बृजेन्द्र लाल साह ने लोकधुनों को लेकर तिकसैन में तैयार किया था रामलीला नाटक

भूपाल सिंह पांगती

डाॅ.पंकज उप्रेती
अल्मोड़ा निवासी रंगकर्मी स्व.बृजेन्द्र लाल साह को लोक संस्कृति के क्षेत्र में कार्य के लिये याद किया जाता है। विख्यात रंगकर्मी स्व.मोहन उप्रेती के सखा बृजेन्द्र लाल ने कुमाउनी रामलीला नाटक रचकर जो प्रयोग सीमान्त क्षेत्रा में किया, वह अवस्मरणीय है। उन पुरानी यादों को सहेजे हैं- भूपाल सिंह पांगती।
85 वर्षीय श्री भूपाल सिंह पांगती, नानासेम, मुनस्यारी के रहने वाले हैं। बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि माइग्रेसन के पुराने दौर में जब मल्ला जोहार, मुनस्यारी और भैंसखाल में उनका परिवार आवत-जावत करता था, तब भैंसखाल में वह जन्मे। तब मुनस्यारी बाजार को तिकसैन के नाम से ही ज्यादा जाना जाता था। सन् 1952-54 की बात है जब कपकोट और बैजनाथ में दो ब्लाक खुले थे और बड़े भाई कल्याण सिंह पांगती डिप्टी एजूकेटिव आपिफसर के रूप में कपकोट ;वर्तमान में जिला बागेश्वर में नियुक्त हुए। इनके साथ एक सहायक के रूप में श्री साह जी कपकोट आये। जब सन् 1956-57 में मुनस्यारी में ब्लाक खुला तो उस समय बृजेन्द्र लाल साह जी के लिये नया पद सृजित किया गया। वह पद कल्चरल डेवलपमेंट आफिसर का था। तत्कालीन स्थितियों में ब्लाक भवन और रहने के लिये आवासीय सुविधा न होने के कारण साह जी पांगती भवन में ही रहने लगे। भवन के ‘गोठ’ वाले कमरे में बृजेन्द्र साह रहते थे और वहीं लेखन इत्यादि करते। कल्चरल आर्गनाइजर दुर्गा सिंह पांगती और भूपाल सिंह जी के साथ बृजेन्द्र लाल नित चर्चा करते ताकि कोई नाटक लोकभाषा में बने। तब रामायण के ध्नुष यज्ञ प्रसंग का नाटक तैयार किया गया। गीतों के लिये पहाड़ी शब्दों को पिरोया गया और तिकसैन बाजार में हुए किसान मेले में इसका मंचन हुआ। इसी तैयारी को बाद में दुम्मर हरि प्रदर्शनी में भी दिखाया गया, जिसे लोगों ने बहुत सराहा। नाटक में भूपाल सिंह जी राजा जनक बने और बृजेन्द्र लाल जी परशुराम।
भूपाल सिंह जी यादों का स्मरण करते हुए बताते हैं कि बृजेन्द्र लाल साह लोक धुनों के माहिर थे और उन्हें कुमाउॅ गढ़वाल की कई धुनों का ज्ञान था। उन्हीं धुनों में पूरा रामलीला नाटक तैयार किया गया। जिसे बाद में डाॅ.शेर सिंह पांगती ने पुस्तक आकार में लिखा।
लेखक ने अपने शोध् कार्य के दौरान 1998-99 में कुमाउनी रामलीला पर एक अध्याय ही लिखा है। बृजेन्द्र लाल साह जी के साथ लोक धुनों पर शास्त्रीय रागों के सिलसिले में लम्बी वार्ता के बाद इन धुनों की रिकार्डिंग भी की है।

पिघलता हिमालय 28 नवम्बर 2016 अंक से

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