संघर्षमय रहा जिनका पूरा जीवन

पत्रकारिता के मिशन को जिस लगन से स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने शुरू किया था, उसे बनाये रखने वाली कमला उप्रेती की 15 सितम्बर 2019 को प्रथम पुण्यतिथि है।
जिन्दगी को आन्दोलन बना चुके आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते हुए आपने किसी से कोई शिकायत नहीं की। जिन्दगी के सफर में रोग-शोक से लड़कर भी बच्चों को हौंसला दिया। घर-परिवार और गाँव के सारे लोगों को आपका ममतामयी स्पर्श हमेशा बांधे रहा। अपने सीमित साधनों में घर-गृहस्थी चलाते हुए सामाजिक आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका आपने निभाई। बहुत विपरीत स्थितियों में भी आपके बोल संस्कारों से भरे थे। ‘जशौदा मैया तेर कन्हैया बड़ो झगड़ी, झन लगाया गोरु-ग्व्ाला हमन दगड़ी’ जैसे भजनों से लेकर होली के आशीष तक के गीत गाने वाली इस माँ ने जीवन की सच्चाई को हमेशा सामने रखा और गुनगुनाया- ‘संग्राम जिन्दगी है लड़ना इसे पड़ेगा….।’
66 वर्ष की आयु में अन्तिम सांस तक अपने मिशन के लिये जिस साहस से आप लड़ीं वह चिंगारी बुझ नहीं सकती है। पिघलता हिमालय का यह अंक आपको समर्पित।

पत्रकार ऐसे ही नहीं बन जाते हैं

स्व.कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि पर सम्पादकीय
आज जब पत्रकारिता की बात होती है तो इसे बहुत हल्के में लिया जाता है, कारण इसे बना ही ऐसा दिया गया है। पत्र और पत्रकार जन चेतना के अग्रदूत होते हैं। उनसे आन्दोलन और आन्दोलन से वह होते हैं। उनका पठन-पाठन और उनके संस्कार उनकी कलम में दिखाई देते हैं। वर्तमान में जब समाचार-संदेश देने के लिये द्रुतगामी व्यवस्थायें हैं पत्रकारिता जगत में हलचल मच चुकी है। होड़ में जल्द से जल्द समाचार परोसने और कारोबार को बढ़ाने के लिये विज्ञापनों के लिये सर माथा पीटने का अभियान चल पड़ा है। समाचार पत्रों की दयनीयता इससे ही समझी जा सकती है कि उन्हें बाजार में स्थापित होने के लिये नित नये अभियान चलाने पड़ रहे हैं। प्रबुद्ध पाठक चर्चा करने लगा है कि अखबार में समाचार पढ़ें या विज्ञापन। कई पेजों के विज्ञापन का पुलिन्दा और उपर से सैकड़ों नामों से भरी कोई सूचना या चटपटी प्रस्तुति को आज का युवा पत्रकार पत्रकारिता बता रहे हैं। यदि कोई पत्रकारिता के ज्ञान को लेकर प्रयोग करना चाहे तो उसके लिये शायद ही किसी मीडिया घराने के दरवाजे खुलें, क्योंकि भीड़ में अपनी मुंडी उपर निकालने के लिये सार्टकट रास्ता तलाशा जा रहा है। ऐसे में साहित्य की पत्रकारिता वाली धारा की बात हो ही नहीं सकती है। यदि कोई अपने आप से हिम्मत करता है तो वह छोटे या मझले समाचार पत्रों की श्रेणी में है। ऐसे समाचार पत्रों के सामने चुनौती ज्यादा हैं। तुरन्त लाभ के लिये कोई भी सरकार उन समाचार पत्रों को चुनने लगी है जिसे वह तत्काल विज्ञापन देकर अपनी बात मनवा सके। ऐसा ही लाभ निजी संस्थान व धन्धेबाज भी चाहने लगे हैं। यदि नहीं चाहते हैं तो उन्हें विज्ञापन के लिये मजबूर किया जा रहा है। सोचनीय है कि आजादी के 70 साल बाद भी भीड़ में खड़े रहने के लिये इतना ही साहस बटोर सके हैं हम।

पत्र और पत्रकारिता के लिये मिशन का होना जरूरी है। इस मिशन को यदि हम स्वीकारते हैं तो पूरी ईमानदारी जरूरी है। लेकिन क्या हमारी व्यवस्था का ढांचा ऐसा होने दे रहा है? वह कागजों में उलझाये रखना चाहता है और सारे मीडिया घराने चिल्लाते हैं- ‘नम्बर वन’। इन सबके बाद भी पत्रकारिता के मिशन को बनाये रखने के लिये दुनिया में बहुत से महानुभाव संकल्पित हैं। उन्हीं में से थीं- कमला उप्रेती। किसी की जिन्दगी पूरी तरह संग्राम बन जाती है और इस संग्राम में जो लड़ता है वह योद्धा है। ऐसी ही योद्धा थी ईजा। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उसने जुड़ी अनगिनत यादें हैं। ‘पिघलता हिमालय’ को बनाने में ईजा का घोर संग्राम रहा है। यह कहानी 1964 से शुरु हो जाती है जब स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी ने छापाखाना खोला। पहले छापाखाने की बहुत इज्जत हुआ करती थी। ‘शक्ति प्रेस’ नाम से खुले छापाखाना में बाईडिंग, परफेटिंग, रूलिंग, कम्पोजिंग, प्रिंटिंग हर प्रकार का काम होता था। इसी छापेखाने में बहुत बड़ी टेªडिल मशीन हुआ करती थी, पूरे ट्रक के बराबर। जिसमें दैनिक पिघलता हिमालय भी छपा। बाद में छोटे आकार की टैªडिल मशीन वगैरह भी प्रेस में लगाई गईं। इन मशीनों में अनगिनत मशीनमैन, कम्पोजिंग में अनगिनत कम्पोजिटर रहे हैं। छापाखाने मे प्रतिस्पद्र्धा नहीं थी और शादीकार्ड, बिलबुक इत्यादि के ग्राहकों के अलावा लिखने-पढ़ने वालों का अड्डा छापाखाने ही हुआ करते थे। आजकल तो प्रिंटिंग प्रेस लिखना आसान हो चुका है। और प्रतिद्वंद्वी अपने ग्राहकों को ढूंढने के लिये दौड़ते हैं, सरकारी काम के लिये तिकड़मबाजी करनी पड़ती है। पहले पोस्टर, पर्चे, कार्ड छपवाने वालों में आन्दोलनकारी, समाज सेवी, पुस्तकें-फोल्डर-पर्चे छपवाने के लिये लेखक, कुछ खास-खास लोग शादीकार्ड छपवाने के लिये छापेखाने तक आते थे। प्रेस की बड़ी जिम्मेदारी थी और लोगों को भरोसा था कि उनकी गलतियों को भी सुधर कर छापा जायेगा। तब एफएस, एफोर, एथ्री जैसे कागज साइजों को नहीं जानते थे बल्कि रिमों के साइजों के बाद कागज कटिंग होती थी। आज भी बड़े छापेखानों में यही होता है। खैर, बात पिघलता हिमालय की हो रही थी। 1978 में पिघलता हिमालय शुरु हुई, बहुत उत्साह था आनन्द बल्लभ उप्रेती जी और दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी में। इनका जोश अखबार को दैनिक में तक बदल गया। लेकिन जीवन के संग्राम में यह उलझ कर रह गये। दुर्दिनों की वह कहानी बहुत लम्बी है………….

