
डॉ.पंकज उप्रेती
भारत-तिब्बत व्यापार और माइग्रेशन होने वाले ग्रामों के पुराने दिन कितने कठिन और रोमांचक थे, उन यादों को समेट लोग आज भी हमारे बीच हैं। अपने बचपन की ऐसी की रोचक यादों के साथ बाला सिंह मर्तोलिया की आँखों में पुराने दृश्य तैरते हुए महसूस किये जा सकते हैं। वह बताते हैं कि उनके परिवार का मुख्य कार्य व्यापार और भेड़-बकरी पालन था। देवीबगड़ में उनका बचपन बीता, जहाँ पशुपालन का मस्त कारोबार था।
जोहार के खीम सिंह मर्तोलिया के परिवार में माधे सिंह और मेघ सिंह हुए। माधो सिंह के सुपुत्रों में रघुनाथ सिंह, स्व. ईश्वर सिंह ओर त्रिलोक सिंह जबकि मेघ सिंह के सुपुत्र बाला सिंह जी हैं। गर्मियों में जोहार मर्तोली और जाड़ों में देवीबगड़ ;बागेश्वरद्ध में यह संयुक्त परिवार जाता था। मुनस्यारी तो इसके बीच हुआ ही। अपनी इन्हीं सारी यादों को ताजा करते हुए बाला सिंह मर्तोलिया बताते हैं कि परिवार के साथ बचपन में इधर-उधर जाने का उन्हें जो अवसर मिला वह बच्चों के लिये खेल सा था। रेड़गाडी, बोगड्यार, रिलकोट यात्रा के पड़ाव थे और जब एक स्थान से दूसरी जगह पूरा परिवार अपने सैकड़ों जानवरों के साथ जाता था, वह सब छोटे बच्चों के लिये खेल ही जैसा था। पड़ाव में रुकते ही कोई पानी की व्यवस्था में जुटता तो कोई रसोई संभालता। बच्चे खेल में मस्त हो जाते। चलते समय जिन महिलाओं या बुजुर्गों को दिक्कत होती उनसे कहा जाता भेड़ के पीछे-पीछे चलें, भेड़ धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। पड़ावों में खूब चहल-पहल होती थी।
बाला सिंह जी बताते हैं कि उनके ताउ माधे सिंह जी को लोग माधे सिंह ‘जाज’ कहते थे। वह जड़ीबूटियों के जानकार थे और हड्डी आदि के बारे में भी ज्ञान था। किसी व्यक्ति या जानवर की किसी कारण कोई हड्डी टूट जाए तो वह सफल इलाज करते थे। लोग दूर-दूर उनके पास आया करते थे। एक बार श्यामाधुरा में भैस काफी गहरे में गिर गया उसे ताउ ने ही ठीक किया। बाला सिंह जी बताते हैं कि पिता मेघ सिंह को होनी-अनहोनी का अससास काफी पहले से हो जाता था, कई घटनाएं इस प्रकार की हैं जब उन्होंने पहले ही पहचान लिया। एक बार उनकी भेड़ बकरी चुरा ली गई थीं लेकिन पिता जी ने उसका पता लगा लिया। जबकि उन भेड़ बकरियों के तीन-चार पुश्त तक हो चुके थे, उन्होंने सबको पहचान लिया।
वर्तमान में हल्द्वानी में रहने वाले बाला सिंह मर्तोलिया का बचपन देबीबगड़ में बीता और वहीं उन्होंने प्राइमरी की पढ़ाई की। हरसिंगिया बगड़ के उपरी क्षेत्र में यह प्राइमरी स्कूल है। इसके बाद इण्टर तक की पढ़ाई मुनस्यारी और पिफर बीए की शिक्षा के लिये नैनीताल आए। तक पाइन्स, नैनीताल में आईटीआई की जानकारी होते ही उसमें प्रवेश ले लिया। टाइपिंग-शार्टहैंड के अभ्यासी बाला को 150 में से 125 नम्बर मिले और वह प्रथम श्रेणी में पास हो गये। पास होते ही हनुमानगढ़ी, नैनीताल की वेध्शालामें उनकी नौकरी लगी। इसी समय रामनगर डिग्री कालेज में स्टेनों की पोस्ट निकली वह उसमें चयनित हो गये। सन् 1984 तक रामनगर में नौकरी की लेकिन बैंक का फार्म भर दिया। सन् 84 में फैजाबाद जगदीशपुर में नियुक्त हो गये। सन् 1985 तक लीड बैंक में क्षेत्रीय प्रबन्धक रहे। इसके बाद पन्तनगर सिडकुल शाखा में वरिष्ठ प्रबन्धक पद से सेवानिवृत्त हुए। अपने बचपन की पहाड़ से लेकर अभी तक की तराई की यादों के साथ मर्तोलिया जी सद् कार्यों में संलग्न हैं। तल्ला दुम्मर के वृजवाल परिवार में इनका विवाह हुआ था। श्रीमती माया देवी, पुत्र राहुल, गणेश सहित यह भले ही हल्द्वानी में निवास कर रहे हों लेकिन इनका मन हिमालय की वादियों में रमता है।
