पेटशाल, पनुवानौला में रुकते थे पैदल यात्री

बातचीज

पि.हि. प्रतिनिधि

अल्मोड़ा जिले के पेटशाल इलाका बहुत चर्चित है। चितई गोलज्यू मन्दिर के कारण तो पेटशाल को लोग जानते ही हैं, लखुडियार के कारण भी इसकी चर्चा होती है। इसके अलावा पेटशाली परिवार भी चर्चा का बड़ा कारण है। कला-साहित्य-संस्कृति के लिये इन लोगों को याद करते हैं। इन्हीं परिवारों में से संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर पेटशाली भी हैं। हंसादत्त पेटशाली के पुत्र- प्रेम बल्लभ ;इनके पुत्र जानकी प्रसाद, लीला हैं, पद्मादत्त ;इनके पुत्र रमेश चन्द्र हैं।, हरिदत्त पेटशाली ;इनके पुत्र हुए जुगलकिशोर, कैलाश, ललितमोहन।
संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर बताते हैं कि इनके बुजुर्ग मूल रूप से नेपाल से आये। चम्पावत जिले के पुण्यागिरी के पास टुन्यास में वह लोग रहा करते थे। गोरखों की मारकाट में एक बुजुर्ग महिला और सात साल का बालक कृष्णदेव जान बचाकर भाग निकले। समझदार बुजुर्ग ने पेटशाल में 200 रुपये में जमीन खरीद ली। पेटशाली जी कहते हैं- अंग्रेजों के समय स्थान के नाम पर वहाँ के वासियों को पुकारा जाने लगा। जैसे- कपकोट से कपकोटी, बाराकोट से बाराकोटी, पेटशाल से पेटशाली।
संस्कृतिकर्मी जुगलकिशोर जी ने पेटशाली में पर्वतीय वाद्ययन्त्रों का संग्रहालय स्थापित कर रखा है। कई पुस्तकों का लेखन व सम्पादन इनके द्वारा किया गया है। पहाड़ के गीत-संगीत की वर्तमान स्थिति को देख वह बेहद खिन्न हैं और कहते हैं कि ग्राम्य पृष्ठभूमि में लोक संस्कृति होती है और अब मंचों पर जो कुछ दिखाई-सुनाई दे रहा है अधिकतर वह जानकारी से अनभिज्ञ लोगों का तमाशा है। लोकविधा की जानकारी इन स्टार कलाकारों को नहीं होती है।
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए पेटशाली जी बताते हैं कि पैदल रास्तों के जमाने में गंगोलीहाट से तक लोग नैनी होते हुए पैदल आते थे। कृपालदत्त ताउ की दुकान में रुकने का अड्डा था। पनुवानौला में गंगादत्त बिनवाल का डेरा रुकने का स्थान था। तब चितई में अनावश्यक भीड़ नहीं होती थी। बाद में जब गिनीचुनी बसें चलनी शुरु हुई। यात्राी बस रुकवाकर मन्दिर में भेंट चढ़ाने असिका लेने आते-जाते थे। ग्राम्य जीवन शुद्ध वातावरण का था।

नमक लेकर बदरीनाथ तक जाते थे

बातचीज

पि.हि.प्रतिनिधि
नैनीताल जिले का रामनगर शहर कुमाउँ और गढ़वाल की पुरानी मण्डी है। कुमाउँ कमिश्नर रेमजे ने इस नगरी को 1878 से 82 के बीच बसाया था। मुहान नामक स्थान पर बाघ के हमले से 24 तीर्थयात्रियों की मौत से दुःखी रेमजे ने नामनगर बसाने की सोची। दरअसल यहाँ के प्राचीन रामामन्दिर में चारधाम यात्रियों के ठहहने का पड़ाव था। यहाँ होते हुए यात्री बदरीनाथ को जाते थे।
इसी रामनगर के पुराने व्यापारियों में सुरेश चन्द्र जी का परिवार है। इनके दादा शम्भू दयाल फिर पिता ओमप्रकाश ने जिस फर्म को चलाया वह 1910 में ‘मानकचन्द शम्भूदयाल’ नाम से शुरु हुई। फर्म को नये स्वरूप में अब सुरेशचन्द्र जी के साथ उनके सुपुत्र अनुज और उनके पौते मानस संभाले हुए हैं। सुरेश चन्द्र जी लखनउ से बीएससी करने के बाद अपने कारोबार में जुड़े। इसी प्रकार इनके पुत्रा अनुज कुमाउँ विवि से एकाॅम में टाॅपर हैं। मूल रूप से काशीपुर में व्यवसाय करने वाले इस परिवार ने जब रामनगर में अपना कारोबार शुरु किया था तब गढ़वाल के दूरस्थ क्षेत्रा तक गल्ला सप्लाई में इनकी फर्म अग्रणीय रही। श्री सुरेश चन्द्र जी बताते हैं कि उनके देखादेखी बकरियों में राशन लदकर जाता था। लाला ओमप्रकाश जी घोड़े में सवार होकर वसूली के लिये जाते थे। बदरीनाथ तक राशन सप्लाई के लिये उनके पास लाइसेंस था। नमक, चीनी, गल्ला का जिन व्यापारियों को मिलता था उन्हें ‘नोमनी’ कहते थे। राजस्थान के साम्भरलेक से रेलवे मालगाड़ी द्वारा नमक आता था और द्वाराहाट, मासी इत्यादि इलाकों में इसका वितरण किया करते थे। सुरेश चन्द जी बताते हैं कि सन् 1970 में आई बाढ़ के कारण पीपलकोटी का पुल बह गया था, जिस कारण 17 दिन तक मुश्किलों से होते हुए वह रामनगर पहँुचे थे। समय के साथ व्यापार के तरीके बदल चुके हैं लेकिन पुराने परिवारों के संस्कार उनकी पीढ़ियों को एकसूत्र में बांधने के साथ संस्कारों से भी जोड़ते हैं। इनका परिवार भी सामाजिक कार्यों में जुड़ा हुआ है। श्री सुरेश जी अग्रवाल सभा की गतिविधियों से जुड़े हैं। यहाँ के पुराने रामामन्दिर में इनके परिवार का योगदान रहा है। पहले से यहाँ आने वाले साधू-सन्यासियों को इनके नाना लाला श्यामलाल द्वारा संरक्षण दिया जाता रहा है। उनके भोजन की व्यवस्था राजाराम हलवाई के वहाँ करवाई जाती थी। सुरेश जी बताते हैं कि नाना जी चारधाम यात्रा के लिये पैदल आने वाले सन्यासियों को ठहरने के लिये रामा मन्दिर में स्थान मिल जाता था और भोजन-प्रसाद के लिये नाना जी पर्ची लिखकर राजाराम हलवाई से व्यवस्था करवा देते थे। यह पुराना मन्दिर आज भी व्यवस्था के तहत संचालित है। रामामन्दिर इन्तजामिया कमेटी के रूप में गणमान्य जन इससे जुड़े हैं। पं.जोगेन्द्र दत्त शर्मा मन्दिर और रामनगर की कई यादों के साथ मन्दिर में बने हुए हैं।