कमला उप्रेती ने अपने पति के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर छापाखाना और अखबार सींचा। लोहे की उन भारी मशीनों की खटखट आवाजों में कागज को मशीन में लगाने और उठाने में सावधनी चाहिये। कई ऐसे अवसर थे जब कमला जी मशीनमैन आनन्द बल्लभ जी के साथ हैल्पर बनी। तब आजकल की तरह सुविधाएं और साधन भी नहीं थे। डाक से जाने वाले अखबारों में पते लिखने में भी वह सहायक थी। अखबार की प्रूफरीडिंग का काम भी वह करती और कभी लिखने बैठ जाती। पत्रकार बनने की शुरुआत ही पठन-पाठन के अलावा कम्पोजिंग से होती थी जैसे आजकल कम्प्यूटर की जानकारी जरूरी है। उप्रेती जी के निधन के बाद उन्होंने पत्र का सम्पादन किया। समय बदला है लेकिन हमारे मूल्य और संस्कार बने रहने चाहिये। पत्रकारिता के कोई मायने होते हैं। इसकी पवित्रता बनी रहे, इसका मिशन बना रहे, इसका आन्दोलन चलता रहे। इसके लिये आम पाठकगण को भी विचार करना चाहिये। आज ईजा स्व. कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि में उनका स्मरण हमें खुशी और आँसू के साथ साहस दे रहा है। उसकी जिद, उसकी लगन, उसका संघर्ष हमें याद दिलाता रहेगा कि योद्धा संग्राम में विचलित नहीं होते।

सामाजिक आन्दोलनों में राजनीति ठुकराई कमला जी ने

टी.सी.पपनै
कमला बहिन जी से मेरा सम्पर्क सन् 1990 से था जब मैं लोक चेतना मंच से जुड़ा। बहिन जी एक प्रखर समाज सेविका के साथ महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रबल कार्यकर्ता भी थी। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से तो मेरा सम्पर्क वर्ष 1980 से था ही जब हम लोग साहित्यिक गोष्ठियों में अक्सर मिला करते थे। उप्रेती परिवार से मेरा पारिवारिक सम्बन्ध् रहा है। एक दुर्घटना में जब मेरा हाथ फैक्चर हुआ था और मैं अस्पताल में भर्ती था तो बहिन जी ने जिस आत्मभाव से साथ दिया मैं कभी नहीं भूल सकता।
श्रीमती कमला उप्रेती आन्दोलनों की अगुवाई में कभी अग्रिम पंक्ति में रहती थीं तो कभी सबको धकेलने के लिये पीछे अपने साथियों के साथ। आन्दोलनों में उनका यह स्वभाव ‘उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन’ में खूब दिखाई दिया। पृथक राज्य के लिये लड़ी गई लड़ाई में उन्हें भी आम आन्दोलनकारियों की तरह कोई गुमान नहीं था। बस, आन्दोलनकारी होने की खुशी थी। राज्य के लिये छिड़े ऐतिहासिक आन्दोलन में वह हल्द्वानी की सड़कों पर महिला शक्ति के साथ निरन्तर रहीं। होने वाली सभाओं की अध्यक्षता करते हुए वह युवा आन्दोलनकारियों को ललकाती थीं- ‘यह लड़ाई बच्चों के भविष्य की लड़ाई थी। इसका नेतृत्व स्वयं करना होगा।’
राज्य आन्दोलन के दौरान हल्द्वानी में हुए पुलिस लाठीचार्ज में घायलों में वह भी थीं। लेकिन उन्होंने प्रतिदिन होने वाले प्रदर्शन में जाना नहीं छोड़ा। राज्य बनने और उसके नाम पर सुविधा लेने वालों की होड़ कमला जी को बेचैन करती थी। वह कहतीं- ‘राज्य की लड़ाई नेता बनने के लिये थोड़ा ही लड़ी है।’ बाद को जब राज्य आन्दोलनकारियों को सरकार की ओर से प्रमाण पत्र दिये गये तो उन्हें भी इसके लिये बुलवाया गया। जब सरकार द्वारा राज्य आन्दोलनकारियों के लिये पेंशन प्रावधन किया गया, वह हँसती और कहती- ‘‘अब मैं पेंशन वाली हो गई हँू।’ क्योंकि जरूरत के समय भी उन्होंने सरकार से ऐसी याचना नहीं की थी। न ही उनके मन में कभी ऐसा विचार आया।
नेतृत्व का गुण उन्हें नेता बनाये हुआ था लेकिन अपने संस्कार और गृहस्थी के साथ सामंजस्य रखते हुए वह केवल सामाजिक आन्दोलनों का हिस्सा बनी। भ्रष्टाचार के खिलापफ वह एकदम गरज पड़ती थी। उनकी सभी महिला साथी आज उन्हें याद करती हैं, जो जानती हैं कि सामाजिक आन्दोलनों के आगे पहली जिम्मेदारी घर-गृहस्थी है। घर को संवार देना किसी भी महिला का सबसे बड़ा आन्दोलन है। वह धर्मपरायण थी लेकिन मंच सजाकर ढोंग का प्रवचन करने वालों के खिलाफ मुखर थीं। श्रीमती उप्रेती के सामने राजनीति के कई मौके आये लेकिन वह टाल गईं। वह जानती थी कि एक-एक, दो-दो व्यक्तियों की पार्टी भी उत्तराखण्ड में बनी हुई है। उत्तराखण्ड क्रान्तिदल को क्षेत्रीय पार्टी के रूप में वह पसन्द करती थीं। इसके अलावा बड़ी पार्टियों की नीतियाँ उन्हें रास नहीं आई। भीड़ एकत्रित करने के लिये वह मनोनीत होने से भी मना कर देती। हाँ, किसी भी पार्टी की जो बात उन्हें भा जाती उसमें वह समर्थन करती। इसके लिये वह भाकपा माले के प्रदर्शन में भी शामिल हुई थी। कांग्रेस के समर्थन में जुटी थीं। कांग्रेस की अकड़ पर भाजपा के नेता का समर्थन किया था। स्पष्ट निर्णय लेने वाली समाजवादी पार्टी के लिये भी वह बोली और जनता पार्टी के समय उसकी नीतियों पर भी उसके साथ थी। राष्ट्रीय दलों से कई बार उनके मनोनयन के लिये पत्रा आए लेकिन वह टाल गईं और न ही उन्होंने किसी पार्टी की सदस्यता ली। नेतृत्व के गुण होने के कारण ही वह पालिका चुनाव से लेकर संसदीय चुनाव तक बूथ में गड़बड़ करने वाले किसी भी पार्टी के कार्यकर्ता को झिड़क देती थीं।
राजनीति की हलचल को परखने और जानने के बाद वह अपने मिशन पर अडिग थीं। महिला संगठनोें के साथ जुड़कर वह शिक्षा व सामाजिक कार्यों में रुचि लेती। इसके लिये कई बार उन्हें सम्मानित किया गया था। बेवाक बोलने वाली कमला जी पत्रकारिता के घराने से थीं तो उन्हें किसी भी अधिकारी या नेता से सम्वाद करने में झिझक नहीं थी लेकिन वह अपने दायरे में रहकर ही सम्वाद करतीं। सामाजिक संस्थाओं से जुड़कर वह कार्यों में जुड़ी रहीं। लोक चेतना मंच की सक्रिय महिला सदस्य के रूप में उनकी भूमिका थी। पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में उन्होेंने जनपक्षीय मुद्दों को उठाया और हिमालय संगीत शोध् समिति की अध्यक्ष के रूप में बच्चों और बड़ों का मार्गदर्शन किया।
सेनि. तहसीलदार, समाजसेवी

