जोहार महोत्सव : समय बदलने की आहट है

डाॅ.पंकज उप्रेती
जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी हल्द्वानी द्वारा इस बार भी दो दिवसीय जोहार महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। महोत्सवों की बाढ़ में इस आयोजन की जो विशेषता दिखाई देती है वह एक घाटी की संस्कृति तो है ही लेकिन प्रतिस्पद्र्धा और द्वन्द के बीच यह साफ हो चुका है कि ‘समय बदलने की आहट है’।
हल्द्वानी की बसासत के साथ किस प्रकार से भोटिया पड़ाव बसा वह लम्बी कहानी है। (पिघलता हिमालय के सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे से’ विस्तार से दिया गया है।) तब तिकोनिया पर से घोड़े-बकरियों के झुण्ड लम्बी कतार में लग जाया करते थे। डीएफओ हीरासिंह पांगती साहब सहित दो-तीन परिवार सबसे पुराने परिवार यहाँ बसे। दोनहरिया में लक्ष्मण निवास भी मिलने जुलने वालों का केन्द्र बना। पुष्कर सिंह जंगपांगी जी का आवास ‘प्रताप भवन’ बनते समय नहर के पास बहुत संघर्ष की कहानी है। ‘शंकर निवास’ पुरानी यादों का परिवार है। खैर पहाड़ में कुछ परिवारों का जम-जमाव हो गया। पड़ाव के बीचोंबीच पांगती परिवार का ‘मिलम निवास’ भी बुद्धिजीवियों का अखाड़ा बन गया। उस दौर में हल्द्वानी के होल्यार बंजारा होली के रूप में दोनहरिया शिवमन्दिर तक जाया करते थे।
समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है परन्तु भोटिया पड़ाव में जाते ही अलग प्रकार की अनुभूति होती थी। हाँ, यहाँ मोहल्ले में आबादी घनी होने लगी थी और जोहार-मुनस्यार से आने वाले व्यापारियों का अड्डा दीवान सिंह जी का ‘सीमान्त ट्रान्सपोर्ट’ हो चुका था। मुख्य बाजार में ओके होटल के पास इस ट्रान्सपोर्ट कम्पनी की धक थी। 1968 में कालाढूंगी रोड स्थित हमारा छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ जन मिलन का बड़ा केन्द्र बन चुका था, जहाँ पहाड़ के हर कौने से आने-जाने वाले मिलते थे। बाद में यहीं पर बाजपुर बस अड्डा बन गया और तराई क्षेत्रा के लोगों का मिलन केन्द्र भी हुआ। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ शुरु होते ही शक्ति प्रेस व्यापारियों के मिलन का केन्द्र भी बना। संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने रिंगाल के कारोबार के लिये यूपी के व्यापारियों से सम्पर्क बनाए थे। ‘रहमत अली शेख फारुखी’ नाम मुझे आज भी याद है। कई व्यापारी रिंगाल के लिये आते और हिन्दू धर्मशाला इत्यादि स्थानों में रुकते थे। व्यापारियों की अपनी इशारों की भाषा थी जिसे वह हाथ मिलाते हुए रुमाल से ढक कर एक-दूसरे के सौदा कर लेते।
हल्द्वानी का पर्वतीय उत्थान मंच का कार्यालय भी पिघलता हिमालय शक्ति प्रेस ही बना। रामलीला मैदान से शुरुआती शोभा यात्रा निकाली गई थी। बाद में हीरानगर में इसे स्थापित किया गया लेकिन जब तक भवन नहीं बन गया, उत्थान मंच की सारी गतिविधियों का केन्द्र शक्ति प्रेस ही रहा। मुझे भली भांति याद है हल्द्वानी में उत्तरायणी जुलूस को मेले का स्वरूप देने के लिये प्रथम बार स्टाल लगाने का विचार आया तो पिता जी ने सबसे पहले मिलम के जड़ी-बूटी विशेषज्ञ उत्तम सिंह सयाना और दुम्मर से उनी कपड़ों के लिये जंगपांगी जी को बुलाया। मात्र दो-चार स्टाल लगे थे। अगले साल भी ऐसा ही हुआ। बाद में यह मेला स्टालों की भरमार का बना। समाज में बढ़ती उच्छंृखलताओं को देख पिता जी ने उत्थान मंच को हमेशा के लिये छोड़ दिया। जिस मंच के लिये वह दिन-रात समर्पित थे, उन्होंने क्यों छोड़ा होगा, यह आज आज समझ में आने लगा है……….
