COVID-19 खतरे में न डालें किसी को

कोरोना वायरस से पूरी दुनिया खतरे में है। मानव जाति पर तेजी से फैल रहे इस संक्रमण का सबसे ज्यादा प्रभाव अमेरिका में हो चुका है। स्पेन, प्फांस, इंग्लैण्ड, जर्मन सहित तमाम देशों में सुविधाएं होने के बावजूद कोरोना का कहर बढ़ता जा रहा है। चीन को तो पूरे विश्व में संदिग्ध् देश के रूप में देखा जाने लगा है क्यांेकि यहीं से कोरोना की शुरुआत हुई थी। इसके अलावा पाकिस्तान जैसे आतंक को पनाह देने वाले देश में भी कोरोना का असर है परन्तु वहाँ के प्रधानमंत्री इमरान खान का अड़ियल रुख आम जन के हित को नहीं नहीं देख रहा है। अपने देश की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार व प्रशासन मुस्तैद है लेकिन कतिपय लोगों को लापरवाही के कारण सख्ती करनी पड़ रही है।
यदि इसी प्रकार सभी देशों की स्थितियों पर विचार करने लगें तो कुछ न कुछ वाद-विवाद मिल जायेंगे लेकिन यह समय वाद-विवाद को छोड़ एक ऐसे वायरस से लड़ने का है जो मानव समाज के लिये मौत बनकर फैल रहा है। इस दिशा में दुनिया के देशों ने एक-दूसरे की मदद भी की है और अपने अपने देशों में जूझ रहे हैं। हालात जब इतने खतरनाक हैं तो प्रत्येक आम नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वह अपनी सरकार को ही न ताके बल्कि बचाव के लिये उपाय करे। भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश व दुनिया के गरीब देशों के सामने समस्या बहुत विकट है क्योंकि स्थिति से निपटने के लिये लाॅकडाउन में गरीबों को परेशानी उठानी पड़ रही है। हमारे आस-पास ही लाॅकडाउन में पुलिस द्वारा की जा रही निगरानी, फैक्ट्रियों के बन्द होने, यातायात के थम जाने, कफ्रर्यू की स्थिति में मजदूरों/श्रमिकों को भूखा मरने की नौबत आ गई है। ऐसे में कुछ लोगों ने इनकी सहायता के लिये हाथ भी बढ़ाकर पुण्य किया है।
किसी भी सरकार या प्रशासन की नीयत अपनी जनता को परेशान करने की नहीं है लेकिन कोरोना के फैलते संक्रमण को रोकने के लिये सख्ती करनी मजबूरी है। यह संक्रमण जितनी तेजी से फैल रहा है उसमें यदि थोड़ा भी चूक होती है तो मौतों की बारात बन जायेगी। इस भयानक स्थिति को रोकने के लिये ही शासन-प्रशासन को न चाह कर भी सख्त होना पड़ रहा है। इसलिये हम सभी का कर्तव्य होता है कि किसी को खतरे में न डालें। अपने और अपने परिवार, अपने मित्रों, अपने पड़ौस, अपने गाँव, अपने जिले, अपने प्रदेश, अपने देश को मौत के मुंह से बचाने में सहयोगी बनें।

कार्यालय प्रतिनिधि
कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव ही इस समय सबकी प्राथमिकमता है। इसे लेकर किसी भी तरह की लापरवाही मौत है। इस संक्रमण ने पूरी दुनिया को वर्षों पीछे धकेलते हुए सोचने पर मजबूर कर दिया है कि प्रकृति का सच क्या है। विश्व के कई देशों की तरह भारत में भी लाॅकडाउन के बाद सन्नाटा और अपनों के बीच रहने की होड़, भूख की लड़ाई, भय बना हुआ है। खतरनाक हालातों में घिरा मजदूर वर्ग और शहरों में जैसे-तैसे दिन गुजार रहे लोग अपने गाँव-घर जाने के लिये परेशान हैं। विदेशों से भी कई भारतीयों को सरकार स्वदेश ला चुकी है।
