घोरपट्टा में आये थे तिब्बती तब हुई हचल-पहल

मोहनी टोलिया से बातचीज
पि.हि. प्रतिनिधि
अपनी आँखों के सामने परिवार व मित्रों को तिब्बत व्यापार को जाते देखना, माइग्रेशन में इधर से उधर घुमन्तू जीवन बिताना, जोहार के अन्तिम गाँव मिलम से टोला फिर तमाम पड़ाव होते हुए दिगतड़ ;डीडीहाट और अब अपने पुत्रों के साथ हल्द्वानी और दिल्ली तक की लम्बी यात्रा के अनुभवों से भरी 85 वर्षीय मोहनी टोलिया पिघलता हिमालय से खास बातचीज में बताती है कि जब दलाईलामा तिब्बत छोड़ भारत आये तो उनके साथ कई तिब्बती दिगतड़ भी आये जो घोरपट्टा नामक स्थान पर रहे। उन दिनों दिगतड़ में काफी चहल-पहल रही। सरकार ने तिब्बत से आये लोगों के लिये घोरपट्टा में व्यवस्था की। यहां पर इन लोगों ने सड़क का कार्य भी किया। बाद में यह लोग देहरादून, हिमांचल चले गये।
मोहनी देवी मिलम के अमर सिंह सयाना की पुत्री हैं, जिनका विवाह टोला के खुशाल सिंह जी से हुआ। सीमान्त के प्राकृतिक जीवन में रमी श्रीमती मोहनी जी अपने अतीत का स्मरण करते हुए बताती हैं कि अन्तिम गांव मिलम में होने के कारण तिब्बत व्यापार का हाल देखने का सौभाग्य हुआ। तब पुरुष व्यापार के लिये तिब्बत जाते थे और महिलाएं घर में उनी कारोबार और खेती का छुटपुट कार्य करती थीं। खेतों में फांफर, आलू खूब होता था। विवाह के बाद वह अपने ससुराल टोला में थीं लेकिन व्यापार और व्यवहार की दिनचर्या वैसी ही थी। जोहार, टोला, साईपोलू, भैंसकोट बारी-बारी से वह लोग आते-जाते रहते थे। मौसम के अनुसार जोहार से लेकर मुनस्यारी तक वह लोग आते थे। तब गर्मी होते ही जोहार भागने की तैयारी करते थे। लोगों को मुनस्यारी तक की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती थी, अब महानगरों में गर्मी सह रहे हैं। बचपन से लेकर कई सालों तक की जीवन यात्रा का सिलसिलेबार वृत्तांत सुनाती हैं। इनके पुत्र-पुत्रियों में वीरेन्द्र, नवीन, लीला हुए। टोला में बालक वीरेन्द्र की बाल लीलाओं को याद करने के साथ ही वह बताती हैं कि नवीन बचपन से ही गीत-संगीत का शौकीन था। बच्चों का स्कूल दूर होने के कारण वह उनका परिवार दिगतड़ आ गया। तब लोग अपने जानवरों को लेकर दूर-दूर तक यात्राएं करते थे। दिगड़त में बड़ा सा मैदान था, जोहार से तीन परिवार शुरुआत में बसने के लिहाज से आये। हाट लगने के कारण दिगतड़ का नाम ही डीडीहाट हो गया। यहां बच्चों की पढ़ाई की सुविधा थी। पुराने परिवार में धनसिंह पांगती, कृष्ण सिंह टोलिया हुए। तब नन्दा मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर भी बनाया ताकि अपने ईष्ट को याद करने का स्थल नियत हो जाए।
आज के डीडीहाट पर चर्चा करते हुए वह कहती हैं कि बहुत बदल गया है। जिस जगह एक मैदान मात्र था, आज बाजार हो गया है और गांव से बड़ी संख्या में लोग बस चुके हैं। जब तिब्बती दिगतड़ आये थे वह मैदान में होने वाले कार्यक्रमों में अपने सांस्कृतिक प्रोग्राम दिखाने आया करते थे। स्कूल में विद्वान गुरुजन बुलाए जाते थे। शौका मास्टर भी थे जिनमें बहादुर सिंह लस्पाल भी हुए। इसके अलावा तिब्बती मास्टर भी रखे गये जो अपनी भाषा में सिखाते थे।