पिता जी लेखन में जुटे रहते। तब उन्हें ‘राजजात के बहाने’ कृति के लिये राहुली सांकृत्यायन पुरस्कार से सम्मान मिला था। लगातार धारदार लेखन वह करते रहे। हीरसिंह राणा, गोपालबाबू गोस्वामी मिलने प्रेस में ही आ जाया करते थे। मेले की भीड़ क्या होती है, इस प्रश्न को पिता जी बहुत रोचक तरीके से हमें समझा देते थे। साथ ही पहाड़ के तमाम कौतिकों का उदाहरण देते, जो स्वयंस्पफूर्त होते हैं। पिछले एक दशक में तो हल्द्वानी सहित आसपास उत्तरायणी महोत्सव नाम के ही ढेर लग चुके हैं। तमाम मंच जगह-जगह सजने लगे हैं। इसके अलावा फैलते जा रहे हल्द्वानी में कई प्रकार के जलसे-जुलूसों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कई प्रकार की संस्कृतियों का गुलदस्ता यह भाबर है लेकिन हर कोई चाहेगा कि वह अपनी जड़ों को पल्लवित करे और अपने संस्कार अगली पीढ़ी तक पहँुचाए। ऐसी ही कोशिश जोहार समाज में भी हुई। शुरुआत में अपने स्थानीय तीज-त्यौहारों साथ जो शुरुआत हुई थी वह होली पूजा के रूप में बेहतर शुरुआत बन गई। माघ की खिचड़ी का आयोजन भी ध्यैनियों के सम्मान में मिलने-जुलने का बड़ा आयोजन बनने लगा। जोहार मिलन केन्द्र आपस में मेल-जोल का शानदार केन्द्र स्थापित हो गया, जिसमें हर आयुवर्ग के लोग आते हैं। ऐसे में उर्जावान युवाओं ने विचार किया कि क्यों न आधुनिक समय को देखते हुए किसी ऐसे आयोजन को अंजाम दिया जाए जिसकी सपफलता बड़ा परिणाम दे।
जोहार की बात और व्यवहार को लेकर कई संगठन हैं लेकिन जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी ने इसे कर दिखाया और ‘जोहार महोत्सव’ के रूप में जो वृक्ष रोपा वह आज हरा है। इसके पहले आयोजन में अनुभव कम था लेकिन उत्साह ज्यादा, जिसका परिणाम यह हुआ कि तमाम जगह से जोहारी बन्धु आयोजन में भागीदार बने। पहले अनुभव के बाद सोसाइटी ने अगले वर्ष इसके स्वरूप में बदलाव किये बगैर आयोजन को तरीके से समेट लिया। इसके बाद आयोजन का स्वरूप लगभग तय हो चुका था और समझ आने लगा था कि हल्द्वानी भाबर मेें किस प्रकार से सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसके स्टालों में जोर दिया गया और व्यावसायिक गतिविधियां द्रुत हुईं। सांस्कृतिक माहौल बनाने के लिये उन कलाकारों को बुलाया जाने लगा। सांगीतिक दृष्टि से आयोजन का यह हिस्सा बहुत असरकारी होता है, इसका प्रभाव दूरगामी होता है। खैर, आयोजकों ने जोहार की प्रतिभाओं को मौका देने के अलावा बाहर से कलाकार आमंत्रित किये।
‘जोहार-महोत्सव-मेला-संस्कृति’ की समग्र पड़ताल के बाद आयोजकों को बधाई दी जानी चाहिये कि वह इस बड़े आयोजन को अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। साथ ही सुझाव भी है कि आयोजन के ‘जोहार’ नाम अनुरूप इसकी हर हरकत उस संस्कृति की ठहस से भरपूर हो। जिस जोहार नगर (भोटिया पड़ाव) के बसने के समय घोर संघर्ष हुए थे तब इसके फैलाव के बारे में विचार भी नहीं आता था। वर्तमान में हल्द्वानी के अलग-अलग स्थानों पर जोहार वासियों की बसासत है। सारे साधन-संसाधन होने के बावजूद अब वह स्थिति है कि अधुना समय में इसकी चमक और ज्यादा हो।
यह सच भी स्वीकार लेना चाहिये कि समय बदलने की आहट इस बार के महोत्सव में दिखाई दी। पुरानी पीढ़ी के बहुत से लोग हमारे बीच नहीं हैं। कुछ समर्पित जन अस्वस्थ्य होने के बावजूद समाज की बेहतरी के लिये जुटे हैं। कई जुझारु जन अपने अनुभवों के साथ इस अभियान को बनाये रखने की कसक लिये हुए दिखाई दिये। देखना होगा समय का चक्र किस दिशा को तय करेगा….

