भोट देश का सम्बन्ध हूण देश


इतिहास कथा
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली
प्राचीन समय में उत्तराखण्ड का उत्तर-पूर्वी (वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय भारतीय सीमान्त क्षेत्र) का हिम क्षेत्र, पश्चिम तिब्बत प्रान्त और हूण देश के सम्बन्ध इस प्रकार से थे।
भोट देश- वर्तमान कुमाउँ का उत्तर पूर्व अन्तर्राष्ट्रीय हिम सीमान्त क्षेत्र और पश्चिम तिब्बत हिम सीमान्त क्षेत्र को सर्वप्रथम स्वतन्त्र भोट देश के नाम से जाना जाता था।
    ‘कूर्मांचल वाले’ कुमाउंनी लोग भारत तिब्बत अन्तर्राष्ट्रीय हिम सीमान्त क्षेत्रा को ‘भोट देश’ कहते थे। जो हिमाच्छादित प्रान्तों का नाम है। इनका माने उस देश से है, जहाँ ‘भोट-भोटिया’ रं, रौंगपा, शौका, जाड़ औन अन्य जनजातीय लोग रहते हैं। इस क्षेत्र के वासियों को कुमाउंनी लोग भोट-भोटिया और कुछ लोग शौका से भी सम्बोधित करते थे। ( कुमाउं का इतिहास, पेज नं. 523, लेखक बद्री दत्त पाण्डे)
हूण देश- कूर्मांचल ( कुमाउं ) के कुर्मांचली लोग मध्य तिब्बत क्षेत्र के मूल/स्थायी तिब्बतियों के बौद्धिक बौद्ध और उनके देश को बौद्धिक देश/बौ( देश भी कहते थे। वास्तविक बौद्ध देश के जगह हूण देश का नाम बार-बार इतिहास में आने का कारण चैथी और पाँचवीं शताब्दी में हूण समुदायों के समूह का वर्चस्व पूरे बौद्ध /लामा देश के मध्य केन्द्र तक फैल गया था। ये हूणीये चीन के पश्चिम दक्षिण हिमालय क्षेत्र से, पश्चिम उत्तर बौद्ध देश की सीमान्त से होते हुए बौद्ध देश के केन्द्र तक पहुँचे। बौद्ध लामाओं का वर्चस्व कम होने के कारण बाद में यह बौद्ध /लामा देश ही हूण देश  कहलाने लगा/हूण देश के नाम से जाना जाने लगा।
    श्री मूर प्रोफ्ट और उसके साथी श्री विल्सन 1812 में तिब्बत गए थे। उन्होंने इसे हूण देश यानि उन देश बताया, किन्तु इस समय असली नाम हूण देश था। जिसका तात्पर्य उन मानववादी, बौद्धिकता वादियों से था, जो मानवीय और बौद्धिकता पर पूर्णतयाः विश्वास करते थे। जहाँ पर मूल बौ( लामा रहते थे। पर उस समय काल में उन हूणीयों को प्रभुत्व मध्य तिब्बत तक फैल गया था। जो हूणीयों, बौद्धिक बौद्धिकता वादी और मानववादी लामाओं से अलग व्यक्तित्व वाले लामाएं/ बौद्ध कहे जाते थे। ये अपने समुदाय और क्षेत्र  से अलग दूसरे बाहरी लोगों पर जबरदस्ती अधिकार  जमाते थे, दूसरे क्षेत्रा में लूटपाट व क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते थे। इनके समुदाय में एक सरदार (मुखिया) होता था और ये सरदार (मुखिया) को राजा समतुल्य मानते थे और बाहरी लोग भी उसे राजा ही समझते थे। ये हूणी लोगों को आतंकित करते हुए, दूसरे क्षेत्रों को जबरदस्ती अपने अधीन करते थे।
    ये हूण समुदायी लोग मूल तिब्बती नहीं थे। आरम्भ में ये हूणी लोग चीन के पश्चिम क्षेत्र में रहते थे। पहली-दूसरी शताब्दी के मध्य में चीनियों ने इन हूणीयों को हराकर इनके मूल स्थान से पश्चिम और दक्षिण हिमालय क्षेत्रा की ओर भगाया। बाद में इन्हीं हूणीयों ने पश्चिम-दक्षिण हिम क्षेत्रों के मध्य पर अधिकार  जमाया और यही क्षेत्र बाद में हूण देश कहलाने लगा। हिन्दू सांस्कृतिक ग्रन्थोें में हूण शब्द अनेकों स्थान में आया है।