दशौली गाँव भी जाते थे माइग्रेसन में

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्तवासियों की घुमन्तू जीवनचर्या में दशौली भी एक पड़ाव था। थल से आगे पुंगराउ घाटी में वृजवाल परिवार जाड़ों में आया करते थे और धरमघर में पंचपाल। उसी प्रकार पांखू के दशौली में गनघरिया परिवार भी आये, जिनकी काफी जमीन आज भी गाँव में है। इन जानकारियों के साथ अल्मोड़ा में जोहार सिंह गनघरिया से बातचीत प्रस्तुत है-
जोहार घाटी के गनघर में व्यापारी धनसिंह गनघरिया हुए। तिब्बत व्यापार सहित स्थानीय व्यापार में यह सक्रिय थे। कहते हैं इस रौबीले व्यापारी के घोड़े-बकरियां जब जाते थे तो अन्य रुक जाते थे। इनकी पत्नी मालती देवी बहुत दयालु प्रवृत्ति की थी और ग्रामीणों को सहयोग में आगे रहती। धनसिंह जी के पुत्र हुए केशर सिंह। फिर इनके तीन पुत्र हुए- त्रिलोक सिंह ;इनके पुत्र हैं- चन्दन और कन्हैया, जगत सिंह ;इनके पुत्र हैं धीरेन्द्र और जोहार सिंह सिंह ;इनके पुत्र हैं राहुल। गनघर से थाला ;बागेश्वर आकर भी गनघरिया परिवार बसे हैं। माइग्रेसन के उस दौर गनघर, तल्लाघोरपट्टा मुनस्यारी और थाला में यह परिवार रहते थे। जोहार सिंह जी बताते हैं कि दशौली में करीब ढाई सौ नाली भूमि उनके परिवार की है। इनके पिता पीएसी में थे, इनके बचपन में ही उनका निधन हो गया। ऐसे में दादी मालती देवी, माता गोपुली देवी, भाईयों के संरक्षण में इनका जीवन बीता। घोरपट्टा में रहकर बचपन की पढ़ाई के बाद पिथौरागढ़ कालेज से पढ़ाई की। बाक्सिंग व फुटबाल के बेहतरीन खिलाड़ी के अलावा यह छात्रासंघ के अध्यक्ष भी चुने गये। अल्मोड़ा आकर बीएड किया।
गनघरिया परिवार स्थित-परिस्थिति में अल्मोड़ा सहित कई जगह फैल चुका है परन्तु इनका मन आज भी अपने गनघर पर है। वाकेई अपने मूल ग्राम के विकास में योगदान के लिये जुड़ना अपनी संस्कृति से सच्चा प्यार है।

