सेठ जगत सिंह की सेठियत

औपनिवेशिक शासन से आंखिर भारत ने 15 अगस्त 1947 को निजात पा ही लिया था,किन्तु आजादी के पंद्रह वर्ष बीत जाने पर भारत पर चीन के आक्रमण तथा तिब्बत पर अधिपत्य जमा लेने के बाद सीमा प्रांत क्षेत्र के निवासियों का सदीयों का व्यापार झटके में समाप्त हो गया,उसी में जोहार घाटी में निवास करने वाले शौका जनजाति समुदाय का भी जीवन गति थम सी गई, जिसके कारण कयी गर्खा (जाति )समुदाय के लोगों का जीवन भी प्रभावित हो चला था.
शौका जनजातियों के घुमक्कड़ी जीवन में स्थिरता आ गई ,जो मौसम के अनुसार अपना प्रवास बदलते रहते थे. अब एक ही स्थान पर रहने के लिए मजबूर हो गए. अफ़रा-तफ़री की स्थिति बन गई, जिनके व्यापार,व्यवसाय का संबंध हिमालय के वार-पार जन-जीवन से था, जीवन ठहर सी गई,अब लोग स्वयं अपनी तरह जीवन जीने को मजबूर थे.
जोहारियों के गांवों में भी लोगों की स्थिति दयनीय ही थी. जमीन बंदोबस्त में ‘जिसका जोत उसी का खेत’ के तहत जीमदारों( जिन्हे खेतीबाड़ी का जिम्मा था)के पास चला गया था.बस अब ऊनी कारोबार, पशुपालन, मेहनत मजदूरी से लोग जीवन व्यतीत कर रहे थे.देश को गुलामी से बाहर आए कम ही समय हुआ था,देश में ग़रीबी, बेरोजगारी,कष्टमय जीवन जीने को लोग मजबूर थे, वही स्थिति शौकाओं के गांवों की भी थी.
शौका बहुल गांव में सेठ,सौकार (धनवान) व्यक्ति जिन्हें विरासत में धन-दौलत प्राप्त था इने-गिने ही थे.उन्ही के पास छोटा-मोटा व्यापार, आर्थिक सम्पन्नता, प्रतिष्ठा भी थी, अन्य लोगों का जीवन अति कष्टमय, सुबह शाम का गुजारा करना भी मुश्किल था, परिवार भरा -भरा, शिक्षा का प्रचार प्रसार भी न थी.
सेठ जगत सिंह गांव का धनी, प्रतिष्ठित व्यक्ति था.जिनकी दो पत्नी,एक पुत्री तथा परिवार में धर्म भाई नैन सिंह भी रहता था. सेठ जी आदर्श चरित्रवान, मृदुभाषी, परोपकारी, संवेदनशील, सामाजिक, धार्मिक प्रवृत्ति के इंसान थे ; उन्हें चिंता थी तो केवल अपने उत्तराधिकारी पुत्र प्राप्ति की जिनके लिए, पुजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, सभी टोना-टुटका समय -समय करते रहते थे, किंतु व्यक्ति जो सोचता, होता नहीं.वही सेठ जी के साथ भी हुआ. जीवन के अंतिम समय मानसिक संतुलन भी खो बैठे, तथा जो मृत्यु का कारण भी बना था.
सौकार (धनवान ) जगत सिंह की सेठियत- “गांव के विशिष्ट व्यक्ति, धन-दौलत की चमक -दमक, गांव का एक मात्र व्यापारी, बासमती चावल की महक पास-परोस तक आना, औरतों के पहने आभूषणों का आकर्षण, गरीबों के हितेषी, पूजा -पाठ,ज्ञान -ध्यान,गीता ग्रंथ का नियमित अध्ययन,सरल व्यक्तित्व, धार्मिक प्रवृत्ति, सामाजिक व्यक्ति व बच्चों से प्रेम भाव आदि सेठ जी की ‘सेठियत’ ही थी.”