कोरोना वायरस से पूरी दुनिया घिरी है। चीन से शुरु हुए इस रोग ने दुनिया के देशों को अपने चपेट में ले रखा है। इससे सबसे ज्यादा मौतें इटली में हुई हैं। दुनियाभर के डाक्टर, वैज्ञानिक करोना से बचाव के लिये खोज में जुटे हैं और टीके बनाने की तैयारी की जा रही है जो इससे बचाव करे। लेकिन यदि ऐसा टीका बन भी जाता है तो सालभर का समय तो लग ही जायेगा। ऐसे में प्रत्येक आम जन की सूझबूझ व समझदारी ही समाज को बचा सकती है। भारत में भी इस महामारी से बचाव के लिये कदम उठाये गये हैं। सरकार की अपील के बाद भी लापरवाह बने लोगों को सख्ती के साथ रोका गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद 25 मार्च से देश को लाॅकडाउन कर दिया गया। इससे पहले पहले जनता कफ्रर्यू पिफर अघोषित कफ्रर्यू लगाया गया। छूट पर लापरवाही करने वालों के कारण राज्यों में सख्ती के साथ कफ्रर्यू लगाया गया ताकि कोरोना जैसी घातक महामारी को रोका जा सके। आश्चर्य हो रहा है कि जब दुनियाभर में इस महामारी से हाहाकार मच चुका है, हमारे यहाँ कुछ लोग अड़ियलपना करते रहे। अपने घर से बाहर निकलने को बेताब ऐसे लोगों को पुलिस के डण्डे से हटाया गया। इसके अलावा सोशल मीडिया पर हँसी-मजाक, गीत-संगीत के अलावा सरकार के कदमों पर नुख्ता निकालने वाले शुरुआत में नहीं मान रहे थे लेकिन कोरोना के कहर से सब जान चुके हैं कि यदि किसी भी प्रकार की लापरवाही हुई तो मोहल्ले के मोहल्ले मरघट बन जायेंगे। इसी खतरे को देखते हुए दिल्ली सहित पूरे देश के मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च में सामुहिक प्रार्थना-पूठा-अजान जैसे कार्यक्रम स्थगित कर तय हुआ कि अपने घरों पर ही रहकर पूठा-पाठ करें। संकट की इस घड़ी में लाॅकडाउन से किसी भी कर्मचारी का वेतन न काटने का निर्देश प्रधानमंत्री ने दिया है और अपील की कि लोग अपने परिवार को घर पर ही रहकर खतरे से बचाएं।
कोरोना के संक्रमण का प्रकोप रोकने के लिये भारत सरकार और प्रदेश की सरकारें जुटी हुई हैं। पुलिस, प्रशाासन, बैंक की ड्यूटी के अलावा चिकित्सक और स्वच्छकों द्वारा किये जा रहे कार्यों की जितनी सराहना की जाए कम है। खतरे में रहकर इन लोगों द्वारा जो सेवा की जा रही है वह इस लड़ाई के असल हीरो हैं। कुछ समाजसेवियों द्वारा भी असहाय व परेशान लोगों की सेवा के लिये हाथ बढ़ाया गया है।
कोरोना संक्रमण की भयावह स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस विषय पर दूसरी बार देश को सम्बोधित करते हुए जब 21 दिन के लाॅकडाउन की घोषणा की, उनकी बातों में देश व दुनिया को बचाने का दर्द था। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान के हर नागरिक को बचाने के लिए घरों से बाहर निकलने पर बापंदी लगाई जायेगी। ये एक तरह से कफ्रर्यू ही है। लाॅकडाउन की कीमत देश को उठानी पड़ेगी। लेकिन आपके परिवार को बचाना, आपके जीवन को बचाना, इस समय मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इस समय देश में जो जहाँ हैं, वहीं रहें। अभी 21 दिन का लाॅकडाउन है। अगर ये 21 दिन नहीं संभले तो हमारा देश 21 वर्ष पीछे चला जायेगा। प्रधानमंत्री के सम्बोधन का जबर्दस्त प्रभाव हुआ और सभी लोग लाॅक डाउन के लिये तैयार हो गए। कोरोना की महामारी को रोकने के लिये यही एक तरीका है कि इस वायरस की चैन को तोड़ा जाए ताकि यह न फैले। केन्द्र द्वारा कोरोना वायरस के कहर से निपटने के लिये 15,000 करोड़ रुपए के फंड का प्रावधान किया है। वर्तमान संकट को देखते हुए बड़े पिफल्मी कलाकारों, उद्योगपतियों, समाजसेवियों ने अपनी तिजोरी खोल दी। इसमें स्वामी रामदेव ने 800 करोड़ देने की घोषणा के साथ सन्देश दिया। फिल्मी कलाकार अक्षय कुमार ने 25 करोड़ रुपये, क्रिकेटर सचिन तंदेलुकर ने 50 लाख दिये। अजीम प्रेम जी फांउडेशन ने बड़ी राशि देकर सहायता की है।