अल्मोड़ा शहर: जब लोग पान खाने के बहाने शिब्बन की दुकान में जाया करते थे

संस्मरण

नवीन चन्द्र उपाध्याय

बचपन की यादें बहुत मधुर होती हैं जो कोमल हृदय और अपरिपक्व मस्तिष्क में एक सुन्दर सपने की भांति जीवन भर मंडराती रहती हैं। मेरी बचपन व शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा शहर में हुई अतः यह स्वाभाविक है कि उस वक्त की सारी खट्टी-मीठी यादें अभी भी मन को गुदगुदाती रहती हैं। चूंकि यह शहर एक सांस्कृतिक व प्राचीन सम्भ्यता को अपने में संजोये हुए है, जहाँ पर हर मुहल्ले व गली में संगीत की धारा बहती है। खासतौर पर शुद्ध शास्त्रीय संगीत की झलक यहाँ की बैठकोंहोली में मिलती है। यहाँ कुमाउनी संस्कृति व रीति-रिवाज का सम्पुट अन्य धर्मावलम्बी वर्गों में भी मिलता है। होली, दिवाली, ईद व क्रिसमस साथ-साथ मनाई जाती है। जहाँ दीवाली की बात आती है बचपन में सभी बच्चे शहर की दीवाली देखने जाया करते थे वहाँ उनको खेल-खिलौने मिठाई खाने को मिलती थी। बिजली आने से पूर्व मोमबत्ती व दिये से शहर को रोशन किया जाता था। पचासवें दशक की बात है जब पहले पहल बिजली के बल्बों की रोशनी में दिवाली मनाई गई तो सारा शहर रोशनी से नहा रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शहर आसमान के तारों से जा मिला या तारे शहर में उतर आये हों। कुछ भी रहा हो, बच्चों के लिये यह एक आश्चर्यजनक नजारा था। कभी-कभी ऐसा दृश्य तब देखने को मिलता था जब बरसात या जाड़ों में कोहरा आने पर जमीन व आसमान एक ही नजर आते थे। इसीदृश्य को देखते हुए गीतकारों ने भी गीत लिखा था-
‘‘ये आसमां छू रहा है जमीं पर
ये मिलन हमने देखा यहीं पर………..।’’
विद्यार्थी जीवन के कई रोचक प्रसंग अभी भी याद आ रहे हैं। मैं रामजे हाईस्कूल में पढ़ता था, जहाँ पर प्रार्थना सभा में बाइविल की आयात का पाठ किया जाता था क्योंकि स्कूल ईसाई मिशनरी के प्रबन्ध् न में था। अतः अधिकांश शिक्षक क्रिश्चियन वर्ग के थे। एक दिन मेरे गाँव से एक परिचित मुझे विद्यालय में मिलने आये, वे गेट पर से मुझे बाइविल का पाठ करते देख रहे थे जब प्रार्थना सभा समाप्ति पर थी वे अचानक मेरे बगल में खड़े हो गये मुझे बाइविल न पढ़ने के लिये कहने लगे तथा स्कूल बदलने को कहा। इस पर चुप होकर मैं उनको सुनने लगा जब उनका भाषण खत्म हो गया मैं उन्हें विद्यालय के भीतर ले गया जहाँ हर कमरे की दीवार में बाईविल की आयतें लिखी थी वे इस प्रकार से थी-
‘‘ईश्वर सबका एक है। ईश्वर से प्रेम करो। भगवान का भय बुद्धि का प्रारम्भ है।…..।’’ वे सज्जन इनको
पढ़कर कहने लगे- यह तो हमारे धर्मग्रन्थ में भी लिख रहता है। तब मैंने उनसे कहा कि अधिकांश लोग अन्ध्कार में रह कर एक-दूसरे के धर्म की निन्दा करते देखे गये हैं। वे सज्जन सन्तुष्ट होकर वापस चले गये और मैं अपनी कक्षा में। उस समय मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ता था, मेरी हिन्दी की कक्षा थी, हमको हिन्दी पढ़ाने वाले अध्यापक श्री केशवदत्त पाण्डे जी थे जो साधरण सा लिवास पहने रहते थे तथा उच्च विचारों के एक योग्य अध्यापक थे। उनके पढ़ाने का तरीका ऐसा था कि कक्षा के बच्चे एकदम शान्तचित्त होकर उनको सुना करते थे, वे बीच-बीच में कुछ कहानियां व रोचक प्रसंग भी सुनाया करते थे। एक बार उन्होंने एक रोचक प्रसंग विद्यालय के बारे में सुनाया। प्रसंग इस प्रकार था कि विद्यालय में कुछ अंग्रेज अधिकारी पैनल मुआयने में आये थे उनमें से एक अधिकारी अंग्रेजी अध्यापक की कक्षा का निरीक्षण करने गया, साथ में काजेल के प्रधनाचार्य मि.रावत भी थे अध्यापक को सम्बोधित करते हुए अधिकारी ने कहा- ‘मि.आपका शाब्दिक उच्चारण ठीक नहीं है, ठीक से अंग्रेजी के शब्द बोलिये।’ रावत जी भी अध्यापक का उच्चारण सुन रहे थे। उन्हें लगा कि उच्चारण
सही हो रहा है। उन्होंने अधिकारी से कहा- महाशय! अध्यापक बिल्कुल सही बोल रहे हैं। इस पर अधिकारी नाराज हो गये। रावत जी ने अंग्रेज से कहा मि. क्या आप कुमाउनी भाषा के शब्दों को ठीक से बोल सकते हैंयदि हाँ तो मैं कुछ शब्द बोलता हँू आप उन्हें ठीक उसी प्रकार दुहरायेंगे
बोलें- मडुवाक रऽवाट’, अंग्रेज अधिकारी के मुख से निकला- ‘मडुवाक ल्वात’। इस पर सभी बच्चे हँसने लगे तब रावत जी ने उन्हें समझाया कि भौगोलिक परिस्थितियों व जलवायुके अनुसार ही हमारी जीभ व मँुह का संचालन होता है। ठण्डी जलवायु के लोग अपना मँुह गर्म जलवायु के व्यक्तियो की अपेक्षा कम खोलते हैं जिससे उनका उच्चारण प्रभावित होता है। इस पर अंग्रेज अफसर चुप होकर चला गया।
मध्यान्तर हुआ हम सभी विद्यार्थी बाहर निकले और इसी प्रसंग की चर्चा में हँसते रहे। बाजार में
कन्हैयालाल नन्दलाल के यहाँ दूध् पीने चले गये जो उस वक्त एकआने में एक गिलास मलाई डालकर मिलता था, वह दूध् आज भी याद आता है। अगली कक्षाओं के लिये कुछ समय अभी बचा था, हम सभी शिब्बन पान वाले की दुकान के सामने रेडियो सुनने चले गये। वहाँ पर अधिकांश लोग पान खाने के बहाने रेडियो समाचार व आजाद कश्मीर रेडियो के गाने सुना करते थे। छुट्टी के दिन या इतवार को हम लोग ब्राइटन कार्नर घूमने जाया करते थे और लौटते समय रीगल सिनेमा के सामने ठेला लगाये बाबा के यहाँ स्वादिष्ट गोलगप्पे का आनन्द लेते हुए बसंल होटल के गुलाब जामुन खाना नहीं भूलते थे।
इस प्रकार विद्यार्थी जीवन की छोटी-मोटी बातें आज भी दिलो-दिमांग में घूमती रहती हैं। एक बार नन्दादेवी के मेले में मुझे अपने फूफा जी केसाथ जाने का अवसर प्राप्त हुआ। फूफा जी मुझे अपने कन्ध्े में बिठा कर बावन सीड़ियां चढ़कर मन्दिर परिसर में ले गये, जहाँ बहुत भीड़ एकत्रित थी कारण था भैंस की बलि चढ़ाना लोग देख रहे थे। मैं फूफा जी के कन्ध्े में बैठा सबसे आगे वाली कतार में था। बलि का भैंसा लाया गया साथ में एक खड्ग हाथ में लिये खटिक भी था। राजा काशीपुर के हाथ में खड्ग पकड़ा कर खटिक ने एक ही बार में भैंस की गरदन से सिर अलग कर दिया, खून की धारा बहने लगी। हृदय विदारक दृश्य को देखकर मेर बाल मन विकल हो उठा और मैं बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा। साथ ही मेरे फूफा जी भी गिर पड़े। दोनों को चोटें आई। किसी प्रकार हम लोग घर पहँुच पाये। कई दिनों तक मेरे दिमाग में वह वीभत्स घटना तैरती रही जिससे मुझे रात नींद में चिल्लाने व उठ कर बैठ जाने की शिकायत हो गई। आज भी मैं सोचता हँू कि मनुष्य ने अपनी सुख सुविधा व मनोकामना के लिये या कहें मनोरंजन के लिये निरीह प्राणियों पर किस प्रकार से अत्याचार करते हैं जो एक जघन्य पाप की श्रेणी में आता है। अभी तक यहप्रथा चली आ रही है। कुछ हद तक सरकार ने इसको प्रतिबन्धित किया है। फिर भी लोग चोरी-छिपे ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं जो अनुचित है।

