लोकवाद्य विलुप्त हो गई विणई

डाॅ. पंकज उप्रेती

मानव सभ्यता के साथ संगीत भी चला आ रहा है। अपनी अभिव्यक्तियों को व्यक्त करने के लिये लोकजीवन में पहले पहल कुछ इशारे, कुछ स्वरों से इसकी शुरुआत रही होगी। जो धीरे-धीरे विकसित होते हुए धुनों में बनती चली गई, वाद्ययन्त्र विकसित होते गये। विकास की इस प्रक्रिया में कई वाद्ययन्त्र विसरा दिये गये हैं। ऐसा ही यन्त्रा है- ‘विणई’। विणई/मुरचंग प्रायः सभी जगह रहा है परन्तु उन स्थानों पर ज्यादा प्रचार में रहा जहाँ पशुचारण व वन कर्मों में लोग जुटे रहे। देश-विदेश में मोरसिंग, मुखरशंखु, मोरछंग नाम भी सुनाई दिये हैं। अंग्रेजी में इसका नाम Jaw Harp है। उत्तराखण्ड के अलावा राजस्थान, बंगाल, कर्नाटक, आसाम, उड़ीसा, आन्ध््र प्रदेश, तमिलनाडु में इसका प्रचलन रहा है। नेपाल, पाकिस्तान के सिंध् प्रान्त, चीन, नाॅर्वे, रूस, ईरान, इटली, हंगरी, फ्रांस, के लोक संगीत में भी इसका प्रयोग होता रहा। वाद्य संगीत के विशेषज्ञ डाॅ. लालमणि मिश्र कहते हैं- ‘‘प्राकृतिक संगीत ही लोकगीतों की परिभाषा है। मानव जब असभ्य था, तक वह अपने उद्गारों को प्रकट करने के लिए वाणी द्वारा कुछ अस्पष्ट शब्दों का उच्चारण करता था। उस सयम वही वाणी उसकी कविता और वही अस्पष्ट शब्द अथवा ध्वनियुक्त स्फुरण उसका संगीत होता था।’’वाद्य
संगीत की बात होते ही सबसे प्रथम गायन की चर्चा होती है परन्तु यह स्वयंसिद्ध है कि गायन को लय देने के लिये वाद्य होते हैं। इसके अलावा वाद्यों की अपनी तरंग हमें रंजित करती रही है। आज भी बचपन के खेल में बच्चे मुंह में धागा वगैरह दबाकर एक अंगुली से उसे बजाते हैं, आम की कोमल गुठली को घिसकर उसे बाजते हैं, माचिस की खाली डिब्बी में धगा या सुतली बांध् कर एक से दूसरे साथी को सुनाते हैं। पत्थरों को आपस में बजाकर उनकी आवाल से प्रसन्न होते हैं। वर्तमान की भागमभाग और साधनों की भरमार के कारण हो सकता है शहरी बच्चे इस प्रकार के खेलों से दूर हों लेकिन वह भी किसी न किसी रूप में इस प्रकार के खेल खेलते हैं और झिंग-झिंग, टिन-टिन, डम-डम इत्यादि आवाजों के साथ आनन्दित होते हैं। ऐसा ही कुछ मानव जीवन के शुरुआत में हुआ था। सभ्यता विकसित होती रही लेकिन वनों में ग्वालवालों ने मनोरंजन के लिये इसी प्रकार के लोकगीतों लोकवाद्यों का प्रयोग किया। वंशी, अलगोजा, मुरचंग/विणई इत्यादि बजाकर मनोरंजन व अपने पशुओं को संकेत के लिये धुनों का छेड़ा। इन्हीं में से वंशी के प्रकार बांसुरी खूब सुहाई और शास्त्रीय संगीत के मंचों तक धूम मचा रही है। अवनद्ध वाद्य विकसित होकर तबले के रूप में गायन व अन्य संगतों में श्रेष्ठ है। तंत्रवाद्य, गजवाद्यों ने भी शास्त्रीय संगीत का श्रृंगार किया है। दूसरी ओर लोक के कई वाद्ययन्त्र विलुप्त होते जा रहे हैं। इन्हीं में से एक है- ‘विणई’। लोक अपनी प्रकृति व प्रवृत्ति के अनुसार वाद्ययन्त्रों का प्रयोग करता रहा है। जो कुछ हमें उपलब्ध् है, उसी अनुरूप संगत के लिये वाद्ययन्त्र को गढ़ते चले जाते हैं। डाॅ.लालमणि मिश्र लोक-संगीत-वाद्यों के बारे में कहते हैं- ‘‘सामन्यतः लोक-संगीत के वाद्यों की समस्त सामग्री प्रकृति-जन्य होती है। जिसमें मिट्टी, काठ, खाल मुख्य हैं किन्तु उनकी बनावट में कहीं-कहीं कारीगरी के अद्भुत नमूने देखने को मिलते हैं।’’
