
Hot pursuit of Kazakh Bandits by a Johari Tradar
डॉ.नारायण सिंह पांगती से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
दुनिया का कालचक्र हमेशा दुश्वारियों से घिरा रहा है। अपने वर्चस्व, अपनी भूख, अपने शौक के लिये लड़ते-भिड़ते देशों व गिरोहों की अनगिनत कथा कहानियाँ इतिहास में हैं। जहाँ शान्ति की कामना की जाती है, वहाँ भी कोई न कोई अड़चन रही है। बात करते हैं भारत- तिब्बत सम्बन्धों और इनके बीच होने वाले व्यापार की तो पता चलता है कि हमेशा से हिमालयी राज्यों व देशों का सम्बन्ध् मधुर रहा है लेकिन आक्रान्ताओं की नीयत और अत्याचार ने इन शान्त वादियों को भी नहीं छोड़ा। ऐसा ही आतंक एक बार कज्जाकी लुटेरों का था और इनका पीछा करने वालों में बहादुर शौका व्यापारी स्व.शेरसिंह पांगती का नाम है। जर्मनी के शोधार्थी एल्मार ग्रेपा ने अपने अध्ययन में भी इसकी खोज की थी, बाद में डॉ.आर.एस. टोलिया व सुरेन्द्र सिंह पांगती से प्रेरित होकर डॉ.एन.एस.पांगती-श्रीमती जया पांगती ने इस महत्वपूर्ण इतिहास को पुस्तक का रूप भी दे डाला। ‘एक जोहार व्यापारी द्वारा कज्जाकी लुटेरों का पीछा’ की चर्चा से पहले डॉ.पांगती के बारे में जान लेते हैं। एक थे- रामसिंह पंागती जी। इनके दो पुत्र हुए- शेरसिंह और लाल सिंह। शेरसिंह जी की अगली पीढ़ी में मनोहर सिंह, नारायण सिंह। डॉ. नारायण सिंह पांगती जिन उँचाईयों पर हैं, इनका बचपन उतना ही परीक्षादायी रहा है। मिलम में 1944 में जन्मे पांगती जी माइग्रेशन परम्परा के साक्षी हैं और ग्राम चिलकिया (नाचनी से पहले पुल के पास) में बचपन की पढ़ाई के बाद अपने रिश्तेदारों के पास रहकर तेजम के लोधियाबगड़, भैंसखाल, टिमटिया स्कूली शिक्षा लेने लगे। 1962 में मुनस्यारी से हाईस्कूल का प्रथम बैच ;विज्ञान वर्गद्ध के छात्र पांगती जी कक्षा 11 की परीक्षा बेरीनाग से और इण्टर अल्मोड़ा से किया। सन् 1965 में किंक जार्ज मेडिकल कालेज लखनउ से एमबीबीएस किया। सन् 1962 के बाद अपने क्षेत्रा से यह पहले युवा थे जिन्होंने एमबीबीएस किया था। इससे पहले चन्द्र सिंह रावत, जसवन्त सिंह धर्मशक्तू अपने समय के एमबीबीएस किये हुए थे। सन् 1972 में राजकीय चिकित्सा सेवा में आने के बाद 1984 में प्रमोशन पर डिप्टी सीएमओ का कार्यभार ग्रहण किया। अल्मोड़ा में सीएमएस बेस अस्पताल में रहने के बाद नैनीताल फिर 2002 में सेवानिवृत्त डाक्टर साहब ने अपनी चिकित्सा सेवा का लाभ विस्तार रूप में किया। इनके कार्यों में श्रीमती जयवन्ती (जया) पांगती जी का हरक्षण सहयोग आगे बढ़ने में फलीभूत हुआ है। सुपुत्र डॉ.मंयक, सुपुत्री श्रीमती गुन्जन, सुपुत्र- डॉ. भानू अपने कार्यक्षेत्र के अलावा सामाजिक सरोकारों से जुड़े हैं।
पांगती जी के अपने घरेलू राग से ज्यादा सामाजिक आलाप रहे हैं। तभी तो उन्होंने अपने पूज्य पिता का स्मरण करते हुए अनमोल कृति समाज को दी। डा. आर.एस.टोलिया के साथ बार-बार चर्चा करते हुए इन्होंने डॉ.शेरसिंह पांगती को उचकाया कि प्राप्त कुछ दस्तावेजों पर कार्य हो। जोहार मिलन केन्द्र के सहयोग से सन् 2009 में दुर्गा सिटी सेन्टर हल्द्वानी में उस पुस्तक का विमोचन भी हुआ। वह केवल पुस्तक नहीं बल्कि एक ऐसा दस्तावेज है जो इतिहास के रूप में उन यादों को बताता है कि किस परिस्थितियों से हम जुड़े रहे और कैसे थे हमारे बुजुर्ग। इसके अलावा भी डॉ.पांगती की लगन समाज को जोड़ने के रूप में हमेशा से है जो सकारात्मक उर्जा देती है।