पिघलता हिमालय 1 दिसम्बर 2014 के अंक से

बेरीनाग का प्राचीन मन्दिर स्थल जिसे अंग्रेज शिकारी के कृत्यों से छोड़ दिया गया

डाॅ.पंकज उप्रेती
सुरम्य स्थान बेरीनाग का शहरी क्षेत्र अपनी जमीन के मामले में उलझा है किन्तु आस-पास के गाँवों को मिलाकर नगर पंचायत की तैयारी है। तैयारी तो बहुत है और बसासत का हिस्सा बन चुके चाहते भी हैं कि किसी प्रकार टी-स्टेट के नाम पर मचा हल्ला कम हो और उन्हें जमीन पर मालिकाना
हक मिल जाए।
बेड़ीनाग के नाम पर विख्यात बेरीनाग में को कंक्रीट का जंगल बनाने की होड़ है लेकिन इसके प्राचीन अवशेषों को भुला दिया गया है। विख्यात चाय के बाग हों, मैदान हों, जसुली शौक्याणी का धर्मशाला
हो या प्राचीन नागमन्दिर का क्षेत्र। महाविद्यालय के पास एक टीले में प्राचीन मन्दिर के अवशेष हैं। प्राचीन मन्दिर और इसका नौला अब महाविद्यालय की सीमा के भीतर हैं। नौला तो आस-पास के कुछ परिवारों के लिये सुखद बना हुआ है लेकिन कुछ दूरी पर मन्दिर का खण्डहर झाड़ियों से ढक चुका है। बताया जाता है कि अंग्रेजी शिकारी द्वारा पक्षी को गोली मारी गई जो इस मन्दिर के उपर गिर पड़ा, अंग्रेज उसे लेने के लिये जूते सहित मन्दिर के उपर चढ़ गया। इस घटना के बाद अंग्रेज के
परिवार में वज्र पड़ने से कापफी नुकसान हुआ और वह बेरीनाग छोड़कर ही चला गया। ;पि0हि0के पिछले अंक में भवानी लाल वर्मा के साथ बातचीत में भी इस अंगे्रज परिवार का उल्लेख आया था। मन्दिर के पुजारी भटीगाँव के पन्त जी को स्वप्न में मन्दिर केनये स्थल के बारे में पता चला तो इस मन्दिर को छोड़ कर नागदेवता की स्थापना दूसरे स्थान पर की गई। स्थानीय महाविद्यालय से कुछ आगे पर नाग का प्रसिद्ध मन्दिर है। समय के साथ-साथ पुरानी घटना भुला दी गई और इतिहास बन चुका मन्दिर का खण्डहर भी झाड़ियों के बीच मलवा बनने लगा। यह पहाड़ में बनने वाले पुराने मन्दिरों के डिजायन का है, जिसमें भीतर जाने को छोटा सा मार्ग है। कम उचाई वाले मन्दिर के कमरे में खिड़की भी है। कहा जाता है मन्दिर में पूजा इत्यादि के लिये पानी निकट वाले नौले से आता था।

पिघलता हिमालय 1 दिसम्बर 2014 के अंक से

तय हुआ कुछ करो यारो और बन गया ‘दिगड़ी’ ग्रुप

 

 

