छोटी विलायत के नाम से प्रसिद्ध रहा ‘गर्ब्यांग’

गर्ब्याल दम्पत्ति से बातचीज –

शिक्षा विभाग के बाद नगर पंचायत धारचूला की चैयरमैन बनीं साबित्री ह्यांकी गर्ब्याल
-दुर्गासिंह मर्तोलिया जब डीएसबी कैम्पस में अध्यक्ष बने, पहाड़ की लहर थी
-पधान मनोरथ सिंह ने गुंजी में स्कूल बचाने के लिये अपने बच्चों का प्रवेश करवाया
डॉ. पंकज उप्रेती

बात जब हिमालय की करें तो वहाँ के मजबूत स्तम्भ हमेशा स्मृति में रहते हैं। आज की विशेष वार्ता श्रीमान जमन सिंह गर्ब्याल-श्रीमती साबित्री गर्ब्याल के साथ है। इस दम्पत्ति ने सीमान्त के जिस वैभव को देखा है उतना ही दुरुह जिया भी है। इसी लिये यह यर्थाथ पर जीने वाले हैं और वर्तमान की दिखलावटी दुनिया को खोखला मानते हैं। श्रीमती साबित्री 33 साल शिक्षा विभाग में रहने के बाद धारचूला नगर पंचायत की चैयरमैन रही हैं। जमन सिंह जी एफसीआई से सेवानिवृत्त हैं।
पांगू के पधान भीम सिंह ह्यांकी और श्रीमती डमस्यां (दमयन्ती देवी) के घर जन्मी साबित्री ने सीमान्त पांगू में हाईस्कूल तक शिक्षा के बाद नैनीताल में चन्द्रभवन छात्रावास में रहकर इण्टर फिर एसआर छात्रावास में रहकर बीए की शिक्ष ग्रहण की। इलाहाबाद से एलटी करने के बाद शिक्षा विभाग में सेवा की। इसी प्रकार गर्ब्यांग के पधन परिवार में मनोरथ सिंह गर्ब्याल जी श्रीमती कुन्ती देवी के घर जमन सिंह गर्ब्याल का जन्म हुआ। इन दोनों परिवारों ने भारत तिब्बत व्यापार के दिनों को देखा और चुना है। पधानचारी होने के नाते सक्षम होते हुए हमेशा अपनी मातृभूमि के लिये समर्पित रहे हैं।
बातचीज के दौरान श्रीमती सात्रित्री गर्ब्याल अपने पुराने दिनों में लौटते हुए बताती हैं- धारचूला से नैनीताल पढ़ाई को जाते समय दो दिन लग जाते थे। पहले अल्मोड़ा पहंुचकर एम्बेसेडर होटल में रुके थे फिर अगले दिन नैनीताल जाते थे। आने-जाने के लिये दन्या वाली रोड पूरी तरह धूलपट्ट थी। पिघलताल हिमालय के संस्थापक स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया को याद करते हुए वह बताती हैं- दुर्गा सिंह एमए में थे और वह बीए की पढ़ाई कर रही थीं। तब डीएसबी कैम्पस में छात्र संघ चुनाव को लेकर पहाड़ यानी सीमान्त की लहर थी। दूर-दूर से आकर पढ़ने वाले सभी साथी एकजुट हो गये और दुर्गा दा को अध्यक्ष बनाया। अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान सावित्री जी सन् 1968 में सरकारी सेवा में लगी। गर्ब्यांग के जमन सिंह जी के साथ 1980 में इनका विवाह हुआ। अपनी 33 साल की सेवा में गोपेश्वर बदरीनाथ में अधिक समय व्यतीत किया। सन् 2003 कांग्रेस के टिकट पर इन्हें धारूचला नगर पंचायत सीट पर चुनाव लड़ाया गया और यह चैयरमैन बनीं। घर में हर प्रकार से सक्षम इस परिवार का ध्येय अपने इलाके को सुदृढ़ करना था ऐसे में कई महत्वपूर्ण कार्य इनके द्वारा किये गये। एनएचपीसी द्वारा लीज पर लिया गया स्थान स्टेडियम बनना था लेकिन इसमें हीलहवाली हो रही थी। तत्कालीन डीएम नवीन पाण्डे जो सावित्री जी के सहपाठी रहे थे, घूमने के लिये नारायण आश्रम आए थे। वर्षों बाद उनसे मिलकर एनएचपीसी वाली भूमि को लेकर खेल मैदान के रूप में विकसित करवाया। इसी प्रकार धारचूला का भोटिया पड़ाव बनाने का कार्य हुआ। श्रीमती सावित्री कहती हैं- डीएम पाण्डे जी के संरक्षण में ही वह उम्दा कार्य हो सके। काली नदी से नहर के लिये लाया गया बजट ठेकेदारों को नहीं दिया बल्कि सिंचाई विभाग की देखरेख में कार्य करवाया। नदी के बहाव से धारचूला को बचाने लिये गुणवत्ता युक्त कार्य का होना जरूरी था। उसी दौर में जनजाति व अन्य पिछड़े लोगों के लिये प्रशिक्षण केन्द्र खुलवाया गया जिसका आज तक लाभ हो रहा है। इसमें कम्प्यूटर शिक्षा भी दी जाती है। इसके अलावा बारातघर, गैराज और भारत नेपाल सीमा पर प्रहरियों के एक सेड बनवाया गया ताकि गर्मी, बरसात के दिनों में पुल के पास पहरा देने वाले आराम से रह सकें।
जमनसिंह जी और सावित्री देवी कैलास के मुख्य पड़ाव और तिब्बत व्यापार की देखी और सुनी यादों को बताते हैं कि पांगू कैलास मानसरोवर यात्रा का मुख्य स्थान है। सिरखा, सिर्दांग होते हुए कैलास यात्री यहीं से जाते रहे हैं। पहले समय में इस स्थान पर सफरी डाक्टरों की ड्यूटी लगती थी। सफरी यानी यात्रा में जाने वालों को देखते हुए इन्हंे तैनात किया जाता था। पांगू में भीम सिंह पधान जी यात्रियों के लिये सत्तू गुड़ अािद तैयार रखते थे। यात्रा के दौरान इस प्रकार की खाद्य सामग्री को पसन्द किया जाता है क्योंकि इन्हें सत्तू को पानी में घोलकर भी गुड़ के साथ खाने के लिये तैयार कर लेते हैं, मौसम के लिहाज से गर्म तासीर भी होती है। लिपू दर्रे से होते हुए तिब्बत व्यापार होता था और व्यापार टैण्ट लगाकर रहते थे। तकलाकोट में इसका लगान पड़ता था। बचपन में अपने बुजुर्गों के साथ एक बार जमन सिंह जी को इस यात्रा में जाने का अवसर मिला।
जमन सिंह जी बताते हैं कि सीमान्त का गर्ब्यांग 250 परिवारों का सुन्दर स्थान था, जिसे छोटी विलायत के नाम से पुकारते थे। यहाँ तीन-चार मंजिले के नक्कासीदार शानदान मकान थे, इनमें सबसे उपर मंजिल पर रसोई बनाई जाती थी। सन् 1957 से ग्राम में भूधंसाव हुआ और धीरे-धीरे भारी नुकसान हो गया। चूंकि पढ़ाई के लिये मौसम अनुसार माइग्रेशन व्यवस्था थी और ग्राम से हम लोग धारचूला आते थे लेकिन गर्ब्यांग की हालत देखते हुए जूनियर हाईस्कूल गर्ब्यांग को गुंजी में खोला गया। दूसरी जगह स्कूल खुलने से विद्यार्थी संख्या एकदम नहीं हो सकी, ऐसे में स्कूल की मान्यता बरकरार रखने के लिये पिता जी (पधान मनोरथ सिंह) ने मेरा व चचेरे भाई का प्रवेश उस स्कूल में करवाया। हमें स्कूल को मान्यता मिलने की खुशी थी।
गर्ब्यांग में भूधंसाव का खतरा झेल रहे लोगों को तराई के दिनेशपुर में जगह दी गई, उसके बाद सितारगंज में परिवार भूमि आवंटन हुई। सिद्ध गर्ब्यांग नामक स्थान में गर्ब्याल परिवार रहते हैं। इस प्रकार अपनी ढेरों यादों के साथ यह गर्ब्याल दम्पत्ति रेशमबाग, कुसुमखेड़ा हल्द्वानी में निवास कर रहा है लेकिन इनकी यादों का हिमायल वहीं है।

