कज्जाकी लुटेरों का आंतक था

Hot pursuit of Kazakh Bandits by a Johari Tradar

डॉ.नारायण सिंह पांगती से बातचीज

डॉ. पंकज उप्रेती
दुनिया का कालचक्र हमेशा दुश्वारियों से घिरा रहा है। अपने वर्चस्व, अपनी भूख, अपने शौक के लिये लड़ते-भिड़ते देशों व गिरोहों की अनगिनत कथा कहानियाँ इतिहास में हैं। जहाँ शान्ति की कामना की जाती है, वहाँ भी कोई न कोई अड़चन रही है। बात करते हैं भारत- तिब्बत सम्बन्धों और इनके बीच होने वाले व्यापार की तो पता चलता है कि हमेशा से हिमालयी राज्यों व देशों का सम्बन्ध् मधुर रहा है लेकिन आक्रान्ताओं की नीयत और अत्याचार ने इन शान्त वादियों को भी नहीं छोड़ा। ऐसा ही आतंक एक बार कज्जाकी लुटेरों का था और इनका पीछा करने वालों में बहादुर शौका व्यापारी स्व.शेरसिंह पांगती का नाम है। जर्मनी के शोधार्थी एल्मार ग्रेपा ने अपने अध्ययन में भी इसकी खोज की थी, बाद में डॉ.आर.एस. टोलिया व सुरेन्द्र सिंह पांगती से प्रेरित होकर डॉ.एन.एस.पांगती-श्रीमती जया पांगती ने इस महत्वपूर्ण इतिहास को पुस्तक का रूप भी दे डाला। ‘एक जोहार व्यापारी द्वारा कज्जाकी लुटेरों का पीछा’ की चर्चा से पहले डॉ.पांगती के बारे में जान लेते हैं। एक थे- रामसिंह पंागती जी। इनके दो पुत्र हुए- शेरसिंह और लाल सिंह। शेरसिंह जी की अगली पीढ़ी में मनोहर सिंह, नारायण सिंह। डॉ. नारायण सिंह पांगती जिन उँचाईयों पर हैं, इनका बचपन उतना ही परीक्षादायी रहा है। मिलम में 1944 में जन्मे पांगती जी माइग्रेशन परम्परा के साक्षी हैं और ग्राम चिलकिया (नाचनी से पहले पुल के पास) में बचपन की पढ़ाई के बाद अपने रिश्तेदारों के पास रहकर तेजम के लोधियाबगड़, भैंसखाल, टिमटिया स्कूली शिक्षा लेने लगे। 1962 में मुनस्यारी से हाईस्कूल का प्रथम बैच ;विज्ञान वर्गद्ध के छात्र पांगती जी कक्षा 11 की परीक्षा बेरीनाग से और इण्टर अल्मोड़ा से किया। सन् 1965 में किंक जार्ज मेडिकल कालेज लखनउ से एमबीबीएस किया। सन् 1962 के बाद अपने क्षेत्रा से यह पहले युवा थे जिन्होंने एमबीबीएस किया था। इससे पहले चन्द्र सिंह रावत, जसवन्त सिंह धर्मशक्तू अपने समय के एमबीबीएस किये हुए थे। सन् 1972 में राजकीय चिकित्सा सेवा में आने के बाद 1984 में प्रमोशन पर डिप्टी सीएमओ का कार्यभार ग्रहण किया। अल्मोड़ा में सीएमएस बेस अस्पताल में रहने के बाद नैनीताल फिर 2002 में सेवानिवृत्त डाक्टर साहब ने अपनी चिकित्सा सेवा का लाभ विस्तार रूप में किया। इनके कार्यों में श्रीमती जयवन्ती (जया) पांगती जी का हरक्षण सहयोग आगे बढ़ने में फलीभूत हुआ है। सुपुत्र डॉ.मंयक, सुपुत्री श्रीमती गुन्जन, सुपुत्र- डॉ. भानू अपने कार्यक्षेत्र के अलावा सामाजिक सरोकारों से जुड़े हैं।

पांगती जी के अपने घरेलू राग से ज्यादा सामाजिक आलाप रहे हैं। तभी तो उन्होंने अपने पूज्य पिता का स्मरण करते हुए अनमोल कृति समाज को दी। डा. आर.एस.टोलिया के साथ बार-बार चर्चा करते हुए इन्होंने डॉ.शेरसिंह पांगती को उचकाया कि प्राप्त कुछ दस्तावेजों पर कार्य हो। जोहार मिलन केन्द्र के सहयोग से सन् 2009 में दुर्गा सिटी सेन्टर हल्द्वानी में उस पुस्तक का विमोचन भी हुआ। वह केवल पुस्तक नहीं बल्कि एक ऐसा दस्तावेज है जो इतिहास के रूप में उन यादों को बताता है कि किस परिस्थितियों से हम जुड़े रहे और कैसे थे हमारे बुजुर्ग। इसके अलावा भी डॉ.पांगती की लगन समाज को जोड़ने के रूप में हमेशा से है जो सकारात्मक उर्जा देती है।
