
दीवान सिंह धर्मशक्तू से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
इस समय भारत-चीन स्थलीय व्यापार को लेकर बराबर समाचार आ रहे हैं और कोरोना काल के बाद फिर से व्यापार शुरू होने की खुशी भी है। व्यापार का यह पूरा तरीका व्यवहार से ज्यादा प्रतीकात्मक लगता है। व्यापार के उन दिनों को याद कर कम्पन होने लगती है जब पैदल दुर्गम रास्तों से होकर भारत-तिब्बत व्यापार की परम्परा संस्कृति का हिस्सा बन चुकी थी। इस व्यापार में अपने मित्रों से मिलने की ललक और अपने पुस्तैनी कार्य को बनाये रखने की लालसा थी। इस यात्रा और व्यापार में वह खतरा भी था जो किसी भी कालखण्ड में रहा है, जैसे- चट्टान गिरना, प्रकृति का प्रकोप, लुटेरों का आतंक।
ऐसी ही एक सच्चाई जोहार के व्यापारी रतन सिंह उर्फ डोगनच्यू के जीवन में घटी। ‘डोगनच्यू’ को तिब्बत भाषा में वीर बहादुर लड़ाकू कहा जाता है। उस समय ज्ञानिमा मण्डी में डाकुओं का आतंक मचा हुआ था। इनका लीडर ‘नकचंग डोक्यू’ था। एक दिन इनके गिरोह ज्ञानिमा मण्डी में चढ़ाई कर दी, ऐसे में गरपन के सारे सिपाही दुबक गये। व्यापारी डर हुए थे। तब रतन सिंह जी ने जाकर लुटेरों के लीडर के घोड़े की लगाम पकड़ ली, अंगूठा खड़ा किया तो वह घोड़े से उतर गया। इसके बाद तिब्बती में उनकी बात हुई और ‘लकचंग डोक्यू’ अपने गिरोह के साथ वापस लौट गया। इस घटना के अगले साल तिब्बत में खम्पा (लड़ाकू जाति) ने लुटेरों के लीडर को मार डाला और उसकी गर्दन काटकर लटका दिया और हर आने-जाने वाला उसमें थूकता था क्यांेकि उसके आतंक से सभी त्रस्त थे। अपने दादा/बूबू की इस वीरता भरी कहानी को उनके कुनबे अलावा सभी जानते हैं। इनके परिवार के 89 वर्षीय दीवान सिंह धर्मशक्तू से आज की बातचीज प्रस्तुत है। इसी क्रम में इनके परिवार के बारे में कुछ और जानकारी प्रस्तुत है। रतन सिंह जी के सुपुत्र भीम सिंह थे। इनके चार पुत्र हुए- दीवान सिंह, केदार सिंह, देवेन्द्र सिंह, राम सिंह। इनमें से राम सिंह जी का असमय निधन हो गया। दीवान सिंह की अगली पीढ़ी में संजय सिंह, नीमा (जंगपांगी), मंशा (रावत), शीलू (जंगपांगी)। केदार सिंह के परिवार में गुड्डी (लस्पाल), पूजा (टोलिया), रोजी धर्मशक्तू। देवेन्द्र सिंह के परिवार में धीरेन्द्र सिंह, लीला, वीरेन्द्र सिंह हैं।
दीवान सिंह धर्मशक्तू का जन्म 1938 में मिलम में हुआ। इनके पिता भीम सिंह तिब्बत व्यापार के परम्परागत कार्य में माहिर थे और व्यापार के दिनों तिब्बत में ही बीमारी के कारण उनका निधन हो गया था। इनकी माता श्रीमती हरकी देवी गृहणी के अलावा अपने कुटीर उद्योग में कुशाग्र थीं।
दीवान सिंह का बचपन भी माइग्रेशन की उस व्यवस्था मंे बीता जब पूरा कुनबा मौसम के अनुसार इधर से उधर जाता और बच्चों की पढ़ाई होती। बचपन की पाठशाला के बाद मुनस्यारी से शिक्षा करने के बाद अल्मोड़ा से आईटीआई में प्रवेश लिया और सर्वेयिंग में डिप्लोमा कर एक वर्ष यूपी पीडब्लुडी में रहे। इसके बाद 25 मार्च 1963 को बीआरओ इनकी नियुक्ति हो गई। सीमा सड़क संगठन बीआरओ कीे नौकरी में दीवान सिंह जी को अरुणांचल, भूटान, लाहौल- स्पीति आदि जगह सर्वेक्षण की जिम्मेदारी निभाई। भूटान में रहते उन्हें रानी के निवास स्थान तक पक्की रोड का कार्य सर्वे का मौका भी मिला। वहाँ की रानी जिस जगह रहती उसे ‘गुम्फा’ कहते हैं, वहाँ खूब सजाया हुआ था। रोड कार्य पूर्ण होने के बाद एक दिन रानी ने बुलाया और नमकीन चाय पिलाई। दीवान सिंह जी कहते हैं- ‘चूंकि हम लोग नमकीन चाय पीने के आदी हैं तो वहाँ भी मक्खन डाली हुई नमकीन चाय की स्वाद खूब था।’ बचपन खेल से लेकर बीआरओ में रहते सेवा को रोमांच मानकर जीने वाले दीवान सिंह जी सामाजिक कार्यों में भी हमेशा अग्रणीय रहे हैं। शिव मन्दिर जोहार नगर हल्द्वानी के पास इनका आवास है और परिवार में श्रीमती गंगोत्री देवी सहित परिजन हैं। अपनी नौकरी के दौरान पड़ाव में इन्होंने अपना आशियाना बना लिया था। वह बताते हैं कि सामाजिक कार्यों में सक्रियता के लिये ‘जोहार मिलन केन्द्र’ बनाया गया, इसकी शुरुआत के लिये सबसे पहले स्व.कल्याण सिंह पांगती ने एक लाख रुपये देकर समाज को उत्साहित किया। आज यह बहुउद्देशीय स्थान सबके लिये सुगम है।