श्रीमती मोहनी टोलिया पि0हि0 के वरिष्ठ सदस्य रहे स्व.उमेदसिंह मर्तोलिया का स्मरण करते हुए बताती हैं कि जिस समय दलाईलामा के साथ तिब्बती दिगतड़ आये थे दरोगा साहब मर्तोलिया जी की तैनाती भी यहीं थी। उनके साथ पुत्र सुरेन्द्र भी था। वह लोग यहां रहे। समय की सीमा में बहुत कुछ बदल जाता है। आज श्रीमती टोलिया जीवन का उत्तरार्द अपने योग्य पुत्रों के साथ बिता रही हैं। वह जोहार मौसम से लेकर दिल्ली के मौसम और रहन-सहन पर खुलकर बोलती हैं। उनके मन में हमेशा जोहार बसता है और वह युवा पीढ़ी से चाहती हैं कि वह अपने संस्कृति से जुड़े रहें।

कला-संगीत प्रेमियों के लिये उत्साह जगाने और जनमानस को झकझोरने वाला आयोजन

पि.हि. कला-संगीत समीक्षक
हल्द्वानी शहर में ‘आवाहन’ नाम से लोक उत्सव का वृहद आयोजन कला-संगीत प्रेमियों के लिये उत्साह जगाने वाला और जनमानस को झकझोरने वाला था। व्यापारिक मण्डी के अलावा तमाम तरह के अड्डों में बदलते जा रहे हल्द्वानी भाबर में इस प्रकार के आयोजन के सूत्रधार मनोज चन्दोला की जितनी प्रसंशा की जाए कम है। क्योंकि महोत्सव की बाढ़ में फंसे उत्तराखण्ड में इस प्रकार के आयोजन मुश्किल से हो हो पा रहे हैं। आयोजन को लेकर चिन्तन करने वालों में चारु तिवारी का योगदान सबसे आगे है। चन्दोला जी और तिवारी जी की जुगलबन्दी ने इस आयोजन को मूर्त रूप दिया और कई विचारधाराओं के लोगों को एकसाथ करने का काम किया। गीत-संगीत के अलावा संगीत-साहित्य के मर्मज्ञों को मंच देकर प्रोत्साहित किया।
अभिव्यक्ति कार्यशाला की ओर से देवभूमि उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक विरासत एवं लोक विधओं को सहेजने के लिये तीन दिवसीय आयोजन में दिन में सेमिनार और रात्रि में कार्यक्रम का हिस्सा था। कार्यक्रम का शुभारम्भ सांसद अजय भट्ट ने रैली को हरी झण्डी दिखाकर किया। शहर के तमाम विद्यालयों के बच्चों ने सुन्दर प्रस्तुतियों के साथ इसमें भाग लिया। मय झांकी के बच्चों ने रंग बिरंगे परिधनों में अपनी अभिव्यक्ति की। शेष तो वही होना था जो उन्हें उनके विद्यालय में तैयार करवाया गया था। सनातन धर्म संस्कृत महाविद्यालय, सिंथिया स्कूल, ललित आर्य महिला इण्टर कालेज, बीयरशिवा, रा.मा.विद्यालय नया गांव लछमपुर, द्रोण पब्लिक स्कूल, गांध्ीनगर राजकीय मा.विद्यालय, एमबी इण्टर कालेज, लक्ष्मी शिशु मन्दिर, खालसा इण्टर कालेज, रा.पूर्व.मा.विद्यालय कालाढूंगी रोड, टिक्कू माडर्न, रा.इण्टर कालेज बनभूलपुरा, महात्मा गांध्ी इण्टर कालेज के विद्यार्थी रैली में शामिल थे। आयोजन स्थल पर स्वयं सहायता समूहों की ओर से स्टाल भी लगाए गये थे। कार्यक्रम में रेशमा शाह ने जौनसारी, प्रहलाद मेहरा ने कुमाउनी गीत प्रस्तुत किये।
सेमिनार में उत्तराखण्ड की वर्तमान सांस्कृतिक परिस्थितियों पर बोलते हुए अनिल कार्की ने कहा कि इसे अपने से शुरु करना होगा, तब दूसरों से कहने के हकदार हैं। प्राध्यापक डाॅ.प्रभा पन्त ने कहा कि संस्कृति और पलायन बाधा नहीं है। जितना पलायन होगा उतना विस्तार होगा। कवि और साहित्यकार जुगल किशोर पेटशाली ने कहा कि भगनौल, बैर गीत हमसे दूर होते जा रहे हैं, जो चिन्ता की बात है। पत्रकार और चिन्तक ओ.पी.पाण्डे ने कहा कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन संस्कृति के आधर पर हुआ था लेकिन सरकार ने आज तक संस्कृति को बचाने का रोड मैप तक तैयार नहीं किया है। लोेक गायक हीरा सिंह राणा ने ‘मुख में लागी ताई’ व्यंग गीत से कालाकारों की पीड़ा को व्यक्त किया।