डॉ.पांगती अपने बचपन को याद कर कहते हैं- पिता शेरसिंह जी और माता श्रीमती रूकमणी देवी के शैशवकाल में दिवंगत होने पर चाचा लाल सिंह जी और चाची श्रीमती उखा देवी का साया हमारे उपर था। पिता स्व.शेर सिंह पांगती के बारे में बचपन से ही खूब सुना था कि वह तिब्बत में डाकुओं का पीछा करते हुए काश्मीर गये और वहाँ से कई फोटो लाए थे। चिकित्सकीय शिक्षा पूरी कर पांगती जी राजकीय अस्पतालों में कार्यरत थे, एक बार अवकाश में अपने घर मुनस्यारी गये तो एक लिफाफा दिखा जिस पर देवनागिरी लिपि में चाचा जी का नाम-पता लिखा था। इस लिफाफे में 50 पेज का अग्रेजी में लिखा आलेख था। पूछने पर चाचा जी ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व एक जर्मनी नौजवान मुनस्यारी आया था उसने दाज्यू बडे़ भाई स्व.शेर सिंह के बारे में पूछताछ की, उसी ने भेजा है।
यहीं से डॉ. पांगती को पिता जी का वह सूत्र पता चला जो शैशवावस्था में वह पिता के जाने के बाद नहीं जान पाये थे कि उनके पिता कैसे जो थे। लिफाफे में ग्रेपा का आलेख कई बार पढ़ने के बाद पांगती जी ने तय कर लिया कि अपने बुजुर्गों की इस याद को वह संजोयेंगे और शोधर्थी ग्रेपा का धन्यवाद किया कि उसने खोज में उनके पिता के बारे में जानकारी पुष्ट की। डॉ.पांगती ने ने अपनी पत्नी जया जी के साथ निश्चय किया किया कि जर्मनी से आकर ग्रेपा ने जिस कार्य को खोजा उसे सार्वजनिक किया जाए, इसके लिये ग्रेपा और ब्रिटिश लाइब्रेरी से स्वीकृति भी ले ली। इस कार्य में डॉ.शेरसिंह पांगती का योगदान भी रहा।
भारत-तिब्बत व्यापार विषय को लेकर पिघलता हिमालय बराबर रोचक जानकारी देता रहा है। सन् 1941 में कज्जाकी लुटेरों द्वारा तिब्बत में जोहार (भारतीय व्यापारियों) का सामान लूटने तथा व्यापारी शेरसिंह पांगती द्वारा उन लुटेरों का पीछा किये जाने की घटना कम रोचक नहीं है। ग्रेपा के शोध में भी यह कहा गया कि 1980-90 के दशक तक इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी तथा कज्जाकी लुटेरों से पीड़ित व्यापारी जीवित थे। जिनकी सहायता से वह सम्पूर्ण घटनाओं से अवगत हो सका। ग्रेपा ने म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) से अपना पंजीकरण करा कर दो-तीन वर्षों तक मुनस्यारी, थल और हल्द्वानी स्थित जोहार के तत्कालीन तिब्बती व्यापारियों से सम्पर्क स्थापित किया। साथ ही धरमशाला (हिमांचल प्रदेश) स्थित म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) और ब्रिटेन के इण्डिया आफिस लाइब्रेरी आदि स्थानों से इन कज्जाकियों के सम्बन्ध् में महत्वपूर्ण अभिलेख उपलब्ध् करने में अथाह परिश्रम किया।
