स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती की षष्टम् पुण्यतिथि का आयोजन

अखबारी मिशन के साथ लोक परम्पराओं को जानना जरूरी

हल्द्वानी। पिघलता हिमालय के संस्थापक सम्पादक स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती की षष्टम् पुण्यतिथि के अवसर पर 22 व 23 फरवरी 2019 को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में उच्चशिक्षा निदेशक प्रो.बी.सी.मेलकानी, इतिहासकार व पर्यावरणविद् प्रो.अजय रावत सहित आठ महानुभावों को सम्मानित किया गया। इस मौके पर ‘हिमालयी लोक परम्परा’ विषय पर विद्वानों ने भरपूर जानकारियां सांझा की और हिमालय संगीत शोध् समिति के कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से समा बांध।
जे.के.पुरम् छोटी मुखानी स्थिति आनन्द भवन में समारोह का शुभारम्भ पिघलता हिमालय के वरिष्ठ सदस्य दुर्गा सिंह बोथियाल ने दीप प्रज्जवलित कर किया। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षाविद् विपिन चन्द्र पाण्डे के संचालन में चल रहे समारोह में मुख्य अतिथि जसुली बूढ़ी शौक्याणी के वंशज फली सिंह दताल ने अपनी वंश परम्परा, ग्राम, जसुली के बारे में रोचक प्रसंगों को सुनाया और ‘पिघलता हिमालय’ को हिमालयी जन सरोकारों का पत्र बताया। दुर्गा सिंह बोथियाल ने स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती के साहित्य को उनकी हमेशा उपस्थिति का प्रमाण कहा। हिमालयी लोक परम्परा विषय पर आधर व्याख्यान देते हुए डाॅ.प्रयाग जोशी ने जसुली, तीलू रौतेली, माधे सिंह, संग्राम कार्की सहित कई महापुरुषों का नामोल्लेख करते हुए कहा कि हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिये। हम अंग्रेजों के बनाये गये दस्तावेजों को ही अपना इतिहास न मानें। डाॅ.प्रयाग ने स्व.उप्रेती के मिशन को चलते रहने की कामना की और कहा कि छोटे अखबारोें की सच्ची परम्परा को पिघलता हिमालय सजोये हुए है। शिक्षाविद् ताराचन्द्र त्रिपाठी ने अखबारी मिशन के साथ लोक परम्पराओं को जानने की बात कही। उन्होंने एशिया यूरोप के देशों सहित स्थानीय परम्पराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे पास जो है, उसे हम भूलते जा रहे हैं। जबकि आगे बढ़ने के साथ हमें अपनी विरासतों को संवारना चाहिये। साहित्यकार प्रो.शेरसिंह बिष्ट ने कथाकार-पत्राकार स्व.उप्रेती का स्मरण करते हुए उन्होंने कभी भी अपने को दिखावे का प्रयास नहीं किया। उनका साहित्य देश के बड़े साहित्यकारों के मुकाबले का है। दिल्ली, इलाहाबाद इत्यादि स्थानों को छोड़ वह स्थानीय स्थिति-परिस्थितियों में ही अपने को गढ़ते रहे, जिसे हम लोग समझा नहीं गया है। डाॅ.बिष्ट ने हिमालयी लोक परम्परा में भाषा-लिपि पर विशेष जोर दिया। डी.एस.बी.परिसर नैनीताल वाणिज्य संकायध्यक्ष प्रो.अतुल जोशी, महिला महाविद्यालय के प्रो.एच.डी.तिवारी व राजकीय महाविद्यालय अमोड़ी;चम्पावत की प्राचार्य डाॅ.कमला जोशी ने जल- जंगल-जमीन की बात करते हुए युवाओं को आने वाले दिनों के लिये सजग किया। कुमाउँ विश्वविद्यालय कार्य परिषद के सदस्य डाॅ.सुरेश डालाकोटी, डाॅ.निर्मल चन्द्र मुनगली ने आयोजन के तरीके को सराहते हुए कहा कि अपने मिशन के मुताबिक इस प्रकार के आयोजन बहुत जरूरी हैं। राम सिंह सोनाल ने सीमान्त क्षेत्रा की संस्कृति को विकृत कर पहचानने वालों को आगाह किया और समझाया कि उनकी समृद्ध परम्परा को बनाने और बचाने में पीढ़ियों का योगदान है। उच्चशिक्षा के पूर्व संयुक्त निदेशक प्रो.बहादुर सिंह बिष्ट और निदेशक प्रो.बीसी मेलकानी ने स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती को कलम का सच्चा सिपाही बताते हुए कहा कि उनकी परम्परा बनी हुई है। इस अवसर पर उच्चशिक्षा निदेशक प्रो.बी.सी. मेलकानी, इतिहासकार पर्यावरण विद् प्रो.अजय रावत, संस्कृति के संरक्षण में जुटे फली सिंह दताल, पत्रकार भगवान सिंह गंगोला, कैलाश पाठक, दीप भट्ट, गणेश जोशी को सम्मानित किया गया। प्रोपफेसर विपिन उप्रेती, प्रो.सन्तोष मिश्रा, प्रो.अनिल जोशी, प्रो.दीपा गोवाड़ी, प्रो.जयश्री भण्डारी, प्रो. आशा हर्बोला, प्रो.सुरेश टम्टा, प्रो.एच.एस. भाकुनी ने इसमें सहयोग कर रहे थे। अध्यक्षता कर रहे उच्चशिक्षा उत्तराखण्ड के संस्थापक निदेशक प्रो.पी.सी.बाराकोटी ने आनन्द बल्लभ उप्रेती की पूरी परम्परा को विस्तार से बताते हुए कहा कि कोई भी समाज एकाएक नहीं बनता है। उसे बनाने के लिये लम्बी प्रक्रिया है। जिस मिशन के साथ यह अभियान चल रहा है वह सपफल होगा। कार्यक्रम में स्व.उप्रेती की कृति राजजात के बहाने;तृतीय संस्करण आदमी की बू ;द्वितीय संस्करण और डाॅ.गीता पन्त के कविता संग्रह अनुभूतियों का विमोचन किया गया। इस अवसर पर देवसिंह दरियाल, फलसिंह बोनाल, राजेन्द्र सिंह कुटियाल, पुष्पराज गब्र्याल, प्रो.रीतेश साह, एन.सी.तिवारी, डाॅ.दीपा काण्डपाल, संस्था के संरक्षक गिरीश उप्रेती, डाॅ.लता काण्डपाल डाॅ.मनोज उप्रेती, उदय किरौला, डाॅ.ओंकार नाथ कोष्टा, डाॅ.भुवन तिवारी, शुभम कुमार, सुरेश चन्द्र पाण्डे, ललितमोहन जोशी, अमित पाण्डे, डाॅ.मंजू काण्डपाल, ध्ीरज सिंह फत्र्याल, मदन सिंह बिष्ट, चन्द्रशेखर जोशी, डाॅ.टी.सी.पाण्डे, सम्पादक श्रीमती गीता उप्रेती, ध्ीरज उप्रेती सहित बड़ी संख्या में उपस्थिति थी। अन्त में आयोजन सचिव डाॅ.पंकज उप्रेती ने सभी का आभार प्रकट किया।