रतन सिंह उर्फ डोगनच्यू ज्ञानिमा मंडी में डाकू से भिड़ गये थे

दीवान सिंह धर्मशक्तू से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
इस समय भारत-चीन स्थलीय व्यापार को लेकर बराबर समाचार आ रहे हैं और कोरोना काल के बाद फिर से व्यापार शुरू होने की खुशी भी है। व्यापार का यह पूरा तरीका व्यवहार से ज्यादा प्रतीकात्मक लगता है। व्यापार के उन दिनों को याद कर कम्पन होने लगती है जब पैदल दुर्गम रास्तों से होकर भारत-तिब्बत व्यापार की परम्परा संस्कृति का हिस्सा बन चुकी थी। इस व्यापार में अपने मित्रों से मिलने की ललक और अपने पुस्तैनी कार्य को बनाये रखने की लालसा थी। इस यात्रा और व्यापार में वह खतरा भी था जो किसी भी कालखण्ड में रहा है, जैसे- चट्टान गिरना, प्रकृति का प्रकोप, लुटेरों का आतंक।
ऐसी ही एक सच्चाई जोहार के व्यापारी रतन सिंह उर्फ डोगनच्यू के जीवन में घटी। ‘डोगनच्यू’ को तिब्बत भाषा में वीर बहादुर लड़ाकू कहा जाता है। उस समय ज्ञानिमा मण्डी में डाकुओं का आतंक मचा हुआ था। इनका लीडर ‘नकचंग डोक्यू’ था। एक दिन इनके गिरोह ज्ञानिमा मण्डी में चढ़ाई कर दी, ऐसे में गरपन के सारे सिपाही दुबक गये। व्यापारी डर हुए थे। तब रतन सिंह जी ने जाकर लुटेरों के लीडर के घोड़े की लगाम पकड़ ली, अंगूठा खड़ा किया तो वह घोड़े से उतर गया। इसके बाद तिब्बती में उनकी बात हुई और ‘लकचंग डोक्यू’ अपने गिरोह के साथ वापस लौट गया। इस घटना के अगले साल तिब्बत में खम्पा (लड़ाकू जाति) ने लुटेरों के लीडर को मार डाला और उसकी गर्दन काटकर लटका दिया और हर आने-जाने वाला उसमें थूकता था क्यांेकि उसके आतंक से सभी त्रस्त थे। अपने दादा/बूबू की इस वीरता भरी कहानी को उनके कुनबे अलावा सभी जानते हैं। इनके परिवार के 89 वर्षीय दीवान सिंह धर्मशक्तू से आज की बातचीज प्रस्तुत है। इसी क्रम में इनके परिवार के बारे में कुछ और जानकारी प्रस्तुत है। रतन सिंह जी के सुपुत्र भीम सिंह थे। इनके चार पुत्र हुए- दीवान सिंह, केदार सिंह, देवेन्द्र सिंह, राम सिंह। इनमें से राम सिंह जी का असमय निधन हो गया। दीवान सिंह की अगली पीढ़ी में संजय सिंह, नीमा (जंगपांगी), मंशा (रावत), शीलू (जंगपांगी)। केदार सिंह के परिवार में गुड्डी (लस्पाल), पूजा (टोलिया), रोजी धर्मशक्तू। देवेन्द्र सिंह के परिवार में धीरेन्द्र सिंह, लीला, वीरेन्द्र सिंह हैं।
दीवान सिंह धर्मशक्तू का जन्म 1938 में मिलम में हुआ। इनके पिता भीम सिंह तिब्बत व्यापार के परम्परागत कार्य में माहिर थे और व्यापार के दिनों तिब्बत में ही बीमारी के कारण उनका निधन हो गया था। इनकी माता श्रीमती हरकी देवी गृहणी के अलावा अपने कुटीर उद्योग में कुशाग्र थीं।
दीवान सिंह का बचपन भी माइग्रेशन की उस व्यवस्था मंे बीता जब पूरा कुनबा मौसम के अनुसार इधर से उधर जाता और बच्चों की पढ़ाई होती। बचपन की पाठशाला के बाद मुनस्यारी से शिक्षा करने के बाद अल्मोड़ा से आईटीआई में प्रवेश लिया और सर्वेयिंग में डिप्लोमा कर एक वर्ष यूपी पीडब्लुडी में रहे। इसके बाद 25 मार्च 1963 को बीआरओ इनकी नियुक्ति हो गई। सीमा सड़क संगठन बीआरओ कीे नौकरी में दीवान सिंह जी को अरुणांचल, भूटान, लाहौल- स्पीति आदि जगह सर्वेक्षण की जिम्मेदारी निभाई। भूटान में रहते उन्हें रानी के निवास स्थान तक पक्की रोड का कार्य सर्वे का मौका भी मिला। वहाँ की रानी जिस जगह रहती उसे ‘गुम्फा’ कहते हैं, वहाँ खूब सजाया हुआ था। रोड कार्य पूर्ण होने के बाद एक दिन रानी ने बुलाया और नमकीन चाय पिलाई। दीवान सिंह जी कहते हैं- ‘चूंकि हम लोग नमकीन चाय पीने के आदी हैं तो वहाँ भी मक्खन डाली हुई नमकीन चाय की स्वाद खूब था।’ बचपन खेल से लेकर बीआरओ में रहते सेवा को रोमांच मानकर जीने वाले दीवान सिंह जी सामाजिक कार्यों में भी हमेशा अग्रणीय रहे हैं। शिव मन्दिर जोहार नगर हल्द्वानी के पास इनका आवास है और परिवार में श्रीमती गंगोत्री देवी सहित परिजन हैं। अपनी नौकरी के दौरान पड़ाव में इन्होंने अपना आशियाना बना लिया था। वह बताते हैं कि सामाजिक कार्यों में सक्रियता के लिये ‘जोहार मिलन केन्द्र’ बनाया गया, इसकी शुरुआत के लिये सबसे पहले स्व.कल्याण सिंह पांगती ने एक लाख रुपये देकर समाज को उत्साहित किया। आज यह बहुउद्देशीय स्थान सबके लिये सुगम है।

बरपटिया समाज ने कृषि में उन्नत स्थान बनाया तो शौका समाज ने उनी कारोबार में

प्रेम सिंह जंगपांगी से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती

सीमान्त क्षेत्र मदकोट के ‘इमला’ गाँव को लेकर आज की विशेष बातचीत श्रीमान प्रेम सिंह जंगपांगी के साथ है। इमला गाँव की पहचान सिर्फ पहाड़ों से नहीं बल्कि यहाँ बसने वाले शौका और बरपटिया समाज की साझा विरासत से है। सांस्कृतिक रूप से खास घाटियों में इसकी गणना होती है। जोहार घाटी के इस क्षेत्र में गोरी और सहायक नदियां बहती हैं। अपनी संस्कृति और परम्परा को जीने वाले लोगों ने जिस जीवटता के साथ अपने को स्थापित किया वह प्रेरणादायक है। बैंकिंग सेवा में रहे श्रीमान प्रेम सिंह जी कहते हैं- ‘‘इमला का बचपन सीख दे गया। आतिथ्य सत्कार का जो भाव बड़े-बुजुर्गों में था वह पीढ़ियों में है। माता पार्वती देवी गृहस्थ जीवन में जिस तनमयता के साथ हर आने वालों का मान-सम्मान करती थीं, उनका आशीर्वाद किसी न किसी रूप में हम सभी परिजनों को मिलता रहा है।’’
बातचीज का यह सिलसिला आगे बढ़े उससे पहले श्री प्रेम सिंह जी के बारे में बताते हैं- बुर्फू में एक हुए मान सिंह जंगपांगी। इनके चार पुत्र एक पुत्री हैं, जिनमें रुद्रसिंह, मोहनसिंह, रामसिंह, मानधाता सिंह खिमुली देवी। अब यदि इनकी अगली पीढ़ी की बात करें तो रुद्रसिंह जी के सुपुत्र हुए- नन्दन सिंह, प्रेम सिंह। मोहन सिंह जी के गणेश सिंह, हरीश सिंह। राम सिंह जी के नरेन्द्र सिंह, भूपेन्द्र सिंह। मानधाता सिंह के पूरन सिंह, पुष्कर सिंह। खिमुली देवी का विवाह रावत परिवार में हुआ। वह दौर जब सीमान्त में सीमा पार व्यापार और मौसम अनुसार माइग्रेशन का का निश्चित समय था, जंगपांगी परिवार भी बुर्फू से घाटी में उतर आता। जाड़ों के दिनों में यह लोग भकुण्डा, इमला मेें आते। प्रेमसिंह जी का जन्म इमला में 1963 में हुआ।
बचपन की पाठशाला इमला में होने के कारण बचपन के वह दिन हमेशा याद करने वाले श्री जंगपांगी बताते हैं कि कोटाल गाँव, गोल्फा, इमला का एक एक प्राइमरी स्कूल था- जसपुर खान। 1963 में शुरू हुए इस स्कूल में इन तानों गाँवों के सभी बच्चे पढ़ने जाते थे। आज भी ये स्कूल शिक्षा की नींव माना जाता है। जसपुरखान इमला की विरासत है। इमला से प्राइमरी के बाद प्रेम सिंह जी ने मदकोट से हाईस्कूल, मुनस्यारी से इण्टर फिर नैनीताल से स्नातकोत्तर किया। 1989 में बैंकिंग सेवा आते हुए इनकी पहली पोस्टिंग इलाहाबाद बैंक मलिहाबाद, लखनउ में हुई। दस साल ठहराव के बाद नैनीताल पिफर लखीमपुर में इनकी सेवा रही। इसके बाद उत्तराखण्ड में शेष सेवा काल रहा और सन् 2003 में हल्द्वानी में वरिष्ठ प्रबन्धक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।
अपने बचपन, शिक्षा और बैंकिंग सेवा के लम्बे सफर में श्री जंगपांगी को बचपन हमेशा याद रहा है। वह बताते हैं- जब वह 7-8 में पढ़ते थे, इमला गाँव में रामलीला शुरू हुई। गोकुल राम तालीम करवाते थे, बाद में गोविन्द सिंह पंचपाल तालीम देने आए। उस समय के जिस भी युवा ने रामलीला में पात्र की भूमिका निभाई, संयोग से सभी नौकरी में लग गये। अपनी जन्मभूमि को लेकर वह कहते हैं- कृषि और घरेलू उद्योग-धन्धें से जुड़े कर्मठ लोगों की भूमि है इमला। बरपटिया समाज ने कृषि में उन्नत स्थान बनाया, वहीं शौका समाज ने उनी कारोबार को बढ़ावा दिया। मदकोट का यह क्षेत्र जितना उपजाउ है उतना ही संस्कार और सीख देने वाला भी है। वह बताते हैं कि मल्ला दुम्मर में होने वाली हरि प्रदर्शनी के लिये बुजुर्गवार घोड़ों सहित अन्य सामग्री के साथ जाते थे। तब प्रदर्शनी में पशुओं की प्रदर्शनी मुख्य रूप से लगती थी। घरेलू कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिये लगने वाली प्रदर्शनी में दन-कालीन इत्यादि सामान इमला से तक लाया जाता था। इस बहाने अपने इष्ट-मित्रों से भेंटघाट का अवसर भी होता। यह प्रदर्शनी वर्तमान तक भी वदस्तूर जारी है और इसमें नई पीढ़ी के लोग जुड़ रहे हैं।
प्रेम सिंह जी का विवाह बूंगा, मुनस्यारी के रावत परिवार में हुआ। अपने समय के प्रधान जोत सिंह रावत श्रीमती लीला रावत की सुपुत्री प्रभा जी से से इनका विवाह हुआ। श्रीमती प्रभा शिक्षा विभाग से जुड़ी हैं। मुनस्यारी से अपनी सेवा का सफर आरम्भ करते हुए वह धुलई, घोड़ाखाल में रहीं। इसके बाद जूनियर हाईस्कूल भीमपुर, कमोला नैनीताल में सेवारत हैं। इनके सुपुत्र मयंक जंगपांगी जेएनयू से शिक्षा के बाद दिल्ली में और सुपुत्री शिवानी बंगलौर में हैं। वाकेई हम जिन दुर्गम क्षेत्रों को बेढप मान लेते हैं, वहीं से उपजे लोग अपनी जीवटता और ईमानदारी से किस प्रकार रास्ते बनाते हैं, यह प्रेम सिंह जंगपांगी के सफर से सीखने को मिलता है।