इसी शोध प्रबन्ध् का उल्लेख करते हुए हुए डॉ.पांगती बताते हैं- भारत की आजादी से पूर्व अथवा तिब्बत का चीनी प्रशासन के अधीन आने से पहले भारत और तिब्बत दो देशों के इस सीमावर्ती क्षेत्र में निवास करने वालों के बीच सदियों से जो व्यापारिक सम्बन्ध था, उन सम्बन्धें का विश्वसनीय रूप में परिपालन करते हुए ये व्यापारी अपनी बेशकीमती व्यापारिक वतस्तुएं इन तिब्बती मित्रों के पास अथवा बौद्ध मठों में छोड़ आते थे और यह सामान सुरक्षित रहता था। तिब्बती लोग अपने इन भारतीय मित्रों को धेखा देना महान पाप समझते थे परन्तु मध्य एशिया के जिस खानाबदोस समुदाय ने लूटमार करना अपना व्यवसाय बना लिया हो, उनके लिये तिब्बत जैसे असहाय और शान्तप्रिय देश में लूटमार करना कोई असम्भव कार्य नहीं था। यहीं से लूट मचना आरम्भ हुआ।

अगस्त 1941 में इन कज्जाकी लुटेरों ने तिब्बत के उत्तरी पठारी मैदान च्यांग-थांग से लूट शुरू करते हुए कैलास मानसरोवर के निकटवर्ती क्षेत्र में प्रवेश किया। इनके भय से शौका (भारतीय व्यापारियों) ने भी अपना सामान तिब्बती मित्रों के पास रखकर जान उचित समझा। लेकिन कज्जाकी जुटेरे तो सिर्पफ लूट जानते थे। इन्होंने जोहार के 43 व्यापारियों का लगभग 41 हजार रुपये का सामन लूट लिया, जिसमें राम सिंह रतन सिंह नाम के एक व्यापारिक फर्म का सबसे अधिक 13 हजार रुपये का सामान लूटा गया था। इन कज्जाकियों द्वारा लूटा गया सामान वापस प्राप्त करने के लिये इस फर्म के साहसी व्यापारी शेर सिंह पांगती ने कठिनाईयों का सामना करते हुए पीछा किया। बौद्ध धर्म के अनुयायी तिब्बती लोगों को सता रहे कज्जाकियों का आतंक जब अति हो गया था गरतोक के गरपन राज्यपाल ने इनकी रोकथाम व लूटे गये सामान को वापस प्राप्त करने की आशा से काश्मीर सरकार के अध्किारियों से निवेदन किया और स्वयं सेना के साथ पश्चिम की ओर प्रस्थान किया। साथ में जोहार के व्यापारी शेरसिंह पांगती भी थे।
कज्जाकियों ने काश्मीरी सेना की टुकड़ी पर हमला कर दिया परन्तु उन्हें पीछा हटना पड़ा। इस बीच ब्रिटिश रेजीडेन्ट से काश्मीर सरकार को पत्र प्राप्त हुआ कि भारत सरकार कज्जाकियों की गतिविधियों की पूर्ण जानकारी के बिना तिब्बत की सीमा के अन्दर अपनी सैनिक टुकड़ी भेजने की अनुमति नहीं देना चाहती है। इसके लिये शीत के दिनों में लद्दाख में वार्ता की जा सकती है। अक्टूबर में चार जोहारी व्यापारी चुसूल पहंुचं। शिविर में 40 सिपाहियों ने दमचौक के लिये प्रस्थान किया। चमचौक पहुंचकर उन्हें वहाँ की टुकड़ी को मजबूत करना था।
कज्जाकियों की ये कहानी बहुत लम्बी और रोचक है (फिर कभी)। फिलहाल पांगती जी की यादों को सलाम करते हुए बताते हैं- कज्जाकियों द्वारा लूट कर ले जाये गये सामान को प्राप्त करने के लिये शेर सिंह पांगती की भाँति गरतोक का गरपन भी तिब्बत सेना के साथ दमचौक तक गया था परन्तु कज्जाकियों के आत्मसमर्पण करने के पश्चात भी जब उन्हें कुछ भी प्राप्त न हो सकता तो मन मारकर वापस लौटते समय गरपन ने कज्जाकियों द्वारा छोड़े गये 600-700 भेड़-बकरियाँ एक आना 12 आने की दर से जोहार के व्यापारी मेघ सिंह, मानी सिंह को बेची, जो जोहार पहँुचने तक 400 ही रह गई थी। शेर सिंह पांगती ने पं.