चैती गायन का परम्परा ही सिमट चुकी है

डाॅ.पंकज उप्रेती
थल-बेरीनाग मार्ग के बीचोंबीच का प्रसिद्ध इलाका है- काण्डेकिरौली। काण्डे, किरौली, जगथली कभी एक ही ग्रामसभा हुआ करती थी, अब यह तीन ग्राम सभाएं हैं। इसी काण्डे के मूल निवासी पनीराम परम्परागत कलाकर हैं। नागों में मुखिया पिंगलीनाथ के दास के रूप में अपनी परम्परा को आज भी पनीराम और इनता परिवार निभा रहा है। लोक गायन की कई विधाओं को जानने वाले 72 वर्षीय पनीराम के शिक्षित पुत्र राजन, गोपाल, महिपाल भी इन विधओं को जानते हैं और मेलों के असल रंग में झूमने के लिये जाते हैं।
पनीराम के दादा रुद्रराम और पिता गुलाबराम जागर व अन्य गायन की अन्य लोक विधाओं के जानकार थे, इन्हीं से सीखे हुए पनीराम आज भी नित्य प्रातः और सायं अपने घर में ढोल बजाकर पिंगलीनाथ का स्मरण करते हैं। ग्रामीण भी इनके मान-सम्मान में कसर नहीं छोड़ते हैं। लोक की यह अद्भुत परम्परा में कोई भेदभाव नहीं है, सब लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं। जिसके घर में जो नई फसल का जो होता है उसका हिस्सा अनिवार्य रूप से इस परिवार को भी दिया जाता है। ऐसा सामाजिक तानाबाना हमारी कला-संस्कृति को जोड़ने वाला रहा है लेकिन सरकारी धन से कला-कलाकारों के संरक्षण के नाम पर हो रहा खेल दिल दुःखाता है।
पनीराम गंगनाथ की जागर लगाते हैं, जिसे हुड़के पर गाया जाता है। गोल ज्यू, नौलिंग, बजेंण, छुरमल, कालसिन की बंशावली को गाते हैं, जिसे ढोल की संगत में गाया जाता है। ढोल में पिंगलनाथ का स्मरण किया जाता है। वह बताते हैं कि नागों की वंशावली नहीं गाई जाती है, अन्य देवी-देवताओं के भांति नागों के डांगर नहीं होते हैं।
ढोल-जागर के अलावा पनीराम चैती गायन में माहिर हैं। इस गायकी में ट्टतु का रंग, रोमांच और उदासी के स्वर गूंजते हैं। पहाड़ में गाई जाने वाली यह गायकी अब सिमट चुकी है। बातचीत के दौरान वह ढोलकी के साथ सुनाने लगते हैं-
‘रितु औंछे पलटि बरस का दिना
ज्यूना भागी जी रौला,
सौभागी सुणला बरस की रितु……
मालो जानी गबड़ी पलटी आला,
खेवी जानी मौनू पलटी आला,
चैतोलिया मासा भाई भिटोली आला।
जाको न छि भाई, कौ भिटोली आला,
दैराणी-जैठाणी का भाई भिटौली आला,
गोरीध्ना रौतेली, कौ भिटोली आला,
छाजा बैठी गोरी आँसुवा ढोललि……..।’
इसमें चैत मास का वर्णन करते हुए गायक कहता है बर्ष में यह रितु भी अपने समय से आयेगी, सभी राजीखुशी रहें, सौभाग्यवती सुनेंगी, भाबर जाने वाले ग्रामीण लौट आयेंगे जैसे मधुमखी रस लेकर अपने स्थान पर लौट आती है। इस वर्णन में गायक आगे कहता है- चैत के मास में भाई मिलने आयेगा। बहुत ही कारुणिक वर्णन इसमें है जब वह कहता है- गोरीधना का तो भाई ही नहीं है, कौन भिटोली लेकर आयेगा। वह छज्जे में बैठकर आंसु गिरायेगी।
चैती का यह वर्णन बहुत लम्बा है जिसमें आगे बताया गया है कि गोरीधना का भाई नहीं था। उसके विवाह के उपरान्त घर में एक भाई हुआ, जो बाद में उसके लिये भिटौली लेकर आया। इस प्रकार पुराने समय में रितु के रंग, रोमांच के साथ करुणरस के स्वरों को घोलता हुआ चैती गीत गाया जाता है। वर्तमान में इसके गायक गिनती भर के हैं, जो गाँवों में घर-घर जाकर इसे सुनाया करते थे और सुनने वाले भी बहुत ही भावपूर्ण ढंग से इसे सुनते और कलाकार को पुरस्कार स्वरूप कुछ देते थे। काण्डे के पास ही बैठोली के दलीराम और उड्यारी के चनरराम भी चैती गायकी के अच्छे जानकार थे। इन्हीं परिवारों में से दलीप राम और मोहनराम ने गणतंत्रत दिवस के अवसर पर सबसे पहले छोलिया नृत्य किया था। यहाँ की धनीराम एण्ड पार्टी नैनीताल, लखनउ, दिल्ली तमाम जगह में जाया करती थी। सनेेती, सनगाड़, भनार, नागमन्दिर बेणीनाग में कभी जबर्दस्त झोड़ा-चांचरी के आयोजन होते थे और परम्परागत कलाकार अपने गाँवों से ढोल-दमुवा बजाते हुए जात्रा के रूप में जाते थे। हुड़कीबौल सामन्यतः धन रौपाई में लगाई जाती है किन्तु यहाँ मडुवा गोड़ाई के समय इसे लगाया जाता था। समय बदला और अब पनीराम के ढोल की स्वर सुनाई देते हैं।