उत्तराखण्ड में भी प्रदेश की सीमाएं सील करते हुए कफ्रूर्य लगाया गया है ताकि कोरोना वायरस की लड़ाई को लड़ा जा सके। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सभी प्रदेश वासियों से सहयोगी बनने को कहा है। मुख्यमंत्री ने जनता से प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सम्पूर्ण लाॅकडाउन के आह्वान में पूरा सहयोग देने की अपील की। उन्होंने कहा कि जब भी देश पर और मानवता पर संकट आया है, हम सभी की एकजुटता से संकट को दूर करने में कामयाब हुए हैं। लाॅकडाउन को कारगरबनाने के लिये प्रदेश में टास्क पफोर्स गठित की गई है। साथ ही अति आवश्यक सेवाओं में लगे वाहनों के लिये पास जारी किये गये हैं।
पुलिस महानिदेश अपराध् एवं कानून व्यवस्था अशोक कुमार ने बताया कि प्रदेश में लाॅकडाउन के दौरान कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये 6000 पुलिस कर्मी और 20 कम्पनी पीएसी तैनात हैं। प्रदेश को 102 जोन और 500 सेक्टर में बांटा गया है।
इस बीच देहरादून सचिवालय में प्रदेश कैबिनेट की बैठक में महत्वपूर्ण फैसले लिये गये। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में मंत्राी सतपाल महाराज, यशपाल आर्य, मदन कौशिक, डाॅ.हरक सिंह रावत, सुबोध् उनियाल और अरविन्द पाण्डे मौजूद थे। प्रदेश सरकार के शासकीय प्रवक्ता मदन कौशिक ने सचिवालय मीडिया सेंटर में कोरोना वायरस ;कोविड 19 से बचाव को लेकर प्रदेश सरकार के फैसलों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कालेजों देहरादून, हल्द्वानी, श्रीनगर और अल्मोड़ा मेडिकल कालेज को मुख्य रूप से कोरोना रोगियों के उपचार के लिये आरक्षित रखा जाएगा। शेष विभागों को अन्य हास्पिटल में शिफ्रट किया जाएगा। कैबेटिन के फैसलों पर अमल करते हुए शासन ने निर्देश जारी कर दिये हैं। इसके तहत बड़े निजी अस्पतालों से कहा गया है कि वे 25 फीसदी बेड कोरोना रोगियोें के लिये रखें। इसके अलावा आईआईपी देहरादून और एम्स ट्टषिकेश में केविड-19 की जाँच हेतु इजाजत दी गई है। श्रीनगर, हल्द्वानी, दून मेडिकल कालेजों के विभाग अध्यक्ष तीन महीने के लिये डाक्टर भर्ती कर सकते हैं। जिलाधिकारी भी अपने जिलों के अस्पतालों में तीन माह के लिये डाक्टर भर्ती कर सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग में सृजित 958 रिक्त पदों के सापेक्ष 479 सर्जन को 11 माह के रखने की अनुमति, असंगठित मजदूर जरूरतमन्द जनता की तात्कालिक मदद के लिये चार जनपदों के जिलाधिकारियों को तीन व अन्य को दो करोड़ रुपये का फंड, गेहूं किा खरीद मूल्य बढ़ाकर कर 1925 रुपये प्रति क्विंटल से अब 1945 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है।
कोरोना से बचाव की यह लड़ाई लम्बी है, सभी ने सावधान रहना होगा।

कोरोना का भस्मासुर

पिघलता हिमालय