गोविन्द बल्लभ पन्त सहित तमाम बड़े नेताओं से मिलकर लूटे सामान को वापस लाने का यत्न किया लेकिन असेम्बली के 16 फरवरी 1962 की वार्ता में भाग लेते हुए गोविन्द वी देशमुख के प्रश्न के आधार पर जिन व्यक्तियों के सामान की क्षति हुई, उसके भुगतान के लिये सरकार निश्चय कर चुकी थी। परन्तु औलफ कारो ने घोषणा की कि कज्जाकियों ने जिन व्यक्तियों का सामान भारत से बाहर चुराया है, उन्हें किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति नहीं दी जा सकती है। सीध सा अर्थ था कि तिब्बत यानी देश से बाहर लूट के लिये तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार ने किसी प्रकार अपना उत्तरदायित्व नहीं समझा। सवाल आज भी बना हुआ है जिसे एक जोहारी व्यापारी ने लड़ा था।

पहाड़ की सुरसाम्राज्ञी बीना तिवारी

रतन सिंह किरमोलिया
कुमाउंनी गीत संगीत एवं गायकी की सुर साम्राज्ञी बीना तिवारी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वह कुमाउंनी और गढ़वाली गीतों की उस जमाने की गायक कलाकार रही हैं जब आकाशवाणी लखनऊ से इनकी शुरुआत हो ही रही थी। यह करीब सन् 1963 के शुरुआती दिनों की बात है। इससे पूर्व कुमाउंनी और गढ़वाली गीतों के प्रसारण की आकाशवाणी लखनऊ से कोई व्यवस्था नहीं थी। हाँ,ं स्थानीय मेलों एवं कौतिकों में लोकगीत गाए एवं बजाए जाते थे। हालांकि उस समय कुमाउंनी और गढ़वाली के कई गीतकार गीतों की रचना में लगे हुए थे। कुछ स्वयं गाते भी थे।
कुमाउंनी और गढ़वाली लोकगीतों के हिमायती कुछ प्रबुद्ध विद्वानों ने आकाशवाणी लखनऊ से ‘उत्तरायण कार्यक्रम’ नाम से इसकी शुरुआत की। इसकी जिम्मेदारी जयदेव शर्मा ‘कमल’ और जीतसिंह जड़धारी को सौपी गई। ये दोनों गढ़वाली में कार्यक्रम करते थे और कुछ कुमाउंनी के गीत बजाया करते थे। कुमाउंनी के लिए कम्पीयर के रूप में बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ को लाया गया। 7 जनवरी 1963 से वे उत्तरायण कार्यक्रम से जुड़ गए। तब कुमाउंनी गढ़वाली गीतों को गाने वाले गायक कलाकारों को खोजा जाने लगा। कुमाउंनी लोकगीत गाने के लिए बीना तिवारी का चयन किया गया। बाकायदा स्वर परीक्षा के बाद ‘बी’ हाईग्रेड कलाकार के रूप में उनका चयन किया गया। मैं समझता हूँ लोक भाषा कुमाउंनी के गीत गाने वाली तत्कालीन बी हाईग्रेड कलाकार के रूप में वह प्रथम महिला गायिका रही हैं। उन्होंने कुमाउंनी के साथ साथ गढ़वाली के भी कई लोकगीत गाए हैं। आकाशवाणी लखनऊ के उत्तरायण कार्यक्रम में उनके गाए गीतों के प्रसारण के बाद श्रोताओं से उन्हें जो प्यार और वाहवाही मिली वह काबिले तारीफ रही।
बीना तिवारी का जन्म पिता कृष्णचन्द्र और माता मोहिनी देवी के घर 14 जनवरी 1949 को लखनऊ में हुआ। उनका मूल पैतृक गाँव ज्योली अल्मोड़ा है। उनकी शिक्षा दीक्षा लखनऊ में ही हुई। उन्होंने बीए, संगीत निपुण तक की शिक्षा भातखण्डे संगीत महाविद्यालय लखनऊ से प्राप्त की। उनके संगीत एवं गायन में महारत हासिल करने में गोविन्द नारायण नातू और कृष्णराय की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बाद में कुछ समय के लिए बेगम अख्तर और बिरजू महाराज के सानिध्य में रह कर भी उन्हें संगीत एवं गायन सीखने का अवसर मिला।
उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ से जुड़कर कुमाउंनी गढ़वाली गीतों के अलावा हिन्दी के गीत गजल एवं भजन भी गाए। आकाशवाणी लखनऊ के अलावा आकाशवाणी रामपुर, नजीबाबाद और अल्मोड़ा केन्द्रों से भी उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है।
प्रतिष्ठित गीतकारों में चारुचन्द्र पाण्डेय, शेरसिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गोपालदत्त भट्ट, हीरासिंह राणा, बृजेन्द्र लाल साह, बंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’, चन्द्रसिंह राही, केशव अनुरागी, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा ’ आदि के गीतों का अपने सुरीले कण्ठ एवं मोहक स्वर में गाकर स्वयं भी लोकप्रियता हासिल की और गीतकारों को भी अमर कर दिया।
उस समय के इनके गाए गीत काफी चर्चित एवं लोकप्रिय रहे। उनमें जैसे- झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, ओ परुवा बौज्यू, दे देवा बाबा जी कन्या को दान, बाट लागी बर्यात चेली, पारा भीड़ा जाणियां बटौव रे, बुरूंशी का फूलों को कुमकुम मारो, गिरधारी तेरो अति चकान, लोरी गीत और रामी बौराणी जैसे अनेकों गीतों को आपने स्वर दिया। जो आज भी सराहे जाते हैं।
आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित कई धारावाहिकों में भी आपने काम किया। बर्ष 2022 की गणतंत्र दिवस की बीटिंग रिट्रीट परेड हेतु ’‘झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी.!’ की धुन को चुना गया था। आपने 6 बर्षों तक मोतीलाल नेहरू कन्या इण्टर कालेज लखनऊ में और 19 बर्षों तक दयावती मोदी अकादमी रामपुर उ.प्र. में संगीत विषय का अध्यापन किया।
देश की नामी गिरामी कई संस्थाओं द्वारा समय-समय पर आपको करीब डेढ़ दर्जन पुरस्कारों/सम्मानों से नवाजा गया परन्तु आश्चर्य की बात है कि सरकारी स्तर पर अद्यतन आपको न संगीत नाटक अकादमी ने याद किया, न उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग ने और न उत्तराखण्ड भाषा संस्थान ने ही आपकी कोई सुध ली। संगीत एवं गायन के क्षेत्र में इनके अमूल्य योगदान का कहीं कोई मूल्यांकन नहीं हो पाया। यहाँ तक कि वयोवृद्ध कलाकारों को मिलने वाली पेंशन से भी इन्हें महरूम रहना पड़ रहा है। उनका कहना है कि कई बार आवेदन करने के बावजूद किसी ने भी संज्ञान नहीं लिया। इस सम्बन्ध में उनका आगे कहना है कि वर्तमान में’ अपनी-अपनी और अपनों की दौड़’ में उम्र की इस दहलीज में किससे कहूं और क्या कहूं। अब तो मन खिन्न हो चुका है और अब तमन्ना भी नहीं रह गई है।
इस लेख के माध्यम से मेरा उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग से अनुरोध है कि कम से कम उन्हें जीवन निर्वाह के लिए पेंशन तो अनुमन्य करवा देवें। उनके द्वारा लोकगीत संगीत क्षेत्रा में दिए गए करीब 50 बर्षों के अमूल्य योगदान का मूल्यांकन का उत्तराखण्ड सरकार को संज्ञान लेना चाहिए।