पिघलता हिमालय 19 सितम्बर 2016 अंक से

बीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट का है इतिहास

इन्द्र सिंह नेगी
नैनीताल। नैनीताल का बीरभट्टी क्षेत्र अतीत से ही अपने इतिहास में कई पन्ने जोड़े हुए है किन्तु त्रासदी तो यह है कि बलियानाले के ट्रीटेमेंट के नाम पर आज तक कोई ठोस कार्य नहीं हो पाया है। जिस कारण गन्दगी फैलने के साथ-साथ रानीबाग से सीधे इस इलाके को जोड़ने वाला मार्ग भी लुप्त हो चुका है और मुख्य हाइवे पर बना पुल भी मजबूत बनने के लिये मजबूर सा बना हुआ है। बलियानाले के ट्रीटमेंट के नाम पर हो रहे कार्यों को आज तक शासन-प्रशासन ने गम्भीरता से लिया होता तो इलाके में खतरा नहीं मंडराता और प्राचीन यात्रा पथ भी यहाँ के इतिहास की परख के लिये सुलभ होता।
जरा इतिहास की ओर नज़र दौड़ायें तो पता चलता है कि इस क्षेत्रा को ब्र्रेवरी कहा जाता था। अंग्रेजों के शासन काल में यहाँ वियन बनाने की भट्टी थी। 1987 में मनोरापीक के भूस्खलन का मलवा वीरभट्टी में आया, जिसमें 27 अंग्रेजों की मौत हो गई थी। अस्तबल, होटल, डाकखाना, पशु भी मलवे में दफन हो गये। तब वीयरभट्टी को भवाली खोल दिया गया। बाद में सिलीगुड़ी;आसाम में उसे शिफ्रट कर दिया गया था। यह इलाका नीमकरौली महाराज की कर्मस्थली भी रही है। पं. नेहरु सहित कई दिग्गज यहाँ आये हैं। पं.गोविन्द बल्लभ पन्त जी तो इसे घर ही मानते थे। ऐसे स्थान को मालदार परिवार ने अपनी कर्मस्थली बनाया। ठाकुर देव सिंह बिष्ट के पुत्र- दानसिंह-मोहनसिंह भाईयों ने जिस तल्लीनता के साथ वीरभट्टी क्षेत्रा में कार्य किये उनकी यादें आज भी हैं। दानसिंह जी की 6 पुत्रियां हुई और मोहन सिंह जी के तीन पुत्र 10 पुत्रियां। इनके ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज सिंह थे। इस बड़े कुनबे के परिजन यत्र-यत्र के साथ वीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट में भी रहते हैं। मोहन सिंह जी बहु रमा बिष्ट, पृथ्वीराज जी की पुत्री दीप्ति बिष्ट अपने बुजुर्गों की यादों को संजोये हुए हैं।
बिष्ट स्टेट वह क्षेत्र हैं जहाँ से उन्नति कर कई लोगों ने अपने भविष्य को संवारा है। इस प्रकार की धरोहरों को संवारने के लिये व्यक्तिगत प्रयासों के साथ सामूहिक कृत्य भी होने चाहिये। 1897 से लेकर 1922 तक यहाँ रामलीला मंचन भी हुआ है। इतिहास के गवाह इस इलाके के विकास की बात छोड़ शासन-प्रशासन अपने में ही उलझा है। यह क्षेत्रा बलियानाले का मुहाना है और रानीबाग तक दस हजार परिवार इससे प्रभावित हो रहे हैं। क्षेत्रवासी चाते हैं कि वृटिश कालीन पुराने मार्ग के सौन्दर्यीकरण सहित बलियानाले का ट्रीटमेंट कार्य ठोस हो।

पिघलता हिमलाय 22 फरवरी 2016 के अंक से

अद्भुत है एकहथिया मन्दिर

पि.हि. प्रतिनिधि
थल/मुवानी। उत्तराखण्ड के हजारों गाँवों में हजारों प्रकार की ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व की चीजें हैं, जिनके बारे में कथाओं, गाथाओं, किस्से, कहानियों में जानकारी मिलती है। ऐसी ही ऐतिहासिक महत्व की चीज थल से करीब दो किमी दूर स्थित है। ‘एकहथिया मन्दिर’ के रूप में स्थापित इस प्राचीन मन्दिर के बारे में कई प्रकार की चर्चाएं रही हैं और कहा जाता है कि किसी ने एक ही रात में एक हाथ से इस मन्दिर को एक ही पत्थर काटकर बनाया था।
वाकेई मन्दिर की कृति थल के ऐतिहासिक मन्दिर जैसी है किन्तु इसे एक विशाल पत्थर को काटकर ही बनाया गया है। मन्दिर में खूबसूरत नक्कासी के साथ ही पानी का छोटा सा कुण्ड बनाया गया है। पानी आने के लिये रास्ता बनाया गया है। शिवलिंग भी है लेकिन उल्टी दिशा में होने के कारण यहाँ दिया-बाती नहीं की जाती है। एकहथिया मन्दिर के बारे में जानकारी लेने व देखने के लिये दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं। पर्यटन विभाग की ओर से एक टिनशैड इसके पास बनाया गया है लेकिन इस ऐतिहासिक मन्दिर को बचाये रखने के लिये सुरक्षा दीवार अतिआवश्यक है अन्यथा भविष्य में इसे खतरा उत्पन्न हो सकता है।
बलतिर गाँव में स्थित एकहथिया मन्दिर के पास भेलियागाड़ के कारण पहाड़ में काफी जमीन भीतर की ओर कटी हुई है। जंगल और खेतों के बीच यह ऐतिहासिक महत्व की चीज फिलहाल सुरक्षित है लेकिन इसे सौन्दर्यीकरण के साथ संवारना चाहिये। गाड़ के पार अल्मिया गाँव स्थित है। थल से करीब दो किमी की दूरी पर स्थित बलतिर और अल्मिया गाँव कृषि के लिये अग्रणीय हैं किन्तु इनकी सुध् लेने के लिये शासन-प्रशासन ने हाथ हलकाने चाहिये। हाल यह है कि अपने आप से ग्राम संवारने वालों में इतनी उर्जा नहीं है कि वह बजह होने के बाद भी नेताओं को पकड़ कर अपनी समस्याएं हल करवा ले जाएं। न ही जनप्रतिनिधि ध्यान दे रहे हैं। गाँव में पलायन की मार अलग से है। रामगंगा घाटी की इस उपजाउ भूमि में भेलिया गाड़ और सालीखेतगाड़ के कारण पर्याप्त पानी भी है लेकिन कृषि आधारित छुटपुट कार्यों के सिवाय कुछ नहीं हो रहा है।
इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि कभी रामगंगा इसी जगह से होकर जाती थी जिसने बाद में अपनी दिशा बदली होगी। एकहथिया मन्दिर वाले क्षेत्रा में पाये जाने वाले पत्थरों से आसानी से अनुमान लग जाता है कि वह नदी के साथ रहे होंगे।
बलतिर ग्राम में तो दूर-दूर तक खेतों को देखकर प्रसन्नता होती है। यहाँ कुछ प्राचीन पेड़ हैं, जिन्हें पूज्य के रूप में माना गया है। काई इन्हें सतयुगी भी कहते हैं। इन पेड़ों के नीचे प्राचीन मूर्तियां और तराशे गये पत्थर भी रखे गये हैं। बलतिर की आवादी करीब डेढ़ हजार होगी, यहाँ एक प्राइमरी स्कूल है। इसके अलावा विकास के पत्थर नहीं लगे हैं। एकहथिया मन्दिर तक जाने के लिये थल से पैदल चढ़ाई वाला मार्ग तो है ही। थल मुवानी मोटर रोड से एक पक्की सड़क का मार्ग भी कटता है जो बलतिर गाँव पहँंुचाता है। इस प्रकार सड़क से आसान पहँुच वाले इस क्षेत्रा के विकास में अभी बहुत कुछ होना है।