डाॅ.पंकज उप्रेती

अपनी जन्मभूमि के प्रति कुछ करने की ललक हो तो बहुत कुछ किया जा सकता है। बच्चों को दिशा दी जा सकती है और बेसहाराओं को सहारा। जोहार-मुन्सयार का ‘दिगड़ी’ग्रुप भी कुछ करने
की ललक के साथ बना है। इस चर्चित ग्रुप का उद्देश्य भी अपनी जन्मभूमि और अपनों के लिये कुछ करना है।
इसके बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। तय हुआ कुछ करो यारो और बन गया दिगड़ी ग्रुप। दिगड़ी किस प्रकार से अपने कार्यों को अंजाम देता है इससे जोहारवासी भली भांति परिचित हैं। इसके सदस्यों के नाम उन्हें मौखिक याद रहते हैं। इस ग्रुप का शुभारम्भ होने की कहानी नवराज पांगती बेहतर बता सकते हैं। बातचीज मे वह बताते हैं कि सन् 1995 में वह बरेली आये थे। नरेन्द्र जंगपांगी भी 1997 में बरेली आ गये। एक सायं हम लोग बैठे थे और मन में आया कुछ करें। गर्मी के दिनों में मुनस्यारी में टूर्नामेंट हुआ करता है। उसके लिये फुटवाल, पम्प सहयोग के रूप में दिये। तब तक ‘दिगड़ी’ नाम का ग्रुप नहीं था। 1999 में एक ग्रुप बनाने की सोची गई। सुरेन्द्र मर्तोलिया, भूपेन्द्र पांगती, कैप्टन भूपेन्द्र पांगती को इस ग्रुप से जोड़ा गया। यह पूरा ग्रुप आपसी तालमेल और विश्वास पर आधारित है। किसी एक की बात पूरे ग्रुप की होती है। उस दौरान डाॅ.शेरसिंह पांगती बरेली आये हुए थे और डाॅ.प्रहलाद पांगती भी बरेली में थे। सबने आपस में बैठक ग्रुप का नाम सोचा। दोस्त से दिगड़ी, दगड़ी जैसे नाम सोचते-सोचते ‘दिगड़ी प्रफाम जोहार’ बन गया। जोहार के दोस्तों
का यह ग्रुप पर्यावरण सन्देश को जोड़ते हुए अपने कार्य करने लगा। सन् 2000 के नववर्ष पर जोहार सांस्कृतिक संगठन बरेली का आयोजन करते हुए ‘उत्तराखण्ड में शौकाओं का भविष्य’ विषय पर परिचर्चा भी की गई। उस समय तक ग्रुप के सारे सदस्य लगातार मुनस्यारी जाते थे। सीमान्त क्षेत्र के दो स्कूलों में जाकर बच्चों को ड्रेस, कापी-किताब बांटने का अभियान चलाया। प्रधान, अध्यापकों के साथ मिलकर यह कार्य किया जाता था। बाद में एक स्कूल गोद लेने का निर्णय लिया गया। चूंकि दरकोट में पूरे ग्रुप का मिलना आसान था इसलिये उसे केन्द्रित करते हुए कक्षा में प्रथम बच्चे को 500, द्वितीय को 300 व तृतीय को 200 देने का प्रावधन किया। यह सारे कार्य ग्रुप के सदस्य अपने स्वयं के सहयोग से करते हैं। बाद में ग्रुप के सदस्यों को लगा हम काफी दूर-दूर हैं इसलिये स्थानीय प्रतिनिधि रखे गये ताकि तत्काल के लिये उनसे सम्पर्क कर मदद की जा सके। ग्रुप ने आपदा में फंसे लोगों को तत्काल सहायता दी है। क्वीरीजिमिया के आपदा प्रभावितों को तत्काल सहायता के रूप में चाय-चावल-माचिस इत्यादि का पैकेट ग्रुप ने बंटवाया। दिगड़ी की कोशिश रही है कि जरूरतमंद को तत्काल और अतिआवश्यक सामग्री उपलब्ध् हो। श्री नवराज पांगती बताते हैं कि 2007 में उनके पिता जी का निधन हुआ, वह गाँव गये हुए थे। नवम्बर मास का समय था। एक दिन वह बालासिंह जी की कपड़े की दुकान पर बैठे थे, वहीं पर उषापति  द्विवेदी भी थे। उस बीच एक परेशानहाल को उन्होंने देखा और पंडित जी कहने पर तुरन्त एक कम्बल और रुपये उस व्यक्ति को दे दिया। कम्बल और उसके उपर रखा सौ का नोट लेने के बाद उस परेशान व्यक्ति की आँखों से आँसू छलक पड़े। तब पंडित जी ने कहा यह आदमी आपको दिल से दुआ दे रहा है। श्री पांगती कहते हैं कि समाज की ऐसी घटनाएं समझने की होती हैं और सिखाती हैं कि किस प्रकार मदद की जा सकती है। वह बताते हैं कि इसके बाद दिगड़ी ने माउण्टेन मैराथन का आयोजन किया। 2007 में इस ग्रुप के साथ पुष्कर सिंह पंचपाल भी जुड़ गये। क्षेत्र के ख्यातिप्राप्त खिलाड़ी या अन्य को सम्मान देने की बात हो अथवा ‘पठौन’ के रूप में अपने पहाड़ की यादों को एक झोले में भेंट स्वरूप देने का रिवाज हो ‘दिगड़ी’ ने किया है। दिगड़ी ग्रुप के सदस्य अपने सेवाकाल के दौरान किसी प्रकार समय निकालकर
कार्य कर रहे हैं और उनका सपना है कि सेवानिवृत्ति के बाद इस कार्य को और भी वृहद रूप से संचालित किया जाये। इसके लिये उनका प्रेम-विश्वास- सहयोग बड़ी ताकत है। सीमान्त वासियों को एक आशा और उम्मीद इस ग्रुप से हो गई है और इसे सपने को साकार करने में वह तत्पर रहेंगे।

पिघलता हिमालय 16 माचर्व 2015 के अंक से

कर्ण की तप स्थली है अलकनन्दा और पिण्डर नदी का संगम कर्णप्रयाग

ललित नैनवाल
जनपद चमोली का कर्णप्रयाग तीर्थों का तीर्थ है। अलकनन्दा और पिण्डर नदी के संगम स्थल पर बसे कर्णप्रयाग को कर्ण की तपस्थली के रूप में जाना जाता है। यहाँ कर्णशिला ;कर्ण मन्दिर में श्रद्धालु जाते हैं। उमाशंकर मन्दिर समिति द्वारा पूर्व में इस मन्दिर का सौन्दर्यीकरण किया गया था किन्तु उसके बाद से आज तक इसमें एक पत्थर भी नहीं लगना हमारे विकास की पोल खोलता है।
कर्णप्रयाग के बाजार क्षेत्र में ही कर्ण का मन्दिर है जिसमें कर्ण की मूर्ति के साथ ही कृष्ण की मूर्ति है। स्थानीय देवता की पूजा भी यहाँ की जाती है। कर्णप्रयाग तीर्थ के महात्म्य को जानें तो पता चलता है कि गंगा और पिण्डर के संगम पर शिव के क्षेत्र में देवालयों में महाराज कर्ण ने यहाँ दीक्षा ग्रहण की। यहाँ तप करके महादेव के मंत्र से तपकर देवी भवन ;वर्तमान उमा मन्दिर में ठहर गये थे। यहाँ ;वशिष्ठ वामदेव, व्यास देव, शुक, पैल, वैशम्पायन, नारद, तुम्बरु, भृगु अश्वसथामा, सदेव, रन्ति देव, महाहनु कश्यम तथा नदो, गालब, दलभक्षक, पॅर्णशत, महानाद, कुमधन्य, तपोनिधेश शनः, शेफ, भारद्वाज, गौतम, गणरात्रिप ये तथा बहुत से ब्रह्मवादी मुनि एवं सैकड़ों ट्टषि कर्ण के यज्ञ में आये थे। सुन्दरि यजमान राजा ;कर्णद्ध ने यज्ञ में सूर्य की अराधना की। तब कुछ दिनों में ;सूर्य ने महात्मा कर्ण को वर दिया तथा अवेद्य कवच और अक्षय तरोण ;तरकश दिये। महावीरो अजेय ;न जीते जाने योग्य होने का वर दिया तथा उसी के नाम पर उस क्षेत्र का नाम रखा गया तभी यह क्षेत्र कर्णप्रयाग के नाम से स्मरण किया जाता है।

