भीम सिंह बृजवाल जी का तिब्बत यात्रा वृतांत

वर्तमान समय में जोहार घाटी के तिब्बत व्यापार तक जाने वाले लोगों की गिनती अंगुली में की जा सकती हैं. घाटी की चहल-पहल, प्रत्येक गाँव से तिब्बत जाने वाले छोटे- बड़े व्यापारीयों को लोग गाँव से वलकिया (गाजे-बाजे के साथ स्वागत ) कुछ दूर तक जाकर विदा करते थे. यहाँ के व्यापारी भी अन्य घाटी यों की व्यापारीयों की तरह हिमालय के वार-पार क्षेत्रों मे दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं की आपूर्ति करते थे.
तिब्बत व्यापार के लिए माल वाहक के कार्य भेड़-बकरी,घोड़े-खच्चर, जूबू,, चौंर (याक) ही प्रमुखतया थे.निर्यात- कपड़ा, अनाज, किराना सामान, भेली (गुड़) वस्तु विनमय के अतिरिक्त नगद धनराशि देकर भी किया जाता था. मंडी तथा मित्र तक पहुचाकर वस्तु विनमय का व्यापार प्रमुखतया था. आयात- नमक, ऊन, सोना- सूहागा, चंवर पूंछ आदि किया जाता था.व्यापार का इतिहास पुराणों में भी तंगण-पतंगण के उल्लेख के रूप में देखी जा सकती हैं.
चीन द्वारा तिब्बत राज्य पर अपना अधिपत्य के चलते सन् 1962 में शौकाओ के सदीयों से चलती आ रही व्यापार पर विराम लग चुका था तभी से जोहार के समृद्धशाली इतिहास तथा जोहार के बर्बादी की कहानी लिखना प्रारंभ हो गया था.
जोहार के शौकाओं को भारत तिब्बत एजेंट गरतोक द्वारा 1955 में व्यापार करने की अनुमति मिलने के पश्चात अपने युवा काल 19 वर्ष के उम्र में श्री भीम सिंह बृजवाल जी तिब्बत व्यापार जाने हेतु उत्सुक, अपने हम उम्र साथी लछम सिंह बृजवाल, रतन सिंह बृजवाल,बड़े भाई प्रेम सिंह बृजवाल के साथ अपने पिता जसौद सिंह बृजवाल के आज्ञा से तिब्बत जाने के लिए तैयार हो गये. जो आज नब्बे बंसत पार कर चुके अपनी मुह जबानी बताते हैं.
बिल्जू ग्राम से व्यापारी दल को गाँव के लोग वलकिया (गाजे-बाजे से स्वागत) कर गाँव से कुछ दूर तक विदा करते थे. हम भी उसी तरह विदा हुए, हम केवल घोड़ा-खच्चर में जौं, उवा लेकर एक याक (चंवर) याक के साथ तिब्बत यात पर थे. सबसे आगे याक तथा उसकी विशिष्ट विशेषता, कुदरत की देन यह जानवर चलते समय रूकने का नाम नहीं लेता है्.आगे- आगे मार्ग दर्शक का काम कर रही थी.पहला पडाव दुंग नामक स्थान पर रहा.कठिन कंकड़-पत्धर, पथरिली, बर्फ के रास्ते भी अति कठिनाइयों भरा राह भी सुखद अनुभूति ही करा रही थी. जो उनका प्रथम व अंतिम यात्रा थी.
तीन धूरा (चोटी) जहाँ जान गंवाने में भी देर नही लगती थी. ऊंटाधूरा, जयंती, किंगरी-बिगंरी जिसे किसी भी रूप में एक दिन में पार करना अनिवार्य था. जिसे हम डेथ पांइट भी कह सकते है. एक ही दिन में पार कर लिया गया, उसी बीच गंग पानी से किंगरी-बिगंरी , दुंग, छिरतिंग, चिलमता, मानीथंगा, खिमलिंग, गुरगम, मिसर, बम्बाडोल ज्ञानिमा तक रास्ते, पडाव दुर्गम,बफीले रास्ते जहाँ चलते काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. जहाँ भेड- बकरियाँ का बर्फ में डुबने तक की स्थिति आ सकती थी. किंतु हमारे पास सिर्फ घोड़े,खच्चर ही थे.बस अंतिम चोटी किंगरी-बिगंरी पहुचकर कैलाश पर्वत दर्शन का मनोरम दृश्य दृष्टिगत नज़र आने लगी.