बन्द पड़ा उन-कालीन का कारोबार

बलतिर ग्राम में श्रीमती तुलसी देवी मर्तोलिया ने उफनी कारोबार की जोरदार शुरुआत की थी लेकिन उनके अस्वस्थ्य होने के बाद से यह कारोबार लड़खड़ा गया। मूल रूप से आमथल के रहने वाले मर्तोलिया परिवार ने थल में रहते हुए ग्राम बलतिर में भूमि ली और भवन बनाया ताकि कृषि के साथ साथ उनी वस्त्र, दन-कालीन का कारोबार चलाया जाए। इसके लिये श्रीमती तुलसी मर्तोलिया ने प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाया और लोगों को इससे जुड़ने के लिये प्रेरित किया किन्तु उनके अस्वस्थ्य होते ही यह कारोबार रुक गया। श्रीमती मर्तोलिया आज भी कभी कभार बलतिर अपने मकान पर जाती हैं लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनी कारोबार को चला पाना कठिन है। सरकार की ओर से लघु उद्योग के लिये बहुत सी योजनाएं चलाई जा रही हैं। काश बलतिर में एक परिवार द्वारा छेड़ी गई इस मुहीम को जिन्दा रखने में मदद मिलती।

पिघलता हिमालय 28 दिसम्बर 2015 अंक से

बृजेन्द्र लाल साह ने लोकधुनों को लेकर तिकसैन में तैयार किया था रामलीला नाटक

भूपाल सिंह पांगती

डाॅ.पंकज उप्रेती
अल्मोड़ा निवासी रंगकर्मी स्व.बृजेन्द्र लाल साह को लोक संस्कृति के क्षेत्र में कार्य के लिये याद किया जाता है। विख्यात रंगकर्मी स्व.मोहन उप्रेती के सखा बृजेन्द्र लाल ने कुमाउनी रामलीला नाटक रचकर जो प्रयोग सीमान्त क्षेत्रा में किया, वह अवस्मरणीय है। उन पुरानी यादों को सहेजे हैं- भूपाल सिंह पांगती।
85 वर्षीय श्री भूपाल सिंह पांगती, नानासेम, मुनस्यारी के रहने वाले हैं। बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि माइग्रेसन के पुराने दौर में जब मल्ला जोहार, मुनस्यारी और भैंसखाल में उनका परिवार आवत-जावत करता था, तब भैंसखाल में वह जन्मे। तब मुनस्यारी बाजार को तिकसैन के नाम से ही ज्यादा जाना जाता था। सन् 1952-54 की बात है जब कपकोट और बैजनाथ में दो ब्लाक खुले थे और बड़े भाई कल्याण सिंह पांगती डिप्टी एजूकेटिव आपिफसर के रूप में कपकोट ;वर्तमान में जिला बागेश्वर में नियुक्त हुए। इनके साथ एक सहायक के रूप में श्री साह जी कपकोट आये। जब सन् 1956-57 में मुनस्यारी में ब्लाक खुला तो उस समय बृजेन्द्र लाल साह जी के लिये नया पद सृजित किया गया। वह पद कल्चरल डेवलपमेंट आफिसर का था। तत्कालीन स्थितियों में ब्लाक भवन और रहने के लिये आवासीय सुविधा न होने के कारण साह जी पांगती भवन में ही रहने लगे। भवन के ‘गोठ’ वाले कमरे में बृजेन्द्र साह रहते थे और वहीं लेखन इत्यादि करते। कल्चरल आर्गनाइजर दुर्गा सिंह पांगती और भूपाल सिंह जी के साथ बृजेन्द्र लाल नित चर्चा करते ताकि कोई नाटक लोकभाषा में बने। तब रामायण के ध्नुष यज्ञ प्रसंग का नाटक तैयार किया गया। गीतों के लिये पहाड़ी शब्दों को पिरोया गया और तिकसैन बाजार में हुए किसान मेले में इसका मंचन हुआ। इसी तैयारी को बाद में दुम्मर हरि प्रदर्शनी में भी दिखाया गया, जिसे लोगों ने बहुत सराहा। नाटक में भूपाल सिंह जी राजा जनक बने और बृजेन्द्र लाल जी परशुराम।
भूपाल सिंह जी यादों का स्मरण करते हुए बताते हैं कि बृजेन्द्र लाल साह लोक धुनों के माहिर थे और उन्हें कुमाउॅ गढ़वाल की कई धुनों का ज्ञान था। उन्हीं धुनों में पूरा रामलीला नाटक तैयार किया गया। जिसे बाद में डाॅ.शेर सिंह पांगती ने पुस्तक आकार में लिखा।
लेखक ने अपने शोध् कार्य के दौरान 1998-99 में कुमाउनी रामलीला पर एक अध्याय ही लिखा है। बृजेन्द्र लाल साह जी के साथ लोक धुनों पर शास्त्रीय रागों के सिलसिले में लम्बी वार्ता के बाद इन धुनों की रिकार्डिंग भी की है।