पिघलता हिमालय 23 नवम्बर 2015 अंक से

हंसेश्वर महादेव मठ: अस्कोट के राजा पुष्कर पाल के शासन काल से स्थापित है

पि.हि. प्रतिनिधि
जौलजीवी/पिथौरागढ़। भारत-नेपाल सीमा लगे हंसेश्वर धम को महन्तों की लम्बी श्रृंखला ने व्यवस्थित कर संभाल रखा है वर्ना तो इसे अतिक्रमणकारियों की नज़र लग जाती। जौलजीवी के निकट स्थित हंसेश्वर महादेव मठ तितरी अस्कोट का क्षेत्र समस्त अस्कोट गर्खा तल्लाबगड़ धूरा दौ बास है। यह अस्कोट के राजा पुष्कर पाल के शासन काल से स्थापित है। जिसके संस्थापक महन्त हंसगिरि महाराज थे।
बहुतों को आश्चर्य हो सकता है कि इस निर्जन में मठ के पास घेराबन्दी की 500 नाली भूमि है। आश्रम में महन्तों की परम्परा लम्बी है, इसकी पुष्टि यहाँ बनी हुई 14 समाधियां करती हैं। एक बड़े क्षेत्र की आस्था का केन्द्र हंसेश्वर को नेताओं का आश्वासन मिलता रहा है किन्तु कोई सुध् लेने वाला नहीं है। आश्रम में आज भी एक 92 साल और एक 72 साल की माई रहती है किन्तु इन्हें वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिल पाई। बताया जाता है कि इनकी पेंशन के लिये फाइल तैयार की गई लेकिन कागज पूरा करने के पच्चड़ अड़ंगे वाले हैं, इन माईयों से भी आय प्रमाण पत्र मांगा जाता है। मठ में रहकर अपने दिन गिन रही वयोवृद्ध माइयां क्या कर सकती हैं? चुनाव में आशीर्वाद लेने आने वाले नेतागणों को अपनी कथनी-करनी में फर्क नहीं दिखाई देता है। पिथौरागढ़ के तेजतर्रार विधयक मयूख महर ने इस इलाके को स्वर्ग बनाने की बात कही थी तो काशीसिंह ऐरी ने गोवा बनाने की। विधयक विशन सिंह चुफाल भी आश्वस्त करते रहे। जिला पंचायत अध्यक्ष प्रकार जोशी भी कुर्सी मिलने के बाद कम आ पाते हैं। यानी की आशीर्वाद लेने बहुत आते हैं लेकिन सुध् लेने वाला कोई नहीं है। मठ के संचालक परमानन्द गिरी कहते हैं कि धर्मिक पर्यटन का बहुत शोर है किन्तु इस प्राचीन मठ की सुध् विरसा चुकी व्यवस्था से क्या उम्मीद की जाए? मठ के पाास 372 नाली 14 मुट्ठी नाप भूमि है जबकि घेरीबन्दी 500 नाली है। 2013 की आपदा में 50 नाली भूमि को नुकसान हुआ। नदी के कटाव से आश्रम की भूमि बर्बाद हुई जिसमें फलदार वृक्ष आम, लीची, कटहल के लगे थे। पूर्व में कई बार तटबन्ध् की मांग की गई थी लेकिन भूमि कटाव होता रहा लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था।
उल्लेखनीय है कि पैदल यात्रा और कम साध्नों के जमाने में कैलास यात्रा पर जाने वाले साध्ु-सन्यासी कई पड़ावों में रुकते हुए यहाँ से जाया करते थे। इन्हीं में से शंकर गिरी और नागा प्रेम गिरी भी इलाहाबाद से घूमते हुए हंसेश्वर पहँुच गये। ये दोनों काली नदी के सूरज कुण्ड ;गरम पानी के स्रोतद्ध के पास रुके थे, इन्हें खाने के लिये वेर की झााड़ियां भी मिल गई। जंगली फल और वेर खाकर अपनी दिनचर्या यहीं बीतानी शुरु कर दी। वह समय 18वीं सदी का था जब अस्कोट के राजा पुष्कर बहादुर पाल थे। बताया जाता है कि नदी किनारे शवदाह के लिये आने वाले यदि अधजले शव को छोड़ गये तो ये गुरुभाई शव को ही भोजन के रूप में ग्रहण कर लेते। तब राजा से इस बात की शिकायत हुई। एक दिन राजा ने अचानक छापा मारकर इनसे प्रसाद मांगा। राजा ने सुना था कि मांस पकाया जा रहा है। बाबा ने पक रहा भोजन पूड़े में परोसा तो वह खीर थी। राजा ने बाबाओं से यहीं रहने को कहा और भूमि देने की बात कही।फिर पूड़े में बालू भर दी और कहा जहाँ इस पूड़े की बालू गिरेगी वह सारा क्षेत्रा हंसेश्वर का होगा। मौखिक रूप से हुए इस दाननामे में काली नदी के पार नेपाल के उक्कू ग्राम में शहपालमाणो शिवालय है, वह भी इसी मठ के अधीन है। यह भी बताया जाता है कि 1890 में जब जब शंकर गिरी के शिष्य हंसगिरी आश्रम में थे तब पुष्कर बहादुर के पुत्रा गजेन्द्र पाल गद्दी में थे। गजेन्द्र पाल को स्वप्न आया कि पिता पुष्कर पाल जी की आत्मा को रोक लिया गया है और वह मठ के लिये दी भूमि का निर्धारण की बात कह रहे हैं। सवाल था कि मठ की भूमि कितनी है, इसका निर्धारण कैसे हो? तब महन्त ने एक रात्रि का समय राजा से मांगा। उस रात्रि में भूतों ने मठ के चारों ओर दीवार बना दी और खेत बना दिये। अगले दिन राजा ने यह चमत्कार देखा और लिखित दाननामा किया। भारत की आजादी के बाद इस भूमि की किसानबही बनी। आज भी हंसेश्वर मठ की दीवार को भूतों की दीवार कहा जाता है और कोई भी उसे क्षति नहीं पहुँचाता है।
हंसेश्वर की पूरी कथा को कोई श्रद्धा, कोई चमत्कार और कोई रोमांच के रूप में देखता हो परन्तु यह तो सच है कि राज्य का यह अनूठा मठ है जिसके पास काफी अचल सम्पत्ति है। महन्तों की पूरी श्रृंखला ने यहाँ श्रम कर इसे बचाया। इनके हाथों बनी गूल से खेतों में रोपाई होती थी। इसमें आज भी अन्न उगाया जाता है। ऐसे मठ और आश्रम को संरक्षित करने के लिये सभी को ध्यान देना चाहिये।