जन चेतना का गढ़ रहा है शक्ति प्रेस

धीरज उप्रेती
महानगर की शक्ल ले चुके हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड की सूरत भी अब बदलती जा रही है। कभी इस सड़क पर फड़ों का छोटा सा बाजार और दूर जाकर पीलीकोठी मुख्य स्थान हुआ करता था। उसके बाद उँचापुल। तब कहीं जाकर कठघरिया, फतेहपुर का ग्रामीण इलाका। मुखानी नहर चैराहे के बाद यह सारे गाँव बसे थे। आज कुछ पहचान नहीं आता है। चारों ओर फैल रहा शहर महानगर का आकार ले चुका है। कालाढूंगी चैराहा शहर का मुख्य चैराहा है, इसी सड़क पर हमारा छापाखाना शक्ति प्रेस तमाम सामाजिक आन्दोलनों का मुख्यालय बनकर रहा। इस पुराने भवन में छापाखान, आन्दोलनकारियों की बैठकें, प्रेसवार्ता, आन्दोलनकारियों की भीड़ हमेशा रही। यही मेरा जन्म स्थान है। बचपन के खेलकूद, पढ़ाई और संगीत सबकुछ इसी माहौल में हुआ। जन चेतना के इस गढ़ का अपना इतिहास है।
समय के साथ सब बदलता जायेगा लेकिन कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो केन्द्रबिन्दु बनकर इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। शक्ति प्रेस का यह ठिकाना भी ऐसा ही है। मैंने बचपन से प्रेस/घर के हिस्से में अन्तर ही महसूस नहीं किया। सबकुछ तो हँसीखुशी के माहौल में होता था। आज घुट से रहे हल्द्वानी शहर में भीड़ बढ़ती जा रही है लेकिन अपनापन नहीं है। अपनों के बीच बसने की चाह लेकर पलायन कर रहे लोग भीड़ में खो चुके हैं। बैठने के पुराने अड्डे नहीं रहे। दौड़भाग की शक्ल वाला यह शहर सिर्फ बाजार बनकर खड़ा है, जिसमें बेचने और बिकने वालों की बात हो रही है। ऐसे में सावधान रहने की जरूरत है। पुराने जमाने की लकीर भले न पीटी जाए लेकिन उसकी मान्यताओं को रखना जरूरी है।
हमारे गाँव कुंजनपुर, गंगोलीहाट इलाके के सभी लोगों का अड्डा उस जमाने में शक्ति प्रेस था। अब तो होटलों में रहने की परम्परा हो चुकी है और फैलते हल्द्वानी में कई लोगों के परिवार-रिश्तेदार हो चुके हैं। मुनस्यारी-धरचूला के सीमान्त से ‘पिघलता हिमालय’ परिवार के सदस्यों के अलावा तमाम जगह से लोगों का आना-जाना था। रामनगर, काशीपुर, बाजपुर के लिये चार-पाँच बसों का अड्डा हमारे छापाखाने के बगल में खुल गया। वर्षाें बाद 80 के दशक में यह बस अड्डा बड़ा आकार ले चुका था और करीब अस्सी बसें इसमें थीं लेकिन इसे हटाना जरूरी था। तब कालाढूंगी रोड में घनी आबादी के बीच प्राइवेट बस अड्डे को हटाने के लिये शासन-प्रशासन बौना दिखाई दिया। ऐसे में उग्र आन्दोलन ही सहारा था। मैंने यह पहला आन्दोलन देखा जिसकी अगुवाई ईजा ने की। इसमें धरना- प्रदर्शन, ज्ञापन से कुछ होने वाला नहीं था। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती ने कई बसों के शीशे तोड़ डाले। हम बच्चे भी पत्थर मारकर बस के शीशे तोड़ने को खेल मानकर जुट जाते। दरअसल उस समय कई खूंखार लोग बस अड्डे से जुड़ चुके थे और मनमानी चाहते थे। ऐसे में सबकी नज़रे ‘शक्ति प्रेस’ पर होती। हल्द्वानी थाने के सीओ पुष्कर सिंह सैलाल जो बाद में डीआईजी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, ईजा को समझाने आते थे- ‘भाभी जी बस अड्डा हट जायेगा, इनके शीशे मत तोड़ना।’ हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले का संचालन ही हमारे ‘शक्ति प्रेस’ से हुआ करता था। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के उस दौर के प्रबुद्ध जनों की बैठक यहाँ हुआ करती थी। लोक चेतना मंच से जुड़कर ईजा ने कई जगह प्रतिभाग किया। सीखने की इच्छा में ईजा ने ट्राइसेम योजना के तहत पीपुल्स कालेज में जुड़ीं। गायत्री परिवार के अभियान से जुड़कर उन्हें सहयोग किया। आन्दोलन के साथ विचार-विमर्श के इस अड्डे से कई अन्य आन्दोलन भी संचालित हुए, जो सामाजिक सौहार्द व दिशा देने वाले थे।