पिघलता हिमालय 28 नवम्बर 2016 अंक से

नारायण स्वामी का पहाड़ आगमन और कैलास यात्रा

मोहन सिंह मर्तोलिया

नारायण स्वामी जी का पहाड़ भ्रमण 1935 में हुआ जब वह कैलास यात्रा पर गये। इस महान सन्त के योगदान को इतिहास हमेशा याद रखेगा। इनकी विरासत को सम्भालना आज चुनौती बना हुआ है। इस दिशा में सभी को जागरुकता दिखानी चाहिये।
स्वामी जी का जन्म 2 दिसम्बर 1914 को उच्च महाराष्ट्रीय गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार में दत्त जयन्ती के दिन बुधवार रोहिणी नक्षत्रा में हुआ। कर्नाटक में जन्मे इस शिशु का नाम राघवेन्द्र रखा गया। पिता जी का नाम माध्वराव था, जो मैसूर राजा के वहाँ दीवान थे। स्वामी जीे बीएससी तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद घर से निकल गये और आश्रम-मठों में भ्रमण करने लगे। माता-पिता को पता नहीं चला कि उनके पुत्र को वैराग्य आ गया है। स्वामी जी को भ्रमण करते हुए मन में आया कि उत्तराखण्ड चारधाम यात्रा की जाए। वह अपने गुरु योगी रामानन्द जी के साथ निकल पड़े और जुलाई 1935 में अल्मोड़ा पहँुचे। यहीं से उन्होंने कैलास जाना तय कर लिया। नारायण स्वामी और योगी रामानन्द पैदल यात्रा करते हुए जोहार घाटी पहँुच गये। वहाँ से आगे चलकर उटाधूरा, किगड़ी- बिंगड़ एवं जयन्ती को पार कर 16000 फिट पठार तिब्बत के तीर्थपुरी पहँुचे। भस्मासुर पर्वत के तलहटी में स्नान कर आगे बढ़े और 19000 फिट उफंचाई डौल्पा ल्हा टाॅप फिट आगे 18000 फिट में गोरी कुण्ड पहँुचकर स्नान किया।
उन्होंने सुना था और स्कन्द पुराण मानस खण्ड से जाना था कि कोई महात्मा वर्षों से कैलास पर्वत में सिद्ध अवधूत लम्बे केश वाला यदा-कदा मिल जाता है। उसी सि( अवध्ूत सन्त के दर्शन इन सन्तों को हुए। इसके वाद वह अवधूत अन्र्तधान हो गये।
नारायण स्वामी जी ने 1952 तक 13 बार कैलास यात्रा की। 1940 में धरचूला के पांगू सोसा में नारायण आश्रम का वृहद स्तर पर निर्माण किया। जिसमें यात्रियों के रहने व अन्य सुविधओं जुटाई गईं। यहाँ 4-5 कर्मचारी व एक मैनेजर रहता है।
सन् 1938 में दिगतड़ पड़ाव ;डीडीहाट में एक कपड़े की दुकान शेर सिंह जंगपांगी ने खोली। जंगपांगी के साथ मुनस्यारी के उनके पुरोहित का पुत्रा दयाकृष्ण लोहनी दुकान में कार्य करता था। कैलास मानसरोवर यात्रा 1946 में श्री नारायण स्वामी के साथ गुजरात-बंगलौर बड़ौदा के उद्योगपति लोग हरीभाई देसाई, विठ्ठल भाई व अन्य साधू-सन्त दिकतड़ ;डीडीहाट पहँुचे। यहाँ नारायण स्वामी ने जंगपांगी जी व लोहनी जी से कहा कि इस क्षेत्र में एक हाईस्कूल होना चाहिये। आगे चलकर यह स्कूल महाविद्यालय तक होगा। यह बात सबको भली लगी और अस्कोट के रजवार एवं डीडीहाट के थोकदार लोगों को बुलाया गया। बैठक में एक कमेटी का गठन किया गया जिसमें पाँच लोग इसके सदस्य बनाये गये। जिसमें मदन सिंह कन्याल मनड़ा गाँव, दयाकृष्ण लोहनी, नारायण सिंह कफलिया बिष्ट थोकदार हाट ग्राम, मेजर लक्ष्मण सिंह पाल अस्कोट, लक्ष्मी दत्त अवस्थी गरखा अस्कोट। बैठक की अध्यक्षता शोबन सिंह जीना वकील साहब अल्मोड़ा द्वारा की गई।
इस बैठक के बाद स्वामी जी के साथ पूरी कमेटी अस्कोट रजवार के पास गये। तब अस्कोट में 1946 जुलाई में धर्मशाला में कक्षा पाँच तक स्कूल शुरु किया गया। 1948 में ध्रमघर नामक जगह में हाईस्कूल भवन तैयार हुआ। 1952 में इसे इण्टर तक कर दिया गया। नारायण नगर इण्टर कालेज का नाम ‘बापू महाविद्यालय इण्टर कालेज’ रखा गया। यह इसलिये रखा गया क्योंकि स्वामी जी की इच्छा थी कि इसे शीघ्र ही महाविद्यालय का दर्जा दिया जायेगा। किन्तु स्वामी जी का 1956 में स्वर्गवास हो गया। ऐसे में विद्यालय को चला ले जाना कठिन हो गया और 1958 में राज्य सरकार ने इसका सरकारीकरण किया, जो रा0इ0कालेज नारायणनगर नाम से जाना जाता है।
इसके अलावा भी स्वामी जी ने कई प्रयास इस पहाड़ के लिये किये। आज जरूरत है उनके प्रयासों को संजोने के अलावा उनके कार्यों को आगे बढ़ाया जाए, जो चुनौती के रूप में है। स्वामी जी के भक्त किसी न किसी रूप में आज भी दूर-दराज से यहाँ आते हैं और पांगू के आश्रम को निहारते हैं। जरूरत उन कार्यों को बढ़ाने की है।

भवानसिंह धर्मशक्तू व कुन्दन सिंह धर्मशक्तू स्वामी से प्रभावित हुए
जोहार मिलम निवासी भवान सिंह धर्मशक्तू स्वतंत्रता सेनानी एवं कुन्दन सिंह ध्र्मशक्तू स्वतंत्राता सेनानी नारायण स्वामी से बेहद प्रभावित हुए और समाज सेवा में जुटे। स्वामी भगवतानन्द का 1980 में स्वर्गवास हो गया। कैलासानन्द वर्तमान में सरस्वती आश्रम गढ़ीकैन्ट, देहरादून में हैं।
उल्लेखनीय है कि स्वामी के भक्त विद्यानन्द स्वामी ने 1944 के बाद मुनस्यारी जोहार के रास्ते कैलास गये। 1945 में मुनस्यारी में समाजसेवी रामसिंह पांगती के शान्तिकुन्ज आवास में निवास करने लगे। तब भजन-कीर्तन-सत्संग में आस-पास के लोग जुटा करते थे। भवानसिंह व कुन्दन सिंह भी यहीं रमने लगे थे। 1950 में विद्यानन्द स्वामी हरिद्वार चले गये। तब दोनों धर्मशक्तू भी हरिद्वार गये और सन्यास ले लिया।