‘मुरचंग’ को ‘मुखचंग’ की संज्ञा भी दी गई है। इसके दो कारण हैं- पहला तो, इसके बीच के भाग को दातों से दबा कर बजाते हैं। दूसरा, इसकी ‘भन्न-भन्न’ व ‘भिन्न-भिन्न’ की आवाज द्वारा ताल वाद्य चंग जैसा ही बजाकर गीत की संगति की जाती है। इस प्रकार दांतों से दबाकर बजाने के कारण ‘मुंह’ ‘चंग’- मुंहचंग/मुखचंग नाम उपयुक्त है। यह वाद्ययंत्र बहुत ही सीमित हो चुका है। उत्तराखण्ड प्रदेश की बात करें तो यहाँ विलुप्त होने को है। लेखक ने जगह-जगह जाकर इसे ढूंढा लेकिन इसे बनाने वाले शिल्पी भी इसे नहीं बना रहे हैं। सुरम्य स्थल बेरीनाग के बोराखेत में रहने वाले सेना के रिटायर्ड सूबेदार व काष्ठकला में प्रवीण श्री अर्जुनराम चम्याल जी ने एक बिणई सन् 2014 में लेखक को दी थी। इस छोटे से वाद्ययन्त्रा को हिपफाजत से रखने के लिये उन्होंने लकड़ी की एक आकृति भी बनाई ताकि डोरी से लपेट कर विणई को इसमें रखा जा सके। लेखक के पास यह वाद्ययन्त्र सुरक्षित है।
‘मुरचंग’ लोहे की शिल्पकारी का एक अद्भुत लोकवाद्य है। उत्तराखण्ड में दस्तकारी में लगे लोक समूह को उसी सामान्य रूप से शिल्पकार की जातीय संज्ञा प्रदान की गयी है, जिस प्रकार से बंगाल प्रदेश में लोहे के दस्तकारों को कर्मकार की प्रदान की गई है। लोहे को घन, हथौड़े, निहाई, भट्टी की मदद से ठोक-पीटकर तरह-तरह के औजारों की शक्ल में बदलने वाले पर्वतीय शिल्पकार जहाँ कृषि यन्त्रा- खुरपी, कुटला, कुदाल आदि और अन्य औजार- चाकू, भाला, तलवार इत्यादि तथा साधरण उपयोग की परम्परागत जरूरी चीजें बनाते हैं, वहीं ये कुछ कलात्मक और असाधरण चीजें उदाहरणार्थ- कुण्डे, ताले, मुरचंग/बिणई आदि बनाने की परम्परा संयोये हुए हैं। प्रचलन में न होने से विणई नहीं बनाई जा रही है। इसे बजाने वाले भी सीमित हैं। कुमाउँ में इसे ‘विणैं’ भी कहा जाता है। विणई को लेकर अद्भुत प्रयोग लोककलाकार श्री जुयाल द्वारा किया गया है। लेखक ने संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली द्वारा चण्डीगढ़ में आयोजित ‘वृहद्देशी संगीत समारोह’ में लोकगायक श्री नरेन्द्र सिंह के साथ पधरे श्री जुयाल का विणई में अद्भुत एकल मंचीय प्रदर्शन देखा। सीधी ताल, आड़ी ताल व पल्टों की गुंजाहट में श्रोता भावविभोर हो गये थे। अपने एक अध्ययन में मासी जिला अल्मोड़ा की संस्था इन्हेयर का कहना है- ‘‘विणैं के स्वर बड़े सुमधुर होते हैं। इन स्वरों में कारूणिकता विद्यमान रहती है। वर्तमान में यह वाद्ययन्त्र प्रायः लुप्त सा हो गया है।’’
पूर्णतः लोहे के बने इस लोक वाद्य की इस पर्वतीय प्रदेश में बहुत उपयोगिता पशुचारण में लगे लोगों के बीच रही है। बांसुरी या मुरचंग ही इनमें लोकप्रिय व मन बहलाने का साधन रहा है। इसके अलावा पैदल यात्राओं के जमाने में दूर-दूर तक यात्रा पर जाने वाले व्यापारियों के पास भी विणई मिल जाती थी। समय बदला, मनोरंजन के साध्न बढ़ते चले गये, रहन-सहन, कार्य- व्यवहार बदले, ऐसे में ‘विणई’ जैसे वाद्ययन्त्रा विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्ति के कगार पर हैं। मुरचंग के बारे में गीत रचनाओं में कापफी जगह उल्लेख आया है। उदाहरण के लिये पहाड़ की बैठ होली की धमार का रचना प्रस्तुत है-
‘‘मनसुख लाओ मृदंग, नाचत आई चन्द्रावलि पग बांध् घुंघरवा।
ताल पखावज बाजन लागे, अरु डफली मुरचंग।’’