फरवरी 2019

हिमवंत कवि चन्द्र कुंवर बरतवाल जन्म शताब्दी

रुद्रप्रयाग। प्रतिकूल परिस्थितियों में हिन्दी जगत को विशाल काव्य भण्डार देने वाले हिमवंत कवि चन्द्र कुँवर बत्र्वाल का जन्म शताब्दी समारोह धूमधाम से मनाया गया। हरिदत्त बेंजवाल राजकीय आर्दश इण्टर कालेज अगस्त्यमुनि में चन्द्र कुँवर बत्र्वाल स्मृति शोध् संस्थान द्वारा मुख्य समारोह आयोजित किया।
रुद्रप्रयाग जिले के तल्ला नागपुर पट्टी के प्रसिद्ध मालकोटी गाँव में 20 अगस्त 1919 को भोपाल सिंह एवं श्रीमती जानकी देवी के घर में चन्द्र कुँवर बत्र्वाल का जन्म हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा उडामांडा प्राथमिक स्कूल और मिडिल शिक्षा नागनाथ पोखरी से हुई। बाद में पौड़ी, देहरादून और इलाहाबाद से उच्चशिक्षा प्राप्त की। उनकी प्रसिद्ध कृतियां हैं- नंदिनी, पयस्विनी, विराट ज्योति, हिमतंत का एक कवि, काफल पाक्कू, हिरण्यगर्भ, गीत माधवी, साकेत, उदय के द्वारों पर, प्रणयनी, हिम ज्योत्सना। उनके मित्रा शम्भू प्रसाद बहुगुणा ने उनकी विलुप्त हो रही रचनाओं को प्रकाशित किया। तभी से काव्य जगत में चन्द्र कुँवर बत्र्वाल का दूसरा नाम हिमतंत कवि प्रसिद्ध हुआ।
जन्मशताब्दी समारोह के मुख्य अतिथि रा.स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो.जी.एस.रजवार, विशिष्ट अतिथि वयोवृद्ध साहित्यकार योगम्बर बत्र्वाल थे जबकि अध्यक्षता नगर पंचायत अगस्त्य मुनि के अध्यक्ष अरूणा बेंजवाल ने की। कवि स्मृतियों को सांझा करते हुए डाॅ.योगम्बर बत्र्वाल ने कहा कि चन्द्र कुँवर आमजन का कवि मानकर जीने वाले आज भी हैं, इसलिये बिना किसी विभेद के जगह-जगह उन्हें याद किये जाने का सिलसिला चल पड़ा है।
आयोजन के दूसरे  सत्र का आयोजन राजकीय महाविद्यालय के सभागार में हुआ। हिन्दी साहित्य अकादमी नई दिल्ली के तत्वावधान में राज्य और देशभर से विद्वतजनों ने इसमें भागीदारी की। इस वर्ष का चन्द्र कुँवर बत्र्वाल स्मृति सम्मान प्रतिष्ठित साहित्यकार कुमाउनी भाषा पत्रिका दुदबोली के सम्पादक मथुरादत्त मठपाल को दिया गया। उनके सुपुत्र नवेन्दु मठपाल आयोजन में पधारे थे। आयोजन में प्रतिष्ठित पोस्टर चित्र कविता के चर्चित स्व.बी.मोहन नेगी के चित्रों की प्रदर्शन आकर्षण का केन्द्र थी। खुशी हुई कि उनके दो पुत्रों ने नेगी जी की परम्परा को बनाए रखा।

उनका संस्कार, धैर्य, साहस बनाने वाला था

मथुरादत्त मठपाल
स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से मेरा परिचय कोई 37-38 वर्ष पूर्व हुआ था। मैं एक कुमाउनी काव्य समारोह में भाग लेने हेतु हल्द्वानी आया हुआ था। एक अति साधरण सा दिखने वाला व्यक्ति वहाँ एक मकान की छत लगाई गई रसोई में भोजन व्यवस्था में संलग्न था। पास ही एक दुबली-पतली सी महिला बैठी उनका हाथ बटा रही थी। उन्होंने अपना परिचय स्वयं ही दिया कि वे आनन्द बल्लभ उप्रेती हैं, ये कमला जी हैं। मैंने मजाक में कहा, ‘आप दोनों एक ही पार्टी के लगते हैं।’ हम तीनों ही हँस पड़े। तब से मैं जब भी हल्द्वानी आता प्रायः उनके ‘शक्ति प्रेस’ में कुछ देर अवश्य बैठता था। वही सैंतिस-अड़तिस वर्ष पूर्व देखे गये आनन्द जी-कमला जी में कोई फर्क मैंने कभी अनुभव नहीं किया। भीतर के अंधेरे कमरे में उनका ट्रेडिल प्रेस चलता रहता, बाहर के कमरे में ‘पिघलता हिमालय’ साप्ताहिक पत्र का काम चलता रहता। दो-तीन अति साधरण सी कुर्सियाँ-एक बैंच और कोने पर सटा कर रखा हुआ एक बड़ा सा बैंच। आगे चलकर जब कम्प्यूटर- फोटोस्टेट का काम खोला कमरे का हुलिया वही रहा। हाँ भीतर के कमरे में खटर-पटर अब नहीं होती थी। बहुत धीरे से स्वर में आनन्द जी बतियाते- प्रायः कुमाउंनी में ही। ‘ओहो, और्री है गो’ जैसा कोई तकिया कलाम बीच-बीच में लगता रहता।
समय के साथ-साथ ज्यों-ज्यों आनन्द जी से मेरा परिचय गहराता गया मुझे उनके अन्दर एक बालक की तरह सरल-निष्कपट- सपाट व्यक्ति के दर्शन होते गये। एक पत्राकार की उनकी गहरी ईमानदारी, आर से पार तक और बहुत दूर तक देखने की सामथ्र्य वाली उनकी दृष्टि, बिना लाग- लपेट या कोई मुलम्मा चढ़ाये पत्रकारिता के अपने मिशन के प्रति कर्तव्य निष्ठता, सुख-दुःख में समभाव रख सकने की उनकी चारित्रिक विशेषता, अपने समकालीन समाज और राजनीति की गहरी समझ रखने वाले एक जागरूक मनीषि की सी मेध से सम्पन्न व्यक्तित्व आदि गुणों के कारण में उत्तरोत्तर उनके व्यक्तित्व का कायल होेता गया। लेकिन उनके जीवन के अनेक पहलू मेरी नजरों में तब उजागर हुए जब मैंने उनके विस्तृत साहित्य का अध्ययन किया। अपने प्रारम्भिक प्रकाशन तो उन्होंने स्वयं ही मुझे दिये थे, बाद वाली कृतियाँ उनके परिजनों ने मुझे सुलभ करवायीं थीं। मुझे सुखमय विस्मय होता है कि आनन्द जी जितने प्रखर पत्रकार थे उतने ही मेधावी रचनाकार भी। वे एक भावुक कवि, मानव मन के सफल चितेर कहानीकार, एक सतत यायावर, निबन्धकार आदि बहुत कुछ थे।
कमला जी के साथ आनन्द जी का विवाह फरवरी 1971 में हुआ था। कमला जी रानीखेत के एक सम्भ्रान्त परिवार की कन्या थी। मुझे याद है वर्षों पहले रानीखेत सदर बाजार में ज्वाला प्रसाद एण्ड सन्स में हम लोग जाया करते थे, जो इन्हीं परिवार का है। प्रतिष्ठित व्यवसायी ज्वालाप्रसाद जी स्वयं गद्दी पर बैठे दिखाई देते थे। शहर में रहने के कारण कमला जी ने गाँव का जीवन कम ही देखा था। उप्रेती जी का जीवन एक फक्कड़ का जीवन था। ‘काम-क्रोध्-मद-मान न मोहा’ वाली स्थिति थी। सौभाग्य से उन्हें जीवन-संगिनी के रूप में एक ऐसी महिला मिली जो उनके साथ पग से पग मिला कर चलीं। इससे एकदम अकेले संघर्ष कर रहे उप्रेती जी को जीवन का एक स्थायी सम्बल प्राप्त हुआ। वे हल्द्वानी में अपना प्रेस चलाते, पत्र निकालते और सामाजिक- सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी करते रहते थे।वे किसी दल, धड़े या मोर्चे से कभी नहीं जुड़े। एक ईमानदार पत्रकार की भाँति वे आम जन के सुख-दुःखों को ही अपनी लेखनी से उजागर करते रहे। उधर कमला जी को अपनी ससुराल गंगोलीहाट में अपने बड़े परिवार के साथ रहना था। ग्रामीण परिवेश में रहकर उन्होंने ग्राम्य जीवन के सारे काम-काज सम्भाल लिये थे। बड़े पुत्र के जन्म के पश्चात पति-पत्नी एक माह के नन्हें शिशु को लेकर हल्द्वानी चले आये। ‘शक्ति प्रेस’ भवन में गृहस्थी जम गई। छोटे पुत्र और कन्या के जन्म के पश्चात कमला जी अस्वस्थ रहने लगीं। घर-गृहस्थी और व्यवसाय की सारी जिम्मेदारी आनन्द जी के कन्धें पर आ पड़ी। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने अपने पत्र ‘पिघलता हिमालय’ का प्रकाशन बनाये रखा। कमला जी अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही थीं। इस अन्धकार में प्रकाश की किरण के रूप में उनके सामने तीनों बच्चे ही थे। समय बीता, कमला जी भी कुछ स्वस्थ हो गईं, ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एवं उन्हें संस्कारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ‘पिघलता हिमालय’ भी गति पकड़ चुका था। नन्हा पंकज भी पिता के कामों में हाथ बटाने लगा था।
समय ने अपने कितने ही रूप दिखाये- रंग दिखाये लेकिन उप्रेती दम्पत्ति ने न अपना धैर्य छोड़ा और न अपना पत्रकारिता का मिशन ही छोड़ा। वे स्वयं में एक संस्था थे- एक आन्दोलन थे। कुछ पँूजी का प्रबन्ध् हुआ तो उन्होंने जे.के.पुरम्, सेक्टर-डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में अपने परिवार की आवश्यकता भर की पूर्ति कर सकने में सक्षम एक छोटे से आशियाने को बनाया। इसी बीच 22 फरवरी 2013 ई. के दिन वे आनन्द जी एकाएक चिरनिद्रा में सो गये। ऐसे में उनकी अद्र्धांगिनी कमला जी ने साहस के साथ उनके मिशन को संभाला और अपने बच्चों को सौंपकर 15 सितम्बर 2018 को वह भी विदा हो गईं। उनका संस्कार, धैर्य, साहस बनाने वाला था। सामाजिक कार्यों में उनका हस्तक्षेप दिशा देने वाला था।