हरीभाई देसाई का योगदान रहा है
उद्योगपति हीराभाई देसाई स्वामी जी के अनन्य भक्त थे। सीमान्त में नारायण आश्रम एवं नारायण नगर में आश्रम व जहाँ भी स्वामी जी ने स्कूल इत्यादि स्थापित किये, हीराभाई उनमें संरक्षक की भूमिका में रहे। उन्होंने नारायणनगर में वृदह मन्दिर अपने योगदान से 1975 में बनवाया और 1977 में यहाँ मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम आयोजित किया गया। उस आयोजन में बंगलौर, गुजरात, बड़ौदरा के उद्योगपति मय संगीत मण्डली के पधारे थे। अस्कोट, डीडीहाट के भक्तजन भी आयोजन में उपस्थित हुए। बाहर से आई कीर्तन मण्डली ने जाने समय अपने बजाने वाले मार्दल/मदृंग को डीडीहाट के संगीत रसिक परसीलाल वर्मा को दिया था। उस दौर में सन् 1975 से 1977 तक धन सिंह पांगती और लेखक ;मोहनसिंह प्रत्येक रविवार को नारायण नगर निरन्तर जाया करते थे। तब हरीभाई व उनकी पत्नी भी नाराणनगर में रहती थीं।

पिघलता हिमालय 27 फरवरी 2017 के अंक से

हरि प्रदर्शनी की तैयारी

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि

मुनस्यारी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरि सिंह जंगपांगी की याद में मल्ला दुम्मर में प्रतिवर्ष होने वाली हरि प्रदर्शनी इस बार ठीक दीपावली के मौके पर होनी है। इसके लिये हरि स्मारक समिति ने तैयारी कर ली है। आयोजन को लेकर ग्रामीणों में उत्साह है। ऐसे में दीपावली के पटाखे फूटेंगे और प्रदर्शनी में ग्रामीण थिरकेंगे।
उल्लेखनीय है कि आजादी के बाद से मल्ला दुम्मर में हरिसिंह ज्यू की याद में होने वाली इस प्रदर्शनी पर जोहार घाटी के समस्त स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण किया जाता है। साथ ही ग्रामीण प्रतिभाओं को खेलकूद, सांस्कृतिक मंच के माध्यम से अवसर मिलता है। घरेलू एवं कुटीर उद्योग प्रदर्शनी ग्रामीणों को उत्साहित करने वाली है। जिसमें घरेलू उत्पाद, कृषि, पुष्प, उनी वस्त्र, दन-पंखी कालीन, जड़ी-बूटी की प्रदर्शनी लगाई जाती है। जानकारों द्वारा इनका निरीक्षण कर विजेताओं को पुरस्कृत किया जाता है। मुख्य रूप से जंगपांगी बन्धुओं द्वारा इस आयोजन को मनाया जाता है परन्तु क्षेत्र के सभी लोगों को इसमें सादर निमंत्राण होता है और सभी के सहयोग से इस प्रदर्शनी को विस्तार दिया जाता है। आजादी के बाद से निरन्तर बिना किसी सरकारी सहायता के इस प्रदर्शनी को करवाना साहस की बात है। अपने बुजुर्गों, स्वतंत्रा सेनानियों का स्मरण के साथ युवा प्रतिभाओं को सम्मान और आपसी भाईचारे के लिहाज से यह अनुकरणीय उदाहरण भी है। समय के साथ कई प्रकार के उत्सव-महोत्सव शहरी ढब में रंगे आयोजन हो रहे हैं लेकिन अपने लोक की खुशबू के साथ होने वाली हरि प्रदर्शनी का सानी नहीं। जिसमें मल्ला दुम्मर, तल्ला दुम्मर, दरकोट, दरांती, रांथी, जलद, तिकसैन से लेकर दूर-दूर तक के लोग पहुंचते हैं। महिला मंगल दलों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देखने लायक होती हैं। यह प्रस्तुतियां उन कलाकारों से ज्यादा उम्दा होती हैं जिन्हें स्टार नाइट का ठेका शहरों में दिया जाता है या जो ग्लैमर के साथ शो करने के आदी हो चुके हैं।
हरि प्रदर्शनी को लेकर समिति के अध्यक्ष ललित सिंह जंगपांगी, गंगा सिंह जंगपांगी, किशन सिंह जंगपांगी, लोकबहादुर सिंह जंगपांगी, नरेन्द्र सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह पांगती, प्रधान पंकज बृजवाल, देवेन्द्र सिंह, हरीश धपवाल, मनोज धर्मशक्तू, गोकर्ण सिंह मर्तोलिया, चन्द्र सिंह लस्पाल, मंगल सिंह मर्तोलिया, मनोज जंगपांगी, राजेन्द्र सिंह मर्तोलिया, शंकरसिंह धर्मशक्तू, लक्ष्मण राम स्थानीय स्तर पर जुट हुए हैं।