सभी गर्खाओं के मित्र की तरह बृजवालों के मित्र खिमलिंग स्थान पर डेरा डाले थे.चंवर गाय के बालों से बनाया तम्बू जिसमें अत्यधिक गरम रहता था. वहाँ बौद्ध मठ (गुम्फा) का दर्शन व पूजा- पाठ करके आगे का रास्ता भी तय किया गया.
रास्ते में हमें अन्य गर्खा(जाति) के लोग जोहार के समाजसेवी व्यक्ति धरम राय के बड़े सुपुत्र बाला सिंह पांगती, हयात सिंह पांगती, उन्हीं के साथ साथ उमेद सिंह निखुर्पा भी मिल गये थे. तिरछापुरी,सिसर से दायीं तरफ की ओर बगल में हमें अपने मित्र मिल गये थे. जिन्होने चंवर गायों के बालों से बने मोटे तम्बू बनाकर डेरा डाला था. जो हमारा ही इंतजार कर रहे थे.ज्ञानिमा मंडी में पहले से पिताजी जसौद सिह, दीवान, सिंह तथा गोबर्धन सिंह,(बड़ा व्यापारी)जसवंत सिंह, जगत सिंह,(सेठ) मोहन सिंह धूरा वाले अपनी दुकान सजाऐ बैठे थे.
दोनों ओर से मित्रजनों का मिलन स्यो-ढोक (प्रणाम) का आदान-प्रदान के बाद थोड़ी देर आराम करने के पश्चात हुनिया मित्र द्वारा आवाभगत में समक्ष सभी के लिए थाली में पकाया हुनकारा भेड़ का गोस्त व सत्तू परोसा था, हम सभी ने सहर्ष स्वीकार कर ग्रहण किया.
अपने मित्र साथियों से मिलकर हम सभी ने तिब्बती बकरी हुनकारा,से बाल उतारने में सहयोग भी किया, 120 बिल्ची तैयार कर रूपये ढ़ाई (2=5०) की दर से नगद खरीदा था. दो- तीन दिन ठहरने के पश्चात जब घर वापसी की सोच रहे थे तभी तीन दिन भारी बर्फबारी के कारण यही रूकना पड़ा.
ज्ञानिमा व्यापारी मंडी में याक का आराम दायक आंनदित सवारी, घुमते- फिरते रहना जिसकी यादें भुले नहीं भुलाया जा सकता है,कुछ दिन रूकने के पश्चात अपने गाँव बिल्जू वापसी हुई.जोहार से तिब्बत आने -जाने में लगभग आठ-दस दिन का समय अवश्य लगता है.
श्री भीम सिंह बृजवाल जी से उनके तिब्बत यात्रा के विषय में बातचीत, जिक्र करने पर भावुक हो जाते है, वे तिब्बत यात्रा की सुखद अनुभूति को संजोये रखना, कभी भूलना नही चाहते हैं.आज वे स्वयं सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त है तथा दोनों सुपुत्र श्री गिरीश सिंह व श्री प्रकाश सिंह बृजवाल जी अच्छे सरकारी नौकरी पेशा उच्च ओहदे पद पर आसीन है.शहरों में निवास करते है.किंतु भीम सिंह बृजवाल जी का पैतृक भूमि प्रेम, पुरखों के विरासत को खोना किसी प्रकार से नागवार है.शहर का जीवन उन्हें रास नहीं आता है वे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती तुलसी देबी बृजवाल संग पुंगराव घाटी के फ्लांटी गाँव में रहते है इसी घाटी में एक और बुजुर्ग व्यक्ति श्री नारायण सिंह बृजवाल जी भी ग्राम मुसरिया में भी रहकर अपनी थाती प्रेम का मिसाल दे रहे हैं. और तिब्बत जोहार घाटी के विषम में अच्छी जानकारी रखते हैं.आज हमारे जीते- जागते धरोहरों, बुजुर्गों को सदैव नमन करता हूँ.
जगदीश सिंह बृजवाल