आप तो हमारे साथ ही रहोगी हमेशा हमेशा!

हरीश पन्त
कहते हैं तूफान में जब दिशा बोध् असम्भव हो जाता है तो दीप स्तम्भ की बत्ती अपने स्थान से उठ जहाज के आगे पानी में तैरते हुए नाविकों का मार्ग दर्शन करती है। कुछ ऐसी ही व्यक्तित्व था पिघलता हिमालय परिवार के लिए स्व. कमला उप्रेती का।
अस्वस्थ्य होने के बावजूद विषम परिस्थितियों में आनन्द बल्लभ उप्रेती जी के सारे संघर्षों, उपलब्धियों और पारिवारिक सामाजिक कार्यों को संवारने की विलक्षणता उनमें अद्वितीय थी।
वेदना में एक शक्ति है जो दृष्टि देती है और जो वेदना में है वही दृष्टा हो सकता है। सन् 1977-78 के दौरान नैनीताल समाचार के प्रकाशन शुरू होने के बाद ही पिघलता हिमालय परिवार यानि उप्रेती जी के संसर्ग में कालाढूंगी रोड शक्ति प्रेस से सम्पर्क हुआ तो आज तक वह अपना ही लगता है बावजूद न उप्रेती जी रहे न कमला जी! पर वह आत्मीयता आज भी पंकज, धीरज व परिवार के साथ यथावत है।
स्व. उप्रेती दम्पति के साथ औपचारिक दाज्यू-भाभी वाला सम्बोधन न हो कर आनौपचारिक साहब! और काँ छाँ हो, कै कर्न छा हो! ही रहा।
90 के दशक में गम्भीर बीमार हो कर हल्द्वानी में चैकअप के दौरान एक महीने तक जिस ममत्व से उन्होंने मेरी देखभाल की उससे उरिण तो मैं ता जिन्दगी नहीं हो पाउँगा पर उनका यह भाव बिना किसी लाग लपेट के सभी आगंतुक परेशानी में घिरे लोगों के साथ निस्वार्थ रहता था।
शक्ति प्रेस व पिघलता हिमालय की आर्थिकी को सम्भालने में कमला उप्रेती की विशेष भूमिका रहती थी जो कि उदारमना उप्रेती जी में कम ही थी।
वह बहुत ही स्पष्ट खरी-खरी कहने की वजह से शायद कुछ लोगों को खटकती हो पर वह खुली व स़ापफगोई पसन्द व्यक्तित्व की स्वामिनी थी।
उप्रेती जी के नहीं रहने के बाद जिस कुशलता और एकजुटता से पूरे परिवार को खराब होते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने संभाला वह हिमालय संगीत शोध् समिति की उत्तरोत्तर प्रगति का स्पष्ट प्रमाण है। होली आयोजन, उप्रेती जी की पुण्यतिथि के आयोजन व सम्मान समारोह, संगीत की बैठकें सब में उनका सक्रिय सहयोग, मार्गदर्शन और आतिथ्य अद्भुत व पूरे परिवार को साहस से आगे बढ़ने की प्रेरणा देता था और अब उनके ना रहने पर भी उनकी अमिट छाप पिघलता हिमालय व हिमालय संगीत शोध् समिति पर छाई रहेगी। कवि रुस्तम की कविता के साथ-
समय कुछ ढँूढता था।
समय कुछ टटोलता था।
रात को, अकेला,
शहर की गलियों में
अपने आप कुछ बोलता था।
उसकी आँखों में क्या बिम्ब होते थे?
समय क्या सोचता था?
किसे याद करता था समय?
किसी अन्य समय को?
और किसे भूलता?
मैं दूर से उसके पीछे पीछे घूमता था,
सिर्फ दूर से।
कमला उप्रेती आप तो हमारे साथ ही रहोगी हमेशा हमेशा!