कोरोना वायरस ने पूरे विश्व में हड़कम्प मचा दिया है। चीन से शुरु होकर अमेरिका व ईरान में सैकड़ों लोगों की मौत के बाद दक्षिण-पूर्वी एशिया में सैकड़ों मामले सामने हैं। थाइलैंड, भारत, इंडोनेशिया, श्रीलंका, मालदीव, बंग्लादेश, नेपाल, भूटान सहित चारों ओर यह वायरस फैला है। कोरोना महामारी से निपटने के लिये विश्व के देशों ने हाथ-पैर मारने शुरु कर दिये हैं और अपने नागरिकों से घर में सिमट कर रहने को कहा है ताकि वायरस फैलने से बचा जा सके।
कोरोना वायरस के बारे में विशेषज्ञ जुटे हुए हैं और इसकी रोकथाम के लिये जितना ज्यादा हो सकता है किया जा रहा है। लेकिन यह तो जान ही लेना चाहिये कि कोरोना का भस्मासुर क्या है? दरअसल दुनियाभर की तेज रफ्रतार में यह भुला दिया गया है कि प्रकृति के अपने नियम हैं। नियम विरुद्ध आचरण और मनमानी का परिणाम ही कोरोना है। चीन जैसे शक्तिशाली देश को ही सबसे पहले कोरोना ने निवाला बनाया। अपने विकास के लिये दूसरे के विनाश का रास्ता चुनने वाले व्यक्ति और देश यह कतई नहीं जानते हैं कि कोई भी वरदान तब विनाश बन जाता है जब उसका दुरुपयोग किया जाने लगे। कोरोना वायरस भी इसी प्रकार का भस्मासुर है। इसका नाच इतना ताण्डव मचा चुका है कि दुनिया के देशों में हाहाकार मचा है। इन्तजार है शिव रूप में कोई इसे नचाए और भस्म कर दे।
शिव और भस्मासुर की कथा को जानने वाले बातों को आसानी से समझ सकते हैं। भस्मासुर नामक दैत्य ने शिव को प्रसन्न कर ऐसा वरदान मांगा कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जायेगा। वरदान मिलने के बाद भस्मासुर शिव को ही भस्म करने दौड़ पड़ा था। परेशान शिव ने बचने के लिये मोहनी रूप धर नृत्य किया और भस्मासुर भी नाचने लगा। नाचते नाचते उसने अपना हाथ अपने ही सिर पर रख दिया और भस्म हो गया था। ऐसा ही कुछ कोरोना भी है। चीन ने जो प्रयोग अपने वहाँ किये, उसे पता नहीं था कि वह उसे ही भस्म करने वाला है। कोराना ही क्या, ऐसे न जाने कितने वायरस दुनिया में फैल चुके हैं जो भविष्य में भी परीक्षा बनकर सामने होंगे। इसलिये जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने और अपने परिवार को संभाले। हमारे संस्कार, हमारे नियम-ध्र्म, हमारी मान्यताएं कोरी बकवास नहीं हैं। इनके साथ ही विज्ञान को जानना भी जरूरी है। अपने को अनुशासन में रखने से अपने समाज और अपने देश को सुरक्षित किया जा सकता है। कोराना ने पूरी दुनिया में यह सन्देश दे डाला है कि यदि महामारी पफैली तो सबकुछ मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी।

ठहर सा गया है जन-जीवन

कार्यालय प्रतिनिधि
कोरोना वायरस से बचाव के लिये सारे उपायों के साथ उत्तराखण्ड भी अलर्ट है। पूरा मार्च का महीना कोरोना कफ्रर्यू से घिरा रहने के बाद अब अप्रैल भी सामान्य नहीं है। सुरक्षा इन्तजामों का जाल शासन प्रशासन ने बिछाया है लेकिन वह भी उतना ही कर सकते हैं जितना उसके पास है। ऐसे में सभी ने जागरुकता दिखानी है। कोरोना के भय से सबकुछ ठहर सा गया और इससे सारी व्यवस्थाएं चरमरा चुकी हैं। स्कूल-कालेज प्रतियोगिता-परीक्षा सभी प्रभावित हैं। नव संवत्सर ‘प्रमादी’ का स्वागत भी सादा ही रहा। इस अवसर पर होने वाले जलसे-जुलूस स्थगित रहे। प्रसिद्ध मन्दिरों व मेलों में रोक का असर भी रहा। प्रदेश में होने वाली धर्मिक यात्राएं भी प्रभाव में हैं। ऐसे में ग्रीष्मकालीन पर्यटन को भी सन्देह से देखा जा रहा है। पर्यटन के मौसम में छुटपुट कारोबार कर रोटी जुटाने वाले ताक रहे हैं कि स्थिति ठीक हो और यात्राी पहाड़ आएं लेकिन अधिकांश बुकिंग रद्द होने से मायूस हैं।