डॉ.पांगती अपने बचपन को याद कर कहते हैं- पिता शेरसिंह जी और माता श्रीमती रूकमणी देवी के शैशवकाल में दिवंगत होने पर चाचा लाल सिंह जी और चाची श्रीमती उखा देवी का साया हमारे उपर था। पिता स्व.शेर सिंह पांगती के बारे में बचपन से ही खूब सुना था कि वह तिब्बत में डाकुओं का पीछा करते हुए काश्मीर गये और वहाँ से कई फोटो लाए थे। चिकित्सकीय शिक्षा पूरी कर पांगती जी राजकीय अस्पतालों में कार्यरत थे, एक बार अवकाश में अपने घर मुनस्यारी गये तो एक लिफाफा दिखा जिस पर देवनागिरी लिपि में चाचा जी का नाम-पता लिखा था। इस लिफाफे में 50 पेज का अग्रेजी में लिखा आलेख था। पूछने पर चाचा जी ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व एक जर्मनी नौजवान मुनस्यारी आया था उसने दाज्यू बडे़ भाई स्व.शेर सिंह के बारे में पूछताछ की, उसी ने भेजा है।
यहीं से डॉ. पांगती को पिता जी का वह सूत्र पता चला जो शैशवावस्था में वह पिता के जाने के बाद नहीं जान पाये थे कि उनके पिता कैसे जो थे। लिफाफे में ग्रेपा का आलेख कई बार पढ़ने के बाद पांगती जी ने तय कर लिया कि अपने बुजुर्गों की इस याद को वह संजोयेंगे और शोधर्थी ग्रेपा का धन्यवाद किया कि उसने खोज में उनके पिता के बारे में जानकारी पुष्ट की। डॉ.पांगती ने ने अपनी पत्नी जया जी के साथ निश्चय किया किया कि जर्मनी से आकर ग्रेपा ने जिस कार्य को खोजा उसे सार्वजनिक किया जाए, इसके लिये ग्रेपा और ब्रिटिश लाइब्रेरी से स्वीकृति भी ले ली। इस कार्य में डॉ.शेरसिंह पांगती का योगदान भी रहा।
भारत-तिब्बत व्यापार विषय को लेकर पिघलता हिमालय बराबर रोचक जानकारी देता रहा है। सन् 1941 में कज्जाकी लुटेरों द्वारा तिब्बत में जोहार (भारतीय व्यापारियों) का सामान लूटने तथा व्यापारी शेरसिंह पांगती द्वारा उन लुटेरों का पीछा किये जाने की घटना कम रोचक नहीं है। ग्रेपा के शोध में भी यह कहा गया कि 1980-90 के दशक तक इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी तथा कज्जाकी लुटेरों से पीड़ित व्यापारी जीवित थे। जिनकी सहायता से वह सम्पूर्ण घटनाओं से अवगत हो सका। ग्रेपा ने म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) से अपना पंजीकरण करा कर दो-तीन वर्षों तक मुनस्यारी, थल और हल्द्वानी स्थित जोहार के तत्कालीन तिब्बती व्यापारियों से सम्पर्क स्थापित किया। साथ ही धरमशाला (हिमांचल प्रदेश) स्थित म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) और ब्रिटेन के इण्डिया आफिस लाइब्रेरी आदि स्थानों से इन कज्जाकियों के सम्बन्ध् में महत्वपूर्ण अभिलेख उपलब्ध् करने में अथाह परिश्रम किया।
इसी शोध प्रबन्ध् का उल्लेख करते हुए हुए डॉ.पांगती बताते हैं- भारत की आजादी से पूर्व अथवा तिब्बत का चीनी प्रशासन के अधीन आने से पहले भारत और तिब्बत दो देशों के इस सीमावर्ती क्षेत्र में निवास करने वालों के बीच सदियों से जो व्यापारिक सम्बन्ध था, उन सम्बन्धें का विश्वसनीय रूप में परिपालन करते हुए ये व्यापारी अपनी बेशकीमती व्यापारिक वतस्तुएं इन तिब्बती मित्रों के पास अथवा बौद्ध मठों में छोड़ आते थे और यह सामान सुरक्षित रहता था। तिब्बती लोग अपने इन भारतीय मित्रों को धेखा देना महान पाप समझते थे परन्तु मध्य एशिया के जिस खानाबदोस समुदाय ने लूटमार करना अपना व्यवसाय बना लिया हो, उनके लिये तिब्बत जैसे असहाय और शान्तप्रिय देश में लूटमार करना कोई असम्भव कार्य नहीं था। यहीं से लूट मचना आरम्भ हुआ।