वह सपने नहीं, सच्चाई को जीती थी…..

डाॅ. पंकज उप्रेती
‘‘संग्राम जिन्दगी है, लड़ना इसे पड़ेगा…..।’’ इस प्रकार के गीतों को गुनगुनाने वाली हमारी ईजा अब सिर्फ याद आती रहेगी। वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी। बीमारी, अस्पताल, मौत तो उसके निकट थे लेकिन अचानक वह चल देगी ऐसा पता नहीं था।
मुझे याद है पिता के साथ घोर संघर्षों में साथ देने वाली माता ने कितनी परीक्षाएं मौत के लिये दी। अपनी 66 साल की आयु में उन्होंने सौ प्रतिशत संघर्ष किया जिसमें मौत से संघर्ष भी था। बचपन में हम तीनों भाई बहन- पंकज, धीरज, मीनाक्षी सोचते माँ कब ठीक होगी, उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। परीक्षा के इस दौर में दैनिक पिघलता हिमालय को बन्द करना पड़ा था। चल रहे संग्राम में पहाड़ ही टूट पड़ा। मुनस्यारी में दुर्गा चाचा दुर्गा सिंह मर्तोलिया अपनी स्थितियों में बुरी तरह टूट चुके थे। थके-हारे पिता आनन्द बल्लभ ने छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ को बिकाउ होने का विज्ञापन दे डाला था। लेकिन नहीं, परमात्मा को यह मंजूर नहीं था। ईश्वर को हमारा लड़ना ही पसन्द है। पूरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। 6 साल का मैं और 4 साल का भाई धीरज गाँव गंगोलीहाट चले गये। छोटी बहन को नैनीहाल रानीखेत भेज दिया गया। माँ अस्पताल और पिता हल्द्वानी में। संघर्षों के उन सालों में जितने टोने-टोटके, पूजा-पाठ हो सकते थे सब किये पिता ने। ताकि हमारा परिवार बन सके। दो साल के अन्तराल में बिखरा हुआ पूरा परिवार एक हो गया लेकिन कुछ समय बाद ईजा पिफर से बीमार हो गई। हम तीनों बच्चे रोते थे। फिर से दो साल तक घोर संग्राम। पिता भी परेशान थे लेकिन ‘शक्ति प्रेस’ हमारी धुरी था। ‘उप्रेती ज्यू’ को मानने वाले, उनकी ईमानदारी को पहचानने वालों की कमी नहीं रही। ईजा ठीक होकर घर आ गई लेकिन बीमारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पिघलता हिमालय को पिता ने फिर से जीवन दिया और ट्रेडिल मशीन के जमाने की मशीनों पर जूझते रहे। खून में व्यापार तो था नहीं, हाँ उनकी कलम की ताकत और ईमानदारी ने परिवार को सम्मान के पद पर खड़ा रखा। बीमारियों और संघर्षों ने हम बच्चों को भी बहुत कुछ सिखाया। हमें सिखाया की दुर्दिन कैसे होते हैं, दुनिया के मेले में कितने प्रकार के चेहरे होते हैं, अपना-पराया क्या होता है………..। मुफलिसी कोई बात नहीं होती लेकिन आपकी प्रतिब(ता बनी रहनी चाहिये। अखबार निकालना हमारी प्रतिबद्धता थी। संकल्प ले रखा था इसे चलाने का। ईश्वर कभी कोई दूत भेज देता और उम्मीदें जग जाती। एक दिन हल्द्वानी बेस अस्पताल में ईजा को बाहर रख दिया गया और डाक्टरों ने कह दिया था कि भगवान ही बचा सकता है। हम बच्चे रात्रि में रोते हुए यह कहकर नींद की गोद चले गये- ‘‘हे भगवान! हमारी मम्मी को ठीक कर देना।’’ अगले दिन पता चला कि ईजा ठीक हो गई है। पिता जी अपने कुछ साथियों के साथ रातभर अस्पताल में मौत से जूझ रही ईजा के पास थे। अस्पताल में जाने से पहले मुंह का ग्रास तक छोड़कर जाना पड़ा था उन्हें। उस दिन मेरा जनमबार था और पिता ने तय किया था बहुत दिनों बाद आज इतमिनान से खाना खायेंगे। उन्होंने खाना पकाया और हम लोग खाना खाने बैठे ही थे कि हमारे पड़ौसी लाला दाउ दयाल जी बताने आ गये कि अस्पताल में चलो, हालत खराब है।
अस्पताल में बहुत समय अकेले ही काटा है ईजा ने। वह हिम्मती थी तभी इतने साल तक उसका शरीर बचा रहा। बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह थकी नहीं बल्कि परेशान इसलिये थी कि उनका परिवार परेशान है। वह कहती थी- ‘‘मैं एमबीबीएस हो चुकी हँू। बीमारियों के कारण सारी दवाईयों के नाम और बीमारियों के बारे में जान चुकी हँू।’’ कई बार मरते-मरते बची ईजा बताती थी- ‘‘यमराज के वहाँ आध्े रास्ते से लौट कर आई हँू।’’
ईजा की बातों मेें बहुतों को विश्वास नहीं हो सकता है। वह बहुत चैकन्नी थी कि किसी भी समय बुलावा आ सकता है। इसलिये वह अपने हिस्से की लड़ाई लड़ती रही। वह सपने नहीं सच्चाई जीती थी। नींद उसकी आँखों में नहीं थी और हर वक्त कुछ गुनने-बुनने-कहने-सुनने की आदी हो चुकी थी। उन्हें भरोसा था कि ईमानदार से काटा गया समय ईमानदारी लौटाता है। आने वाले कष्टों को वह पी जाती और समय का इन्तजार करती। उनकी दृढ़ता ही थी कि वह पिता जी के अखबारी मिशन, लेखन, सामाजिक आन्दोलनों में बराबर की भागीदार बनी। उन्होंने कभी भी बाबू जी से यह शिकायत नहीं की कि इन आन्दोलनों से क्या होगा, बच्चों की पढ़ाई नहीं हो रही है, सजने- संवरने के लिये साधन चाहिये, रहन-सहन के लिये बड़ी और खुली जगह चाहिये। वह ऐसे सपने कतई नहीं पालती थी। उनके यही सपने होते तो हमारा यह मिशन अध्ूरा रह जाता। यह ईजा का ही साहस था कि उन्होंने हर स्थितियों में अपना संसार बनाया। ऐसा संसार जिसमें सच्चाई हो। आम महिलाओं की तरह वह भी घर-गृहस्थी चलाती नाती-पौतों के साथ खेलती और गुनगुनाती लेकिन उससे पहले वह आन्दोलन थीं। उसने अपने को नहीं अपने मिशन को संवारा…..