सन् 1960-70 में गांव के अधिकांश लोगों की माली हालत ठीक नही कहीं जा सकती हैं, जोहारियो के गांव में मुख्यतया -ऊनी कारोबार, पशुपालन, मेहनत मजदूरी, आंशिक कृर्षि करके ही जीवन यापन करते थे, गांव में खेती-बाड़ी सिर्फ दो ही जिमदार (सामान्य जाति) परिवार के पास ही अधिक थी. थोड़ी बहुत कुछ परिवार ही करते थे.किन्तु उनकी भी स्तिथि ठीक न था.
1967 में में आरक्षण आरक्षण मिलने पर यहां के युवाओं ने पढ़ाई लिखाई के पश्चात सरकारी नौकरी में जाना प्रारंभ किया तभी स्थितियां बदलती गई.
सेठ जगत सिंह जी अपने घर में बने बरामदे में बैठकर कुछ लिखत- पढ़त का काम कर ही रहा था, तभी बड़ी पत्नी सोबली देबी ने आवाज लगाई.
सोबली देबी – ” सेठ जी से- सुनिए ! “अगले महीने जौंलजीबी का मेला आने वाली है, तैयारी करनी पड़ेगी,”
सेठ जी – ‘ठीक है, “हमारे पास सामान कितने है- देख लेना.”
सोबली देबी – ” तीन दन, चार चुटका, छः पंखी,चार कोट के पट्टु,(ऊनी कपड़े) दो,तीन आसानच भी है बहुत है एक, दो और तैयार हो रहा है.’
सेठ जी – सोबली ! “थोड़ा मडुवा का सत्तू व खजिया धान का खाजा (भूना चावल) भी तैयार कर देना, नास्ते में अच्छा रहता है.”
सोबली देबी – ” मडुवा व खजिया धान बक्से में है कल परसों भूनकर तैयार करती हुं, हो जाएगा.”
सेठ जी – सोबली! हमें दो आदमी सामान इधर-उधर करने के लिए भी चाहिए,आज से ही बात करनी पड़ेगी.’
सोबली देबी – ” शेर सिंह व नैन सिंह जी मेरे खयाल से अच्छा रहेगा,आप बताइए.”
सेठ जी – ” तुमने तो मेरी मुंह की बात कह दी, मैं भी यही सोच रहा था.घोडे वाले तो सामान पहुंचाकर आ जायेंगे,उतने दिन वहां रूकना बेकार हुआ, फिर आ जायेंगे.”
सोबली देबी – ” तैयारी शुरू कर देते हैं.” ठीक ही होगा.
जौलजीबी का ऐतिहासिक व्यापारी मेला सदीयों से गोरी-काली के संगम पर लगता है जहां दूर-दूर से क्रेता -बिक्रता आकर अपने सामाग्री का आदान-प्रदान नगद धनराशि या वस्तु विनिमय के माध्यम से करते थे.पशु मेला भी लगता था.जोहारीयो के लिए बहुत महत्वपूर्ण मेला,यहां के व्यापारी अपनी-अपनी दुकानें सजाते थे. जिसकी आज यादें भर रह गई है.
“मेले की तैयारी हमारे गांव के लोग कैसे करते थे ?” हस्तशिल्प -ऊनी वस्त्रों का कारोबार,जोहार के हर परिवार में किया जाता था.मेले में वस्त्रों की बिक्री से नगद धन की लालसा लोगों में रहती थी. कयी माह पूर्व से लोग मेले में अपने सामान बेचने हेतु तैयारी करने लगते थे.गांव में घर-घर में ध्वाच – ध्वाच ( लकड़ी का हत्था तथा उसमें लगे पांच लोहे के पत्ते,पंजा जो:ताना-बाना’ को ठोंकने की आवाज है ),कटम-कटम ( थल्ल- चौड़ा लकड़ी के तख्त से बना यंत्र,’ताना-बाना’ को ठोकने की आवाज), बच्चे से लेकर बुजर्ग तक कुछ-न -कुछ ऊनी कारोबार में संलिप्त दिखाई देते थे, भरा परिवार, मेहनत कश लोग, अभावग्रस्त जिंदगी, जहां सभी मिलजूलकर परिवार का सहयोग में योगदान देते हैं.”
