पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
स्वर्गीय त्रिलोक सिंह बृजवाल हमारे क्षेत्र के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका जन्म 17 सितम्बर 1903 को बिल्जू, जोहार के गाँव में श्री हिम्मत सिंह बृजवाल के घर में हुआ था। जो बचपन से ही जुझारू व समाज के प्रति समर्पित रहते थे। सेवा की भावना उनमें कूट कूट कर भरा हुआ था। ज़रूरतमंदों के लिए वे हमेशा तत्पर तैयार रहा करते थे। श्री त्रिलोक सिंह बृजवाल ने सन् 1936 में कांग्रेस संगठन में प्रमुख भाग लेना आरम्भ किया, सार्वजनिक सुधार-कार्यो में भी भाग लेते रहे। एक पुस्तकालय की स्थापना की। जिला कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। जिन्होंने 2 फ़रवरी 1941 को अंग्रेजों के खिलाफ तिरंगा उठाकर, स्थान तेजम में तहसील पिथौरागढ़ के नामक जगह से हमारे पहाड़ों में स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रख कर इस आंदोलन की अलख जला, प्रथम सत्याग्रही के रूप में सत्याग्रह किया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजवाल की हिम्मत व हौसला को देखकर एकबारगी अंग्रेज भी सकपका गये। उन्होंने इनको समझाने की बहुत कोशिश की पर वह नहीं माने। श्री त्रिलोक सिंह बृजवाल को देखने के लिए तेजम नामक स्थान में जन सैलाब उमड़ पड़ा था, अंग्रेजों ने त्रिलोक सिंह बृजवाल के हाथों से तिरंगा छुड़ाने की अथक कोशिश की पर वे छुड़ा नहीं पाये। लिहाज़ा उन्होंने बृजवाल को बुरी तरह से लाठी, डंडों व बूटों से पीट पीटकर अधमरा कर दिया। तत्पश्चात् गिरफ़्तार कर अपने साथ ले जाकर अल्मोड़ा जेल में डाल दिये। अल्मोड़ा जेल में उनको काफ़ी यातनायें दी गयी, जहाँ पर वे 7 जून 1941 तक रहे, तत्पश्चात् उनको बरेली जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। जहाँ वे 25 अगस्त 1941 तक रहे। उनके ऊपर आर्थिक दंड के रूप रुपया 150/- भी लगाया गया। तभी से तहसील सत्याग्रह संचालक का कार्य करते रहे। थल में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की। जब वे युवाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से क्षेत्र के भ्रमण कर रहे थे व “अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन” को सफल बनाने के उद्देश्य से नामिक से दानपुर होते हुए अल्मोड़ा के राह में खाड़बगड़ स्थान पहुँचे थे तब उन्हें 10 अक्तूबर 1942 को खाड़बगड़ से गिरफ्तार कर पुनः जेल में डाल दिया गया था। वे 13 अक्तूबर 1942 से 22 जून 1943 तक अल्मोड़ा जेल में रहे उसके बाद उनको सीतापुर कारागार में स्थानांतरित किया गया, जहाँ वे 23 जून 1943 से 23 मई 1944 तक रहे, और उनको काफ़ी यातनायें देकर शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनपर अर्थदण्ड के रूप में जुर्माना भी लगाया गया था। वे जेल में रहते हुए भी नियमित रूप से सुबह ही सुबह स्नान इत्यादि कर, व्रत रखते थे। जेल में ही हर रोज गीता का पाठ नियमित रूप से किया करते थे। जो देश आजाद होने के पश्चात भी नियमित रूप से जारी रखा था। अल्मोड़ा ज़िले में तब उनका क्षेत्र जोहार मुनस्यारी आता था, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण, अल्मोड़ा में तब त्रिलोकी दिवस को बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। देश आज़ाद होने के पश्चात भी उन्होंने अपना पूरा समय व ध्यान समाज सेवा करने में ही लगा दिया। मुख्यतः वे युवाओं को शिक्षा की ओर आकर्षित करने की कोशिश करते थे। उन्होंने क्षेत्र में अनेक विद्यालय खुलवाये उनमें प्रमुख था मुनस्यारी का राजकीय इण्टर कॉलेज। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाकर ही दम लिया। राजकीय कन्या इंटर कालेज, नमजला पिथौरागढ़ भी उन्हीं के कोशिशों की देन है। उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए भी अहम भूमिका को निभाया जिसमें मुख्य है। तेजम मोटर मार्ग, शामा मोटर मार्ग, कपकोट डाकखाना, सुरिंगगाढ़ में झूला पुल एवं सुरिंगगाढ़ में पन बिजली योजना। वे भ्रष्टाचार को रुकवाने के लिए भी लड़ते रहते थे। युवाओं को शिक्षित करना व नशा मुक्ति के लिए लगातार आवाज उठाते रहते थे। तराई में जगह जगह आश्रम पद्धति विद्यालयों को खुलवाने में भी उन्हीं का हाथ होता था, जहाँ वे समय समय पर जाकर विद्यालयों के हालातों का जायज़ा लिया करते थे। प्रदेश गये अपने बच्चों से रूबरू होकर उन सभी से एक अभिभावक के रूप में मिलते थे। संग में उन बच्चों का हौसला अफजाई भी किया करते थे।