विणई चिमटी में पिन लगा जैसा छोटा या वाद्ययन्त्रा है, जिसे आसानी से जेब में रखा जा सकता हे। इससे दो-तीन भिन्न-भिन्न स्वरों में दो-तीन पटाक्षर- भुन्न-भुन्न और भन्न-भन्न उत्पन्न होते हैं। उन पटाक्षरों की मदद से इस लोक वाद्य पर विभिन्न लयों की चमत्कारी संगतियां सम्भव हैं। इसे कभी एकल और कभी गीत की संगति में लोक कलाकार बजाते हैं। डाॅ.लालमणि मिश्र ने लोक-संगीत वाद्यों को उद्देश्य की दृष्टि से दो वर्गों में बांटा है। पहला वर्ग उन वाद्यों का है जिन्हें हम लय अथवा ताल के लिये बजाते हैं। स्वर के लिए बजाये जाने वाले तत तथा सुषिर वर्ग के वाद्य होते हैं जिनकी संख्या तथा भेद लोक-संगीत में अधिक नहीं है। लय अथवा ताल के लिए बजाये जाने वाले अवनद्ध तथा घन के अन्तर्गत आते हैं। भारतीय लोक-संगीत में इनकी संख्या इतनी अधिक है कि देखकर आश्चर्य होता है।
विणई की विशेषता है कि इसमें ट्यूनिंग की बड़ी ही संवेदनशील गुंजाइश होती है। वाद्य की ‘भन्न-भन्न’ पटाक्षर प्रदान करने वाली स्टील या लोहे मुख्य पतली सी चपटी पट्टी पर थोड़ाी मोम जमाकर या उस मोम को कम ज्यादा करके इसके मुख्य स्वर को थोड़ा चढ़ाया या उतारा जा सकता है। इसका ठीक से समझने के लिये कहना उपयुक्त होगा कि जिस प्रकार मृदंग के मंुह पर आटे को लगाकर उसमें बायंे को दाहिने केे समानान्तर स्वर में मिलाते हैं, उसी प्रकार से मुखचंग/ मुंहचंग/विणई को भी मिलाया जा सकता है। इस प्राचीन और चिमटीनुमा वाद्ययन्त्रा की यादें अब किवाड़ों में बन्द सी होती जा रही हैं। जो भी हो, इनके बारे में जानकारी तो होनी ही चाहिये।

संगीत साधक पं. शीतल प्रसाद मिश्र

भरत कुमार मिश्र

पं. शीतल प्रसाद मिश्र का जन्म उत्तरी बिहार के मिथिला प्रान्त के मधुबनी मिथिला के एक सांगीतिक घराने में हुआ। इनके पूर्वज, काशीराज के कथाकार, गायक, कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित थे। काशीराज नरेश, रीवां नरेश एवं दरभंगा नरेश मैत्री के पफलस्वरूप आदान-प्रदान के कारण काशी से कुछ कलाकार मिथिला आये। इन्हें दरभंगा, मधुबनी राज्य से गाँव-जमीन आदि देकर बसाया गया। इनमें से भरत कुमार मिश्र ;लेखक लगभग सातवीं पीढ़ी के कलाकार हैं।
पं. शीतल प्रसाद मिश्र के बाल्यकाल का नाम घूरन मिश्र था। पं. शीतल जी अपने परिवार के सबसे कनिष्ठ पुत्र हैं। सबसे बड़े भाई स्मृति शेष पं.दुर्गा प्रसाद मिश्र, कमशः उमा देवी;पत्नी पं. गामा महाराज, श्याम देवी ;पत्नी पं. बद्री महाराज, पं. दिनेश मिश्र, स्वयं पं. शीतल प्रसाद मिश्र हैं। कहा जाता है कि पं.शीतल प्रसाद मिश्र के जन्म के समय इनकी माता जी ;दादी श्रीद्ध मूर्छित हो गई थीं। काफी समय तक लोग इन्हें मृत समझकर इस शिशु को अशुभ जानकर घूरे पर, जहाँ कूड़ा-करकट झाड़-बुहार कर रखा जाता है, खिसका दिया…….। काफी देर बाद, दादी जी की चेतना वापस आने पर इन्होंने शिशु की खोज की और महिलायें घूरे पर से वापस ले लाईं, और इस कारण पं.शीतल जी को घूरन पुकारा जाने लगा। गाँव में अभी भी घूरन बाबू, दुर्गा बाबू, दमन बाबू उर्फ दिनेश मिश्र नाम प्रचलन में हैं।
पं.शीतल जी के पिता स्मृति शेष पं. अनन्त मिश्र जी, स्वयं भी एक अच्छे एवं छिपे हुए लोग संगीत के कलाकार थे। ताउ जी पं.आद्या मिश्र भी शास्त्रीय गायक थे, चाचा पं. हरिशंकर ;लल्लू जी एक कुशल तबला वादक थे। पं. अनन्त मिश्र के पिता शेष स्मृति पं. परमेश्वरी मिश्र, दरभंगा, मधुबनी के रियासत के तहसीलदार पद पर कार्यरत थे। उस समय, इन्हें घोड़े की सवारी मिली थी। उस जमाने में महिलायें घोड़ों की बग्घी-गाड़ी में पर्दे में सवारी करती थीं।