कथाकार शेखर जोशी की रटन अन्त तक रही

श्रद्धासुमन
डाॅ.पंकज उप्रेती
हिन्दी के जाने-माने कथाकार शेखर जोशी का गाजियाबाद के एक अस्पताल में 4 अक्टूबर 2022 को निधन हो गया। स्वास्थ्य कारणों से वह सप्ताह भर इस अस्पताल मेें रहे और सबसे विदा ले ली। लेखन-पढ़न में 90 वर्ष तक ईमानदार कार्य करने वाले जोशी जी सामाजिक मिलनसार थे। उनकी कहानियों का अंग्रेजी, चेक, पोलिश, रूसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कहानी दाज्यू पर बाल-फिल्म सोसाइटी द्वारा फिल्म का निर्माण किया गया है।
उम्र के उत्तराद्र्ध में आँखों की रोशनी कम होने के बावजूद वह लैंस के सहारे पुस्तकें, चिट्ठी-पत्राी पढ़ते थे। 11 सितम्बर को अपने जीवन के 90 साल पूरे करने वाले शेखर जोशी का जन्म अल्मोड़ा जिले के ओलिया गाँव में 10 सितम्बर 1952 को हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुई थी। इण्टरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही सुरक्षा विभाग में जोशी जी का ई.एम.ई. अप्रेन्टिसशिप के लिये चयन हो गया, जहाँ वो सन् 1986 तक सेवा में रहे। तत्पश्चात स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्वतंत्र लेखन करने लगे।
दाज्यू, कोशी का घटवार, बदबू, मेंटल जैसी कहानियों में शेखर जोशी को हिन्दी साहित्य के कथाकारों की अग्रणी श्रेणी में खड़ा कर दिया। उन्होंने नई कहानी को अपने तरीके से प्रभावित किया। पहाड़ के गाँवों की गरीबी, कठिन जीवन संघर्ष, उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध्, उम्मीद और नाउम्मीदी से भरे औद्योगिक मजबूरों के हालात, शहरी-कस्बाई और निम्नवर्ग के सामाजिक-नैतिक संकट, धर्म और जाति में जुड़ी रूढ़ियां- ये सभी उनकी कहानियांे के विषय रहे हैं। शेखर जोशी की प्रमुख रचनाओं में कोशी का घटवार 1958, साथ के लोग 1978, हलवाहा 1981, नौरंगी बीमार है 1990, मेरा पहाड़ 1989, डायरी 1994, बच्चे का सपना 2004, आदमी का डर 2011, एक पेड़ की याद, प्रतिनिधि कहानियां शामिल हैं।
हिन्दी साहित्य को अपनी कालजयी रचनाओं से समृ( करने वाले शेखर जोशी ने चिकित्सा शोध् के लिये अपने शरीर को दान किया था। जिस कारण उनकी पार्थिक देह को ग्रेटर नोएड के शारदा हाॅस्पिटल को दिया गया। शेखर जी के सुपुत्र प्रत्तुल जोशी पिछले महीने ही आकाशवाणी अल्मोड़ा केन्द्र से सेवानिवृत्त हुए है।। छोटे सुपुत्र संजय जोशी फिल्मकार हैं। ‘प्रतिरोध् का सिनेमा’ नाम से उनके अभियान चर्चित हैं।