वाद्ययंत्र भौंकर और मलयनाथ के भक्त रावल परिवार

नवीन टोलिया

डीडीहाट। भौंकर वाद्ययन्त्र हमारे लोकवाद्यो में प्रमुख स्थान रखता है। अनुष्ठानों, विवाह इत्यादि आयोजनों पर इसकी धुन सुनाई देती है। एक सपाट सा दिखाई देने वाले इस वाद्ययन्त्र की संख्या सीमित ही रह गई है। कुछ लोक कलाकार जरूर इसके साथ दिखाई देते हैं। इन्हीं में से एक हैं- 76 वर्षीय रूप सिंह रावल। श्री रावल भौंकर के दो वर्ष पुराने इतिहास की गणना करते हैं।
रूप सिंह जी बताते हैं कि 200 वर्ष पूर्व धेलेत ग्राम में मेरे दादा राय सिंह रावल रहते थे, उनकी दो पत्नियां थीं। पहली पत्नी से 3 पुत्रा व एक पुत्राी पैदा हुई। दूसरी पत्नी से कोई सन्तान नहीं हुई। ऐसे में दूसरी पत्नी हमेशा दुःखी रहती थी। यहाँ के क्षेत्रावासियों की आस्था का केन्द्र मलयनाथ मन्दिर शुरू से रहा है। तब डीडीहाट का आज का बाजार क्षेत्रा दिगतड़ था। 4-5 मवाशे इस जंगल में रहते थे। माइग्रेसन में आने वाले सीमान्त वासियों के जानवरों को ठहराने का पड़ाव भी यह इलाका था। इस घोर जंगल और गौचर में दुःखी रावल दम्पत्ति ने मलयनाथ के पूजन की ठानी और मन्दिर में जागरण शुरु कर दिया। तब गरजते हुए देवचुला ;भानलिंग की ओर देख कर रुदन करने लगे। ऐसे में मलयनाथ शेर के रूप में प्रकट हुए और आशीर्वाद दिया। कुछ समय बाद उनके घर दो पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ। उन्होंने सन्तान होने पर भखड़ा ;भौंकर देने का वादा किया था। रूप सिंह का दावा है कि उनके पास जो भौंकर है वह उनके पूर्वजों का है। वह बताते हैं कि पहले इस भौंकर को बजाने से जंगली जानवर, बाघ, सुअर इत्यादि भाग जाते थे। मलयनाथ में असीम श्रद्धा रखते हुए उनका परिवार भौंकर संभाले हुए है, जिसे अनुष्ठानों व विशेष अवसरों पर बजाया जाता है। सरल प्रवृत्ति के रूप सिंह इस वाद्ययन्त्रा को श्रद्धापूर्वक अपने साथ ले जाते हैं।

पिघलता हिमालय 5 मार्च 2018 के अंक से