दूसरे दिन के आयोजन में दिल्ली के भगवत मनराल ग्रुप का कार्यक्रम था। युगमंच की ओर से गोपुली बुब का एकाकी मंचन हुआ। नन्दलाल भारती टीम ने जौनसारी संस्कृति प्रदर्शित की। इसके अलावा फृयूजन के नाम पर शहर में हो रहे कनफ्रयूज करने वाले कार्यक्रम हुए। कार्यक्रम के अतिथि मेयर डाॅ.जोगेन्द्र रौतेला थे। इस दिन के सेमिनार में सिने कर्मी हेमन्त पाण्डे ने कहा कि लोक संस्कृति सरकार नहीं, संस्कार से बचेगी। संगीतज्ञ डाॅ.पंकज उप्रेती ने महोत्सवों के नाम पर हो रहे छलावे पर चिन्ता व्यक्त की। नन्दलाल भारती ने कहा कि आर्थिक उदारीकरण होने के बाद अपसंस्कृति का प्रचार-प्रसार बढ़ा है। डाॅ.माध्ुरी बड़थ्वाल ने कई शानदार उदाहरण देकर अपने लोग गीतों को बचाने का आहवान किया।
समारोह के तीसरे यानी अन्तिम दिन भगवत मनराल व साथियों के अलावा अमित गोस्वामी, दीपा नगरकोटी, मनोज चड्ढा, रोहन भारद्वाज, करिश्मा, खुशी जोशी ने प्रस्तुति दी। आयोजन के तीनों दिनों में शहर की स्थानीय संस्थाओं ने प्रस्तुतियां दीं। जिसमें शास्त्राीय संगीत को लेकर फृयूजन कहा गया लेकिन संगीत की दृष्टि से वह खरा नहीं कहा जा सकता है। दरअसल अपने प्रचार के लिये व बहलावे के लिये इस प्रकार के प्रयोग किये जाने लगे हैं जिसमें गायन, वादन, नृत्य के धमाल को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। चूंकि सीखने वाले बच्चे वही करने लगते हैं जो उन्हें बताया गया है सो वह एक शो के रूप में भीड़ के आगे परोस दिया जाता है। ऐसे में न शास्त्रीयता होती है और न लोक का नृत्यगीत। तीसरे दिन के सेमिनार में उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना और यथार्थ विषय पर वक्ताओं ने विचार रखते हुए संघर्षश्ीाल ताकतों को आगे आने को ललकारा। कवि बल्लीसिंह चीमा ने कविता के माध्यम से अपना दर्द कहा- ‘मैं किसान हँू, मेरा हाल क्या, मैं तो आसमां की दया से हँू।’’ उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष पी.सी. तिवारी कहा कि राज्य गठन के बाद कांग्रेस और भाजपा के हाथ में प्रदेश की सत्ता आने से राज्य गठन की परिकल्पना ध्वस्त हो गई। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक रूप से राज्य पिछड़ गया। उत्तराखण्ड पत्रकारिता विभाग के प्रो.भूपेन सिंह ने कहा कि सरकारों ने पर्वतीय राज्य की अवधरणा को पूरी तरह मटियामेट कर दिया है। नया भ्रष्ट राजनीतिक वर्ग उभर रहा है। सत्ता में बदल-बदल कर आ रहे इन चेहरों ने समाज को भी भ्रष्ट बना दिया है। एंकर आरजे काव्या ने कहा कि हमारी संस्कृति के संरक्षण के लिये हमें स्वयं ही पहल करनी होगी। पत्रकार रूपेश ने कहा कि 10 साल के राज्य में मूल्यांकन का समय है। आयोजन के दौरान डाॅ.प्रयाग जोशी, नवीन वर्मा, मोहन बोरा, हेमन्त बोरा, अमिशा पाण्डे, नवीन पाण्डे, योगेश पन्त, विजय बिष्ट, टीसी उप्रेती, दीपक बल्यूटिया, प्रवीन रौतेला, भावना पन्त, प्रकाश भट्ट, लता कुंजवाल, कमल मठपाल, जीत राम, ललित पन्त, बबीता उप्रेती उपस्थित थे।

कुमाउँ विश्वविद्यालय को याद नहीं आ रहे हैं संस्थापक कुलपति

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