सेठ जगत सिंह का नित्य कार्य सुबह प्रातः काल उठकर दूर निवृत्त होना, स्नान, ज्ञान -ध्यान पूजा पाठ के बाद अपने रोजमर्रा के कार्य में संलग्न हो जाना है, तभी बाहर से आवाज आती है.
धनुली देबी – ” सौरा,सौरा (ससुर जी) मेरा भी दो-तीन पंखी जौलजीबी मेले में बेचने हेतु ले जाने का कष्ट कर दिजिएगा.”
सेठ जी – ” दाम तय कर लेना”
धनुली देबी – “क्या करूं? आप बेच दिजिए.”
सेठ जी – ” दाम तय ठीक रहता है, आपको भी अच्छा लगेगा.”
धनुली देबी – “सौरा बस ! “70,या80 रूपए तक बेच देना , हो गया.”
सेठ जी -, “ठीक है, कोशिश पूरी रहती है, नहीं बिकने पर ही वापस लाना पड़ता है. बहू!”
मेले जानें की तैयारी, छोटी पत्नी से कहती हैं – पानुली,”नास्ता हेतु सत्तू,व खाजा (भूना चावल) बना लिया है क्या?
पानुली देबी- जी, ” सब कुछ तैयार है.”
“शेर सिंह,सेठ जी के घर आकर कब चलना है, बता दिजिएगा.”सेठजी.
सेठ जी – ” शेरू, परसों सभी साथ चलेंगे,नेनू को भी बता देना.” ठीक!
शेर सिंह – ठीक है, “सेठ जी अब मैं घर जाता हूं.”
सेठ जी – अच्छा,” ठीक है.”
सेठ जगत सिंह जी अपने गांव दुम्मर से अपने कांरवा के साथ जौलजीबी मेले के लिए चलते हैं गांव के लोग घोड़े की हिनहिनाहट,खांकर (घंटीयां) की खनखनाहट,पास-परोस के लोगों की शोर शराबा, मेलार्थियों को दूर धार (अदृश्य पहाड़ के पार) तक जाते देखते हैं,प्रथम दिन छोरीबगर तक का लक्ष्य तथा दुसरे दिन मेले में पहूंच जाते हैं, सदियों से अपने पैतृक निर्धारित स्थान पर दुकान सजाते हैं, महिनों दिनों बिताने के पश्चात ही वापसी होती है, सामान बेचने के पश्चात कुछ आवश्यकता अनुसार खरीददारी-गुड,घी, कपड़े, जूता-चप्पल आदि घोड़े में रखकर घर पहुंचते हैं,
गांव के मेहनतकश लोगो को सेठ जी के वापिस का इंतजार भी रहता है.उन्हे अपने सामान बिकने से नगद धन की प्राप्ति की चाह,आंनदानूभूति की हिलोरे दिल में उठने का आभास होता है, दूर धार से ही घोड़ों की गले में बधी घंटीयों की खनखनाहट आवाज का आभास होता है, बच्चे एकदम सचेत हो जाते, तथा नजदीक पास आते देख सेठ जी के घर पर इकट्ठा हो जाते हैं ,आशा जरूर एक टुकड़ा बाल मिठाई प्राप्त हो ही जायेगी.”
दुसरे, तीसरे दिन से सेठ जी के बुलावे से लोग घर पर पहुंचते रहते हैं. कुछ के चहरे खिले हैं, तो कुछ उदास भी दिखते है. जिनका सामन बिक न सका था. सेठ जी अगले थल,या बागेश्वर में बेचने का आश्वासन देते हैं.”