शेखर जोशी जितना अपने लेखन पढ़न में डूबे थे उतना ही सामाजिकता में रमे रहे। उनका अधिकांश समय पहाड़ से बाहर बीता लेकिन उनके दिल-दिमाग में पहाड़ बसता था। इलाहाबाद में लम्बी यात्रा उनकी रही है। पत्नी के निधन के बाद जब उनसे उनका इलाहाबाद छूटा, वह भी उन्हें बहुत उदास कर चुका था लेकिन समय ने बहुत उलट किया वह लखनउ रहने लगे। अपने मित्रांे-साथियों के साथ बराबर पत्राचार करते, पुस्तकों की समीक्षा लिखते, स्वतंत्रा रूप से लेख लिखते। नव लेखकों को प्रोत्साहित करते और पहाड़ को आवाद करने की बात करते। पिघलता हिमालय परिवार के साथ ही भी उनका यह रिश्ता बना रहा। सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के कहानी संग्रह की भूमिका भी उन्होंने लिखी। इसके अलावा निरन्तर पत्राचार से सम्वाद होता रहता था। उप्रेती जी के निधन के बाद सम्पादक श्रीमती कमला उप्रेती को ढांढस बंधते हुए जोशी जी ने मार्मिक पत्रा लिख भेजा था, जिसमें उन्होंने अपने इलाहाबाद छूट जाने के दर्द को भी लिखा और कामना की कि संकट की इस घड़ी में पिघलता हिमालय को सींचना होगा।
इलाहबाद के समय से ही शेखर जोशी के तमाम संगी-साथी थे और उनका जुड़ाव-लगाव सभी से था लेकिन लखनउ आने के बाद पहाड़ के सभी प्रमुख जनों से उनकी मुलाकात थी। पत्रकार-लेखक नवीन जोशी उनकी लगातार टोह लेते रहते। वरिष्ठ पत्रकार महेश पाण्डे नियमित रूप से भेंटघाट करने के साथ ही उन्हें पहाड़ की सूचनाओं से जोड़े रहते। आज जब शेखर जोशी जी हमारे बीच नहीं हैं, सभी उनके रचना संसार के अलावा उनके व्यक्तित्व को याद कर श्रद्धासुमनअर्पित कर रहे हैं। वह हमेशा अपनी रचनाओं के माध्यम से याद रहेंगे।
वाकेई शेखर जोशी अपनी पीढ़ी के विराट व्यक्तित्व वाले रचनाकार थे, जिनकी रटन लिखने-पढ़ने-समझने की थी। उनकी सच्चाई थी कि वह गुंथते चले जाते, उन्हें सम्मान की चाह नहीं थी। पिघलता हिमालय परिवार स्व. शेखर जोशी को श्रद्धासुमन अर्पित करता है।
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साहित्यकार/कहानीकार शेखर जोशी 2016 में मुनस्यारी भी आये थे। दरअसल वह इस बार अपने ग्रीष्म प्रवास में परिजनों के साथ पहाड़ों की सैर में निकले थे। तब 84 वर्षीय श्री जोशी जी ने पिघलता हिमालय के साथ खूब बातचीज की। उनका जीवन इलाहाबाद पिफर लखनउ में बीता लेकिन उनकी यादों में पहाड़ का बचपन हमेशा रहा है। पिघलता हिमालय से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था- ‘‘गाँव-घरों में ताले लटक जाना दुर्भाग्य है जो हमारी परम्परा की जड़ रहे हैं।’’ उस समय लेखक मंच प्रकाशन से उनकी पुस्तक ‘मेरा ओलिया गाँव’ तैयार हो रही थी। जोशी जी अपनी पुरानी यादों में घिरते हुए कहने लगे- उनका गाँव परम्परा और आध्ुनिकता का मेल था, खेती भी अच्छी होती थी, लोगों के पास समय भी था, लोक संस्कृति- गीत, एंेपण सभी तो था। 12 घरों के इस गाँव में अब केवल 2 घर खुले रहते हैं। यह सब कैसे हुआ, उसी का वृत्तांत पुस्तक में है। कमोवेश यही स्थिति आज हर गाँव की है।