भावातिरेक में कभी पिता श्री शीतल जी ने भी अपने बारे में कहा था जैसा कि इन्होंने अपनी दादी, नानी से सुना था कि पैदाइश के समय माता श्री जी का मूर्छित होना, चार वर्ष की आयु में दादा पं. परमेश्वरी जी का एवं पाँच वर्ष की आयु में पिता पं.अनन्त मिश्र जी का निधन और तत्पश्चात परिवार का विघटन…..यह सब मेरी अभाग्यता का सूचक ही तो है। उसके बाद यह परिवार अपने मायके अर्थात पं.शीतल जी अपने ननिहाल, जो कि उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के मोंढ़ जिला भदोही स्थित नाना पं.शम्भू मिश्र एवं मामा पं. बेचन मिश्र जी के यहाँ पले बढ़े। यह सौभाग्य बन गया कि छः वर्ष की अल्प आयु में इन्हें ;पं.शीतल जी को बड़े बहनोई पं. गामा महाराज जी के साथ कबीर-चैरा, वाराणसी भेज दिया गया। कालान्तर में पं. गामा महाराजा जी, आरा बिहार प्रदेश में शिक्षक के रूप में प्रतिष्ठत हुए। यहाँ बनारस में इनकी देखरेख पं. बद्री महाराज जी, जो कि स्वयं कंठे महाराज जी के शिष्य थे, उनकी देखरेख में प्रारम्भिक कायदे-पल्टे विस्तार से अभ्यास कराया गया। तत्पश्चात गुरु पूर्णिमा के अवसा पर वे अपने गुरु पं. कंठे महाराज ;वाद्य शिरोमणि जी से गंडा-बंधन करवाया। इस प्रकार, प्रारब्धवश, पं.शीतल प्रसाद जी के पूर्वज वाराणसी काशीराज से बिहार के मिथिलांचल घराने की छाप लेते हुए पुनः बनारस घराने के गंडा-बंध् शिष्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
अतः इनकी शिक्षा-दीक्षा वाराणसी में हुई। आदर्श सेवा विद्यालय में कक्षा 8 की पढ़ाई के समय कभी-कभी पं.गोपाल जी मिश्र एक उद्भट्ट सारंगी वादक, अपने बैठक में रियाज करते थे और पं.शीतल जी के शब्दों में- ‘‘मैं उनकी सारंगी के आलाप, बंदिश और तानों की झड़ी-लड़ी में खो जाता और पंडित जी ‘गोपाल मामा’ एवं पं. हनुमान प्रसाद मिश्र ‘हनुमान मामा’ अपने बैठक से देखते और बुला लेते, फटा सा ढीला बायां दे देते और कहते कि तिताला ठको लगाव। मैं देखता विस्मय से, खाली ढीले बायें से ठको कसे बजाई? तो खुद बायां लेक बेताया ‘ना ध्े ध्े ना। ना ध्े ध्े ना। ना क के नो। ना ध्े ध्े ना।’ बस हम शुरु हो जाते, घंटों अभ्यास करते और कराते भी, यह हमारे ध्ैर्य की परीक्षा, आदर की भावना की परीक्षा थी और इस प्रकार हमें पीतल की इकन्नी देते और कहते कि पिफर आये। पं. हनुमान मिश्र एवं पं. गोपाल मिश्र मामा द्वय, पं. राजन एवं साजन मिश्र बन्ध्ु के पोते एवं चाचाची थे। इन्हीं के घर मेरे बहनोई पं. बदरी महाराज जी उपनाम खदेर जी ने प्रथम प्रदर्शन के रेपू में सोलो तबला वादन कराया था। गत फरद, टुकड़ा, बांट आदि का खूब अभ्यास करक ले गये थे। उसके बाद राजन-साजन मिश्र बन्ध्ु का युगल गान बंदिश, ‘सुमरन कर मनु राम नाम को’ आज भी कानों में गुंजायमान होता है।’’
पं.शीतल जी आगे बताते हैं कि शायद आज पद्मभूषण पं. राजन जी एवं पद्मभूषण साजन जी को याद हो और प्रथम प्रदर्शन के फलस्वरूप मैंने ठेका लगाया था। पं.शीतल जी के शब्दों में, ‘‘स्वर साम्राज्ञी श्रीमती गिरिजा देवी जी के यहाँ तीन रुपये महिने की ट्यूशन करने जाते थे…….कभी-कभी लय लय बढ़ जाने पर दीदी ‘गिरिजा दीदी’ टोकती रहती थीं…….इस प्रकार हमें अच्छे- अच्छे धुरंधर कलाकारों का सहयोग, आशीर्वाद व मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ।’’
गुरु सेवा में तत्पर……किसी प्रकार की सेवा जो लोग न कर पाये, वह करने में कभी भी ‘ना’ शब्द से इनको लगाव नहीं था। जूता पालिश, तेल मालिश, कपड़े धेना, लंगोट आदि……बाजार से सामान ढूंढकर जहाँ से भी हो, ले आते, कभी-कभी ‘गुरुवर’ कह देते कि फलनवां का नाहीं मलिल, तै कहाँ से लै अइले….., वाह बेटा, हनुमान जी जैसन ढूंढ के लैै अइले खुश रह ;बनारसी बोली में।