अब सेठ जी फ़ुरसत के कुछ क्षण प्राप्त हुए हैं आराम तथा भगवान भक्ति में लगा देना चाहते हैं, बहुत दिनों से ” गीता ” का अध्ययन भी नहीं किया गया है. तभ बाहर से एक आवाज आती है
पोस्टमैन- सेठ जी..सैठ जी,नमस्ते ! आपका पत्र आया है.’
सेठ जी- नमस्ते. ” बैठो,चाय पी लिजिए.”
पोस्टमैन – ” ठीक है, चाचाजी.” यह लिजिए पत्र.
सेठ जी पत्र को लेकर बाहरी पता देखकर समझ जाते है कि मर्तोली के स्वामी जी का पत्र प्राप्त हुआ है.”
सोबली- ” पत्र कहा से आया है?”
सेठ जी – स्वामी जी का पत्र, है लिखा है. “लिखा है,मित्र जगत,अबके जब जोहार जाएंगे,तो आपके घर पहुंचकर साथ चलेंगे.” कैसा रहेगा? “
सोबली- ” बहुत अच्छी बात, स्वामी जी के साथ जाकर कयी बरस से छोडे चुके घर की देख रेख भी हो जाएगी.”
समय बितने के माह मई में ‘स्वामी जी’ का संदेश पत्र सेठ जी को मिलता है- मित्र ! “जगत परसों आपके घर पहुंच रहे हैं.” जोहार साथ -साथ चलेंगे.
सेठ जी – “स्वामी जी को देखते,आइए.. आइए, निकट जाकर प्रणाम किया, उनके संग साथ में शिष्या राधा बहन का भी सत्कार करते है. ‘सेठ जगत सिंह जी स्वामी जी के परम मित्र में से एक है.’
स्वामी जी – ” मित्र ठीक-ठाक, परिवार सहित कुशल मंगल से हो.”
सेठ जी – “स्वामी जी, आपकी कृपा से सब ठीक-ठाक ही है.” जी, आप पहले हाथ -मुंह धो लिजिए. चाय बनने तक.
“स्वामी जी तथा राधा बहन ने हाथ-मुंह धोकर , चाय-पानी ग्रहण किया. स्वामी जी ने थोड़ी देर आराम करने के पश्चात सेठ जी से गपशप करते हैं, तभी सेठ जी को कुछ पिछला खयाल आता है, तो वह स्वामी जी से कुछ मन की बात पुछने का अनुरोध करते हैं.”
स्वामी जी – मित्र! बेझिझक कहिए, क्या कहना है?”
सेठ जी – स्वामी जी, ” सोच रहा हूं, इस बार श्री पुर्ब्याल देवता के मंदिर में भागवत कथा का आयोजन रखने को सोच रहा हू,आप सुझाव देने का कष्ट करें.” कैसा रहेगा?”
स्वामी जी – वाह मित्र ! आपके नेक कार्य करने बिचार , बहुत अच्छा है, बस ! मुझे कुछ दिन पहले बता दिजिएना अवश्य आ जाऊंगा.’
सेठ जी का जोहार से वापसी के बाद गर्मी के मौसम का आगमन होने पर अपने कुल पुरोहित स्व० बच्ची राम जोशी को भागवत कथा शुभमुहूर्त दिन बार निकालने के लिए सलाह मशविरा किया गया. आज भी मंदिर के आंगन में निर्मित होम अग्निकुंड दिखाई देती है,अतीत की “सेठ जी के सेठियत” की कहानी को बयां करती है.
भागवत कथा प्रारम्भ कू पश्चात दूर -दूर से लोग श्री पुर्ब्याल देवता के मंदिर मंदिर में भक्ति भावना से पहुंचते गये, श्रृद्धा भक्ति अर्पित कर प्रफुल्लित मन से घर वापसी भी करते हैं.