मापांग में नदी का रुख बदलने और मिलम में दूधपानी लाने वाले थे धरम राय

उत्तम सिंह पांगती से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती

अक्सर हम यादों की बारात में सात समन्दर पार जैसी बातें करने लगते हैं और अपने आस-पास के उन महानुभावों को भूल जाते हैं जिनका योगदान समाज के लिये बुनियाद रहा है। ऐसे कर्मठ, दानियों व प्रेरणादायी जनों का स्मरण बराबर होना चाहिये। ऐसे ही महान जन सेवक रहे हैं- ‘धरम राय’। मापांग में नदी का रुख बदलने और मिलम में दूधपानी लाकर समाज के लिये अपने को समर्पित करने वाले ध्रम राय जी के बारे में उनके परिवार के रिटा.जज श्रीमान उत्तम सिंह पांगती के साथ आज की यह बातचीत है। अपने बुजुर्गों की ठेठ परम्परा पर चलने वाले 86 वर्षीय उत्तम सिंह जी से उन दिनों की याद सुनना भी अद्भुत लगता है जब वह पढ़ाई की धुन में इलाहाबाद चले गये। बातचीज का सिलसिला आगे बढ़े, इससे पहले इनके बारे में बता दें।
1889 में मिलम में जन्मे धरमु सिंह की उनकी समाजसेवा देखते हुए समाज ने ‘राय’ पदवी का सम्मान दिया। इनका विवाह क्वीटी के रावत घराने में हुआ था परन्तु अल्पायु में
श्रीमती जी की मृत्यु होने पर दूसरा विवाह वहीं से दलीप सिंह रावत की पुत्री से हुआ। एक पुत्री भी हुई लेकिन जन्म के शिशुकाल मेें ही मृत्यु हुई। दूसरी ओर दूसरी पत्नी का भी अल्पायु में निधन हो गया। जनसेवी धरम राय अपने दुःखों को अपने में ढोते हुए इन माँ-बेटी की याद में सगमों में एक धर्मशाला का निर्माण किया। तिब्बत व्यापार से जुड़े अपने पुस्तैनी कार्य के कारण इस शौका परिवार में फिर से विवाह का दबाव था क्यांेकि धरम सिंह की भी उम्र कम ही थी और परिवार संचालन में महिलाओं का योगदान प्रथम है। इस प्रकार इनका तीसरा विवाह गुलरे के मान सिंह मर्तोलिया की पुत्री द्योमती से हुआ। इस दम्पत्ति ने अपनी परम्पराओं को सींचा और समाज की जिम्मेदारी भी निभाई। इनके चार पुत्र बाला सिंह, खड़क सिंह, गोविन्द सिंह और उत्तम सिंह और चार पुत्रियां- देवी (धर्मशक्तू), दानी(बृजवाल), गंगोत्री (जंगपांगी), कौशल्या/कोसी (रावत) हुए।
बाला सिंह जी की अगली पीढ़ी मेे वीरेन्द्र सिंह, ईश्वर सिंह, दीक्षा (धनी) और लक्ष्मी हैं। खड़क सिंह जी के बाद पीढ़ी में डॉ.हरीश, पुत्रियां ललिता, सुमन, बीना व रेखा हैं। गोविन्द सिंह जी के आगे पीढ़ियों में पुत्र सतीश सिंह, पुत्रियां गीता, हीरा, जानकी, अनीता व किरन हुए। इसी प्रकार उत्तम सिंह जी के बाद पीढ़ी में सुपुत्र शैलेन्द्र, सुपुत्री सीमा (बृजवाल) केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका हैं।
दूरदृष्टि धरम राय ने तिब्बत व्यापार समाप्ति के समय 1962 में मल्ला घोरपट्टा में 15 नाली जमीन खरीद के बाद अपने परिवार को वहाँ शिफ्ट किया। अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिये दिल्ली कलकत्ता दूरदृष्टि धरम राय ने तिब्बत व्यापार समाप्ति के समय 1962 में मल्ला घोरपट्टा में 15 नाली जमीन खरीद के बाद अपने परिवार को वहाँ शिफ्रट किया। अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिये दिल्ली कलकत्ता तक सम्पर्क बनाए रखा। हल्द्वानी रामनगर के बनियों से भी उनकी प्रगाढ़ता रही। अपने कारोबार में उन्होंने परिवार के सदस्यों सहित कई अन्य लोगों को शामिल कर लिया। इस पूरे व्यापारिक तन्त्रा के बीच भी शिक्षा के प्रति उनकी जागरुकता ही थी कि बच्चों को शिक्षित बनाने में आगे रहे।
उत्तम सिंह जी अपने बचपन की यादों में लौटते हुए कहते हैं- 1941 में मिलम में जन्म लेने से वही सब देखा जो सीमान्त के तत्कालीन बात-व्यवहार में समाया था। तिब्बत व्यापार के उन दिनों में सारे परिवार सक्रिय रहते। पिता जी की धार्मिक कार्यों में रुचि होने से वह कैलास यात्रियों के सहयोग के लिये तत्पर रहते थे। मौसम के अनुरूप माइग्रेशन में पूरा परिवार मिलम-दरकोट-भैंसखाल रहता। इसी अनुसार बच्चों की पढ़ाई होती थी। कक्षा पाँच की बार्ड परीक्षा कव्वाधार हुई। नमजला से हाई स्कूल किया। बोर्ड का सेन्टर काण्डा (बागेश्वरद्) हुआ करता था। मुनस्यारी से दो दिन में काण्डा पहँुचते थे। इस पैदल यात्रा में पढ़ने वाले युवा कमरा किराये पर लेकर रहते, एक कमरे में चार लोग लैम्प जलाकर पढ़ते थे। पढ़ाई की धुन में लैम्प बीचों बीच रखा जाता और रातभर पढ़ते। 1957-58 में अल्मोड़ा फिर इलाहाबाद जाना हुआ। वहाँ भी पढ़ाई की यही धुन थी। पठन-पाठन का माहौल मिला तो दिन-रात एक कर दिया। उस समय के मनोहर पांगती आईएएस, कल्याणसिंह मर्तोलिया सीबीआई, लक्ष्मण सिंह जंगपांगी व्यवसाय क्षेत्र में अग्रणीय रहे हैं। उत्तम सिंह जी एलएलबी करने बाद कुछ वर्षों तक सहायक अभियोजना अधिकारी रहे। उसके बाद न्यायिक सेवा में प्रवेश किया और अतिरिक्त जिला जज के पद से सेवानिवृत्त हुए। वे उच्च न्यायिक सेवा में चयनित होने वाले पहले शौका हैं। इनका विवाह कारखेत बाला सिंह मर्तोलिया की सुपुत्री गंगोत्राी जी से हुआ। वर्तमान में जोहार नगर, भोटिया पड़ाव हल्द्वानी में निवासरत हैं। हल्द्वानी के पुराने बाशिन्दे होने के अलावा पिघलता हिमालय परिवार से इनकी बेहद घनिष्ठता है। पांगती जी बताते हैं- मुन्सिपफ मजिस्ट्रेट की पोस्टिंग के समय भोटिया पड़ाव क्षेत्र में प्लाटिंग हो रही थी, तब आधा बीघा ले लिया। अपनों के बीच रहते हुए बचपन की खट्टी-मीठी यादों के साथ जज साहब हमेशा उर्जावान बातें करते हैं। उनका मानना है जब हम सकारात्मक कार्य और सोच रखते हैं तो इससे अपनी संस्कृति और संस्कार को पोषित कर सकते हैं।
इनकी यादों में बचपन का देखा और बुजुर्गों से सुना वह सबकुछ है जो नई पीढ़ी के लिये आश्चर्यजनक कहानी होगी। किन कठिन परिस्थितियोें में पिता धरम राय अपने परिवार को जोड़े रखा। सीमान्त से लेकर भाबर तक अपने बड़े भाई तेजू के के साथ धरमु (धरम राय) कार्य योजना बनाते और जनहित के कार्य भी करते। वैद्यों से सम्पर्क कर दवा व जड़ी बूटी अपने पास रखते और दूरस्थ क्षेत्र में स्वास्थ्य कारणों से परेशान लोगों को इसका वितरण करते और परामर्श देते। स्वयं के खर्चे पर उन्होंने यात्रा मार्ग व पुलों के सुधार का कार्य करवाया। तल्ला जोहार में रामगंगा नदी के पश्चिम में लाचुली के दूसरी ओर रमारी की चढ़ाई में पानी की कमी देखते हुए धरम राय जी ने बांखरधार में अपने खर्चे पर एक प्याउ लगाया, जहाँ यात्रियों को पानी पिलाने के लिये एक आदमी नियुक्त किया। इसी प्रकार मापांग की रोड बनाने के बाद अपनी ओर से चना औरे चाय का इन्तजाम किया ताकि यात्रियों को इस दुर्गम में कुछ राहत मिल सके। (जोहार का जनसेवक, श्री गजेन्द्र सिंह पांगती की कृति में विस्तार से दिया गया है।)
धरम राय जी के बंशज अपने-अपने तरीके से समाजिक कार्यों में पुरजोर जुटे हैं, इन सबके प्रेरणापुंज के कार्यों का उल्लेख जरूरी है। धरम राय ने अपने समय में कुछ ऐसे कार्य किये जो असम्भव लगते थे। मापांग में सड़क निर्माण और मिलम में गोरीगंगा पार से पानी (दूधपानी) लाना ऐसे ही कार्य हैं। जब मुनस्यारी मिलम मार्ग खुला तो एकदम खड़ी चट्टान के पास गोरीगंगा का बहाव डरावना लगता था। नदी के पुल बनाकर जैसे तैसे यात्रा की जाती थी। उन दिनों में अपने बलबूते दुस्साहसिक कार्य करने का निर्णय धरम राय ने लिया और सीढ़ीनुमा रास्ता बनाया ताकि आने-जाने में खतरा न हो। साधनों के अभाव में भी उन्होंने कार्य करने वाले श्रमिकों का गैंग बनाया और अथाह धनराशि खर्च कर नदी की धरा बदलने का कार्य करते रहे। अपने जुनून में रहने वाले धरम राय की ख्याति उनके कार्यों से दूर-दूर तक फैली।
जब कोई जनहित कार्य होता है एकाएक कईयों के समझ में नहीं आता है। ऐसा ही धरम राय जी के समय भी हुआ। दूध की तरह दिखाई दे रही जल धारा को मिलम में लाने की इच्छा रखने वाले धरम राय ने पांगती कचहरी में इस बारे में बराबर चर्चा की। स्वयं का धन खर्च करते हुए थांगची मैदान तक गूल बनाई गई। इस प्रकार दूध की तरह स्वच्छ व मीठा जल लाने में वह सफल हो गये। पचास के दशक में जब आज की तरह संसाधनों का आभाव था, इस प्रकार के बड़े कार्यों को निस्वार्थ रूप से करना किसी पुण्यात्मा के बस की ही बात थी। बचपन की देखी-सुनी को याद करते हुए उत्तम सिंह पांगती जी बताते हैं- गाँव में पानी आने का जश्न बच्चों के लिये भारी कौतुहल था। वाकेई जज साहब की देखी-सुनी परिवार की घटना मात्रा न होकर समाज के लिये प्रेरणा है।