गुरु गृह में शिक्षा के दौरान पं. पूरन मिश्र सुपुत्र पद्म विभूषण पं. किशन महाराज, पौत्रा पं. कंठे महाराज जी के पूछने पर ओस्ताद, हम लोग गुरुवर को ओस्ताद सम्बोधन से पुकारते……..कि शीतल नाम गुरुवर के खानदान में किसी का न था, अतः बार-बार किसी बुजुर्ग का नाम न दुहराया जाय, अतः पूरन जी ने अपने बब्बा से पूछा इनके हम का कही?………पहले लोगबाग, नाउ-काका धोबी-चाचा, दर्जी-मामा आदि नाम से सम्बोधित करते थे। अतः गुरुवर ने शीतल नाम बदल के ‘सार’ नाम दे दिया कि फलनवां ;बद्री के के तू भैय्या कहल और इ ओकर सार हौ, अतः तोहू इनके ‘सार’ कहल कर…….इस प्रकार घरभर ‘सार’ नाम से सम्बोधित करते, बचपन से छोटे-छोटे जीव जंतु भी पैर से न कुचल जाय, अतः ये जमीन देखकर चलने के कारण गुरुवर कभी-कभी कहते भुइंतक्का ‘जमीन देखके चलने वाला।’
कबीर चैरा से चैकाघाट लकड़ी का गट्ठर लाद के मजदूर लाता पैदल……..उसके सिर से कुछ लकड़ियां गिरती, उसे उठाकर घर आते-आते उस समय तक मेरे पास भी 6-7 लकड़ियां हो जातीं, यह सेवाभाव था।
नौकरी सन् 1967 ई. में भातरखण्डे संगीत महाविद्यालय लखनउफ में तबला संगतकर्ता पद वेतनमान रु. 100-160 पर रु. 04/- वेतन वृद्धि का नियुक्ति का पत्र पाकर गुरुवर से आज्ञा लेकर अमीनाबाद श्री हनुमान मन्दिर, लखनउ, जहाँ पं. रमाकान्त पाठक जी मेरे अयोध्या कार्यक्रम के दौरान मैत्री हुई थी, के पास पहँुचे, कुछ दिन वहीं रहे……..बाद में किराया रु. 30/- माह पर अलग निशातगंज लखनउ में निवास बना। पहला वेतन रु. 150/- प्राप्त हुआ, वेतन तो काफी कम था, पर यहाँ गुणी गायक-वादक-नर्तक कलाकारों का सानिध्य प्राप्त किया, उसी के कारण यहाँ टिक गया। स्वनामधन्य पं. हरिशंकर ;चाचा जी, पं.रंगनाथ मिश्र जी जिनसे मैं कबीरा चैरा, वाराणसी से परिचित था, पं. रंगनाथ मिश्र के सुपुत्र पं. गामा महाराज जी के कारण ये मेरे रिश्ते के भांजे थे, पर ये उम्र मं बड़े थे, अतः भांजे वैसे भी आदरणीय होत हैं। और भी प्रधनाचार्य श्री श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर, उपप्रधनाचार्य श्री गोविन्द नारायण जी ;नातू जी, श्री मोहनराव शंकर कल्याण पुरकर जी एवं श्री विक्रम सिंघे क्रमशः प्रोफेसर एवं सहायक प्रोफेसर कथक नर्तक, उस्ताद इलियास खाँ साहब प्रोफेसर सितार स्वर वाद्य………उसके बाद पं. गणेश प्रसाद मिश्र ;भैया एवं डाॅ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी जी ने पदभार संभाला………शनैः शनैः और भी साथियों सहयोगियों के साथ-साथ 42 वर्ष समय बीत गया और पता नहीं चला।
पं. शीतल जी के शब्दों में मंत्र मूलं गुरूर्वाक्यम् से संगीत समाज की भूरि-भूरि प्रशंसा प्राप्त की। पं. शीतल जी को उनके उत्कृष्ट वादन ;एकल, युगल, नृत्य, गायन, वादन-तंत्रा, गज, सुषिर हेतु अनेकानेक उपाधियां मान-सम्मान प्राप्त हुए। इसमें हैं- सुरसिंगार संसद;मुम्मई द्वारा तालमणि तबला, लालमणि वाद्या ‘पखावज’ सुरसिंगार संसद ;मुम्मई बहुत विरले लोगों मंे से किसी एक को अलग-अलग वाद्यों मंे तालमणि प्राप्त होती है। पं. शीतल जी को तबला एवं पखावज दोनों ही वाद्यों में तालमणि प्राप्त हुई। आईसीसीआर के मानित कलाकार हैं। संस्कार भारती एवं गुरुपूर्णिमा ;व्यास पूर्णिमाद्ध पर व्यास सम्मान। ‘तबला पारंगत’ स्वामी हरिदास संस्था द्वारा। व्यावसायिक कलाकार वर्ग में पं. शीतल जी ने प्रथम विशिष्ट स्थान प्राप्त किया, उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी, लखनउ। वर्ष 1994 में