अगस्त 1941 में इन कज्जाकी लुटेरों ने तिब्बत के उत्तरी पठारी मैदान च्यांग-थांग से लूट शुरू करते हुए कैलास मानसरोवर के निकटवर्ती क्षेत्र में प्रवेश किया। इनके भय से शौका (भारतीय व्यापारियों) ने भी अपना सामान तिब्बती मित्रों के पास रखकर जान उचित समझा। लेकिन कज्जाकी जुटेरे तो सिर्पफ लूट जानते थे। इन्होंने जोहार के 43 व्यापारियों का लगभग 41 हजार रुपये का सामन लूट लिया, जिसमें राम सिंह रतन सिंह नाम के एक व्यापारिक फर्म का सबसे अधिक 13 हजार रुपये का सामान लूटा गया था। इन कज्जाकियों द्वारा लूटा गया सामान वापस प्राप्त करने के लिये इस फर्म के साहसी व्यापारी शेर सिंह पांगती ने कठिनाईयों का सामना करते हुए पीछा किया। बौद्ध धर्म के अनुयायी तिब्बती लोगों को सता रहे कज्जाकियों का आतंक जब अति हो गया था गरतोक के गरपन राज्यपाल ने इनकी रोकथाम व लूटे गये सामान को वापस प्राप्त करने की आशा से काश्मीर सरकार के अध्किारियों से निवेदन किया और स्वयं सेना के साथ पश्चिम की ओर प्रस्थान किया। साथ में जोहार के व्यापारी शेरसिंह पांगती भी थे।
कज्जाकियों ने काश्मीरी सेना की टुकड़ी पर हमला कर दिया परन्तु उन्हें पीछा हटना पड़ा। इस बीच ब्रिटिश रेजीडेन्ट से काश्मीर सरकार को पत्र प्राप्त हुआ कि भारत सरकार कज्जाकियों की गतिविधियों की पूर्ण जानकारी के बिना तिब्बत की सीमा के अन्दर अपनी सैनिक टुकड़ी भेजने की अनुमति नहीं देना चाहती है। इसके लिये शीत के दिनों में लद्दाख में वार्ता की जा सकती है। अक्टूबर में चार जोहारी व्यापारी चुसूल पहंुचं। शिविर में 40 सिपाहियों ने दमचौक के लिये प्रस्थान किया। चमचौक पहुंचकर उन्हें वहाँ की टुकड़ी को मजबूत करना था।
कज्जाकियों की ये कहानी बहुत लम्बी और रोचक है (फिर कभी)। फिलहाल पांगती जी की यादों को सलाम करते हुए बताते हैं- कज्जाकियों द्वारा लूट कर ले जाये गये सामान को प्राप्त करने के लिये शेर सिंह पांगती की भाँति गरतोक का गरपन भी तिब्बत सेना के साथ दमचौक तक गया था परन्तु कज्जाकियों के आत्मसमर्पण करने के पश्चात भी जब उन्हें कुछ भी प्राप्त न हो सकता तो मन मारकर वापस लौटते समय गरपन ने कज्जाकियों द्वारा छोड़े गये 600-700 भेड़-बकरियाँ एक आना 12 आने की दर से जोहार के व्यापारी मेघ सिंह, मानी सिंह को बेची, जो जोहार पहँुचने तक 400 ही रह गई थी। शेर सिंह पांगती ने पं.गोविन्द बल्लभ पन्त सहित तमाम बड़े नेताओं से मिलकर लूटे सामान को वापस लाने का यत्न किया लेकिन असेम्बली के 16 फरवरी 1962 की वार्ता में भाग लेते हुए गोविन्द वी देशमुख के प्रश्न के आधार पर जिन व्यक्तियों के सामान की क्षति हुई, उसके भुगतान के लिये सरकार निश्चय कर चुकी थी। परन्तु औलफ कारो ने घोषणा की कि कज्जाकियों ने जिन व्यक्तियों का सामान भारत से बाहर चुराया है, उन्हें किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति नहीं दी जा सकती है। सीध सा अर्थ था कि तिब्बत यानी देश से बाहर लूट के लिये तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार ने किसी प्रकार अपना उत्तरदायित्व नहीं समझा। सवाल आज भी बना हुआ है जिसे एक जोहारी व्यापारी ने लड़ा था।