दोनहरिया तक बीहड़ था और गौला तक की आवाज आती थी

महेश पांगती से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
हल्द्वानी महानगर के रूप में फैलता जा रहा है लेकिन इसके शुरुआती दिनों में को देखें तो पता चलता है कि किस प्रकार हल्दू के पेड़ से इसका नाम हल्द्वानी पड़ा। (हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से पुस्तक में है इतिहास) इसी हल्द्वानी के भोटिया पड़ाव क्षेत्र में शौका समुदाय का सबसे पहला परिवार डीएफओ हीरा सिंह पांगती जी का आया था। वर्तमान की चकाचौंध में हर कोई पगड़ी पहने सड़कों पर नाच रहा है लेकिन शहर, आदमी और यात्राओं की वह सच्चाई उस दौर में झांकने से पता चलती है। असल में बीहड़ जंगल से घिरा हल्द्वानी भाबर क्षेत्र चारों ओर से आने वालों का केन्द्र बना। सीमान्त क्षेत्रा के शौका समुदाय के बड़े व्यापारी महिमन सिंह पांगती ने एक बंगला बनाया था। ह्यून (जाड़ों) के दिनों में आने वाले जगह-जगह अपना ठहराव स्थल देखते थे, हल्द्वानी भी मुख्य पड़ाव बन चुका था। व्यापारी महिमन सिंह जी के सुपुत्र हुए हीरा सिंह पांगती जी। उस दौर के डीएफओ साहब का मायने ही विराट था। इनके सुपुत्रा हुए- हमेन्त सिंह, महेश सिंह, भूपेन्द्र सिंह, गगन सिंह।
आज की बातचीत श्री महेश पांगती के साथ ही है। वह बताते हैं कि दादा महिमन सिंह के समय ही हल्द्वानी मं 1938 में मकान बन चुका था। जाड़ों में रहने के लिये इस स्थान को चुना गया। बंगले के अलावा आठ बीघा जमीन इसमें थी। दादा जी का सीमान्त में व्यापार था लेकिन उन्होंने गरुड़ में अपना कारोबार शुरू कर दिया। पचास के दशक में गरुड़ क्षेत्र में भी बड़ा कारोबार था। हल्द्वानी व अन्य जगहों के लिये उनके ट्रक आते थे। 1970 में स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने गरुड़ का कारोबार समेट कर हल्द्वानी मंे रहना शुरु कर दिया।
महिमन सिंह जी के सुपुत्र हीरा सिंह जी एसडीओ नन्धौर, कोटद्वार तमाम जगह रहे। पिता के साथ जंगलों की खूब सैर महेश पांगती जी ने की है। सैलापानी, रामनगर, ढिकाला, गढ़वाल, लालढांग चारों ओर घूमने की यादों के साथ श्री महेश पांगती बताते हैं कि हल्द्वानी में हमारा बीस कमरों का बंगला था, जिसकी निचली मंजिल कमरे खाली थे और आने-जाने वालों का विश्रामस्थल भी। तब दोनहरिया तक बीहड़ था और गौला तक की आवाज आती थी। रात्रि में यह आवाज और भी भयंकर सुनाई देती थी। श्री पांगती बताते हैं की भोटिया पड़ाव में उनके परिवार के बाद धीरे-धीरे लोगों का आना शुरु हुआ। पहले शंकर मामा, मंगल मामा आए। उस दौर में किसी नेपाली कब्जेदार की बहुत चर्चा थी। बाद में उसे हटाया गया। दोनहरिया के अलावा अन्य जगहों पर पर भी जंगल होने से आबादी कम थी।
अपने बचपन के दिनों की यादों में खोते हुए श्री महेश पांगती बताते हैं पिता का ज्यादातर जंगलात सम्बन्धी दौरा होता रहता था, माता श्रीमती सरस्वती पांगती घर की व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखती थीं। एमबी कालेज घर के बगल में होने से हम भाईयों की शिक्षा यहीं से हुई। कालेज में ‘त्रिवेणी छात्रावास’ के 5 कमरे थे, जिसमें बाहर से आकर छात्र रहते थे। मैदान में फुटबाल खेलते थे और फल-फूलों के पेड़ों की हरियाली थी। एमबीपीजी कालेज से ही बीएससी करने के बाद महेश जी ने जेएनयू में प्रवेश लिया। इस बीच बैंकिग सेवा में जुड़ गये। पंजाब नेशनल बैंक में लम्बी सेवा के बाद 2017 में जनरल मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हुए। 5 साल तक महाप्रबन्धक रहे पांगती जी की सेवाएं मेरठ व दिल्ली में भी रही हैं। उत्तराखण्ड के महानगरों में गिने जा रहे हल्द्वानी की वर्तमान चकाचौंध से पहले इसकी बुनियाद को जानना हो तो पांगती जी के परिवार का चर्चा होना ही है। इनके परिवार में पत्नी श्रीमती ईला पांगती हैं। जबकि सुपुत्र मोहनीस और रजत अपने कार्यसफर में हैं।

जसमलसिंह-मंगलसिंह दरकोट में थी सबसे बड़ी फर्म

डॉ. पंकज उप्रेती
आज बाजार का स्वरूप बदल चुका है, ऑनलाइन कामकाज भी होने लगे हैं। कल्पना कीजिए उस दौर की जब आने-जाने के रास्ते बीहड़ थे और सामान ढुलान के लिये पशुओं का ही सहारा था। उन स्थितियों में दुर्गम क्षेत्र में कोई फर्म चलाना और लाखों की उधारी फंसी होने के बावजूद हंसते हुए झेलना। साथ ही प्रकृति से तालमेल बनाये रखते हुए व्यापार का तिब्बत से लेकर तराई तक सामंजस्य साधारण बात नहीं है। इस तरह के हालातों में जन्म लेने वाले डॉ. कुन्दन सिंह पांगती जी से आज की विशेष बातचीज है। डॉ. पांगती उस पीढ़ी में से हैं जिन्होंने अपनी आँखों से यह व्यापार और व्यवहार देखा है। यह प्रसंग आगे बढ़े इससे पहले पहले इनके बारे में बताते हैं- डॉ.पांगती के दादा हुए चन्द्र सिंह पांगती। चन्द्रसिंह जी रायबहादुर किशन सिंह के साथी थे। चन्द्र सिंह जी तीन भाई थे, जसमल सिंह, चन्द्र सिंह और मंगल सिंह। चन्द्रसिंह पांगती के सुपुत्र हुए बाला सिंह। पिता के निधन के बाद माता श्रीमती हेमा देवी पर बालासिंह की बड़ी जिम्मेदारी थी। उस दौर में घर के इकलौते बालक को देखते हुए जल्द ही इनका विवाह डोटिला की हरकी देवी से हुआ। ;स्व.हरकी देवी पांगती निधन 101 वर्ष की में इसी साल रविवार 26 अप्रैल 2026 को हुआ। (पिघलता हिमालय ने उनकी जीवनी पर काफी जानकारी दी है।) इनका संयुक्त परिवार मिलम दरकोट और भैंसखाल तक माइग्रेशन व्यवस्था में आवत-जावत करता रहा है। मुनस्यारी के दरकोट में जसमलसिंह-मंगल सिंह सबसे बड़ी फर्म हुआ करती थी। बालासिंह-हरकी देवी के पुत्र हुए कुन्दन सिंह, जिनका जन्म जनवरी 1947 में भैंसखाल में हुआ।