चायना वार के बाद तेजम प्रमुख केन्द्र था

चन्दन सिंह रावत से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
बात और चीजों को समझना भी कुशलता है। समझने का फेर तकलीफ देता है। कई बार अवरोध् दिखने वाली बातें हमारे विकास में सहायक होती हैं। विकास और विनास का यह क्रम चलता रहता है। इस प्रकार के तर्कों से जूझते हुए अपना रास्ता बनाने वाले तेजम के चन्दन सिंह रावत से आज की खास बातचीज है। जिसमें वह थल-मुनस्यारी मुख्य मार्ग पर स्थित ‘तेजम’ सहित रोचक जानकारियों से अवगत करा रहे हैं।
इससे पहले इनके बारे में जानते हैं- मिलम में एक हुए खड़क सिंह रावत। अपने जमाने के इण्डो-तिब्बत व्यापार के प्रमुख व्यक्तियों में थे। गीता, रामायण का ज्ञान और उसका वाचन करने वाले खड़क सिंह जी वैद्यगिरी भी कर लेते थे, जिस कारण ‘खड़कू गीता’ या ‘गीता’ नाम से पहचान मिल गई। आयुर्वेद के जानकार होने के कारण यह इलाज भी कर देते। व्यापार का जमाना था और बताते हैं तब दिल्ली में कहीं इनका सम्पर्क था जिससे यह दवाई की खुराक मंगवा लिया करते थे। स्थानीय स्तर पर भी जड़ी-बूटी का प्रयोग करते। र्ध्मपरायण होने के कारण इन्होंने अपने पुत्रों के नाम- देवराम सिंह, हरीराम सिंह, दयाराम सिंह, श्रीराम सिंह रखा। आज भी तेजम में इनके कुनबे की पहचान ‘गीता’ या ‘खड़कू गीता’ का परिवार के रूप में है। इन चार भाईयों में देवराम सिंह रावत के सुपुत्र हुए- प्रहलाद सिंह और चन्द्रमोहन सिंह। प्रहलाद सिंह के सुपुत्र हुए- चन्दन सिंह, डॉ. प्रद्युमन सिंह, लक्ष्मण सिंह और ईश्वर सिंह। इसी प्रकार चन्द्रमोहन रावत जी के हुए गजेन्द्र सिंह और गम्भीर सिंह रावत। श्री चन्दन सिंह रावत का जन्म 1952 में मिलम में हुआ। साकेत कालोनी हल्द्वानी में निवासरत श्री रावत और श्रीमती जमुना रावत की विवाहित सुपुत्री दीपिका और नीलिमा के अलावा सुपुत्र- नगेन्द्र रावत हैं।
मिलम में जन्मे श्री चन्दन सिंह बताते हैं सन् 1961 तक तो माइग्रेशन स्कूल व्यवस्था में पढ़ाई की व्यवस्था थी। जोहार घाटी में कक्षा 5 तक ही माइग्रेशन वाले स्कूल सीमित थे। घरों की तरह ही स्कूल भवन भी पक्के पत्थरों के बने थे, जोहार घाटी की कई विभूतियां इन्हीं स्कूलों की देन हैं। बाद में तेजम में सरकारी प्राइमरी, जूनियर हाईस्कूल खुले उसमें लम्बे समय तक घास के छप्पर वाली छत थी, जिसमें कक्षाओं का संचालन होता था। उन झोपड़ियों में ही कुर्सी-मेज सब होता। बकायदा टीचर्स क्वार्टर भी बने थे। समर्पित गुरुजनों की देखरेख में सबको अवसर मिले। स्कूल बहुत कम थे और प्राइमरी परीक्षा का सेन्टर भैंसकोट था जबकि कक्षा आठ बोर्ड का सेन्टर बेरीनाग में हुआ करता था। हम साथी लोग मिलकर मनकोट में कमरा लेकर रहते और अपने गांव से ही खाना बनाने वाले साथी भी साथ ही ले जाते थे। चन्दन सिंह जी के पढ़ाई का सिलसिला तेजम, मुनस्यारी और पिफर अल्मोड़ा डिग्री कालेज रहा।