कुमाउँ विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति, भौतिक विज्ञानी प्रो.डी.डी.पन्त का जन्म शताब्दी समारोह उनके चाहने वाले, उनके साथी, उनके शिष्य ध्ूमधम से मना रहे हैं लेकिन विश्वविद्यालय पन्त जी को भूल ही गया। इसके अलावा किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि वह पहाड़ के इस विवि प्रशासन से कह सके कि आयोजन के लिये आगे आओ। महान भौतिक विज्ञानी, कुविवि के कुलपति, उक्रांद के संस्थापक, समाज विज्ञानी प्रो. पन्त की याद में विवि में कुछ होना ही चाहिये, ऐसी मंशा सभी की है परन्तु अपनी कारगुजारी के लिये बेहद चर्चा में बने हुए इस विवि इस बारे में कुछ सोच भी सकता है ऐसा अभी नहीं लगता। कारण विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.एस.राणा को विश्वविद्यालय से ज्यादा उत्तराखण्ड की चिन्ता हो रही है। उनके कई चर्चित बयान सबकी जुंवा पर हैं। साथ ही विवेकानन्द, रविन्द्रनाथ टौगोर को लेकर वह कुछ नया करने की बात कर रहे हैं। पूर्व प्रधानीमंत्री अटल जी के नाम पर भी एक विभाग का नाम रख दिया गया है। लगता है राणा जी बहुत दूर की सोच कर चल रहे हैं शायद तभी उनके बयान भी आते-आते जारी हो गये थे। स्व.डी.डी.पन्त जो पहाड़ के बारे में सोचते थे, विज्ञान के बारे में सोचते थे, समाज के बारे में सोचते थे, उनपर सोचने के लिये अब विवि के पास अवसर ही नहीं है। ऐसे समय में जबकि प्रो.पन्त की जन्म शताब्दी समारोह पर दांये बांये कई गतिविधियां हुई, विवि मौन रहा।
उल्लेखनीय है कि प्रो.पन्त के शताब्दी समारोह को भव्य बनाने को लेकर नैनीताल में बैठक हुई थी और पिछले कुलपित प्रो. डी.के. नोडियाल ने विवि की ओर से इस बारे में सकारात्मक बात दोहराई थी। हालांकि बैठक करवाने वाले नैनीताल के लोग, पन्त जी से जुड़े लोग, उनके शिष्य, उनके चाहने वाले, समाजसेवी थे। समय गतिमान है। प्रो.नोडियाल को कुविवि की लीला जितनी समझ आती उससे पहले उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। दरअसल कुलपति अकादमिक कार्य करने वाले थे और वह प्रशासनिक कार्यों में राजनीति का घोल नहीं बना पा रहे थे। इसके बाद प्रो.राणा को कुलपति बनाकर भेजा गया। आगरा निवासी राणा के आने से पहले ही चर्चा फैल गई कि बहुत पकड़ वाले हैं। अब स्थायी कुलपति के लिये चल कार्यवाही में भी इनकी बात सबसे आगे है। उत्तराखण्ड राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिये यूपी के तीन मैदानी जिलों को इसमें मिलाने का बयान देने वाले प्रो. राणा शायद पता न हो कि प्रो.डी.डी.पन्त वैज्ञानिक होने के साथ ही समाजविज्ञानी थे। समाज की व्यवहारिकता को जानते थे और इसी लिये उन्होंने उत्तराखण्ड क्रान्तिदल में रहना पसन्द किया। राजनीति से दूर पन्त जी पहाड़ के दर्द को जानते थे। इसीलिये तमाम अवसरों के बावजूद वह नैनीताल में ही रहे और अन्त में हल्द्वानी में रहने लगे थे।
कुलपति डाॅ. डी.डी.पन्त के जन्म शताब्दी समारोह को लेकर पहाड़ सहित अन्य संस्थाओं ने शुरुआत की। यहाँ पर सबसे पहले आशुतोष उपाध्याय का उल्लेख करना जरूरी है क्योंकि डी.डी. पन्त को लेकर वह शुरु से ही कुछ करते रहे हैं। उनके सद्प्रयास से डी.डी.पन्त खोजशाला के रूप में गतिविधियां होती रहती हैं। बेरीनाग में इस प्रकार के आयोजन वह करवाते रहे हैं। अन्य स्थानों में भी वैज्ञानिक सोच पैदा करने के लिये वह संस्था के रूप में संलग्न हैं। आशुतोश उपाध्याय की सोच पहले से इस ओर थी कि प्रो.