कुन्दन सिंह जी अपने बचपन के दिनों और बुजुर्गों को याद करते हुए बताते हैं- ‘भैंसखाल में जन्म के समय उन्हें मन्दिर में दिया गया और फिर उन्हें माता-पिता को सौंपा, क्योंकि इनके जन्म से पहले दो बच्चों के न बचने पर सहमे परिवार ने मन्दिर में सुपुर्द कर भगवान का आशीर्वाद चाहा। बचपन में इनका नाम गिरधर रखा गया। बाद में कुन्दन कहने लगे। इस प्रकार कोई गिरधर तो कोई कुन्दन कहता।’ इनके बाद भाई-बहनों में दमयन्ती (वृजवाल), चन्द्रा (मर्तोलिया), नवराज पांगती, कवीन्द्र पांगती हुए। इस प्रकार संयुक्त परिवार में यह सारे सदस्य भी थे।
बचपन की यादों को आगे बढ़ाते हुए डॉ. कुन्दन बताते हैं कि तिब्बत व्यापार बन्द होने से इसमें लगे लोगों की आर्थिकी खराब होने लगी थी। व्यापारियों की काफी पूंजी तिब्बत में फंसी रह गई। तब दरकोट में परिवार की फर्म ‘जसमलसिंह- मंगलसिंह’ मुख्य केन्द्र होता था। दूर-दराज से सभी लोगों को इसका आसरा था। फर्म के लिये काशीपुर से सुदामा लाल रामआश्रय, हृदयनाराण फर्म से कपड़ा आता था। इसी प्रकार हल्द्वानी की फर्म लालमणि खीमदेव से तम्बाबू सामग्री आती थी। सामान लाने के लिये पशुओं का समूह था। भेड़-बकरी भी दो प्रकार के होते हैं। 80-90 लक्खा थे और 500 से अधिक बकर। लक्खा तो सामान ढोने के लिये लगाए जाते थे और बकर अद्योली में देते थे। बकर ले जाने के लिये रिलकोटी जी, धपवाल जी और एक बसन्तकोट के थे। इसी तरह खच्चरों की देखरेख में धारचूला के श्रीराम कुटियाल और तिंकर के दिलीप सिंह भी थे। कपड़ा इत्यादि बड़ा सामान ढोने के लिये खच्चरों का उपयोग होता था। तिकसैन में पुराना ‘हयात सिंह होटल’ मशहूर हुआ करता था। डॉ.कुन्दन सिंह के पिता बाला सिंह की पधानचारी को आज भी लोग याद करते हैं। दरकोट ग्राम के लम्बे समय तक प्रधान रहे। इसके नाते भी दरकोट में दूर दराज से लोगों का जमावड़ा रहता था।
कुन्दन सिंह कक्षा 5 तक मिलम-दरकोट में पढ़ाई करने वाले बच्चों के दल में रहे हैं। तब इनके शिक्षक बासुदेव जी और बहादुर सिंह लस्पाल थे। कक्षा 5 बोर्ड परीक्षा का सेन्टर कव्वाधार में पड़ा था। मिलम जैसे सीमान्त क्षेत्र का प्राइमरी स्कूल भवन आज भी लोगों की कल्पना से परे हो सकता है। सुन्दर भवन, मुख्य द्वार, चाहरदीवारी, सुन्दर फुलवारी, फुटबाल के तीन मैदान इसमें थे। बैठने के लिये कुर्सियां। गुरुजनों के लिये बड़ी मेज। एकदम दूरस्थ में इतनी साज-सज्जा किस तरह हुई होगी। पांगती जी बताते हैं- तिकसैन का स्कूल तक नमजला में हुआ करता था। नमजला से तिकसैन बच्चों की टोली पेड़ लगाने जाती थी और घिंघारू की झाड़ से बाउण्ड्री लगाते थे। गुरुजनों की देखरेख में कालेज का सारा सामान बच्चों ने ही तिकसैन में ढोया था। छात्रावास में रहकर पढ़ाई करते थे। भोजन व्यवस्था के लिये धन सिंह कुक था। बारी-बारी से लड़के अपने घर से राशन लाते और सभी के लिये भोजन बनता था। इस प्रकार इण्टर विज्ञान का प्रथम वैच कुन्दन सिंह व साथियों का रहा। उस दौर के गुरुजनों में श्री पी.सी. पन्त एवं श्री पूरन चन्द्र पन्त जैसे विद्वान थे जिन्होंने छुट्टियों के दिनों में छात्रों को अपने घर बुलाकर तक पढ़ाया।
बचपन की इन तमाम यादों के साथ कुन्दन सिंह जी ने मेरठ मेडिकल कालेज और इलाहाबाद से पीजी किया। संयोग से टेªनिंग के लिये अल्मोड़ा आना हुआ लेकिन भाग्य में रेलवे की नौकरी थी। भारतीय रेलवे के मेडिकल में इनकी पोस्टिंग हुई। बनारस में सर्वाधिक समय 30 साल ईएनटी विशेषज्ञ के रूप में सेवा करने वाले डॉ. कुन्दन सिंह पांगती चार साल इंचार्ज रहे और अवार्ड भी मिला। दीवान सिंह टोलिया जी की सुपुत्री कुसुम जी के साथ इनका विवाह हुआ (आर.एस. टोलिया जी की बहिन हैं)। डॉ.पांगती की सफलता में श्रीमती कुसुम जी का योगदान बराबर रहा है। इनकी सुपुत्रियां रिचा, रौनी, रुचिरा भी मेडिकल क्षेत्र में योग्य हैं।
डॉ. पांगती बताते हैं- नौकरी के शुरुआती दौर में तब लखनउ से दो कोच चलती थी। टनकपुर तो रेलवे का मुख्य स्टेशन हुआ ही, चकरपुर ससुराल भी। ऐसे में बनारस से रेल का सफर पहाड़ से जोड़े रखने वाला ही था। रेलवे की ओर से मिलिट्री कैम्प का अवसर भी लगातार रहा और इन्हें मेजर पदनाम दिया गया लेकिन चिकित्सक के रूप में इन्होंने हमेशा डाक्टर पदनाम को ही सर्वोपरि रखा और सेवानिवृत्त होने के बाद भी चिकित्सा परामर्श के लिये तत्पर हैं।

जलद का शीतकालीन पड़ाव तेजम

केदार सिंह रावत से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती

जोहार के ‘खड़कू गीता’ के बारे में पिघलता हिमालय ने अपने पुराने अंक में जानकारी दी थी। इसी परिवार के श्रीमान केदार सिंह रावत एयरइण्डिया में रहते हुए दुनिया के आलौकिक नजारों को महसूस करने वालों में से हैं। एकदम सीधा सच्चा जीवन जीने में विश्वास करने वाले रावत जी से बातचीज करने से पहले इनके बारे में जानते हैं- मिलम के तिब्बत व्यापारी खड़क सिंह रावत गीता, रामायण का रुचिपूर्ण पाठ करने के अलावा वैद्यगिरी में माहिर थे, जिस कारण ‘खड़कू गीता’ या ‘गीता’ नाम से उन्हें पहचान मिल गई। आयुर्वेद के जानकार होने के कारण यह इलाज भी कर देते। व्यापारी होने के नाते दिल्ली में भी इनका सम्पर्क था, जिससे यह दवाई की खुराक मंगवा लिया करते थे। वैद्यगिरी में स्थानीय जड़ी-बूटी का प्रयोग करते। धर्मपरायण होने के कारण इन्होंने अपने पुत्रों के नाम- देवराम सिंह, हरीराम सिंह, दयाराम सिंह, श्रीराम सिंह रखा। आज भी तेजम में इनके कुनबे की पहचान ‘गीता’ या ‘खड़कू गीता’ का परिवार के रूप में है। इन चार भाईयों में श्रीराम सिंह रावत के सुपुत्र हुए- डॉ. जी.एस. रावत (देहरादून) और के.एस. रावत (हल्द्वानी)।
जोहार-मुन्स्यार के जलद में रहने वाले रावत परिवारों को शीत कालीन पड़ाव तेजम हुआ करता था, जिस कारण यह तेजम में भी बस गये। जलद में ही केदार सिंह का जन्म 1955 में हुआ। बचपन बीतने के बाद बीएससी करने के लिये यह अल्मोड़ा आ गये, इसी कक्षा का पार्ट-2 करने के लिये नैनीताल का चयन किया क्योंकि उस समय इनके भाई भीमताल में थे। इसके बाद इन्होंने आगे एमए करने की तैयारी की लेकिन इनके मामा श्री लक्ष्मण सिंह पांगती ने लखनउ से एक विज्ञापन की सूचना इन्हें भेज दी, जो एयरइण्डिया की थी। रावत जी दिल्ली चले गये और चयन, टेनिंग के बाद 1978 में एयरइण्डिया में लग गये। बात लक्ष्मण सिंह पांगती की करें तो लखनउ में रहते हुए श्री पांगती जी का दिशा-निर्देश हमेशा अपने समाज के लिये रहा है। जोहार की लोक संस्कृति और इतिहास पर लिखने वाले और समाज सुधारक बाबू राम सिंह की सुपुत्री तुलसी देवी का विवाह श्रीराम सिंह रावत से हुआ था (केदार सिंह जी माता)। इनके सुपुत्र लक्ष्मण सिंह ने भी जोहार के इतिहास और संस्कृति को सहेजने का काम किया है। साथ ही युवाओं को आगे बढ़ाने में प्रोत्साहित भी किया।
हाँ, तो बात तेजम और रावत जी की हो रही थी। एयरइण्डिया में नौकरी भले ही के.एस.रावत जी करने लगे थे लेकिन इनके मन-मस्तिष्क में अपना बचपन अपना पहाड़ कौंधता रहता। हवाई यात्राओं में दुनिया के आलौकिक नजारे बहुत देखे लेकिन अपनी जड़ों को कैसे भूल सकते थे। दिल्ली में सारी सुख-सुविधाओं के बीच भी इनका जुड़ाव अपने पहाड़ से बना रहा है। इनकी पत्नी श्रीमती कुसुमलता रावत दिल्ली में ही न्यू इण्डिया इंश्योरेंश कम्पनी में थीं। जो हल्द्वानी में इसी कम्पनी की डप्टी मैनेजर के पद से 2021 में सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। इससे पूर्व श्री रावत जी 2013 में एयरइण्डिया से मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे लेकिन एक हादसा उन्हें परेशान करने वाला रहा वह 2011में हुआ जब वह पैदल घूमने निकले थे किसी मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मारी जो उनके पैर को बुरी तरह घायल कर गई। ऐसे में चाह कर भी लम्बी यात्राओं से बचाव करना होता है। इनके सुपुत्र विजेन्द्र सिंह और सुपुत्री रुचि दिल्ली में ही कार्यरत हैं जबकि रावत दम्पत्ति हल्द्वानी के छड़ायल नयाबाद क्षेत्र में निवास कर रहे हैं।
श्री रावत को एयरइण्डिया में सेवा के दौरान खासे अवसर मिले जब वह देश के शीर्षतम लोगों की फ्लाइट जानी होती थी। सन् 1981 में पहली बार जब प्रधनमंत्री राजीव गांधी चायना गये, तब रावत जी को साथ जाने का मौका मिला। इसी प्रकार राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के साथ साउथ अमेरिका, ब्राजील, मैक्सिको, प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह के साथ जर्मनी दौरे किया। 2010 के कामनवेल्थ गेम्स के लिये मिली बड़ी जिम्मेदारी इन्होंने निभाई जब आस्ट्रेलिया के करीब दस छोटे-छोटे देशों के खिलाड़ियों को एकत्रित कर गेम्स के लिये दिल्ली जाया गया। इन प्रकार की जिम्मेदारियों को बेहतरीन तरीके से निभाना और अपनी जड़ों के साथ जुड़े रहने वाले रावत जी आज भी युवाओं के लिये प्रेरणा हैं कि यदि इच्छा हो तो किसी भी जगह पर आप अपनी खूबियों को दिखा सकते हो।

तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

श्रीमती पार्वती रावत-श्रीमती हेमा बृजवाल से बातचीज

डॉ. पंकज उप्रेती

भारत-चीन व्यापार की वर्तमान स्थितियां एकदम अलग हैं। इस बार लम्बे अन्तराल के बाद यह व्यापार होने वाला है, जो कोरोना कारणों से स्थगित था। इसकी तैयारी हो रही है। लेकिन हमारे सीमान्त क्षेत्र से इस व्यापार की असल परम्परा इतिहास और संस्कृति का आधार है। सीमान्त के व्यापारी अपने तिब्बत मित्रों के साथ किस प्रकार से व्यवहार रखते थे वह जानना बहुत शिक्षाप्रद है क्योंकि दुर्गम स्थानों पर प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए जो कुछ किया जाता था वह त्यौहार सा माहौल बन जाता था। ऐसी ही रोचक जानकारियों के लिये आज श्रीमती हेमा बृजवाल और श्रीमती पार्वती रावत से बातचीज प्रस्तुत है। हेमा बृजवाल और पार्वती रावत आपस में समधन हैं। इन दोनों को ही बचपन में वह अवसर देखने का सौभाग्य है जब इनके घरों से तिब्बत व्यापार के लिये जाते थे और सारे ग्रामवासी व्यापारियों को जाते समय विदाई करते और आने पर स्वागत। बताते हैं- रास्ते के लिये भरपूर खाजा-खजूरे बनाये जाते थे। बातचीज का सिललिसा चलता रहे इससे सबसे पहले हेमा बृजवाल जी के बारे में बताते हैं। दरकोट में पिता जीवन सिंह सयाना माता श्रीमती खिमुली देवी के घर इनका जन्म हुआ। तल्ला दुम्मर बृजवाल परिवार में इनका विवाह हुआ। स्व. प्रताप सिंह बृजवाल के सुपुत्र थे स्व. जसवन्त सिंह जी। हेमा देवी का विवाह जसवन्त सिंह जी के साथ हुआ। इनकी अगली पीढ़ी में स्व. केदार सिंह, मनोहर सिंह, प्रेम सिंह, वीरेन्द्र सिंह और अंजू पांगती हैं। तिब्बत व्यापारी परम्परा में प्रत्येक परिवार से कोई न कोई जाता था जब 12 साल की उम्र में जसवन्त सिंह जी भी अपने परिवार से व्यापार में गये।
हेमा देवी का बचपन दरकोट, मल्ला दुम्मर में बीता। इनके बचपन की सखियों में रुकमणि देवी, पानुली देवी, हरकी देवी रहे हैं। अपने मायके में व्यापार की जिस परम्परा को इन्होंने देखा वही सब ससुराल में भी था। विवाह के बाद एक वर्ष तक यह मल्ला दुम्मर रहीं और फिर पति संग अल्मोड़ा आ गई। 1951 में जसवन्त सिंह बृजवाल ने यहाँ कारपेट एण्ड जनरल स्टोर खोला। थोक का व्यापार बेहतर चल निकला क्योंकि बृजवाल दम्पत्ति अथाह मेहनती थे। पहले यह गंगोला मोहल्ले में रहते थे, बाद में धर की तूनी शैल गाँव में अपना मकान बना लिया। हेमा बृजवाल अपनी उनी कारोबार की परम्परा को अल्मोड़ा में भी बनाए हुए थीं और इन्होंने एक सेन्टर चलाया जिसमें दन गलीचे, पंखी, पसमीना बनाया जाता था। बकायदा बालिकाओं को इसकी ट्रेनिंग दी जाती थी। सेन्टर चलाने के लिये शुरू में लखनउफ से सरकारी इन्तजाम भी हुए जो साल तक थे, इसके बाद अपने आप से आठ वर्ष तक इस सेन्टर को इन्होंने चलाया। सेन्टर में बनने वाले विभिन्न आकार के गलीचेे व उनी सामग्री को लेने लोग इनके पास आने लगे थे। इसके अलावा उत्तरायणी मेले में बागेश्वर और व्यापारिक मेले जौलजीवी में तक यहाँ से सामान जाता था।
अब श्रीमती पार्वती रावत जी के बारे में बताते हैं। इनके बूबू प्रेम सिंह जंगपांगी और पिता मेघ सिंह जी हुए। थल, मल्ला दुम्मर और बुर्फू तक माइग्रेशन परम्परा मेें परिवार की घुमन्तु व्यवस्था थी। साथ ही तिब्बत व्यापार का कारोबार। पार्वती देवी की शिक्षा माइग्रेशन स्कूलों की उस परम्परा में हुई है। तिकसैन मुनस्यारी में रहते हुए नमजला जाकर उन्होंने पढ़ाई की। वह बताती हैं गुरुजन अपने शिष्यों के लिये बहुत मेहनत करते थे। बच्चों द्वारा भी अपने गुरुजनों के लिये बहुत आदर था और बारी-बारी से खाद्य सामग्री, आटा-गुड़-घी, चूल्हा जलाने को लकड़ी उन्हें देते थे। ऐसे में शिक्षकों को माइग्रेशन जैसी शिक्षा व्यवस्था भी नहीं अखरती और वह चित्त लगाकर मेहनत करते थे।
कुशाग्र बुदिृध की पार्वती देवी शिक्षा के बाद शिक्षा विभाग में ही नौकरी करने लगी। नौकरी में वह अल्मोड़ा से धारचूला भी गईं लेकिन विवाह के बाद नौकरी छोड़ दी और एनटीडी, अल्मोड़ा अपने ससुराल में हैं। किशन सिंह रावत परिवार से इनका सम्बन्ध है। किशन सिंह जी के सुपुत्रों में विंग कमाण्डर नौसेना ज्योति सिंह, कर्नल रणजीत सिंह, कर्नल थल सेना खुशाल सिंह, विंग कमाण्डर वायु सेना प्रतिमन सिंह हैं।
खुशाल सिंह की सुपुत्री हुईं स्व.प्रोमिला देवी इनकी अगली पीढ़ी में नेहा बृजवाल जो दिल्ली में पीएनबी में मैनेजर हैं। इस पारिवारिक ताने-बाने के बीच पार्वती रावत अपने बचपन को याद करते हुए बताती हैं- तिब्बत यात्रा पर जाने वालों के लिये खाजा-खजूरे, सत्तू तैयार कर रखते थे। एक दिन पहले आसपास सारे लोगों को बुलाकर आयोजन होता था। आलू-पूरी ज्या जैसे व्यंजनों के साथ सब बैठक करते। ढोल वादक भी बुलाए जाते थे। रात्रि के इस आयोजन के बाद अगले दिन जब तिब्बत यात्रा पर व्यापारी निकलते तो उन्हें छोड़ने के लिये दूर तक जाते। जब व्यापार करके हूणदेश से लोग वापस आते थे तो तब भी घर लीपघीस कर खूब सजाया जाता था। व्यापारियों के आने का स्वागत किया जाता था। बचपन की यादगार बातों में वह बताती हैं- बूबू और पिता जी जब तिब्बत व्यापार से लौटकर आते थे तो अपने साथ लाए सामान को देखते और सबको दिखाते। इसके अलावा एक कमरे में पैसोें का हिसाब जोड़ते, तब बच्चों को वहाँ से हटा देते लेकिन हम छोटे बच्चे दीवारों के औने-कौने से देखते क्या हो रहा है। उस कमरे में चाँदी के सिक्कों के ढेरों को अलग-अलग कर लगाते हुए गिनती होती थी। एकआना, दोआना से लेकर अलग-अलग चाँदी के सिक्कों के ढेर बच्चों के लिये कौतूहल था, जो कि व्यापारियों ने दुर्गम यात्रा करते हुए जान जोखिम में डालकर अपने व्यापार में जुटाए थे।

पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं, आधा किलो तक की हसुली बनती थी