    हूण देश के हूणी व्यापारी, जोहारी व्यापारी को ‘क्योनवा’ कहते थे। उनकी बोली में जोहार और कुमाउफँ का नाम ‘क्योनम’ था। दरमानियों को ‘भोट-भोटिया या श्योण’ के नाम से सम्बोधित करते थे। व्यासियों को ‘ज्यालबू’ कहते थे।
   भोट देश के भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ की पूर्ण स्वतंत्राता पर ‘प्रथम प्रहार’-
हुणियों की क्रूरता का प्रमाण- भोट प्रान्त का मशहूर मालदार व्यापारी सुनपति रं भोट, भोट देश के सीमान्त दारमा  प्रान्त के राजा न होते हुए भी उनका यहाँ के सामाजिक नियम-कानून (शासन- प्रशासन) की व्यवस्था में तूती बोलती थी, दबदबा चलता था। इसी कारण हूणी क्रूर, घमण्डी, शादीशुदा, मुख्य सरदार/ राजा विक्खीपाल ने उसकी पुत्री की मोहिनी रूप की सुन्दरता को देखकर सुनपति भोट से पुत्री राजुला का विवाह का प्रस्ताव रखा। मना करने पर रं भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ के साथ पूरे भोट देश को गुलाम कर अपने अधीन करने की        धमकी  दी थी। सुनपति भोट-भोटिया ने भोट प्रान्त (वर्तमान रं लुंग्बा) और भोट देश को बचाने के लिए हूण देश के मुख्य सरदार/राजा विक्खीपाल का विवाह प्रस्ताव न चाहते हुए भी स्वीकार किया, राजुला ने अपने पिता का मान रखने और प्रान्त के साथ देश को बचाने के खातिर बेमेल विक्खीपाल के साथ विवाह किया। बाद में वर्तमान कुमाउँ मण्डल उत्तर-पूर्व क्षेत्र और पश्चिम तिब्बत का सीमान्त हिम क्षेत्र यानि भोट देश को हूण देश के नये शासन ने कुछ महीनों बाद गुलाम कर अपने अधीन कर लिया।
(क्योंकि हूण देश के शासक विक्खीपाल के साथ सुनपति भोट की लड़की राजुला का विवाहिता जीवन ज्यादा दिनों तक सफल न हो सका। कारण- राजुला का जन्मकालीन/बाल्यकालीन मंगेतर बैराठ स्पप्न प्रेमी राजकुमार मालुशाही उसे लेने साधु के भेष में दारमा रं भोट प्रान्त होते हुए हूण देश पहँुचे। विक्खीपाल को मारकर राजुला को अपने राजधानी  -बैराठ ‘वर्तमान चैखुटिया’ ले गए।)
हूण प्रशासन का जबरदस्ती कर वसूली- मध्य तिब्बती हूण देश के प्रशासन हमारे इस रं भोट रं लुंग्बा से तीन प्रकार कर वसूला करते थे-
1. सिंहथल मालगुजारी (जानवरों की चराई पर कर)
2. थाथल ( धूप  सेकने पर टैक्स)
3. क्यूथल (जिजारत में नफा) व्यापार में कर और व्यापार में नफा पर कर।
हुमला-झुमला राज्य, नेपाल का जबदस्ती अध्ीन कर/टैक्स, भोट ‘रं लुंग्बा’ की स्वतंत्रता पर द्वितीय प्रहार- यह दारमा परगना का (दारमा, व्यास और चैंदास) तीनों क्षेत्रा पर हुमला-झुमला राज्य ने कुछ महिने-सालों तक जबरदस्ती अपना अध्किार जमाया। वह जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित लूटपाट किया करते थे, और जो भी आवश्यक सामग्री मिले उसे कर/टैक्स के रूप में अपने साथ ले जाया करते थे। नेपाल हुमला-झुमला प्रान्त का जबरदस्ती कर वूसली के बाद में दारमा परगना, दारमा घाटी, व्यास घाटी, चैंदास घाटी, चंद राज्य, गोरखाराज, अंग्रेज राज्य में कुमाउँ प्रान्त के अधीन आ गया।
