनाया जाता रहा है।
इस पर्वतीय प्रदेश में विशेषकर कुमाऊँ अंचल में होली का जबर्दस्त प्रभाव है। यहाँ एक ओर बैठकी यानी नागर होली आम जनता के बीच जगह बनाने की प्रक्रिया में आज भी है। वहीं खड़ी होली का रंग विशुद्ध लोक का रंग है। इसमें ढोल, मजीरे की थाप पर मस्त होकर होल्यार गाते-झूमते हैं। खड़ी होली में यद्यपि संगीत शास्त्र का अनुशासन न हो किन्तु परम्परा से सीखते हुए लोग लय-ताल के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हंे देख लगता है कि यह लय-ताल, पद संचलन का अभ्यास करते हैं। जबकि वास्तव में मदमस्त लोग सिर्फ इस त्यौहार में ही ऐसी भागीदारी करते हैं। बड़े-बूढ़ों को देख युवा व बच्चे भी उसके अभ्यस्त हो जाते हैं। इसकी तालें भी ढोल में कर्णप्रिय लगती हैं। विष्णुपदी होली से इसकी शुरुआत हो जाती है-
श्याम मुरारी के दरसन को जब
विप्र सुदामा आये लला।।
बिप्र सुदामा द्वार खड़े हैं,
पूछत कृष्ण कहाँ हैं हरी। बिप्र.
हाँजर वासी गये जब भीतर,
द्वार खड़ो है बिप्र हरी। बिप्र.
बालापन के मित्र हमारे,
रोको नहीं क्षणमात्र हरी। बिप्र.
बांह पकड़ के निकट बैठाए,
रुकमणि चरण दबार हरी। बिप्र……
खड़ी होली गायन के गीतों में क्रम का बहुत ध्यान रखा जाता है। विष्णुपदी होली में कई गीत बैठकर गाये जाते हैं। जिसमें दो पक्ष बनाकर बैठा जाता है और एक पक्ष द्वारा गीत प्रारम्भ कर देने के बाद दूसरा पक्ष दोहराता है। पूरी लय ताल के साथ होल्यार इसमें भावाभिव्यक्ति करते हैं। ‘होली कैसो खेलन वन जाई’ जैसे गीत बैठकर गाये जाते हैं। इन गीतों को ढोल-मजीरे की ताल में समवेत स्वर में गाया जाता है। खड़ी होली गाने वाले गीतों में नृत्य की कुछ विशेषताएं हैं। पांवों को गीत के बोल के साथ विशेष तरीके से मोड़ा जाता है, कमर झुकाकर नाचना, हाथों को घुमाना, कहीं-कहीं पर हाथों में रूमाल और छड़ी पकड़कर नाचना इन गीतों को अधिक प्रभावपूर्ण बना देता है। इन गीतों की नई पंक्ति के बीच-बीच में एक प्रमुख होल्यार द्वारा ‘बखारा’ भी जाता है। ‘बृज कुंजन में धूम मचै होरी’ जैसे गीत इसमें गाये जाते हैं। खड़ी होली में ही बंजारा हाली का चलन भी है, जिसे समवेत स्वरों में टोली गाती है। ‘गोरी प्यारो लगो तेरो झनकारो’ जैसे गीत इसमें गाये जाते हैं। और फिर होली के बहाने पूरी चुलबुलाहट गूंजने लगती है-
वृन्दावन की कुंज गलिन में,
दधि लूटे नन्द जी को लाल,
बेचन ना जाइयो।
ना जाइयो मेरे लाल बेचन न जाइयो।।
सोल सौ गोपिनी न्हान चली,
जमुना जी को लम्बो घाट। बेचन.
कौन जाने जसोदा को लड़को,
वो है लौंडा लभार। बेचन.
आपूं जो कान्हा पार उतर गये,
हो धींवर मझधार। बेचन.