नवीन चन्द्र वर्मा से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
उत्तराखण्ड सरकार में वरिष्ठ नागरिक कल्याण परिषद के उपाध्यक्ष श्री नवीन वर्मा भले ही राज्यमंत्री का दर्जा रखते हैं लेकिन उनकी कार्यशैली और समाज के लिये सोच उन्हें काफी आगे पहले से बनाए हुए है। व्यापारी नेता, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के अलावा स्वच्छ छवि के चलते उन्हें सरकार में भी जो अवसर मिला है उनके अनुभवों का लाभ समाज को होना ही है। मूलरूप से स्वर्णाभूषण के कारोबारी परिवार से होते हुए भी नवीन वर्मा जी सोच केवल व्यापारी बनकर रहने की नहीं रही और वह सामाजिक कार्यों में हाथ बंटाते रहे हैं। उत्तराखण्ड की राजनीति और यहाँ के व्यापारी नेता के रूप में वह कितने मजबूत हैं यह जानने से पहले वर्मा परिवार के बारे में आपको बताते हैं।
यह वर्मा परिवार मूलरूप से चम्पावत के तल्लीहाट का हुआ जो रीठासाहिब (रीठा) में चला गया था। श्री नवीन वर्मा के दादा कृपालाल वर्मा के चार पुत्रा, दो पुत्रियां हुईं- हीरा लाल, मोहन लाल, विशन लाल, देवीलाल, मोहनी और जयन्ती। इसके बाद हीरा लाल जी परिवार में राजेन्द्र लाल, प्यारेलाल, सुरेश वर्मा, कलावती वर्मा। मोहन लाल जी परिवार में नवीन चन्द्र, पूरन चन्द्र, स्व. विपिन, दिनेश चन्द्र, कुसुम वर्मा। विशन लाल जी के परिवार में प्रेमा वर्मा, स्व. गिरीश, भुवन चन्द्र, विमला वर्मा, मीना वर्मा, सुध्ीर, दीपा वर्मा, ललित। देवीलाल जी के परिवार में स्व. किशन वर्मा, स्व. किशोर, दीप चन्द्र, सुनील वर्मा।
सन् 1967 तक कृपालाल जी के इस संयुक्त परिवार का एक पड़ाव हल्द्वानी का भाबर था। जाड़ों में परिवार रीठा से हल्द्वानी आ जाता था। सन् 1968 के बाद हल्द्वानी में स्थायी रूप से निवास करने लगा। हल्द्वानी के पटेल चौक में ही नवीन वर्मा का जन्म हुआ। अपने नैनीहाल पहाड़पानी में रहकर जूनियर हाईस्कूल, चम्पावत से हाईस्कूल, एमबी कालेज हल्द्वानी से इण्टर, अल्मोड़ा में बीएससी, नैनीताल में एमएससी करने वाले श्री वर्मा जी का पैतृक कार्य स्वर्णाभूषण से जुड़ा था लेकिन इनकी रुचि खेल, घुमक्कड़ी, सामाजिक कार्यों में रही है। वर्तमान में तिकोनिया के गुरुतेगबहादुर मार्ग में उनका अपना आवास है। उनके साथ सौ वर्षीय माता श्रीमती माधुरी वर्मा का आशीर्वाद है। उनकी सामाजिक अभिरुचि में साथ देने वाली पत्नी श्रीमती बीना वर्मा हैं। वर्मा जी की अगली पीढ़ी में पुत्री अमिता वर्मा, दीपक वर्मा, तनुज वर्मा हैं।
इस प्रकार भले ही तल्लीहाट फिर रीठा से वर्मा परिवार का आगमन इस भाबर में हुआ है लेकिन नवीन वर्मा तो पूरी तरह जन्म से लेकर हल्द्वानी की पहचान हैं। यही कारण है शहर में नियोजित विकास को लेकर उनकी पुरानी मुहीम रही है। कारोबार के रूप में उनका ज्वैलरी का प्रतिष्ठान है लेकिन उनकी दौड़धूप से कोई नहीं कहेगा वह व्यापारी हैं। अपने पम्परागत कार्य पर चर्चा करते हुए वर्मा जी कहते हैं- पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं। पहाड़ों में जिस प्रकार की ज्वैलरी का चलन रहा है, हम जैसे-जैसे चीन सीमा की ओर को जाएंगे वहाँ चाँदी का ज्यादा चलन है। मैदान को आते-आते इनका प्रकार बदल जाता है और सोने के आभूषण दिखाई देते हैं। पहले 250 ग्राम तक के सूते/सुतले गले के बनते थे। हाथ के धागुले 200 ग्राम तक और हसुली लगभग आधा किलो तक की होती थी। कमरबन्ध तो 500 ग्राम से कम के बनते ही नहीं थे। पहाड़ों में सोना उतना नहीं था लेकिन चाँदी के चलन ने सारे रिवाज पूरे किये, जो आज तक भी बने हुए हैं।
अपनी पढ़ाई के साथ खेल व टेªकिंग में अभिरुचि रखने वाले वर्मा जी ने पैदल यात्रा करते हुए दो बार कैलास मानसरोवर और 5 बार आदि कैलास यात्रा की है। वह कहते हैं- यात्राओं मेें बहुत कुछ देखने और सुनने-सीखने को मिलता है। मालपा में प्रकृति के कोहराम से पहले उन्होंने कह दिया था कि मालपा से बूदी के बीच गरमपानी के कई स्रोत हैं जिससे विस्फोट हो सकता है। अपनी यात्राओं में वह केवल जाना-जाना नहीं करते बल्कि हर यात्रा के पीछे अध्ययन भी होता रहा है। हल्द्वानी के भवानीगंज स्थित डॉ. निर्मल मुनगली के वहाँ किराये पर रहते हुए 1968 में इन्होंने अपना मकान बनाया। साथ ही शहर की हर भली गतिविधियों में जुड़े रहे। 1986 में व्यापार मण्डल से जुड़ गए। नगर उपाध्यक्ष, महामंत्री, प्रदेश मंत्राी रहे। पृथक राज्य बनने के बाद 2004 में व्यापार मण्डल के संयुक्त महामंत्री, 2009 से 2018 तक महामंत्री और 2018 से प्रदेश अध्यक्ष हैं।
राज्य आन्दोलनकारी के रूप में इनकी अग्रणीय भूमिका रही है। राज्य आन्दोलनकारी छात्रा संघर्ष समिति की टीम में 5 प्रमुख लोग थे जिसमें एन.सी.तिवारी संयोजक, हेमन्त बगड्वाल, दीवान सिंह बिष्ट, हुकुम सिंह कुंवर और वर्मा जी। 1998 में जमरानी बांध निर्माण संघर्ष समिति बनी, उसमें भी ये नेतृत्व की भूमिका में थे। जमरानी बांध आन्दोलन को लेकर बंशीधर भगत शुरुआत से रहे हैं लेकिन आन्दोलन को आगे बढ़ाने में इस समिति का योगदान गिना जाता है।
खेलों में रुचि के कारण नवीन वर्मा इससे जुड़े रहे हैं। 2004 सुरेन्द्र रावत जी ने स्पोटर््स एसोसिएशन बनाई थी। 1998-99 में विविधवत रूप से हल्द्वानी महोत्सव की नींव रखी। इस प्रकार शहर व इससे बाहर भी हर प्रकार से समर्पित रहते हुए नवीन वर्मा ने जिस प्रकार का मुकाम पाया है वह हमेशा सूझबूझ मार्ग दिखाने वाला रहा है। पार्टियों के झण्डे एक तरफ, इनकी स्वयं की ईमानदारी सकारात्मक उर्जा देती है।

कज्जाकी लुटेरों का आंतक था

Hot pursuit of Kazakh Bandits by a Johari Tradar

डॉ.नारायण सिंह पांगती से बातचीज

डॉ. पंकज उप्रेती
दुनिया का कालचक्र हमेशा दुश्वारियों से घिरा रहा है। अपने वर्चस्व, अपनी भूख, अपने शौक के लिये लड़ते-भिड़ते देशों व गिरोहों की अनगिनत कथा कहानियाँ इतिहास में हैं। जहाँ शान्ति की कामना की जाती है, वहाँ भी कोई न कोई अड़चन रही है। बात करते हैं भारत- तिब्बत सम्बन्धों और इनके बीच होने वाले व्यापार की तो पता चलता है कि हमेशा से हिमालयी राज्यों व देशों का सम्बन्ध् मधुर रहा है लेकिन आक्रान्ताओं की नीयत और अत्याचार ने इन शान्त वादियों को भी नहीं छोड़ा। ऐसा ही आतंक एक बार कज्जाकी लुटेरों का था और इनका पीछा करने वालों में बहादुर शौका व्यापारी स्व.शेरसिंह पांगती का नाम है। जर्मनी के शोधार्थी एल्मार ग्रेपा ने अपने अध्ययन में भी इसकी खोज की थी, बाद में डॉ.आर.एस. टोलिया व सुरेन्द्र सिंह पांगती से प्रेरित होकर डॉ.एन.एस.पांगती-श्रीमती जया पांगती ने इस महत्वपूर्ण इतिहास को पुस्तक का रूप भी दे डाला। ‘एक जोहार व्यापारी द्वारा कज्जाकी लुटेरों का पीछा’ की चर्चा से पहले डॉ.पांगती के बारे में जान लेते हैं। एक थे- रामसिंह पंागती जी। इनके दो पुत्र हुए- शेरसिंह और लाल सिंह। शेरसिंह जी की अगली पीढ़ी में मनोहर सिंह, नारायण सिंह। डॉ. नारायण सिंह पांगती जिन उँचाईयों पर हैं, इनका बचपन उतना ही परीक्षादायी रहा है। मिलम में 1944 में जन्मे पांगती जी माइग्रेशन परम्परा के साक्षी हैं और ग्राम चिलकिया (नाचनी से पहले पुल के पास) में बचपन की पढ़ाई के बाद अपने रिश्तेदारों के पास रहकर तेजम के लोधियाबगड़, भैंसखाल, टिमटिया स्कूली शिक्षा लेने लगे। 1962 में मुनस्यारी से हाईस्कूल का प्रथम बैच ;विज्ञान वर्गद्ध के छात्र पांगती जी कक्षा 11 की परीक्षा बेरीनाग से और इण्टर अल्मोड़ा से किया। सन् 1965 में किंक जार्ज मेडिकल कालेज लखनउ से एमबीबीएस किया। सन् 1962 के बाद अपने क्षेत्रा से यह पहले युवा थे जिन्होंने एमबीबीएस किया था। इससे पहले चन्द्र सिंह रावत, जसवन्त सिंह धर्मशक्तू अपने समय के एमबीबीएस किये हुए थे। सन् 1972 में राजकीय चिकित्सा सेवा में आने के बाद 1984 में प्रमोशन पर डिप्टी सीएमओ का कार्यभार ग्रहण किया। अल्मोड़ा में सीएमएस बेस अस्पताल में रहने के बाद नैनीताल फिर 2002 में सेवानिवृत्त डाक्टर साहब ने अपनी चिकित्सा सेवा का लाभ विस्तार रूप में किया। इनके कार्यों में श्रीमती जयवन्ती (जया) पांगती जी का हरक्षण सहयोग आगे बढ़ने में फलीभूत हुआ है। सुपुत्र डॉ.मंयक, सुपुत्री श्रीमती गुन्जन, सुपुत्र- डॉ. भानू अपने कार्यक्षेत्र के अलावा सामाजिक सरोकारों से जुड़े हैं।