इमला से निकला दल गोरी के किनारे किनारे तम्बू लगाते हुए पहुंचता था बुर्फू

पि.हि.प्रतिनिधि 
कल्पना करिये वह दृश्य कैसा होगा जब यात्री पैदल हों और नदी किनारे-किनारे यात्रा चल रही हो। कई दिनों की इस यात्रा में कई स्थानों पर रुकना पड़ेगा और पड़ाव डालना होगा। जब रुकना ही है तो विश्राम के लिये अपने तम्बू लगाने पड़ेंगे। ऐसी साहसिक यात्राएं अब नहीं होती हैं। संसाधनों की कमी के उन दिनों में लोगों में साहस और कर्मठता अधिक थी। नदी के किनारे-किनारे तम्बू लगाकर विश्राम और फिर आगे की यात्रा का सुख-दुःख भोग चुके इमला के उत्तम सिंह जंगपांगी जी आज पिघलता हिमालय की इस भेंटवार्ता में हैं।
जोहार घाटी में बुर्फू गाँव के नाथू सिंह, मान सिंह, पदम सिंह तीन भाईयों के बड़े परिवार से बात शुरु करते हैं। इन मेहनती भाईयों में नाथू सिंह जंगपांगी के दो पुत्र हुए- माधो सिंह और शेर सिंह। फिर माधो  सिंह जी के पुत्र हुए इन्द्र सिंह ;इनके पुत्र हैं हयात सिंह और उमेश सिंह, उत्तम सिंह ;इनके पुत्र हैं संदीप, प्रहलाद सिंह  ;इनके पुत्र हैं आयुष। शेर सिंह जंगपांगी जी के पुत्र हुए मंगल सिंह ;इनके पुत्र हैं देवेन्द्र सिंह देबू। माइग्रेस में मल्ला जोहार से नंगर यानी गर्म घाटियों को आने के क्रम में जंगपांगियों के ये परिवार ‘इमला’ आया करते थे। मदकोट से 2 किमी चढ़ाई चढ़ते ही खूबसूरत ग्राम इमला है।
पिता स्व.माधोसिंह व माता श्रीमती सुशीादेवी के घर जन्मे उत्तम सिंह जंगपांगी अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि बुर्फू से जंगपांगियों के परिवार कई जगह गये जिसमें से उनके बुजुर्ग इमला आया करते थे। मूल से व्यापारी उनके दादा जी अपने भाईयों के साथ तिब्बत व्यापार में सक्रिय थे। इसी परम्परा को उनके पिता व चाचा ने बनाये रखा। प्रकृति और मौसम के साथ सामंजस्य बनाते हुए इनका परिवार हर साल बुर्फू जाता और इमला आता था। गोरी नदी के किनारे-किनारे तम्बू लगाते हुए पूरा परिवार एक स्थान से दूसरे स्थान जाता। इस दस में बड़े-बूढ़े, बच्चे और पशु धन के साथ गृहस्थ का सामान होता था।
63 वर्षीय उत्तम सिंह जी ने प्राइमरी शिक्षा इमला से ही ली। इण्टरमीडिएट मुनस्यारी से करने के बाद पिथौरागढ़ डिग्री कालेज पढ़ा। स्नातक की पढ़ाई के दौरान इनका चयन बैंक के लिये हो गया। सन् 2015 मई में लीड बैंक चम्पावत से अग्रणीय जिला प्रबन्ध्क के पद से यह सेवानिवृत्त हुए। इमला ग्राम से ज्यादातर जंगपांगी परिवार बाहर निकल चुके हैं जो पूजा व कार्यविशेष में अपने ग्राम जाते हैं। यहाँ रहने वाले इमलाल परिवार क्षेत्रा में सक्रिय हैं। ग्राम में जंगपांगियों ने स्थानीय देव सहित अपने इष्ट को स्थापित किया है। जिसे पंचधाम के रूप में जानते हैं। पहले से ग्राम के लोग जौलजीवी मेले के लिये भी सक्रिय रहते थे और अपने उत्पदों के साथ दुकान सजाते थे।
मल्ला दुम्मर हरिप्रदर्शन में सक्रियता से जुड़े उत्तम सिंह बताते हैं कि प्रदर्शनी में व्यवस्थाओं को रूप देने के लिये उनके पिता बेहद सक्रिय थे। नरसिंह जंगपांगी जी मुख्य लोगों में रहे हैं। सन् 1977 में स्टेट बैंक मुनस्यारी में लगने के समय से उत्तम सिंह जंगपांगी स्वयं भी इस प्रदर्शनी के लिये सक्रिय हो गये और आज भी युवाओं को मार्गदर्शन कर रहे हैं।

नारायण दत्त तिवारी: वह हलचल भरी जिंदगी से घिरे रहे

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
राजनीति के क्षेत्र में दिग्गज रहे  वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी का 18 सितम्बर 2018 को दिल्ली के मैक्स अस्पताल में निधन हो गया। 1935 में इसी तारीख को जन्मे तिवारी जी पहले ऐसे नेता थे जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री बने। तिवारी 1976-77, 1984-85, 1988-89 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। 2002- 2007 तक वे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री एवं 2007 से 2009 तक आन्ध््र प्रदेश के राज्यपाल रहे।

हलचल भरी जिन्दगी से घिरे रहने वाले तिवारी जी का जन्म नैनीताल जिले के बल्युटी ग्राम में 18 अक्टूबर 1925 को हुआ था। इनके पिता पूर्णानन्द तिवारी का विवाह हरिदत्त जोशी की पुत्री के साथ हुआ था। श्रीमती जी के आकस्मिक निधन व अन्य कष्टों से घिरे पूर्णानन्द जी ने संभलते हुए दूसरा विवाह 24 वर्ष की आयु में मातीराम बल्युटिया की पुत्री चन्द्रावती के साथ किया। पिता पूर्णानन्द जी और माता चन्द्रावती के घर 18 अक्टूबर 1925 को नारायण ने जन्म लिया। इनके छोटे भाई प्रोफेसर रमेश तिवारी हैं। नारायण/नरैण की आरम्भिक शिक्षा नैनीताल के आसपास ही हुई। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. और एल.एल.बी. करने वाले एन.डी. 1947 में इलाबाद विवि छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये। 1947 से 1949 तक वह आॅल इण्डिया स्टूडेंट कांग्रेस के सचिव रहे। 1952 में प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर नैनीताल से चुनकर यूपी की विधानसभा में सबसे कम उम्र 27 वर्ष के विधायक बनने का सौभाग्य तिवारी जी को मिला।
तिवारी जी का 1954 में सुशीला तिवारी से विवाह हुआ। 14 मई 2014 को उन्होंने उज्जवला से 88 साल की आयु में विवाह किया। एन.डी.तिवारी उज्जवला के पुत्रा रोहित शेखर के जैविक पिता थे।
1957 में दूसरी बार नैनीताल विस जीतकर यूपी विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने एन.डी. 1962 में चुनाव हार गये थे। 1963 में कांग्रेस में शामिल होकर 1965 में काशीपुर से विधायक चुने गए। 1969 के मध्यावधि चुनाव में जीतकर यूपी सरकार में पहले श्रम, योजना व पंचायतीराज मंत्री बने। यूपी में 1976 में पहली बार, 1984 में दूसरी बार, 1985 में तीसरी बार और चैथी बार मुख्यमंत्री का पद संभाला। 1980, 1996 और 1999 में वह सांसद चुने गये। 1981 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे। 1987 को केन्द्र सरकार में वित्त एवं वाणिज्य मंत्री रहे। 1989 में आम चुनाव में हल्द्वानी सीट जीती लेकिन 1991 में भाजपा के बलराज पासी से नैनीताल लोकसभा सीट हारे। 16 मई 1993 को पत्नी डाॅ.सुशीला तिवारी का न्यूयार्क में कैंसर की बीमारी से निधन हो गया। 23 अगस्त 1994 को यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने 1997 में फिर से अध्यक्ष नियुक्त किये गये। 1998 में नैनीताल से चुनाव हारे और कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दियो। 2002 से 2007 तक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रहे। केन्द्र में योजना, उद्योग, पेट्रोलियम, विदेश मंत्राी रहे एन.डी. की चर्चा प्रधन मंत्री पद तक होने लगी थी।
मृदुभाषी, मिलनसार, विपक्षियों के भी चहेते तिवारी जी ने तराई में औद्योगिक विकास के लिये श्रम किया और रानीबाग की एचएमटी फैक्ट्री को बनाये रखने के लिये श्रमिकों के साथ खड़े रहे। इस महान नेता को पि.हि.परिवार की श्रद्धांजलि।