देशभर में फैले कोरोना वायरस के संक्रामित लोगों तादाद बढ़ती जा रही है। पचास से ज्यादा लोगों के सैंपल लेकर हल्द्वानी भेजे गये हैं। पन्तनगर एयरपोर्ट में तैनात स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा थर्मल स्कैनिंग की जा रही है। पन्तनगर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक डेयरी फार्म द्वारा परिसर में दूध् बांटने के लिये लगाए लगाए गए कैंनों ;दूध् के बर्तनद्ध में अब टोटियांे की सहायता से दूध् दिया जा रहा है। पहले यह दूध् बर्तन का ढक्कन खोल कर खुले में दिया जाता था।
संक्रमण से बचाव के लिये सबसे पहले प्रदेश का सुप्रसिद्ध पूर्णागिरी मेले पर प्रतिबन्ध् लगाया गया। इसके बाद अन्य मेले, मन्दिरों में रोक लगा दी गई। मन्दिर समितियों ने भी इसमें योगदान दिया है। धर्मिक आयोजनों को भी सीमित किया गया है। धर्मिक नगरी हरिद्वार में इन दिनों जहाँ हजारों श्रद्धालु पहँुचते थे, सन्नाटा पसरा हुआ है। यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों पर नजर रखी जा रही है। हैड़ाखान मन्दिर में इटली समेत अन्य देशों के विदेशी पर्यटकों को मन्दिर से हटा दिया गया है। कोरोना का व्यावसायिक कार्यों में तो जबर्दस्त प्रभाव पड़ा है। स्थितियों को देखते हुए होटल व्यावसायियों ने सहयोग किया है। नैनीतात, मसूरी सहित पर्यटक स्थलों पर होटल, रिजाॅर्ट बन्द कर लोगों को जागरुक किया है। मुक्तेश्वर, भीमताल, रामनगर, मुनस्यारी सभी जगत पर्यटकों की बुकिंग न होने से सन्नाटा है।
राजनीतिक पार्टियों ने भी अपने कार्यक्रमों को परिवर्तित कर दिया है। भाजपा ने अपनी बैठकों व प्रस्ताविक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है। आम आदमी पार्टी का सदस्यता अभियान आॅनलाइन है लेकिन इसने भी अपने सम्पर्क अभियान को रोका है। कांग्रेस द्वारा भी अपने कार्यक्रमों को बदल दिया गया है। सभी ने मिलकर कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव की अपील की है। मंत्रिमण्डल की बैठक के बाद जन प्रतिनिध्यिों को सभाओं, जनता दरबार कार्यक्रम रद्द करने को कहा गया।
कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए सरकार ने स्टेडियम, कालेज और गेस्ट हाउसों को क्वारंटीन सेन्टर बनाया है। अस्थायी अस्पताल की तैयारियां भी हो चुकी हैं। किसी भी स्थिति से निपटने के लिये सरकार ने रेडअलर्ट जारी किया है। सेना ने भी कोरोना के कहर से बचने की तैयारी की है। छुट्टी पर गए जवानों की वापसी पर पिफलहाल रोक लगा दी है। जो लोग छुट्टी काटकर वापस आए हैं, उन्हें 14 दिन क्वारंटीन पर रखा जा रहा है।
कोरोना वायरस के बचाव के लिये हाईकोट की ओर से तय किया गया है कि 15 अप्रैल तक केवल अति आवश्यक मुकदमों की ही सुनवाई होगी। निर्देश के अनुसार हाईकोर्ट में केवल मृत्युदण्ड, बन्दी प्रत्यक्षीकरण सुरक्षा, सम्पत्ति ध्वस्तीकरण, जमानत प्रार्थना पत्रा ही सुनवाई होगी। उपरोक्त में मृत्युदण्ड के अलावा अन्य त्वरित मामलों की सुनवाई के लिये अधिवक्ताओं को मामले की अर्जेंसी का कारण बताना होगा।
इस प्रकार जन-जीवन ठहर सा गया है लेकिन यह सब करना भी जरूरी है ताकि किसी प्रकार का नुकसान न हो। इसमें सभी को सहयोग देना है।