अकादमी अवार्ड प्राप्त, उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी लखनउ। ‘संगीत कला रत्न’ आगरा, विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जयन्ती के सुअवसर पर। विदेशी छात्रों को भी पंडित जी ने सिखया और फ्रंास, बर्लिंन, पेरिस, जर्मनी आदि की यात्रा की। ‘तबला मनीषी’, ‘संगीत साधक’ निखिल बनर्जी पुरस्कार प्राप्त शीतल प्रसाद जी ने देश के अनेक चोटी के नामचीन कलाकारों के साथ संगीत सम्मेलनों में सुसंगत की। आप आकाशवाणी के ए ग्रेड के उच्च श्रेणी के कलाकार हैं। आप भातखण्डे संगीत संस्थान लखनउ में ताल वाद्य विभाग में विभागाध्यक्ष रहे एवं वर्ष 1967 से 2009 तक लगभग 42 वर्ष तक संगीत की सेवा करते हुए 2009 मंे सेवानिवृत्त हुए।
गुरु समर्पण- पं. कंठे महाराज जी की पे्ररणा से उन्होंने कई नवरात्रों की जागरण-साधना-अराधना की सिद्धि की है, उनकी कृपा से वर्ष 1978 में प्रतिपदा गुरु जी की जन्मतिथि शारदीय नवरात्रि की प्रथम तिथि मेें पं. ब्रजभूषण मिश्र ‘ग्रामवासी’ जी के निवास स्थान पर कृपाल स्वर संस्थान में 15 घंटे 18 मिनट तक एकल वादन का अनूठा रिकार्ड बनाया जो शास्त्राीय संगीत जगत, लखनउ में एक उपलब्धि है। उसी याद में, प्रतिवर्ष अपने निवास स्थान ;सेक्टर 19/260, इन्दिरा नगर लखनउ पर शारदीय नवरात्रि में 9 रात्रि तक शास्त्राीय एवं सुगम संगीत का उत्सव हर्षोल्लास से मनाते हैं, जिसमें देश के कई नामी कलाकारगण स्वेच्छा से अपनी सांगीतिक कला का प्रदर्शन कर चुके हैं एवं करते हैं।
कठोर-अनुशासक प्रिय, निष्कपट गुरु, छल प्रपंच रहित शिक्षक, मितभाषी, सरल स्वभाव, आत्म सम्मानी, ताल विद्या में दक्ष लयकारी में निपुण, संगत में सि(, वाहब, गायक या नर्तक के साथ एकाकार होकर, बोलों में स्पष्टता, दायें-बायें का सुन्दर सामंजस्य कवित्त, छंदों में शुद्ध उच्चारण करने वाले पं.शीतल जी यथा नाम तथा गुण हैं।
मृदुभाषी पं.शीतल जी के दो पुत्र- भरत मिश्र तबला वादक, भातखण्डे संगीत संस्थान सम विश्वविद्यालय लखनउ में कार्यरत एवं अनुज मिश्र गायक व सारंगी वादक तथा एक पुत्री अब श्रीमती ज्योत्सना दुबे सितार वादिका, गायिका एवं तबला वादिका हैं। पं.शीतल जीे के शिष्यों में उदय शंकर मिश्र, सचिन वर्मा, प्रदीप द्विवेदी, उदय नाटू, मुकेश, कृष्णानन्द, विभा मिश्रा, कुसुम श्रीवास्तव, रजनीश मौये व पुत्रा भरत मिश्र संगीत के क्षेत्रा में अग्रणी पंक्ति के तबला वादक हैं।
जिन ख्यातिनाम कलाकारों के साथ पं.शीतल जी ने संगत की व सानिध्य रहा उनमें से डाॅ.श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर, गोविन्दनारायण नाटू, पं.जसराज, पं.हरिशंकर मिश्र, पं.गणेशप्रसाद मिश्र, पं.महादेव प्रसाद, सुमति मुठाटकर ध्ु्रपद, असगरी बेगम, सविता देवी, के.जी.गिंडे, वाणी जयराम, पं.काशीनाथ शंकर बोडस, वी.जी.जोग, डी.के.दातार, बुद्धदेवदास गुप्त, श्रीमती एन. राजम, इन्द्रनील भट्टाचार्य, गिरिराज, भजन सपोरी, पं.शम्भू महाराज, पं.लच्छू माहाराज, पं.बिरजू महाराज, सितारा देवी, वन्दना सेन, उर्मिला नागर, तरुणकांत, वासंती सुब्रमण्यम, नरेन्द्रनाथ धर, अभयशंकर मिश्र। शोधर्थियों का मार्गदर्शन, मूल्यांकन सहित आज भी वह सक्रिय हैं।

संस्मरण यात्रा कानपुर से नैनीताल

नवीन चन्द्र उपाध्याय

अप्रैल के मध्य में ही इस बार पारा चालीस को पार कर गया था। मैं साइकिल से बारह बजे वाली ड्यूटी के लिये घर से निकला। लू के प्रकार की गर्म हवा के थपेड़ों को चीरते हुए मेरी साइकिल के टायर दम फुलाये पिघलते डामर की सड़क को तय कर रही थी।