चन्द शासन राज का जबरस्ती अधीन कर टैक्स, रं लुंग्बा की स्वंत्रता पर तृतीय प्रहार- चंद शासक ने दारमा
 
परगना से सोने-चाँदी के छोटे-छोटे चूरे के रूप में टैक्स लेते थे।
गोरखा शासन राज का जबरदस्ती अधीन कर/टैक्स, रं लुंग्बा स्वतंत्रता पर चतुर्थ प्रहार- गोरखा राज के प्रशासन दारमा परगना रं लुंग्बा से जड़ी-बूटी, बाज के पेड़, कस्तूरी, शहद और खेती पर टैक्स/ कर लेते थे।
    रं लुग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) में रं भोट जनों के द्वारा हूणियों से लेकर हुमला-झुमला, चंद, गोरखा और अंग्रेज राज के शासकों तक कोई हिंसक क्रूरता अप्रिय घटनाक्रम का प्रमाण नहीं मिलता है। इससे हम रं जन यह सि( कर सकते हैं कि इस रं लुंग्बा के रं जन की विचारधारा  रागद्वेष, कटुता से काफी दूरी है। इसी मानवीय, बौद्धिक विचार धारा  के कारण हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक और सभ्यता अन्य समुदाय की मानसिकता से काफी आगे है। विडम्बना यह है कि हम सब रं जनों को भोटिया और यहाँ की हमारी निवास को भोट कैसे कहा जाता है। सच तो यह है कि सर्वप्रथम इतिहास में तिब्बत को ही भोट/भोत/ बौद्ध नाम से जाना जाता था।
    ब्रिटिश भारत के प्रशासकों, लेेखकों, जासूसों और अनुसंधनकर्ताओं ने वर्तमान रं लुंग्बा के इस क्षेत्रा में रहने वाले रं जनों को तिब्बत की भांति हम जनों को भोट और यहाँ रं लुंग्बा के निवासियों को भोटिया उपजाति नाम देकर परिचित कराया। इन्हीं शब्दों का अनुसरण आज तक होता आ रहा है। जबकि हम भोट देश, भोट प्रान्त-रं लुंग्बा के ‘रं-रंस्या’ जन हैं।
    ब्रिटिश काल के शुरुआत और उससे पहले के राजशाही में यह सब क्षेत्रा स्वतंत्रा और भोट देश का भोट प्रान्त ‘रं-लुंग्बा’ हुआ करता था (रं लुंग्बा जनों का व्यापार भोट देश तिब्बतीय सीमान्त प्रान्त से हुआ करता था।)
   तिब्बती भोट शब्द को सात समुन्दर पार वाले अंगे्रज अंग्रेजी में भोट ही लिखा करते थे। अतः भोत ठीवज से यह भोट हो गया। ठीक इसी प्रकार ऐसा ह इन अंग्रेजों ने तिब्बत के याक ;चवर गाय) को रोमन में समस्त विश्व में याक को मशहूर कर दिया।
   जोहारी, व्यासी, चैंदासी, एवं दारमिया को सम्मिलित रूप से पड़ोसी कुमाउंनी एवं नेपाली जन भोटिया और शौक्याण शब्द से भी सम्बोधित  करते आ रहे हैं।
   (पिता श्री मोहन सिंह दताल जी के कथानुसार 20वीं शताब्दी के मध्य तक भी पश्चिमी-तिब्बत प्रान्तीय प्रशासन दारमा घाटी के मध्य ग्रामों तक जबरदस्ती कर वसूली किया करते थे। पिता श्री 9-10 बार व्यापारी सहायक के रूप में व्यापार के लिये प्राचीन भोट देश प्रान्त- रं लुंग्बा और वर्तमान तिब्बत देश प्रान्त- पश्चिम तिब्बत के सीमान्त क्षेत्रा शिल्दी थं, ज्ञानिमा, ठुकर निम्न व्यापारिक मण्डियों में व्यापार के लिये गये थे।)
जय हो हमारे पूर्वज, जय हो हमारा रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त)
‘‘खा जैनु निसु – खा लिजु – थन गुम निनि’’