सेठ जगत सिंह जी की सेठियत की कहानी को संक्षिप्तता में वर्णित करते हैं-उच्च चरित्रवान, समाजोपयोगी व्यक्ति,सरल व्यक्तित्व लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत थे .सेठ जी की नेक नियत, जीवन कहानी को स्मरण करते हृदयतल से कोटिश: नमन करते हुए अन्तरात्मा से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं.
✍️ जगदीश सिंह बृजवाल

पिघलता हिमालय से मेरी पहली मुलाकात….

चिट्ठी
चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है….। चार-छः जवाहर नवोदय विद्यालय सुयालबाड़ी, नैनीताल के बच्चे समवेत स्वरों में गाकर सरकार द्वारा आवंटित क्वाटर से बाहर मुझे समाचार पत्रा पिघलता हिमालय देने के लिए खड़े थे। मैंने पूछा कि तुम आज पंकज उदास की गज़ल क्यों गा रहे हो? बच्चों ने कहा कि सर आपको आपकी वतन की चिट्ठी आई है। मैं आश्चर्यचकित था मेरी चिट्ठी!! तब बच्चों ने पिघलता हिमालय दिखाते हुए कि सर आप इसे चिट्ठी ही तो कहते हैं। ये चिट्ठी ही हमें गाँव गोठार, मेले ठेले, बांज बुरांश, सुख-दुःख, तीज त्यौहारों की खबरें/निमंत्राण लेकर आती हैं।
तब मुझे याद आया कि एक दिन मैं अपने वार्डन रूम के बाहर पिघलता हिमालय पढ़ रहा था कि बच्चों ने पूछा कि सर आप कौन सासमाचार-पत्र पढ़ रहे हो तो प्रत्युत्तर मैने चिट्ठी- पाती कहा।और बताया कि यह हिमालय की आवाज है, यह सीमांत लोगों की सांसें है। तब से मेरे स्कूल के बच्चे भी कहने लगे कि सर हम भी चिट्ठी – पाती पढ़ेंगे। मैने बताया यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र है जो सप्ताह में नियमित रूप से पोस्टऑफिस से आता है पहले आप लोग पढ़ लेना फिर मेरे पास भिजवा देना। मुझे भी तो पढ़ना है! तब से बच्चे हर सप्ताह चिट्ठी के इंतजार में रहते हैं। जैसे ही पोस्टमैन विद्यालय में डाक देने पहुंचता है तब विद्यालय के छात्र पिघलता हिमालय के लिए दौड़ लगाते है वैसे भी छात्र जो घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करते हैं वे सब अपने आसपास गांव घरकी आदिल कुशल जानने के लिए बेताब होते हैं।आज के सोशल मीडिया के दौर में भी पिघलता हिमालय अपनी पाती द्वारा लोगों को अपनेपन की भावों से जोड़े रखने के प्रयासों की बच्चे खूब सराहना करते हैं।
वेदांग ढौंढियाल जो कक्षा 11वीं का छात्र है पिघलता हिमालय के बारे में विचार देते हुए बताता कि यह
समाचार पत्र नहीं हमारे संस्कृति की संवाहिका है।
प्रणव कुमार कक्षा 11वीं छात्र को झकरुवा भूली के फ़सक बहुत पसंद है।
कक्षा 9 वीं के छात्र श्रेष्ठ सिंह को हमारे संरक्षक/ बुजुर्ग पर आलेख बहुत पसंद है।
तन्मय ध्यानी कक्षा 10 वीं के छात्र को हमारी संस्कृति विरासत फीचर/प्रसंग बहुत भाता है।
कक्षा 9 वीं के छात्र यशपाल पर्यटन स्थलों की जानकारी से संबंधित लेख पढ़ने के लिए उत्सुक रहता है।