दधि माखन सब लूट लियो है,
उलटि मांग लगाई। बेचन…
ब्रज मण्डल की होली की तरह ही देवभूमि की होली भी आध्यात्म से धूम तक चलती है। यहाँ तक की इस होली में श्रृंगार का तड़का इसे और भी आगे ले जाता है-
अरे हाँ रे गोरी चादर दाग कहाँ लागो।।
अरे हाँ रे सासू पनिया भरन हँू चली,
गागर दे छलकाय सासू चादर दाग वहाँ लागो।।
अरे हाँ रे गोरी पनिया दोष न दीजिये,
वहीं खड़ो तेरो यार गोरी चादर दाग कहाँ लगो।।
अरे हाँ रे सासू यार को नौ मत लीजिये,
जहर खा मर जाऊँ यार को नौ मत लीलिये।
अरे हाँ रे सासू खरक दुहावन हँू चली,
बछड़ा मारे लात सासू चादर दाग वहाँ लागो।।
अरे हाँ रे गोरी बछिया दोष न दीजिये,
वहीं खड़ो तेरो यार गोरी चादर दाग कहाँ लागो।……
खड़ी होली की धूम के समानान्तर बैठकी होली पहाड़ में चलती है, जिसका शुभारम्भ पौष के प्रथम रविवार से कर दिया जाता है। इसमें भी पहले विष्णुपदी होली गीत गाने का रिवाज है, जिसे निर्वाण की होली कहते हैं। यह होली गीत विभिन्न राग-रागनियों में गाये जाते हैं। अनुमान है कि जब बाहर से लोगों का इस पर्वत प्रदेश में आगमन हुआ तो मनोरंजन के साधनों के अन्तर्गत राज्याश्रय में महफिलें होती थीं। मिरासी व पेशेवर कलाकारों के नृत्य-गीतों का क्रम चला। जब दरवार से निकल कर यह गायकी सम्भ्रान्त लोगों के पास आई, उस दौर में होली बैठक किसी सक्षम व्यक्ति के घर होने लगी। शिष्ट जनों की होली भ्ीा इसे कहा गया क्योंकि घरों में सीमित लोग इसमें जुटते थे। बस, यहीं से आम जन को चस्का लगा था बैठकी होली का। धमार के रूप में जोरदार आवाज में सुर गूंजने लगे-
‘दय्या आई री, सब गोपियन बन ठन, मोसे करत इतरार मुरार।
कोई चमकत कोई मटकत, कोई नाचत दे दे ताल मुरार।।’
अस्सी फीसदी गीत राग काफी के स्वरों में हैं। महफिल में नियमित बैठने वाले कुछ दिनों तक सुनने के बाद धड़ाधड़ गाने लगते हैं। राम, श्याम के प्रसंगों के अलावा बसन्त और शिव की स्तुति के बाद श्रृंगार की रचनाएं इस राग में सुनने को मिलती हैं-
‘सैय्या तू प्रीत न जाने, अंगिया मोरी रंग ही में साने।
अंग-अंग को रंग गया, कर होली के बहाने।’
राग काफी की भांति ही दिन में पीलू राग पर होल्यार खूब गाते हैं। एक रचना जिसमें मथुरा शहर के भीगने का वर्णन है-
‘मथुरा शहर के लोग सभी, भीगन लागे भिगावन लागे।
हमरी चुनरिया पिया की पगरिया, और केशरिया फाग।’
जंगलाकाफी में कर्णप्रिय रचनाओं का गायन पौष माह के प्रथम रविवार से लेकर टीके की होली तक होता रहता है। एक होली गीत-
‘गोरी धीरे चलो लुट जाओगी डगर,
तेरे सिर से ढुरक ना जाये गगर।
या रसिया है ब्रज को रंगीलो,
या को रहत घट-घट की खबर।’
पहाड़ की रामलीला की तरह होली में भी विहाग और जयजयवन्ती राग की मदमस्त करने वाली धुन रसिकों को मुग्ध करती है। एक रचना-
‘गोरी के नैनन में श्याम बसत हैं, लोग कहें वाके नैन कजरारे।
घूंघट ओट में झिलमिल चमकें, झीनी बदरिया जैसे नभ के तारे।’
इस प्रकार पहाड़ की होली में ठैठ ग्रामीण के साथ सामंती गोद से निकल कर आई नागर होली की सामुहिकता, भावाभिव्यक्ति मुखरित होती है। इसके गीत लगभग तीन माह तक रस घोलते हैं ओर टीके की बैठक में विदाई के साथ फिर से अगले वर्ष मिलने की कामना करते हैं। वाकेई जीवन का उल्लास होली के बिना अधूरा है। यह उल्लास हमारे जीवन को रंगों से सरावोर करता है और हमारे मन को तरंगित करता है।