इनके माइग्रेशन के गाँव का विवरण इस प्रकार है- मल्ला जोहार क्षेत्रा में मिलम, बार्डर पास, फिर मुनस्यारी क्षेत्र में जलथ, उसके बाद तल्ला जोहार की घाटियां। तेजम जहाँ 1962 के बाद स्थाई तौर पर रहना पड़ा। स्थाई तौर पर तेजम आने वाले परिवार जो प्रकृति से जुड़े थे, अतीत की कई चीजें खोई तो कई चीजें प्राप्त कीं। आज भी इनके जेहन में अपनी संस्कृति के वह दिन बसे हैं।
वह बताते हैं भारत-चीन युद्ध के बाद हालात बदलने लगे। तब तक तेजम तक ही गाड़ी आती थी। चायना वार के बाद 1964 के आसपास तेजम प्रमुख केन्द्र था। उस समय के हिसाब से इसका बाजार भी था और मुनस्यारी व दूरस्थ क्षेत्र से जिसने भी मोटरवाहन से यात्रा करनी होती वह तेजम आकर रुकता। इससे पहले गाड़ी रुकने का स्टेशन थल और शामा में रहा। चायना हमले के बाद रास्ते बनने लगे, रोड कटिंग में समय लगा। रावत जी बताते हैं- पहले जमीदारी प्रथा में हमारी काफी भूमि थी और भूमि जोतने वाले ‘अधेली’ यानी फसल का हिस्सा उनके पास पहुंचा जाते थे। बचपन में देखा है- पीठ में लादकर या घोड़े के द्वारा अनाज घर तक पहुंचता था। जमीदारी उन्मूलन में भूमि चली गई। एक ओर युद्ध में व्यापार थम गया और जमीदारी उन्मूलन में भूमि छिन गई तो स्थिति डामाडोल हो गई। तब तक पढ़ाई करने वाले भी व्यापार में ही अपना समय लगाते थे। सन् 1967 में जब क्षेत्र के लोगों को भोटिया जनजाति घोषित किया गया तो परिस्थिति देखते हुए नौकरी के हिसाब से पढ़ने लगे। उन दिनों में तो किसी प्रकार की जानकारी भी नहीं मिल पाती थी। कोई साथी बाहर जाकर सुनता कि अमुक जगह भर्ती है या पद रिक्त है तो एक-दूसरे को बताते थे।
अल्मोड़ा से बीएससी, एम.ए.अर्थशास्त्र के अलावा बीएड करने वाले चन्दन सिंह जी ने 1975 में बैंकिंग सेवा शुरु की। स्टेट बैंक बागेश्वर में प्रथम नियुक्ति के बाद जुलाई 2012 में मैनेजर के रूप में हल्द्वानी से सेवानिवृत्त होकर अपने परिवार के साथ समय व्यतीत कर रहे हैं। श्री रावत सेवानिवृत्त होने के बाद उत्तराखण्ड ग्रामीण बैंक हल्द्वानी में 5 साल वित्तीय जागरूकता केन्द्र भी अपनी सेवाएं देते रहे। इससे सम्बन्ध्ति जानकरी व जागरुकता के लेख पिघलता हिमालय में उनके द्वारा प्रकाशित करवाए जाते थे। समाज में चल रही उथल-पुथल को बारीकी से जानने वाले रावत जी अपने बचपन के दिनों से तुलना करते हैं- तेजम में बचपन के खेल कंचे, कबड्डी, गिल्लीडंडा था। गर्मियों में साथियों संग जाबुका नदी में जी भर तैरना फिर कुछ देर के लिये किनारे पत्थर, रेते पर बैठ कर ध्ूप का आनन्द लेने की प्रक्रिया ये आज भी हम सभी पुराने साथियों को रोमांचित कर जाता है। प्रकृति के साथ रमने वाले कई अच्छे तैराक भी बने। वह कहते हैं- जिन बातों को आज परेशानी के रूप में देखा व समझा जा रहा है वह तो आदत में सुमार था। परिस्थितियों के अनुसार बच्चे-बूढ़े अपने समय को जी रहे थे। ये हमारे समझने का पफेर है। क्योंकि जिन्होंने परेशानी नहीं देखी होती है वह कठिन समय में घबरा जाते हैं। समय के साथ बदलाव होता चला जाएगा लेकिन असली धर उसी में होगी जो ईमानदार होगा। सचमुच प्रकृति के संघर्षों को उत्सव रूप में देख चुके रावत जी और इनके जैसे और भी सज्जन हैं, इनकी क्षमता और देशभक्ति की भावना का सकारात्मक प्रभाव समाज में हमेशा रहता है।