विनय कुमार को हमारे प्राकृतिक संसाधनों की उपेक्षा पर प्रसंग रुचिकर व ज्ञानवर्धक लगता है।
कक्षा 12 के छात्र मोहित सती पिघलता हिमालय की मुहिम हमारी संस्कृति हमारी विरासत संरक्षण के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है।
विद्यालय के छात्र गौरव को ज्वलंत विषयों पर दाज्यु की लेखनी बहुत पसंद है।
इन बच्चों के बाइट्स सुनकर/जानकार मैं सहसा अपने अतीत में खो गया। मैं भी सन् 1987/88 में इन्हीं बच्चों की तरह राजकीय इंटर कॉलेज मुनस्यारी काछात्र था मैं गांव से दूर मुनस्यारी के एक धुएंवाली एक छोटी सी कोठरी किराए पर रहकर पढ़ाई करता था। जिसका मासिक किराया 10 रुपए था । मुनस्यारी बाजार में सबसे कम किराए का यही कमरा था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।मुनस्यारी बाजार मेरे लिए कनॉटप्लेस से कम नहीं था। जिस कमरे में रहता था उसके नीचे होटल था।जिसमें जलेबी, बालूशाही, समोसे अरजी व भुटुवा बनता था।सुबह बांज बुरांश की गीली लकड़ी से चीची आवाज व धुएं से कमरा रहने योग्य नहीं रहता था।पर क्या किया जाए इससे अधिक सुविधा वाले कमरे का किराया देना सामर्थ्य में नहीं था।सोमवार से शनिवार तक स्कूल ,दोस्तों के डेरे में समय व्यतीत होता पर रविवार को अपने कमरे के आसपास बैठा करता। मेरे डेरे के पास देव सिंह पाना जी की चाय की टपरी थीं।दुकानदार रविवार को सुबह की धूप के साथ आनंद लेते थे। मैं भी उन्हीं के आसपास बैठा रहता था एक दिन कुछ दुकानदार पिघलता हिमालय पर छपी खबरों के बारे में चर्चा कर रहे थे।कह रहे थे कि उप्रेती जी ने क्या बढ़िया लिखा है। वे सब पिघलता हिमालय पर छपी वर्ष वा साप्ताहिक खबरों पर विमर्श कर रहे थे।मैं भी पढ़ने के लिए उत्सुक था। पर मैं शर्मीले स्वभाव कारण उनसे जानकारी प्राप्त नहीं कर सका।सभी दुकानदार अपनी अपनी दुकानों में चले जाने के बाद बिंद्रा (शु-मेकर) और मैं हम दोनों बैठे धूप सेक रहे थे। बिंद्रा (शु-मेकर) पढ़ा लिखा था, दुनियादारी देखी थी। मैने पूछा यह पिघलता हिमालय पढ़ने को कहां मिलेगा? तो उसने बताया कि श्री आनंद वल्लभ उप्रेती जी हल्द्वानी वाले और श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया आपस में मिलजुलकर अखबार छपवाते हैं। और कहा यदि तुम श्री दुर्गासिंह जी से बात करो तो वे तुम्हें पढ़ने के लिए दे देंगे ।वे भले और नेक इंसान हैं। उस दौर में अमर-उजाला तीसरेचौथे दिनमुनस्यारी पहुंचता था।उस पर भी कुछ संभ्रांत लोग ही पढ़ पाते थे। साथ ही सोरघाटी प्रिंटिंग प्रेस से छपने वाली पर्वत- पीयूष साप्ताहिक समाचार – पत्र आता था। जिसमें कुछ अभिजात्य वर्ग का ही कब्जा था। जो मुझे बात मेंप ताचला।