बाला सिंह मर्तोलिया से बातचीज डॉ.पंकज उप्रेती भारत-तिब्बत व्यापार और माइग्रेशन होने वाले ग्रामों के पुराने दिन कितने कठिन और रोमांचक थे, उन यादों को समेट लोग आज भी हमारे बीच हैं। अपने बचपन की ऐसी की रोचक यादों के साथ बाला सिंह मर्तोलिया की आँखों में पुराने दृश्य तैरते हुए महसूस किये जा सकते हैं। वह बताते हैं कि उनके परिवार का मुख्य कार्य व्यापार और भेड़-बकरी पालन था। देवीबगड़ में उनका बचपन बीता, जहाँ पशुपालन का मस्त कारोबार था। जोहार के खीम सिंह मर्तोलिया के परिवार में माधे सिंह और मेघ सिंह हुए। माधो सिंह के सुपुत्रों में रघुनाथ सिंह, स्व. ईश्वर सिंह ओर त्रिलोक सिंह जबकि मेघ सिंह के सुपुत्र बाला सिंह जी हैं। गर्मियों में जोहार मर्तोली और जाड़ों में देवीबगड़ ;बागेश्वरद्ध में यह संयुक्त परिवार जाता था। मुनस्यारी तो इसके बीच हुआ ही। अपनी इन्हीं सारी यादों को ताजा करते हुए बाला सिंह मर्तोलिया बताते हैं कि परिवार के साथ बचपन में इधर-उधर जाने का उन्हें जो अवसर मिला वह बच्चों के लिये खेल सा था। रेड़गाडी, बोगड्यार, रिलकोट यात्रा के पड़ाव थे और जब एक स्थान से दूसरी जगह पूरा परिवार अपने सैकड़ों जानवरों के साथ जाता था, वह सब छोटे बच्चों के लिये खेल ही जैसा था। पड़ाव में रुकते ही कोई पानी की व्यवस्था में जुटता तो कोई रसोई संभालता। बच्चे खेल में मस्त हो जाते। चलते समय जिन महिलाओं या बुजुर्गों को दिक्कत होती उनसे कहा जाता भेड़ के पीछे-पीछे चलें, भेड़ धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। पड़ावों में खूब चहल-पहल होती थी। बाला सिंह जी बताते हैं कि उनके ताउ माधे सिंह जी को लोग माधे सिंह ‘जाज’ कहते थे। वह जड़ीबूटियों के जानकार थे और हड्डी आदि के बारे में भी ज्ञान था। किसी व्यक्ति या जानवर की किसी कारण कोई हड्डी टूट जाए तो वह सफल इलाज करते थे। लोग दूर-दूर उनके पास आया करते थे। एक बार श्यामाधुरा में भैस काफी गहरे में गिर गया उसे ताउ ने ही ठीक किया। बाला सिंह जी बताते हैं कि पिता मेघ सिंह को होनी-अनहोनी का अससास काफी पहले से हो जाता था, कई घटनाएं इस प्रकार की हैं जब उन्होंने पहले ही पहचान लिया। एक बार उनकी भेड़ बकरी चुरा ली गई थीं लेकिन पिता जी ने उसका पता लगा लिया। जबकि उन भेड़ बकरियों के तीन-चार पुश्त तक हो चुके थे, उन्होंने सबको पहचान लिया। वर्तमान में हल्द्वानी में रहने वाले बाला सिंह मर्तोलिया का बचपन देबीबगड़ में बीता और वहीं उन्होंने प्राइमरी की पढ़ाई की। हरसिंगिया बगड़ के उपरी क्षेत्र में यह प्राइमरी स्कूल है। इसके बाद इण्टर तक की पढ़ाई मुनस्यारी और पिफर बीए की शिक्षा के लिये नैनीताल आए। तक पाइन्स, नैनीताल में आईटीआई की जानकारी होते ही उसमें प्रवेश ले लिया। टाइपिंग-शार्टहैंड के अभ्यासी बाला को 150 में से 125 नम्बर मिले और वह प्रथम श्रेणी में पास हो गये। पास होते ही हनुमानगढ़ी, नैनीताल की वेध्शालामें उनकी नौकरी लगी। इसी समय रामनगर डिग्री कालेज में स्टेनों की पोस्ट निकली वह उसमें चयनित हो गये। सन् 1984 तक रामनगर में नौकरी की लेकिन बैंक का फार्म भर दिया। सन् 84 में फैजाबाद जगदीशपुर में नियुक्त हो गये। सन् 1985 तक लीड बैंक में क्षेत्रीय प्रबन्धक रहे। इसके बाद पन्तनगर सिडकुल शाखा में वरिष्ठ प्रबन्धक पद से सेवानिवृत्त हुए। अपने बचपन की पहाड़ से लेकर अभी तक की तराई की यादों के साथ मर्तोलिया जी सद् कार्यों में संलग्न हैं। तल्ला दुम्मर के वृजवाल परिवार में इनका विवाह हुआ था। श्रीमती माया देवी, पुत्र राहुल, गणेश सहित यह भले ही हल्द्वानी में निवास कर रहे हों लेकिन इनका मन हिमालय की वादियों में रमता है।