तिवारी कांग्रेस बनाकर भी देख ली
राजनैतिक पारी खेलते हुए नारायणदत्त तिवारी ने अपने बल पर चुनाव लड़ने के लिये 1994 में अर्जुन के साथ मिलकर पार्टी भी खड़ी की थी। कांग्रेस;तिवारीद्ध के रूप में जनता के बीच उम्मीदवार भी खड़े किये गये लेकिन उसका कोई प्रभाव चुनाव में नहीं पड़ सका था।

निरन्तर विकास समिति के संस्थापक
राजनीति के दांवपेंच में काफी आगे बढ़ने के बाद झटका खा चुके एन.डी.तिवारी निरन्तर विकास समिति के संस्थापक भी रहे। इसके लिये उन्होंने युवाओं के साथ सम्पर्क अभियान चलाया और जगह-जगह सभाओं को सम्बोधित किया।

पर्वतपुत्र-धरती पुत्र की दोस्ती
एन.डी.तिवारी को कई प्रकार की संज्ञाएं दी जाती रही हैं। हिमालय पुत्र, पर्वत पुत्र, विकास पुरुष और भी कई नामों के साथ आदर दिया जाता रहा है। दूसरी ओर यूपी के दिग्गज समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को धरती पुत्र की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार पर्वतपुत्र-ध्रती पुत्रा की दोस्ती घनिष्ठ रही है। एन.डी.तिवारी का हर प्रकार से साथ देने के लिये मुलायम सिंह यादव हमेशा तैयार रहे।
नौछमी नरैणा
अपने मिजाज के कारण हमेशा चर्चा में रहने वाले तिवारी जी को लेकर नरेन्द्र सिंह नेगी का गाया हुआ ‘नौछमी नरैणा’ गीत बहुत चर्चित हुआ। अपने जीवन के कई पन्नों में तिवारी जी वाद-विवाद में रहे लेकिन आन्ध््र प्रदेश का राज्यपाल रहते हुए बुरी तरह पफंस गये और उनका राजनैतिक भविष्य ध्ुंध्ला होता चला गया। बाद में रोहित शेखर के साथ कोर्ट-कचहरी हल्ले के बाद उन्होंने स्वीकार कि वह उनका पुत्रा है। तिवारी जी को चारों ओर से घिरा देख कांग्रेस ने उनसे दूरी कर ली। उनके करीब रहने वाले भी एक-एक कर कन्नी काट गये।
स्वार्थियों ने बुरी तरह घेर लिया था
जिस समय एन.डी.तिवारी की तूती बोलती थी, उन्हें स्वार्थियों ने घेर लिया था। विद्वता से भरे एन.डी. भी पता नहीं किन कारणों से उन स्वार्थियों को नहीं छोड़ पाते थे। आम लोगों में नारे लगने लगे थे- ‘एन.डी. तेरे चारों ओर, लीसा-लकड़ी-पत्थर चोर’। तिवारी जी का नाम लेकर अरबपति बन चुके लोगों ने लाभ लेने तक उन्हें बुरी तरह घेर लिया था और बाद में एकदम छोड़ दिया। तिवारी जी बिना एक कदम भी नहीं चलने वाले ऐसे लोगों ने उन्हें धेखा ही दिया।
के.सी.पन्त को नहीं पचा पाये
राजनीति के दांवपेंच में माहिर एन.डी.तिवारी भारत रत्न पं.गोविन्द बल्लभ पन्त के सुपुत्रा के.सी.पन्त को नहीं पचा पाये। चुनाव के दौरान पं.तिवारी व पं.पन्त के नाम पर कांग्रेस की गुटबाजी सापफ दिखाई देती थी। के.सी.पन्त की विद्वता और नम्रता अपनी जगह थी लेकिन तिवारी जी के दबदबे के आगे उन्हें कांग्रेस छोड़ भाजपा की सदस्यता लेनी पड़ी। उनकी पत्नी श्रीमती ईला पन्त ;भाजपाद्ध ने एन.डी. तिवारी ;कांग्रेसद्ध को नैनीताल लोकसभा सीट पर हरा दिया।

बसपाल बूढ़ा के वंशज रहते हैं मगरबला में, यहाँ होती है खुदा पूजा

पि.हि.प्रतिनिधि
गाँवों की सैर में आपको आज थल- मुनस्यारी रोड स्थित ‘बला’ ग्राम के बारे में बताते हैं। ग्राम पो. मगरबला में मर्तोली के मर्तोलिया रहते हैं। सीमान्त के मर्तोली से कई ग्रामों में जाकर लोग बसे जिसमें सुरिंग, आमथल, चुड़ियाधर, गुलेर, कारीखेत, मल्लादेश इत्यादि। इसी प्रकार मगरबला में भी एक राठ बस गया। पुराने जमाने में व्यापार के साथ घुमन्तु जीवन बसपाल बूढ़ा को यहाँ ले आया। बला ग्राम में रहने वाले बसपाल बूढ़ा के बंशज हैं। यह वह ग्राम है जहाँ खुदा पूजा का रिवाज है। गोरखा राज में अला-बला से बचाव के लिये की जाने वाली इस विशेष पूजा को अभी तक किया जाता है। मर्तोलियाओं के अलावा धमी, राणा, वृथवाल परिवार ग्राम में हैं। गाँव अधिकांश लोग बाहर हैं, वर्तमान में 35 परिवार यहाँ रह रहे हैं।
बला के पास से ही नामिक को जाने वाला पैदल रास्ता है। 27 किमी के इस मार्ग का प्रयोग पशुचारक, ग्रामीण और विदेशी पर्यटक करते हैं। नामिक में रहने वाले जैम्यिाल परिवार इस रुट से काफी आवागमन करते रहे हैं क्योंकि उनके रिश्ते हरकोट, बोना, तूनी, क्वीरिजिमिया आदि ग्रामों में होने से यही पैदल रास्ता निकट रहा है। बला से करीब 3 किमी दूरी पर विर्थी झरना है। ग्राम के बुजुर्ग दुर्गा सिंह मर्तोलिया उन उद्यमियों में से हैं जो आज भी मिलम तक जाते हैं, जिस कारण इन्हें पुराने और नये इतिहास की खासी जानकारी है। पिघलता हिमालय में इनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जगह सिंह मर्तोलिया अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि एक बार नामिक जाते समय उन्होंने गाय के गोबर में धूप/अगरबत्ती की सी खुशबू लगी। एक टुकड़ा जेब में डाल लिया, वह सुगन्ध् कई दिनों तक महकती रही। वह कहते हैं कि यह इलाका जड़ी-बूटियों का भण्डार है। जब गाय-बकरियां जड़ी-बूटी खायेंगी तो वह पौष्टिक दूध् देंगे। विदेशी छात्रों को शोध् के लिये भ्रमण पर खूब देखा है। एक बार एक दल मौसम में फंस कर उनके वहाँ रुका। वह लोग पेड़ पौधें जड़ी-बूटियों के बारे में जानकारी जुटा रहे थे। वनस्पति विज्ञान के छात्र जिस तल्लीनता के साथ जुटे थे, वैसा यहाँ नहीं हो रहा है। उपेक्षा के चलते सीमान्त को नहीं संवारा जा सका है। आज भी विदेशियों को इस इलाके के बारे में अच्छी जानकारी है क्योंकि वह पर्यटन के नाम पर केवल कूड़ा फैलाने नहीं बल्कि नामिक ग्लेश्यिर सहित अन्य सुरम्य ग्लेश्यिर व स्थानों का भ्रमण व अध्ययन करते हैं। ऐसे स्थानों को विकसित करने की दिशा में कार्य होने चाहिये।
ग्राम के रतन सिंह मर्तोलिया प्राइमरी स्कूल के बारे में बताते हैं कि व्यापार के उन दिनों में स्कूल भी माइग्रेसन के हिसाब से चलता था। मर्तोली के बाद सुरिंग फिर बला में। कई बार पढ़ाने वाले गुरु भी अलग-अलग होते थे। समय के साथ जो जहाँ रुके वहीं बस गये। अब माइग्रेसन का यह स्कूल सरकारी प्राइमरी पाठशाला के रूप में है। वह कहते हैं कि पहले समय के अनपढ़ भी ज्यादा सूझ वाले होते थे। नई पीढ़ी तो जानती भी नहीं है कि अद्ध-पव्वा-डेढ़ो- ढाम। व्यापारी लाखों का हिसाब मौखिक ही कर दिया करते थे। अब जोड़-घटाने के लिये मशीन का सहारा ले रहे हैं।
वाकेई कितना अच्छा होता हमारी शासन-प्रशासन की मशीन ग्रामों की भावनाओं को समझते हुए इनके विकास की ओर ध्यान देती। प्रत्येक ग्राम के बसने के पीछे कोरे किस्से-कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है।