करोड़ों भक्तों की आस्था का प्रतीक है पूर्णागिरी दरबार


डाॅ.पंकज उप्रेती

हिमालय के उत्तरपूर्व में नेपाल सीमान्त पर समुद्रतल से लगभग तीन हजार फीट की ऊँची अन्नपूर्णा की चोटी पर स्थित है करोड़ों भक्तो की आस्था का प्रतीक पूर्णाेिगरी दरबार। उत्तर भारत के इस प्रसिद्ध मेले में इन दिनों भारी भीड़ जुटी हुई है। मान्यता के अनुसार पूर्णागिरी दर्शन करने वाले सीमा पार नेपाल ब्रह्मदेव में सि(बाबा मन्दिर के दर्शन भी जरूर करते हैं। नाचते-झूमते भक्तों के जत्थों को इन दिनों टनकपुर से लेकर मन्दिर तक देखा जा सकता है। मेले का यह क्रम पूरी ग्रीष्म रितु तक चलेगा। जिसमें लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामना लिये पहँुचते हैं।
चैत्र मास की प्रतिपदा से लेकर बैसाख के अन्त तक दूर-दूर से आने वाले नर-नारियों का जमघट यहाँ प्रतिवर्ष लगता है। पूर्णागिरी माई की जय, पहाड़ वाली माई की जय, शेरावाली की जय, सच्चे दरवार की जय इत्यादि नारे लगाते हुए यात्री दल मीलों पैदल चलकर पूर्णागिरी मन्दिर दरबार पहँुचते हैं। आरोग्य, गृहस्थ, सुख सन्तान, ऐश्वर्य तथा दर्शन की लालसा लिये यात्रियों की मान्यता है कि उनकी यात्रा से मनोवांछित इच्छाएं पूर्ण होगी। दुर्गा-सप्तष्ती में देवी की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा गया है- ‘‘जो सिंह की पीठ पर विराजमान है। जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है जो मरकत मणि के समान कान्तिवाली अपने चारों भुजाओं मे शंख, चक्र, धनुष वाण धरण करती है व तीन नेत्रों से सुशोभित होती है। जिनके भिन्न-भिन्न अंग बंध्े हुए बाजूबन्द, कंकण, हार, खनखनाती हुई करघनी व नूपुरों से सुशोभित हैं। जिनके कानों में रत्न जड़ित, कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। वे भगवती हमारी दुर्गति दूर करने वाली है।’’
पूर्णागिरी नाम क्यों पड़ा, इस बारे में कहा जाता है कि प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती द्वारा स्वयं को भस्म कर देने पर क्रुद्ध शिवजी जब सती की क्षत-विक्षत देह को आकाश मार्ग से ले चले तब मार्ग में लगभग 51 स्थलों पर देवी सती के अंग गिरे। पूर्णागिरी शिखर पर देवी का नाभि अंग गिरने से यह शिखर एक पुनीत स्थल माना जाने लगा। देवी के मन्दिर के बीच में एक बाॅबी/सुराख है। वह सती की नाभि ही है जिसका निचला छोर शारदा नदी तक गया है। कहा जाता है कि कालान्तर में काठियाबाड़, गुजरात निवासी श्री चन्द्र तिवारी सम्वत् 1621 मे यवनों के अत्याचार से पीड़ित हो कुमायूं के चन्द्रवंशी राजा ज्ञानचंद के दरबार पहँुचे। इस प्राीचन देवी-स्थल की महिमा व स्वप्न में देवी का आदेश होने पर ब्रह्मकुण्ड/बोम के निकट स्नान कर सम्वत् 1632 में माँ पूर्णागिरी की मूर्ति की स्थापना की। इस प्राचीन मन्दिर का पूजा कार्य बाद में तिवारी और बल्हेड़िया वंश के लोगों ने परस्पर बांट लिया। खिलपति में अखिलतारिणी मन्दिर, उग्रतारा व बाराही मन्दिरों की स्थापना का श्रेय भी श्री चन्द्र तिवारी को है।
ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार अन्नपूर्णा शिखर के निकट सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी में, जो शारदा नदी के दूसरी ओर स्थित थी, एक विशाल यज्ञ आयोजित किया था जिसमें सभी देवताओं सहित भगवान शिव-पार्वती भी पधारे थे। निकटवर्ती पर्वत श्रेणियों की रमणीक दृृृश्यावली ने देवी पार्वती का मन मोह लिया और उन्होंने शिव से वहीं निवास करने की आज्ञा मांगी तभी से ब्रह्माजी की प्राचीन यज्ञ स्थली ब्रह्मदेव मण्डी तथा देवी पार्वती का वास स्थल पूर्णागिरी के नाम से विख्यात हुआ।
शारदा नदी के बायें तट पर बरमदेव/बूम के ठीक सामने सि(नाथ का प्राचीन मन्दिर एवं पूर्णागिरी मन्दिर के ठीक नीेचे देवी के चरण-स्थलों पर बना मन्दिर मार्ग की जटिलता के कारण प्रायः भक्तों की पहंँुच से बाहर ही हैं चैत्र मास में शारदा नदी में नावें डालकर बूम से ठाकुर जी की सवारी असली सिद्ध बाबा मन्दिर तक जाती व पूजन आदि कर वापस लौट आती है। सिद्धबाबा एक सिद्ध सन्त व देवी के अनन्य उपासक थे जिस पर पूर्णागिरी माता की विशेष कृपा थी। शक्ति स्वरूपा देवी भगवती ही उनकी इष्ट थी। दिन रात खड़े रहकर सच्चे मन से देवी की अराधना कर उन्हें सम्पूर्ण सिद्धियां व देवी से प्राप्त साक्षात्कार व संभाषण शक्ति प्राप्त हो चुकी थी। किवदन्ती है कि देवी उपासक बाबा सदानन्द व सिद्धमणि पर्वत पर तपस्या रत बाबा सिद्धनाथ में परिचय होने पर देवी की महिमा व चमत्कारों को सुन सिद्धनाथ देवी दर्शन को अष्टमी की महारात्रि को सिंह की चिन्ता किए बिना अन्नपूर्णा शिखर की ओर चल दिये। एकान्त-विश्राम के इन क्षणों में पर पुरुष का आभास पाकर देवी क्रोधित हुए बिना न रह सकी और अपने इस भक्त को दो टुकड़ों में खण्डित कर शिखर से उछाल दिया। जिसका एक भाग शारदा नदी के पार नेपाल राज्य में व दूसरा भारत में बनखण्डी स्थान पर गिरा। देवी के इस कृत्य पर नेपथ्य आत्र्तनाद गूंज उठा- ‘‘देवी! क्या तुम्हारे भक्तों की यही दुर्गति होती है।’ देवी ने अपने भक्त सि द्ध नाथ को दर्शन दिये और आशीर्वाद देकर अन्र्तध्यान हो गई। बाबा लम्बे समय तक देवी-चरणों में सेवारत रहकर देवीधम सिधारे। अन्नपूर्णा शिखर के सामने नेपाल राष्ट्र में बाबा सि द्ध नाथ का प्राचीन मन्दिर व समाधि आस्थावानों के लिये श्र द्ध का केन्द्र है।
यात्रा की कठिन चढ़ाई-
माँ पूर्णागिरी के पुनीत स्थल की यात्रा कठिन चढ़ाई वाली है। देश-विदेश से यात्राीगण टनकपुर भाबर मण्डी में रात्रि विश्राम करते हैं। पैदल आने वाले जत्थे व वाहनों, रेल यात्रा द्वारा पहँुचे यात्राी टनकपुर से ठूलीगाड़ नामक स्थान पर पहँुचते हैं। प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी, महावली भीम द्वारा रोपित चीड़ वृक्ष, पाण्डव रसोई तथा उनकी उत्तराखण्ड यात्रा के पड़ाव स्थल इसी के समीप हैं। ठूलीगाड़ में प्रथम पड़ाव के साथ ही लगभग 5 किमी. की पथरीली पहाड़ की चढ़ाई पूरी करनी होती है। इस मार्ग पर बासी की चढ़ाई पूरी कर हनुमान चट्टी, ढलान पर लादी खोलाा, हल्की चढ़ाई पूरी कर पानी की टंकी व पर्यटक आवास दिखाई देता है। कुछ और चलने के बाद भैरोंचट्टी, पुरानी बाँवली व टुन्नास, काली मन्दिर, झूठा मन्दिर के बाद माता का दरबार मिलता है।
मान्यता है कि पहाड़ वाली माई की कृपा अबोध् बालकों, अशक्त महिलाओं तथा वृ(जनों को अपनी शरण में खींच लेती है।