श्री दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी बहुत सहृदय, विनोदप्रिय, मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। सबसे मिलजुल कर रहते थे। जनप्रिय थे इसलिए लोग उन्हें नेता जी कहते थे। शायद शनिवार का दिन था। कोई सार्वजनिक अवकाश के कारण आज बाजार मेंखास चहल-पहल नहीं थीं। मैने देखा एक सामान्य कद-काठी, पर हिमालय जैसे धीर गंभीर ,घनी मूंछें , गोल चेहर , हरे रंग की पारका जैकेट पहने श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया जी अपनी दुकान के आगे लोहे की एक फोल्डिंग कुर्सी में बैठकर पिघलता हिमालय पढ़ रहे थे। मुझे प्रथम बार दूर से पिघलता हिमालय समाचार पत्र और संस्थापक संपादक के दर्शन हुए। मैने इससे पहले कोई क्षेत्रीय ,सांस्कृतिक मुद्दों पर छपने वाली समाचार पत्र नहीं पढ़ा था। मैने हिम्मत जुटाई और मर्तोलिया जी के पास उनके दुकान में पहुंचा। उन्होंने एक ग्राहक समझकर पूछा क्या चाहिए। मैने कहा समान तो कुछ नहीं चाहिए, पर मैं पिघलता हिमालय पढ़ना चाहता हूं। तो वे मुस्कुराते हुए बोले यह कल ही डाक से मिली है। आज मैं पढ़ लेता हूं कल सुबह दुकान खुलने पर आना। तब लेकर पढ़ लेना। जी कहकर मैं वापस लौट आया। दिन किसी तरह बीत गया, रातभर उत्सुकता में नीद नहीं आई। आज रविवार था, मैं सुबह से ही दुकान खुलने का इंतजार में था। आज कमरे में धुआं अत्यधिक था। इस लिए बाहर एक लकड़ी के बैंच में बैठा उनकी राह देख रहा था। सुबह दोनों भाई दुकान में पहुंच गए थे। तब उनकी दो दुकानें थी। एक किराना दूसरा रेडिमेड जनरल स्टोर था। छोटे भाई मंगल सिंह मर्तोलिया जी ज्यादातर किराना संभालते थे श्री दुर्गासिंह जी दोनों में बैठते थे। दूसरे दिन मैं हिम्मत करके अखबार मांगने गया। अरे! हां……कहते हुए मुस्कुराए, पहले मेरे बारे में जानकारी ली, कौन सी कक्षा मे पढ़ते हो तुम्हारा ना क्या है? कहां के रहने वाले हो? मैने सबकुछ बताया बहुत खुश हुए। और कहने लगे कि एक गांव का लड़का इतना पढ़ने के लिए लालायित है। मैं अखबार लेकर अपने कमरें में चला गया। होटल से धुआं कम हो गया था। मैने अच्छी तरह देखा पलटाया और एक एक खबर को पढ़ने लगा। उस दिन आकाश साफ था पंचाचुली की धवल श्वेत शिखरों से सूर्य की स्वर्णिम किरणें चमक रही थी। उस साप्ताहिक में भिटोली पर कहानी छपी हुई थी किस तरह एक भाई भिटौली के पर्व पर अपनी बहिन गौरीधाना मिलने जाता है। ननद और सास द्वारा कुचक्र रचना, एक अंतहीन कहानी पढ़कर मेरे आंखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। उस दिन मैं खूब रोया। यह थी मेरे पिघलता हिमालय से प्रथम साक्षात्कार। मैने पढ़ने के बाद सही सलामत अखबार वापस कर दिया। मर्तोलिया जी बोले जब भी पढ़ने का मन हो मुझसे मांग लेना और पढ़ते रहना। फिर दो चार बार ही लिया होगा। वे अपने कार्यों में ही व्यस्त रहते थे। यदि वे आज होते और मैं ये प्रसंग सुनता तो उन्हें अच्छा लगता। पर वह विराट हिमालय समय से पूर्व पिघल गया उनसे पिघली अमृतधारा आज भी पिघलता हिमालय रूप में निरन्त प्रवाहित है।
नारायण सिंह धर्मशक्तू
जवाहर नवोदय विद्यालय सुयालबाड़ी, नैनीताल।