पिघलता हिमालय 14 दिसम्बर 2015 अंक से

सीराकोट: ऐतिहासिक स्थल

सीराकोट का प्राचीन मुख्य प्रवेशद्वार

डाॅ.प्रयाग जोशी

डीडीहाट के भाष्कर स्वामी के ‘वैकुण्ठ धाम’ आश्रम में पहँुच कर सीराकोट का ऐतिहासिक परिदृष्य दिमाग में कौध् जाता है। जब छपनटा की निर्जल पहाड़ी के उपर वह आश्रम बन रहा था, मुझे उधर से होकर सीराकोट जाने के अनेक मौके मिले थे। आज स्वामी जी के अनुसायियों की उगाई हुई सघन बनाली में पानी के स्रोतों के फूट आने से फिजा ही बदल गई है।
पहले उक्त स्थान से सैकड़ों मीटर नीचे था पानी का पाँच सौ वर्ष से भी पुराना एक नौला जिसमें से कलसी या गगरी भरकर पुजारी पनेर-पोडौ मलैनाथ के मन्दिर की विकट चढ़ाई में सीढ़ियों के सहारे ढो-ढो कर ले जाते थे। इसी भाँति श्रद्धालु जन भी ले जाते थे। खाली हाथ जाना बुरा माना जाता था। कैसे-कैसे शाके सुनते थे उस नौले के पानी के। 1585 ई. में उसी नौले पर पहरा बिठाकर पुरखूपन्त ने, पानी के लिये लड़ाई छेड़ी थी। सीरा के दुर्ग को जीतने की रणनीति का हिस्सा हो गया था ‘छनपटा’ का नौला जिस पर कामयाबी हो जाने से राजा रुद्रचंद्र ने उसे सेनापति का पद दिया। कैसी जबर्दस्त कूटचाल थी आज की ही जैसी उस जमाने के पानी की भी। जबकि पानी, हवा, धूप व आकाश जैसा प्रकृति द्वारा प्राणिमात्रा को मिला वरदान माना जाता था। उसको, बेचने और खरीदने की वस्तु बनाने की कल्पना भी नहीं हो सकती थी। पुरुखूपन्त के चैगर्खिया कटकुओं से, पैसौं के महंगे मोल पानी खरीदते-खरीदते राजा का कोष खाली हो गया और हरिमल्ल राजा ने, चन्दराजा के लड़ैतों के सामने हाथ खड़े कर दिये। कोटपाल, पहरी, उघाईदार, नेगी, बजनियाँ, साहूकार, पुरोहित, धर्माध्यक्ष सबको दुर्ग खाली करके युद्ध-विराम करना पड़ा था। राजा डोटी भागा और और सीरा का सम्पन्न राज्य मल्लों के हाथ से चन्दों के हाथ में चला गया। राज रुद्रचन्द सोर और गंगोली अधिराज्यों को पहले ही अपने में मिला चुका था।
अब सीरा के हाथ आ जाने से जोहार-दारमा से लेकर जुमली-हुमली तक के सीमान्तों तक व हिमालय के नाकों के उस पार तिब्बत की मण्डियों से लेन-देन की नीति बनाने की सहूलियत थी। चम्पावत के ‘छोटे कुमाउँ’ से निकल कर अल्मोड़ा के ‘वृहत्तर कुमाउँ’ बनने की बड़ी उपलब्धियों के पीछे, एक तरफ 1585 ई. की, वहाँ दुर्लभ पानी के विक्रय की तुच्छ-टुच्ची सी सैतानियत का योगदान है तो दूसरी तरफ है उस दुरारुढ़ विकट काँठे पर एक तहसील के बराबर के भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित सीरा अधिराज्य की ‘राज्यबूंगी’ से, गंगोली, सोर, अस्कोट-उक्कू से लेकर डोटी दिपायल, जुमला-हुमला आदि बाईसी व चैबीसी राज्यों तक के समस्त राजाओं को अपनी मातहती स्वीकार कराकर हिन्दू राष्ट्र राज्य के बड़े शासक कहलाने की आनन्द मल्ल व संसारमल्ल जैसे राजाओं की सफल महत्वाकांक्षा। बहुत शानदार और व्यवस्थित राजतन्त्र रहा है मल्लों का। कृषि कर के की, उनके समय विकसित हुई प्रणाली और उसकी वसूली का प्रबन्धन्त्र तो अदुतिय ही है।
बैकुण्ठधम आश्रम की बायीं पहाड़ी के उच्चतम शिखर पर मल्लों के ‘देवकोट’ में मलैनाथ का मन्दिर है। जिसे राजा पापनेश्वर के विरूद से पूजते थे। वहाँ आज भी नित्य पूजा होती है। आठबीसी, बारबीसी, माली-कसाण, डीडीहाट, वगला-पोखरी, परगड, कौली-गराली, चुफालदेस, खेतार-महरगों आदि गरखों के इष्ट देवता हैं मलैनाथ स्वामी। मल्लों के बखत मन्दिर-परिसर में ही ‘दिव्य’ प्रथा से न्यायिक-दण्ड के मामलों का सम्पादन होता था। मन्दिर के बायंे, उससे अपेक्षाकृत कमतर उँची पहाड़ी के समतल शिखर पर ‘राजकोट’ था। देवता का मन्दिर होने से ‘देवकोट’ तो आज भी गुलजार है पर ‘राजकोट’ का नामलेवा तक कोई नहीं मिलता।
सीराकोट तीन तरफ से दर्गम्य चट्टानों से रक्षित होने से स्वयं दुर्ग है तथापि चारेक नाली के खेत के बराबर उपलब्ध् उस स्थान को पत्थरों की दीवार देकर प्राचीरवत घेरा गया था। किले जैसे उस राजघर का नामोनिशान मिटाने के इरादे से रुद्रचन्द ने उसे बरबाद करवाया। माल-असवाब, दस्तावेज, कोष-जेवरात जो भी रहे हों, रामगंगा के उस पार गंगोली पहँुचाये गए, कि कहीं मल्लों की फौज डोटी से चलकर उसे फिर से कब्जिया न ले। वीरान हुए राजकोट के निवासों का उपयोग बाद के वर्षों में राजद्रोह के अभियुक्तों को रखने के जेलखाने के रूप में होता रहा। वर्षाती बाटों के रख रखाव के बिना, सीढ़ियों- खडंजों व पटालों के रड़ते खिसकते और बहते जाने से सब कुछ वीरान- खण्डहर होता चला गया। आज सीरा के साथ जुड़े शब्द ‘कोट’ पर किसी का ध्यान नहीं जाता तो नयी पीढ़ी के बच्चों को इतिहास पर यकीन करना कैसे सिखाया जाय? उस गौरवशाली राजकोट में प्रवेश करने के मुख्य गेट का आध हिस्सा भर बचा हुआ है जिसका फोटो आप इस लेख के साथ छपा हुआ देख सकते हैं। उसकी पुरातत्त्व विभाग से मरम्मत कराई जानी है। सीराकोट का एक समृद्ध ऐतिहासिक स्मारक के रूप में पुनर्निर्माण होना जरूरी है।
सन् 1353 ई. से लेकर 1585 ई. तक के 232वर्षों तक आदित्यमल, निरैपाल, नागमल्ल, रिपुमल्ल, कल्याण मल्ल, आनन्द मल्ल, संसार मल्ल, पूरन मल्ल, अर्जुन मल्ला, भूपति मल्ल और दो बसेड़ा राजाओं ने सीरा अधिराज्य पर राज किया। उनकी शासन पद्धति और कार्य संस्कृति पहाड़ों के भूगोल व जीवन संधरिणी स्थितियों के अनुकूल थी। उनकी नागरिक नीतियों में प्राकृतिक संसाधनों को बनाये रखने की प्रेरणा है। जंगल, गौचर, गाड़ गधेरों के निर्मम इस्तेमाल की कोई सूचनाऐं नहीं हैं। जमीनों के वर्षवार बन्दोबस्त, वेतन-विहीन जागीरदारी शासन-प्रबन्ध्,विनिमय आधारित मुद्राविहीन अर्थ व्यवस्था, स्थानीय उत्पादों के उपजन, भण्डारण व उपभोग की पंचायती व्यवस्था और उनके स्वायत्त अर्थशास्त्र की बहुत सी चीजें आज के समय भी प्रासंगिक लगती हैं। उनका, बकरियों, घोड़ों और भार वाहियों पर निर्भर परिवहन रोजगार पैदा करने वाला है। कमाई करने की खातिर गाँव व प्रदेश से पलायन का विरोध् करता है। बंजर पड़े गाँवों को पुनः आबाद करने के सरकारी प्रोत्साहनों की चमत्कृत सूचनाएंे मल्लों के इतिहास में खोजी गई हैं।
मौखिक ख्यातों, बहियों व ताम्रपत्रों के अध्ययनों से सीरा के तत्कालीन सूक्ष्म इतिहास की अपूर्वियत को समझने की गम्भीर कोशिश के साथ उस ‘गढ़ी’ को हरियाली से भरने के लिये भाष्कर स्वामी जैसे समर्पित प्रकृति प्रेमियों को भी मुहिम में लगाने की जरूरत है।