कानपुर के मिलों की चिमनियों का धुंवा आग उगल रहा था। गन्दी संकरी गलियों में सड़ांघ के मारे दम निकला जा रहा था। नालियों में कुछ सुअर गर्मी के से बचाव करने के लिये पसरे पड़े थे। कुछ ठेला लगाने वाले मजदूर इन गलियों में ठेलों के उपर थकान मिटा रहे थे। हलवाइयों व चाय की दुकानों में मक्खियां इस कदर मडरा रही थी कि मानो दुकान पर मिठाई न होकर मक्खियां ही बिक रही हों। मैं कुछ गलियां पार कर आगे बढ़ा ही था कि सामने एक लम्बी सी कतार भैंसा गाड़ियों की लगी थी जो चर्र मर्र की की आवाज करते कच्चा चमड़ा टेनरी को ढो रहे थे। कच्चे चमड़े की की बदबू उमस भरी गर्मी में बुरा हाल करने वाली होती है।
किसी प्रकार इस मुसीबत से पाला झाड़ आगे को बढ़ा फूलबाग चैराहा पार किया। नाम तो फूलबाग है पर फूल के नाम पर कोई पौंध तक इसमें नज़र नहीं आया। फूलबाग नाम से थोड़ा मन हलका कर कार्यालय पहँुचा, जहाँ की बिजली गुल थी। टेलीप्रिंटर मशीनों को चलाने के लिये जनरेटर चला था जिसका ध्ुंआ गरमी में और इजाफा कर रहा था।
पसीने से तरवतर होकर रूमाल से हवा फटकते हुए मैं किसी प्रकार अपनी सीट पर बैठा ही था कि कार्यालय का चपरासी दौड़ा हुआ आया। उसके हाथ में कोई कागज था, वह ठीक मेरे मेज के सामने खड़ा हो गया। मानो मुझे मुजरिम समझ कर पुलिस वाला कोई कोर्ट का समन दे रहा हो। मैं उसे देखकर थोड़ी देर के लिय घबराया। अपने आपको संयत कर थोड़ी दबी जुवान से से पूछा- क्या लाये हो? कोई गलती तो नहीं हुई? चपरासी ने मुस्करा कर जवाब दिया- बाबूजी स्थानान्तरण आदेश लाया हँू। साहब बता रहे थे कि आप बड़े भाग्यशाली हैं। गर्मी के दिनों में नैनीताल की ठण्डी हवा खाने जा रहे हो ‘आपका स्थानान्तरण हो गया है।’ चपरासी की बात सुनते ही मैंने झपट्टा मार कागज छीन लिया और मन से सारी थकान व गर्मी को अलविदा कर आगे की कार्यवाही में जुट गया।
नैनीताल के बारे में सुना ही भर था पर गया कभी नहीं था। मेरे दादाजी नैनीताल के डाकखाने में मुलाजिम थे उस जमाने में जब प्रसि( शिकारी जिम कार्बेट के पिताजी वहाँ पोस्ट मास्टर हुआ करते थे। दादाजी बताते थे कि नैनीताल में इतनी सर्दी पड़ती है कि यदि कोई आदमी सुबह नहा कर अपने कपड़े सुखाने को बाहर डाले तो वह वर्फ के समान जम कर छड़ी जैसे बन जाते थे।
इन्हीं कल्पनाओं के साथ मैं नैनीताल रवाना हुआ। यात्रा के दूसरे दिन नैनीताल बस स्टैण्ड तल्लीताल ;डांठ पर खड़ा था। चारों ओर दृष्टि डालते हुए मैं अचम्भित सा रह गया था। एकाएक ऐसी जगह पहँुच गया था या तो वह देवताओं का निवास है या कोई सपना है किसी स्वर्गलोक का! मेरी तंद्रा एक कुली ने यह कहकर तोड़ी- बाबूजी सामान ले जाना है क्या? मेरे पास थोड़ा बहुत सामान था जो कुली को पकड़ा दिया। कानपुर की उमस गर्मी को छोड़कर जब मैं नैनीताल की काली डामर की मालरोड पर चल रहा था ऐसा अनुभव हो रहा था कि मैं किसी वातानुकूलित हाॅल में कसीदा वाली मखमली कार्पेट में पैर रख रहा हँू। मुझे सड़क पर चलने में कुछ हिचकिचाहट सी हो रही थी कि कहीं मेरे पैरों के जूतों की गन्दगी सड़क को गन्दा न कर दे।
सुन्दर हरा रंग लिये हुए शान्त तालाब में सपफेद बतख झुण्ड बनाकर खेल रहीं थी, मानो मानसरोवर के हंस हों। चारों ओर पहाड़ियों में घने बांज, देवदार व पोपलर के पेड़ों की पंक्तियां शोभायमान थी जिनसे प्रतिविम्बित होकर तालाब का रंग गहरे हरे रंग में बदल गया था। जो बहुत ही मनोहारी दृश्य था।