कमला: वह वीरांगना थी

महेश पाण्डे
सबसे कठिन होता है अपने किसी नजदीकी के बारे में लिखना। जिसको आप बचपन से से देखते-सुनते आये हैं उसके बारे में लिखना तो और भी मुश्किल होता है। फिर कमला पाण्डे-उप्रेती के बारे में कलम कितनी निरपेक्ष होकर लिखेगी, कहना मुश्किल है। रानीखेत में एक ही मोहल्ले खड़ी बाजार में आमने-सामने मकानों में पाँच मकान छोड़कर कमला का घर था। उन दिनों पूरी खड़ी बाजार एक परिवार की तरह था। जाति-धर्म भाषा का विभेद कोई मायने नहीं रखता था। सब रिश्ते सहज और आत्मीयता लियेे हुए थे। हमारी ईजा, चाची या जड़जा ताई जी थी। हमारी एक बहन जानकी ताउजी की लड़की थी। जानकी के बहाने सभी का घर में आना-जाना लगा रहता था। जानकी की देखा-देखी हमारी ईजा और हम लोग एक रिश्ते में बंध्े हुए थे। कब कमला और उसकी बहनों ने मुझसे दाज्यू कहना शुरु किया, याद नहीं पड़ता लेकिन यह रिश्ता आज तक अटूट बना हुआ है। इसी रिश्ते की डोर से मैं आज पंकज, ध्ीरू और मीनाक्षी का मामा बना हुआ हँू। कमला से अन्तिम मुलाकात वर्ष 2018 में रानीखेत में उमेश डोभाल स्मृति समारोह में बस चन्द मिनटों के लिए हो पायी थी। उसे सपरिवार गंगोलीहाट अपनी ससुराल और हाटकालिका मन्दिर जाना था। इसके बाद दो-तीन बार पफोन से अशल-कुशल का आदान-प्रदान हो पाया। उसके निधन के बाद 22 सितम्बर 2018 को परिवार को शोक सम्वेदना व्यक्त करने घर गया था।
रानीखेत में कमला की परवरिश एक भरे-पूरे और सम्पन्न परिवार में हुई। किसी चीज कर कोई अभाव नहीं था। शादी के कुछ वर्षों में ही तीनों बच्चे पैदा हो गए थे। सभी 7-8 साल से कम वय के थे। उप्रेती जी का फक्कड़पन कमला ने ससुराल आते ही पूरी तरह समावेषित कर लिया था। उनका घर शक्ति प्रेस गाँव-देहात के लोगोें की आश्रय स्थली हुआ करती थी। कितने ही लोगों ने वहाँ प्रेस का काम सीखा। अखबार निकालना सीखा। वहाँ जो भी आया वह आत्मनिर्भर होकर निकला।
जिन दिनों उत्तराखण्ड चिपको आन्दोलन से गुंजायमान था उन दिनों ‘उत्तर उजाला’ के बाद ‘शक्ति प्रेस-पिघलता हिमालय’ आन्दोलनकारियों का केन्द्र बने हुए थे। रात-विरात आन्दोलन के पर्चे-पोस्टर छापने का काम उप्रेती दम्पति के जिम्मे था। उन्होंने कभी किसी से माँगा भी नहीं। उल्टे चाय-नाश्ते की जिम्मेदारी भी उनके ही हिस्से जाती थी। कमला बीमार कैसे पड़ी यह भी एक अलग किस्सा है। किस्सा क्या बहुत त्रासदी है। इसने हँसते-खेलते उप्रेती परिवार को जबरदस्त संकट में डाल दिया। यह संकट आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक तीनों ही मोर्चों पर उभरकर सामने आया। हुआ यों कि एक दिन शाम को दोनों लोग घूमने गए हुए थे। आइसक्रीम वाले को देखकर कमला ने आइसक्रीम खाने की इच्छा जताई। आइसक्रीम खाने के बाद उसे हल्की-फुल्की खाँसी आती रही। जब दो-तीन दिन में भी खाँसी नहीं रुकी तो चिन्ता होने लगी। हल्द्वानी में इलाज चलता रहा, लेकिन खाँसी ठीक नहीं हुई, कुछ महीनों बाद उसने बिस्तर पकड़ लिया तो भवाली एडमिट करना पड़ा। उसके भवाली जाने से पूरे परिवार पर संकटों का पहाड़ टूट गया। बच्चे छोटे थे, उनको ननिहाल रानीखेत भेजना पड़ा। उप्रेती जी को प्रेस और अस्पताल के बीच लगातार चक्कर काटने पड़े। परिवार के भरण-पोषण के साथ ही दवा और कमला के पौष्टिक आहार के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी। डेढ़-दो साल तक बच्चों की परवरिश रानीखेत व गंगालीहाट घर में हुई। जब कमला का स्वास्थ्य कुछ सुध्रने लगा तो पहले पंकज-ध्ीरू और पिफर मीनाक्षी कुछ समयावधि के बाद हल्द्वानी आये। इनकी वापसी के साथ ही परिवार का आर्थिक संकट गहराने लगा। साप्ताहिक से दैनिक बना पिघलता हिमालय ने उनके सामने चतुर्दिक समस्याएं खड़ी कर दीं। मित्रों और परिचितों के सहयोग से उन्हें राहत मिली लेकिन तकादों की भरमार ने उन्हें काफी परेशान भी किए रखा। घर के जेवर तक उन्हें या तो गिरवी रखने पड़े या बेचने पड़े। परिवार की बड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें पिघलता हिमालय दैनिक से साप्ताहिक करना पड़ा। तब तक दुर्गा सिंह मर्तोलिया भी आर्थिक संकट से घिर चुके थे। किसी तरह उप्रेती जी, कमला और पंकज तब तक हाथ बँटाने और काम करने वाला हो गया था कड़ी मेहनत और घोर अभावों के बीच भी अखबार छापने से कभी पीछे नहीं हटे। यही कड़ी मेहनत आज भी पिघलता हिमालय के पीछे लगी हुई है।
बाद के वर्षों में शक्ति प्रेस बौद्धिक और सम्भ्रान्त नागरिकों का सबसे प्रिय केन्द्र बन चुका था। प्रसिद्ध रंगकर्मी बांकेलाल साह, साहित्कार गोबिन्द बल्लभ पन्त, डिग्री कालेज के शिक्षक, व्यापारी आदि वहाँ की बैठकी को अघोषित क्लब का स्वरूप दे चुके थे। इसी शक्ति प्रेस में कई दिनों की लम्बी बैठकों और विचार-विमर्श के बाद पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच ने आकार लेना शुरु किया। उन्हीं बैठकों का नतीजा आज हल्द्वानी की पहचान बन चुके पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच है। एक गृहणी के रूप में कमला भी कभी-कभार बैठकों में भाग लेती थी, उसके विचारों को भी लोग गम्भीरता से सुुनते थे। मंच में महिलाओं की भागीदारी का जो दृश्य आज हम देखते हैं उसके पीछे कमला की मेहनत भी है।
बाद के दिनों/वर्षों में कमला ने कई स्वैच्छिक संगठनों में काफी सक्रियता से भाग लिया, लम्बी यात्राएं भी कीं। उत्तराखण्ड आन्दोलन में उसकी सक्रियता से कोई अपरिचित नहीं है। उप्रेती दम्पति की संगीत के प्रति अत्यधिक लगाव ने तीनों बच्चों को अभावों के बीच भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से अलग-अलग विधाओं में दीक्षित कराया और आज तीनों की अपनी-अपनी विधाओं में अलग पहचान है। तीनों बच्चों और उप्रेती दम्पति के कठोर परिश्रम और साधना के रूप में हमें आज ‘हिमालय संगीत शोध् समिति’ जैसी बहुमुखी संस्था की विरासत मिली हुई है। उप्रेती जी के न रहने पर कमला ने तमाम शारीरिक कमजोरियों और बीमारी के बावजूद परिवार को एकजुट बनाये रखने में काफी दक्षता और कठिन श्रम से काम किया। वास्तव में वह वीरांगना थी। अभावों और कष्टों के बीच कैसे जिया जाता है कोई उससे सीखता। आज वह भौतिक रूप से जरूर हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी बोयी फसल अब सोने की तरह दमक रही है। माँ-बाप की विरासत को निरन्तर आगे बढ़ा रहे उनके बच्चों से यही उम्मीद है कि उनकी जलाई मशाल उनके साथ-साथ और लोगों के जीवन में भी उजाला करते रहे। जिस पिघलता हिमालय को वो छोड़ गये हैं उसकी पिघलन गंगा-यमुना का सदा नीरा जल हमेशा बहता रहे। आमीन।
9/1006 इन्दिरा नगर, लखनउ