पांगती जी के अपने घरेलू राग से ज्यादा सामाजिक आलाप रहे हैं। तभी तो उन्होंने अपने पूज्य पिता का स्मरण करते हुए अनमोल कृति समाज को दी। डा. आर.एस.टोलिया के साथ बार-बार चर्चा करते हुए इन्होंने डॉ.शेरसिंह पांगती को उचकाया कि प्राप्त कुछ दस्तावेजों पर कार्य हो। जोहार मिलन केन्द्र के सहयोग से सन् 2009 में दुर्गा सिटी सेन्टर हल्द्वानी में उस पुस्तक का विमोचन भी हुआ। वह केवल पुस्तक नहीं बल्कि एक ऐसा दस्तावेज है जो इतिहास के रूप में उन यादों को बताता है कि किस परिस्थितियों से हम जुड़े रहे और कैसे थे हमारे बुजुर्ग। इसके अलावा भी डॉ.पांगती की लगन समाज को जोड़ने के रूप में हमेशा से है जो सकारात्मक उर्जा देती है।
डॉ.पांगती अपने बचपन को याद कर कहते हैं- पिता शेरसिंह जी और माता श्रीमती रूकमणी देवी के शैशवकाल में दिवंगत होने पर चाचा लाल सिंह जी और चाची श्रीमती उखा देवी का साया हमारे उपर था। पिता स्व.शेर सिंह पांगती के बारे में बचपन से ही खूब सुना था कि वह तिब्बत में डाकुओं का पीछा करते हुए काश्मीर गये और वहाँ से कई फोटो लाए थे। चिकित्सकीय शिक्षा पूरी कर पांगती जी राजकीय अस्पतालों में कार्यरत थे, एक बार अवकाश में अपने घर मुनस्यारी गये तो एक लिफाफा दिखा जिस पर देवनागिरी लिपि में चाचा जी का नाम-पता लिखा था। इस लिफाफे में 50 पेज का अग्रेजी में लिखा आलेख था। पूछने पर चाचा जी ने बताया कि कुछ वर्ष पूर्व एक जर्मनी नौजवान मुनस्यारी आया था उसने दाज्यू बडे़ भाई स्व.शेर सिंह के बारे में पूछताछ की, उसी ने भेजा है।
यहीं से डॉ. पांगती को पिता जी का वह सूत्र पता चला जो शैशवावस्था में वह पिता के जाने के बाद नहीं जान पाये थे कि उनके पिता कैसे जो थे। लिफाफे में ग्रेपा का आलेख कई बार पढ़ने के बाद पांगती जी ने तय कर लिया कि अपने बुजुर्गों की इस याद को वह संजोयेंगे और शोधर्थी ग्रेपा का धन्यवाद किया कि उसने खोज में उनके पिता के बारे में जानकारी पुष्ट की। डॉ.पांगती ने ने अपनी पत्नी जया जी के साथ निश्चय किया किया कि जर्मनी से आकर ग्रेपा ने जिस कार्य को खोजा उसे सार्वजनिक किया जाए, इसके लिये ग्रेपा और ब्रिटिश लाइब्रेरी से स्वीकृति भी ले ली। इस कार्य में डॉ.शेरसिंह पांगती का योगदान भी रहा।
भारत-तिब्बत व्यापार विषय को लेकर पिघलता हिमालय बराबर रोचक जानकारी देता रहा है। सन् 1941 में कज्जाकी लुटेरों द्वारा तिब्बत में जोहार (भारतीय व्यापारियों) का सामान लूटने तथा व्यापारी शेरसिंह पांगती द्वारा उन लुटेरों का पीछा किये जाने की घटना कम रोचक नहीं है। ग्रेपा के शोध में भी यह कहा गया कि 1980-90 के दशक तक इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी तथा कज्जाकी लुटेरों से पीड़ित व्यापारी जीवित थे। जिनकी सहायता से वह सम्पूर्ण घटनाओं से अवगत हो सका। ग्रेपा ने म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) से अपना पंजीकरण करा कर दो-तीन वर्षों तक मुनस्यारी, थल और हल्द्वानी स्थित जोहार के तत्कालीन तिब्बती व्यापारियों से सम्पर्क स्थापित किया। साथ ही धरमशाला (हिमांचल प्रदेश) स्थित म्यूनिख यूनीवर्सिटी (जर्मनी) और ब्रिटेन के इण्डिया आफिस लाइब्रेरी आदि स्थानों से इन कज्जाकियों के सम्बन्ध् में महत्वपूर्ण अभिलेख उपलब्ध् करने में अथाह परिश्रम किया।
इसी शोध प्रबन्ध् का उल्लेख करते हुए हुए डॉ.पांगती बताते हैं- भारत की आजादी से पूर्व अथवा तिब्बत का चीनी प्रशासन के अधीन आने से पहले भारत और तिब्बत दो देशों के इस सीमावर्ती क्षेत्र में निवास करने वालों के बीच सदियों से जो व्यापारिक सम्बन्ध था, उन सम्बन्धें का विश्वसनीय रूप में परिपालन करते हुए ये व्यापारी अपनी बेशकीमती व्यापारिक वतस्तुएं इन तिब्बती मित्रों के पास अथवा बौद्ध मठों में छोड़ आते थे और यह सामान सुरक्षित रहता था। तिब्बती लोग अपने इन भारतीय मित्रों को धेखा देना महान पाप समझते थे परन्तु मध्य एशिया के जिस खानाबदोस समुदाय ने लूटमार करना अपना व्यवसाय बना लिया हो, उनके लिये तिब्बत जैसे असहाय और शान्तप्रिय देश में लूटमार करना कोई असम्भव कार्य नहीं था। यहीं से लूट मचना आरम्भ हुआ।

अगस्त 1941 में इन कज्जाकी लुटेरों ने तिब्बत के उत्तरी पठारी मैदान च्यांग-थांग से लूट शुरू करते हुए कैलास मानसरोवर के निकटवर्ती क्षेत्र में प्रवेश किया। इनके भय से शौका (भारतीय व्यापारियों) ने भी अपना सामान तिब्बती मित्रों के पास रखकर जान उचित समझा। लेकिन कज्जाकी जुटेरे तो सिर्पफ लूट जानते थे। इन्होंने जोहार के 43 व्यापारियों का लगभग 41 हजार रुपये का सामन लूट लिया, जिसमें राम सिंह रतन सिंह नाम के एक व्यापारिक फर्म का सबसे अधिक 13 हजार रुपये का सामान लूटा गया था। इन कज्जाकियों द्वारा लूटा गया सामान वापस प्राप्त करने के लिये इस फर्म के साहसी व्यापारी शेर सिंह पांगती ने कठिनाईयों का सामना करते हुए पीछा किया। बौद्ध धर्म के अनुयायी तिब्बती लोगों को सता रहे कज्जाकियों का आतंक जब अति हो गया था गरतोक के गरपन राज्यपाल ने इनकी रोकथाम व लूटे गये सामान को वापस प्राप्त करने की आशा से काश्मीर सरकार के अध्किारियों से निवेदन किया और स्वयं सेना के साथ पश्चिम की ओर प्रस्थान किया। साथ में जोहार के व्यापारी शेरसिंह पांगती भी थे।
कज्जाकियों ने काश्मीरी सेना की टुकड़ी पर हमला कर दिया परन्तु उन्हें पीछा हटना पड़ा। इस बीच ब्रिटिश रेजीडेन्ट से काश्मीर सरकार को पत्र प्राप्त हुआ कि भारत सरकार कज्जाकियों की गतिविधियों की पूर्ण जानकारी के बिना तिब्बत की सीमा के अन्दर अपनी सैनिक टुकड़ी भेजने की अनुमति नहीं देना चाहती है। इसके लिये शीत के दिनों में लद्दाख में वार्ता की जा सकती है। अक्टूबर में चार जोहारी व्यापारी चुसूल पहंुचं। शिविर में 40 सिपाहियों ने दमचौक के लिये प्रस्थान किया। चमचौक पहुंचकर उन्हें वहाँ की टुकड़ी को मजबूत करना था।
कज्जाकियों की ये कहानी बहुत लम्बी और रोचक है (फिर कभी)। फिलहाल पांगती जी की यादों को सलाम करते हुए बताते हैं- कज्जाकियों द्वारा लूट कर ले जाये गये सामान को प्राप्त करने के लिये शेर सिंह पांगती की भाँति गरतोक का गरपन भी तिब्बत सेना के साथ दमचौक तक गया था परन्तु कज्जाकियों के आत्मसमर्पण करने के पश्चात भी जब उन्हें कुछ भी प्राप्त न हो सकता तो मन मारकर वापस लौटते समय गरपन ने कज्जाकियों द्वारा छोड़े गये 600-700 भेड़-बकरियाँ एक आना 12 आने की दर से जोहार के व्यापारी मेघ सिंह, मानी सिंह को बेची, जो जोहार पहँुचने तक 400 ही रह गई थी। शेर सिंह पांगती ने पं.गोविन्द बल्लभ पन्त सहित तमाम बड़े नेताओं से मिलकर लूटे सामान को वापस लाने का यत्न किया लेकिन असेम्बली के 16 फरवरी 1962 की वार्ता में भाग लेते हुए गोविन्द वी देशमुख के प्रश्न के आधार पर जिन व्यक्तियों के सामान की क्षति हुई, उसके भुगतान के लिये सरकार निश्चय कर चुकी थी। परन्तु औलफ कारो ने घोषणा की कि कज्जाकियों ने जिन व्यक्तियों का सामान भारत से बाहर चुराया है, उन्हें किसी प्रकार की क्षतिपूर्ति नहीं दी जा सकती है। सीध सा अर्थ था कि तिब्बत यानी देश से बाहर लूट के लिये तत्कालीन ब्रिटिश भारत सरकार ने किसी प्रकार अपना उत्तरदायित्व नहीं समझा। सवाल आज भी बना हुआ है जिसे एक जोहारी व्यापारी ने लड़ा था।