पिघलता हिमालय 3 जुलाई 2017 के अंक से

चंद राजाओं के वीरों के ग्राम करक्यूड़ा को अब खर्ककार्की के नाम से जानते हैं

गाँव का पुराना नौला

पि.हि.प्रतिनिधि
चम्पावत जिले के मुख्यालय से लगे गाँव खर्ककार्की में अब कंक्रीट का जंगल विस्तार लेने लगा है। करक्यूड़ा नाम के इस ग्राम को खर्ककार्की नाम से जाना जाता है। कार्कियों के परिवार यहाँ बहुतायत से हैं। दरअसल चंद शासक के समय कार्की उनके वीरों में सम्मलित थे। चंद शासनकाल में उनके चार बड़े मंत्रियों में कार्की, चैधरी, तड़ागी, बोरा थे। आज भी चम्पावत में चार भागों में इनकी बसासत है। कार्की आल, चैकुनी आल, बोरा आल, चैधयाली। संग्राम कार्की नाम इतिहास में है जो पराक्रमी योद्धा के रूप में जाने जाते हैं।
खर्ककार्की से कई स्थानों पर कार्की परिवार जाकर बसे। इनमें से पुंगराउ घाटी में भी यह बसे। इसी गाँव में शक्टा परिवार इनके आचार्यों के रूप में स्थापित हैं। संस्कृत के विद्वानों शक्टा परिवार आज भी स्वाध्याय व अपने संस्कारों के साथ सामाजिक भागीदारी में संलग्न हैं।
खर्ककार्की गाँव आलू की खेती के लिये भी प्रसिद्ध रहा है लेकिन आजकल सुअरों के आतंक से खेतों को नुकसान होने के कारण क्षेत्रवासी परेशान हैं। गाँव में आज भी पुराने भवन दिखाई देते हैं लेकिन अब अधिकतर सीमेंट-गारे के बनने लगे हैं। पुराने नौलों को भी सौन्दर्यीकरण के सजाया गया है।
चम्पावत मुख्यालय से लगे इस गाँव से कई परिवार अब बाहर जा चुके हैं लेकिन फिर भी उम्मीद है कि कई लोग लौटेंगे। अपने समृ( इतिहास का स्मरण करते हुए अपनी जड़ों को टटोलते हुए वापसी करेंगे। आने जिस प्रकार चम्पावत मुख्यालय फैलता जा रहा है उस अनुपात में खर्ककार्की भी घिरता जायेगा। इसलिये भी जरूरी है यादों को सहेजा जाए।

पिघलता हिमालय 12 फरवरी 2018 अंक से