मर्तोली में भी है नैनीताल

गोपालसिंह मर्तोलिया

पि.हि.प्रतिनिधि
बहुत कठिन दौर था वह जब दुनिया से कटे हुए क्षेत्र के लोग अपनी दिनचर्या में हसरतें लिये हुए आगे बढ़ रहे थे। लेकिन उन हसरतों ने ही हौंसला दिया और लोग कामयाब हुए। मल्ला जोहार के मर्तोली में ज्वाला सिंह मर्तोलिया और श्रीमती मोतिमा देवी के घर जन्म हुआ था- गोपालसिंह मर्तोलिया का। 73 वर्षीय गोपाल सिंह जी बताते हैं कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर बहुत जोश होता था बच्चों में। मर्तोली गाँव की गली-गली में बच्चे अपने हाथ का बनाया तिरंगा लेकर गाते थे- ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’। जोहार में जन्मे गोपालसिंह उन पुराने दिनों के गवाह हैं और बताते हैं कि मुनस्यारी से जोहार में माइग्रेशन में जाना-आना होता था। शिक्षक गुलाबराम जी उनके गोठ में ही रहा करते थे। प्रत्येक बच्चे की ड्यूटी थी वह बारी-बारी से राशन उनके घर पहँुचाते थे। एक बार शायद सन् 1955 में बरफ की लहर में उनका स्कूल टूट गया। प्रकृति के करीब रहने वालों ने हौंसला बनाये रखा और दूसरा स्कूल भवन बनाया गया। हमारे परिवार के पास पधानचारी थी। पिता ज्वाला सिंह जी प्रधान थे। मर्तोली में नैनीताल नामक स्थान पर हमारा मकान है। यह स्थान नैनीताल से मिलता-जुलता है। सामने दृश्य और भी मनमोहक। बुर्फू में मल्ला जोहार का पटवारी रहता था और प्रधान से टैक्स वसूली के लिये पटवारी का आना होता था। तब एक टैक्स पटवारी को देना होता था और दूसरा बागेश्वर उत्तरायणी मेले में देते थे। नन्दाष्टमी तक सारे परिवार जोहार में रहने के बाद मुनस्यारी आते थे। तब नन्दाष्टमी मेले के लिये प्रत्येक परिवार से एक बकरा बलि के लिये जाता था। वेदान्ताचार्य पुण्डरीकाक्ष महाराज के कथा प्रवचन का प्रभाव ही था कि यहाँ बलि प्रथा बन्द हो गई। अब तो पचास साल से भी ज्यादा समय हो चुका है जब बलि प्रथा बन्द है।
गोपाल सिंह बताते हैं कि आज पलायन का रोना-पीटना मचा है लेकिन पुराने कठिन समय में सारे गाँव आबाद थे। बोझा ढोकर यात्राओं पर निकले परिवारों ने ठाना था कि वह कुछ करेंगे। तब सुरिंग से मर्तोली जाने तक चार पड़ाव होते थे। खेतीबाड़ी के लिये हर साल ‘इज्जर’ बंजर भूमि खोदने का काम होता था। बंजर खोद-खोद कर आलू, सरसों, फाॅफर/उगल की खूब पैदावार होती थी। एक बार मर्तोली में घट खराब हो गया था, तब आटा पिसवाने के लिये बुर्फू तक जाते थे।
अपने बचपन की याद में भावुक होते हुए श्री मर्तोलिया कहते हैं- जोहार के बड़े ग्रामों में मर्तोली है। गाँव के बीच में कच्हरी लगती थी और सयानों के बैठने की जगह थी। नन्दाष्टमी से पहले नैनीताली पुजाई होती थी, जिसमें प्रधान पिता जी को दो बकरों का सिर मिलता था, फिर सादी पुजाई होती थी जिसमें तीन बकरों का सिर मिलता था। इसके बाद नन्दाष्टमी की पूजा होती थी। मन्दिर के पास मैदान में लगातार खेल होते थे। किसी भी विशेष सूचना के लिये छत में चढ़कर एक व्यक्ति उँफची आवाज में बोलता था, जिसे आजकल एनाउंसर के रूप में समझा जा सकता था। मेले के अवसर पर ढुस्का-चांचरी के लिये सारे ग्रामीण जुटते थे। हिलमधर में हम सभी अपनी ध्यैनियों-परिचितों को देखने जाते थे कि कौन-कौन मर्तोली आ रहे हैं। जोहार से माइग्रेसन में वापस आने से पहले सारा कामकाज समेटा जाता था। खेतों में फसल कटाई के बाद नींममुचाई याने जानवरों को छोड़ दिया जाता था ताकि रहा-बचा वह भी चर लें। उस समय के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में स्व.गोपाल सिंह और हयात सिंह ‘बनवारी’ थे। गोपाल सिंह जी यह भी बताते हैं कि पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया जब घर आते थे, उन्होंने बच्चों को गीत सिखाया था। पठन-पाठन, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम सभी में सहभागिता करते बच्चे अपनी परम्परागत पाठशाला से भी जुड़े थे। नई पीढ़ी में बहुत बदलाव आ चुका है लेकिन उन्हें अपनी जड़ों में जुड़े रहना चाहिये। अभी नन्दा माई के मन्दिर को भव्य रूप देने की तैयारी की जा रही है।