टुन्नास से पवित्रा होकर यात्राीगण काली मन्दिर से आगे लगभग एक किमी की दुर्गम चढ़ाई, जो अब सीढ़ियाँ बनने तथा लोहे के पाइप लगने से सुगम हो गई है, प्रारम्भ करते हैं। इस मार्ग में झूठा मन्दिर, काली मन्दिर इत्यादि के दर्शन के साथ ही नैसर्गिक शोभा को निहारते यात्राी माता के नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। सामने की पर्वत श्रृंखला में मित्रा राष्ट्र नेपाल की सीमा पर देवी के अनन्य उपासक सि द्ध बाबा के प्राचीन मन्दिर के दर्शन भी यात्राी जरूर करते हैं। इसके बिना यह यात्रा अपूर्ण मानी जाती है।
टुन्नास बनाम इन्द्रभवन-
देवराज इन्द्र द्वारा गौतम ट्टषि की पत्नी अहिल्या से छलपूर्वक मिलने की कथा सर्वविदित है। कुपित ट्टषि के शाप से मुक्ति पाने के लिये भगवान शिव के परामर्श से इन्द्र ने जिस स्थान पर यज्ञ किया वही प्राचीन स्थल इन्द्रभवन या टुन्नास के नाम से जाना जाता है। जो इस मनोहारी यात्रा का मुख्य पड़ाव है। यात्राीगण आते-जाते समय यहीं विश्राम करते है। व बालकों का मुण्डन, पूजा-पाठ व हवन आदि कराते हैं।
झूठे मन्दिर की कहानी-
वर्षों पहले एक सम्पन्न दम्पत्ति सन्तान की कामना लेकर माँ के दरबार में पधरा और सन्तान प्राप्ति पर देवी को सोने का मन्दिर चढ़ाने का वचन दिया। मनोकामना पूर्ण होने पर सेठ ने तांबे का मन्दिर बना उपर से सोने का पानी चढ़वा दिया। कई किमी से बनवाकर लाया गया यह मन्दिर सच्चे दरबार तक नहीं आ सकता और लाख प्रयत्न पर भी नहीं उठा। देवी ने सेठ की भेंट अस्वीकार कर दी, जिसे आज भी झूठे मन्दिर के रूप में जाना जाता है। टुन्नास के निकट रखा यह मन्दिर सच्चे दरबार की महिमा का बखान कर रहा है।
काली मन्दिर व भैरों बाबा-
झूठे मन्दिर से कुछ आगे चलकर काली देवी तथा भैरों बाबा का प्राचीन स्थल है। इसकी स्थापना कूर्मांचल नरेश राजा ज्ञानचन्द के विद्वान दरबारी पण्डित श्री चन्द्र त्रिपाठी ने की थी। राजा ने पण्डित को 6 गाँव उपहार में दिये थे। आज भी इन बिल्हा गाँव के निवासी बल्हेड़िया तथा तिराही गाँव के निवासी त्रिपाठी कहलाते हैं। मन्दिर का समस्त पूजा-कार्य इनके द्वारा किया जाता है। भैरों चट्टी पर देवी के अनन्य उपासक महाकाल भैंरो का प्राचीन स्थल व काली मन्दिर के निकट देवी के काली का रौद्र रूप धरण कर तूर्णा राक्षस का वध् स्थल भी है।
सिद्ध बाबा की समाधि-
एक दिन जब रात्रि में देवी सिंह की सवारी पर निकली तो निर्जन स्थल पर किसी पुरुष की उपस्थिति का आभास पाकर शेर ने गर्जना की और देवी ने समाधिस्थ बाबा सिद्ध मणि के दो टुकड़े कर पफंेक दिये। एक तो नीचे जाकर बनखण्डी नामक स्थान पर गिरा जहाँ आज भी मेला लगता है, दूसरा टुकड़ा सामने पहाड़ पर जाकर गिरा जहाँ समाधि स्थल सिद्ध बाबा का प्राचीन मन्दिर विद्यमान है। देवी के वरदान के कारण ही सिद्ध बाबा के दर्शन किये बिना पूर्णागिरी की यात्रा अपूर्ण समझी जाती है। इस कारण यात्राीगण देवी के दर्शन के बाद सिद्ध बाबा के दर्शन करना अपना पुनीत कर्तव्य समझते हैं।
माँ का दरबार-
चट्टान के उपर-नीचे रास्ते पार कर उँची चोटी पर पूर्णागिरी माता का दरावार है। जिसकी प्रधन शक्ति पीठों में गणना की जाती है। चबूतने पर नाभि, त्रिशूल व मूर्ति आदि चिन्ह हैं, जिसकी पूजा की जाती है। मन्दिर के पाश्र्व भाग में अति प्राचीन पत्रा, पुष्प फल रहित सूखा वृक्ष है। जिस पर अनेकों घंटियाँ व ध्वज पताकायें बंध्ी हैं और पास में त्रिशूल गढ़े हैं। नाभि स्थल ढका है।