सामने की पहाड़ियों मं सफेद बादल छिटक रहे थे। इन पहाड़ियों में छोटे-छोटे बंगलेनुमा भवन बने थे जिनकी छतें हरे व लाल रंग की चादरों से बनी थी और दीवारों का रंग सपफेद था। ऐसा मालूम हो रहा था कि ये भवन आकाश के सितारे हों। मालरोड अतिशान्त वातावरण व घने वृक्षों की शीतल छाया में यदाकदा हाथ रिक्सों की आवाजाही के अतिरिक्त कुछ पैदल यात्राी भी तल्लीताल व मल्ली ताल को सपफर करते दिख रहे थे। गज़ब की शान्ति व स्वच्छता का वातावरण था। स्थानीय वोट हाउस क्लब में किसी पिक्चर की सूटिंग चल रही थी, जिसे देखने को थोड़ी बहुत स्थानीय जनता खड़ी थी। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बड़े शहरों में इस प्रकार के आयोजन कराने में पुलिस बल की सहायता लेनी पड़ती है क्योंकि अपार भीड़ को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है लेकिन यहाँ पर पुलिस की कोई आवश्यकता नज़र नहीं आ रही थी। स्कूल कालेजों में बच्चों की उपस्थिति का आभास नहीं मालूम पड़ रहा था। जबकि इस छोटे शहर में जनसंख्या के अनुपात से कहीं अध्कि विद्यालय हैं, जहाँ पर दूसरे शहरों के विद्यार्थी अध्कि मात्रा में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। शहर का अध्किांश भाग जंगल से घिरा था, निचले इलाकों में थोड़ी बहुत दुकानें तथा एक खेल का मैदान था। मैदान के एक छोर पर देवी ;नैनादेवी का मन्दिर व दूसरे किनारे पर गुरुद्वारा साहिब व मस्जिद था, जिनमें सभी वर्गों के लोग आते जाते दिखाई दे रहे थे। आज के समय में जब राम मन्दिर व बावरी मस्जिद का विवाद उग्र रूप धारण करता जा रहा है। यहाँ नैनीताल में लोगों को ईद, दिवाली, होली, रामलीला साथ-साथ मनाते देखा गया। यहाँ तक कि मस्जिद व मन्दिर साथ-साथ हैं, जिनका आपस में किसी प्रकार से टकराव नहीं। दुर्गा पूजा के अवसर पर सारे धर्म के लोग एकसाथ पूजा में शामिल होते देखे गये। रामलीला में भी दूसरे वर्ग के लोग बढ़चढ़ कर भाग लेते देखे गये।
एक बार पुनः बीस साल के अन्तराल में उस हरी-भरी शान्त प्रकृति के गोद में पदार्पण करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मन में कई प्रकार की कल्पनाएं संजोये मैं उस देवभूमि के बारे में सोचने लगा जिसकी छाया में सुन्दर-झुरमुटों के बीच बैठ कर नामी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं को मूर्त रूप दिया तथा प्रकृति के चितेरे चित्राकारों ने अपनी कल्पनाओं को कागज में उतारा है। इन्हीं विचारों में खोया हुआ अचानक मैं तल्लीताल के बस स्टाप ;डांठ पर पुनः खड़ा था। जन सैलाब का भारी रेला, साइकिल, रिक्सा, टैक्सी, स्कूटर व वाहनों का जमघट देख तथा नेपाली कुलियों को वाहनों के उपर आक्रामक कोशिशें होटल एजेन्टों द्वारा यात्रियों से जबरन धक्का मुक्की आदि देख मैं घबरा गया और एक पल के लिये ऐसा लगा कि मैं पुनः कानपुर आ पहँुचा हँू। शहर की ओर दृष्टि डालने से पता चला कि पहाड़ियों व लेक के इर्द-गिर्द छोटे-छोटे घरौंदे व कहीं-कहीं पर विशाल इमारतों से पहाड़ी ढक चुकी है। उँची पहाड़ियों पर नालों के उपर भी छोटे-छोटे घर दिखाई दे रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि किसी गन्दी जगह पर चील कौवे बैठे हों। मालरोड की चैड़ाई अतिक्रमण होने से संकरी लग रही थी। लेक में पानी का रंग भी हरा न होकर मटमेला लग रहा था। पहाड़ियों हरे जंगल के बदले लिंटर वाले भवन बन चुके थे। कहीं-कहीं पर भूस्खलन के कारण मलवा पटा पड़ा था। सीवर लाइन ओवर फ्रलो कर रही थी।