स्व. दुर्गा सिंह
पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया का जन्म बला में ही हुआ था। आज जिस स्थान पर मन्दिर स्थापित है, उस स्थान उमेंदसिंह-दुर्गासिंह-मंगल सिंह इसी परिवार द्वारा ग्राम के लिये दिया गया।

पिघलता हिमालय 27 जून 2016 अंक से

‘तरकेब’ लगाकर होती थी हरि प्रदर्शनी

गोविन्द सिंह जंगपांगी

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्त के महान स्वतंत्रता सेनानी हरिसिंह जंगपांगी की याद में प्रतिवर्ष होने वाली प्रदर्शनी इस बार भी नवम्बर में होगी। इस प्रदर्शनी को आजादी के बाद से लगातार मल्लादुम्मर मुनस्यारी में मनाया जा रहा है। इसे बनाये रखने में क्षेत्रावासियों की श्रद्धा और लगन है। प्रदर्शनी के शुरुआती दिनों में जब कोई साधन नहीं थे ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर लोग जुटते थे। उन पुरानी यादों को बताने के लिये 69 वर्षीय गोविन्द सिंह जंगपांगी जी से बातचीत के बाद यह प्रस्तुति है-
जंगपांगियों का गाँव बुर्फू में हुआ। बूबू पद्मसिंह के पुत्रा हुए मान सिंह, पान सिंह और विजय सिंह। इन्हीं मान सिंह के पुत्र हैं- गोविन्द सिंह और मंगल सिंह। विजय सिंह के पुत्र हैं- शेरसिंह और माधे सिंह। पिता मानसिंह माता चन्द्रा जंगपांगी के घर बुर्फु में जन्मे गोविन्द सिंह ने जीवन के कष्टकर दिनों को बचपन में गुजारा है। छोटी उम्र में पिता के निधन के बाद मामा जी संरक्षण में शुरुआती शिक्षा गढ़वाल में हासिल की। लौटकर मुनस्यारी में फिर अल्मोड़ा से शिक्षा ली। 1971 में आर्मी में भर्ती होने के बाद आठ साल नौकरी की और ओंरिएटल इंश्योरेंशन में सेवा के लिये आ गये। यहीं से मण्डलीय प्रबन्धक पद से 2009 में सेवानिवृत्त हुए।
जंगपांगी परिवार भी सीमान्त के अन्य परिवारों की भांति माइग्रेशन में एक स्थान से दूसरे स्थान जाते रहे हैं। इनका परिवार बुर्फू, मल्लादुम्मर और भकुंडा;नाचनी के पास में क्रमवार रहता था। अपनी लगन और परिश्रम से मुकाम हासिल करने वाले गोविन्द सिंह जी का विवाह जोहार की महान विभूति रामसिंह पांगती की नातिनी तारा से हुआ। श्रीमती तारा जंगपांगी अध्यापिका होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में शुरु से ही बेहद अभिरुचि रखती हैं। सेवानिवृत्ति के बाद यह दम्पत्ति जोहार नगर, हल्द्वानी में निवास कर रहा है और दुम्मद की हरिप्रदर्शनी सहित सभी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय है
अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए गोविन्द सिंह जी बताते हैं कि साधन नहीं के बराबर थे लेकिन हरि प्रदर्शनी का उत्साह लोगों में बहुत था। इलाके की एकमात्र अलग तरह की इस प्रदर्शनी में लोग ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर जुट जाते थे। तब लगभग सभी परिवारों के पास तरकेब हुआ करते थे, क्योंकि मल्लाजोहार से लेकर गर्म घाटी तक यात्रा करते समय इनकी आवश्यकता होती है। पुराने लोगों में प्रेम सिंह जंगपांगी, नरसिंह जंगपांगी का नाम उल्लेखनीय है। सक्रियता की इस परम्परा को महेन्द्र सिंह ‘महन्त’ जंगपांगी ने भी निभाया। पुराने समय में नेत्र सिंह ल्वाल सांस्कृतिक प्रस्तुति और बच्चों को सिखाने के लिये आते थे। बम्मई में रहकर शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ले रहे नेत्रसिंह जी प्रत्येक वर्ष इस मौके पर दुम्मर आते थे। उनके भाई प्रताप सिंह भी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में साथ देते। प्रदर्शनी के लिये घरेलू उत्पादों का बहुत सामान आता रहा है। श्री जंगपांगी चाहते हैं कि परम्परा बन चुकी यह प्रदर्शनी हमेशा चलती रहे और नई पीढ़ियां इससे सीखें।