पन्त जैसे महान व्यक्ति को भुलाया जाना गलत होगा, कुछ होना चाहिये। इस बीच शताब्दी समारोह आयोजन को लेकर जो श्रृंखला शुरु हुई उसमें बेरीनाग, काण्डा, हल्द्वानी, पिथौरागढ़ में लोग जुटे। संस्था चाहे कोई हो, पन्त को समझने वाले लोगों का जुटना बड़ी उपलब्धि कहा जायेगा। इसी क्रम में हल्द्वानी में हुए आयोजन में वक्ताओं ने कहा कि डाॅ. पन्त जैसे व्यक्तित्व कभी कभार ही पैदा होते हैं। उन्होंने कुमाउँ विश्वविद्यालय को जिस तरह से अकादमिक उँचाईयों पर पहँुचाया, वह आज भी एक उपलब्धिहै। डाॅ.पन्त को अपने देश व समाज से बहुत ही प्यार था, इसी कारण से उन्होंने अमेरिका में अपना भविष्य तलाशने की बजाय भारत में ही रहना पसन्द किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महापौर डाॅ. जोगेन्द्र पाल सिंह रौतेला ने कहा कि डाॅ. पन्त हमारी विशिष्ट पहचान थे। उनका कुमाउँ विश्वविद्यालय से जुड़ा रहना हमारे लिए गौरव की बात रही है। उन्होंने अपने निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों को उच्चकोटि के शोध् कार्य करवाए। वरिष्ठ पत्रकार राजीवलोचन साह ने कहा कि उत्तराखण्ड के विकास को लेकर उनकी अपनी अलग सोच थी, इसी छटपटाहट में वह यूकेडी से भी जुड़े जबकि वह राजनीति से वास्ता नहीं रखते थे। पन्त के मायने आज भी समझने की जरूरत है। प्रो. शेखर पाठक ने उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डाॅ.पन्त नैनीताल के डीएसबी कालेज में भौतिक विषय के संस्थापक रहे। उन्होंने प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो.सी.वी.रमन के निर्देशन में भौतिकी में अपना शोध् पूरा किया। प्रो.रमन ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें भविष्य का वैज्ञानिक घोषित किया था। बाद में अपनी प्रतिभा के कारण ही उन्हें एक फेलोशिप के लिये अमेरिका जाने का अवसर मिला। वहाँ शोध् करने के दौरान उन्हें अमेरिका के अनेक उच्च कोटि के संस्थानों ने अपने यहाँ नौकरी करने का अनुरोध् किया। पर डाॅ.पन्त ने अमेरिका में अच्छी सुविधओं वाली नौकरी करने के बजाय अपने देश और अपनी मातृभूमि उत्तराखण्ड लौटना स्वीकार किया। अपने इसी प्रण के कारण उन्होंने कुमाउँफ विवि के सहारे यहाँ की उच्चशिक्षा को एक नया आयाम दिया।
प्रो.गिरिजा पाण्डे ने कहा कि डाॅ.पन्त को समझना और जानना अपने पूरे समाज को समझने और जानने की तरह है। उनके शताब्दी समारोह के बहाने हम पूरे पहाड़ को भी पूरी समग्रता के साथ समझ सकते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो.कविता पाण्डे ने कहा कि भौतिक विज्ञान के क्षेत्रा में उनके द्वारा किये गये शोध् कार्यों को हमेशा याद रखा जायेगा। प्रो. बीएस बिष्ट पूर्व कुलपति, प्रो. केसी जोशी पूर्व कुलपति, प्रो. एचबी त्रिपाठी, प्रो.प्रीति गंगोला जोशी, डाॅ.आई.डी. पाण्डे, ध्नेश पाण्डे, हृदयेश मिश्रा, प्रो.प्रभात उप्रेती, उमेश तिवारी विश्वास, ओपी पाण्डे ने डाॅ.पन्त की स्मृतियों को श्रोताओं के सम्मुख रखा। जन्म शताब्दी समारोह में हरीश पन्त, जगमोहन रौतेला, ओ.पी.पाण्डे, दिवाकर भट्ट, बबीता उप्रेती, प्रदीप लोहनी, मयंक जोशी, सहर्ष पाण्डे, अनिल कार्की, पंकज उप्रेती, विनोद जीना, रेखा जोशी, सतीश जोशी, पंकज पाण्डे, सुनील पन्त, कर्नल आलोक पाण्डे, पूरन बिष्ट सहित तमाम लोग थे।