मापांग में नदी का रुख बदलने और मिलम में दूधपानी लाने वाले थे धरम राय

उत्तम सिंह पांगती से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती

अक्सर हम यादों की बारात में सात समन्दर पार जैसी बातें करने लगते हैं और अपने आस-पास के उन महानुभावों को भूल जाते हैं जिनका योगदान समाज के लिये बुनियाद रहा है। ऐसे कर्मठ, दानियों व प्रेरणादायी जनों का स्मरण बराबर होना चाहिये। ऐसे ही महान जन सेवक रहे हैं- ‘धरम राय’। मापांग में नदी का रुख बदलने और मिलम में दूधपानी लाकर समाज के लिये अपने को समर्पित करने वाले ध्रम राय जी के बारे में उनके परिवार के रिटा.जज श्रीमान उत्तम सिंह पांगती के साथ आज की यह बातचीत है। अपने बुजुर्गों की ठेठ परम्परा पर चलने वाले 86 वर्षीय उत्तम सिंह जी से उन दिनों की याद सुनना भी अद्भुत लगता है जब वह पढ़ाई की धुन में इलाहाबाद चले गये। बातचीज का सिलसिला आगे बढ़े, इससे पहले इनके बारे में बता दें।
1889 में मिलम में जन्मे धरमु सिंह की उनकी समाजसेवा देखते हुए समाज ने ‘राय’ पदवी का सम्मान दिया। इनका विवाह क्वीटी के रावत घराने में हुआ था परन्तु अल्पायु में
श्रीमती जी की मृत्यु होने पर दूसरा विवाह वहीं से दलीप सिंह रावत की पुत्री से हुआ। एक पुत्री भी हुई लेकिन जन्म के शिशुकाल मेें ही मृत्यु हुई। दूसरी ओर दूसरी पत्नी का भी अल्पायु में निधन हो गया। जनसेवी धरम राय अपने दुःखों को अपने में ढोते हुए इन माँ-बेटी की याद में सगमों में एक धर्मशाला का निर्माण किया। तिब्बत व्यापार से जुड़े अपने पुस्तैनी कार्य के कारण इस शौका परिवार में फिर से विवाह का दबाव था क्यांेकि धरम सिंह की भी उम्र कम ही थी और परिवार संचालन में महिलाओं का योगदान प्रथम है। इस प्रकार इनका तीसरा विवाह गुलरे के मान सिंह मर्तोलिया की पुत्री द्योमती से हुआ। इस दम्पत्ति ने अपनी परम्पराओं को सींचा और समाज की जिम्मेदारी भी निभाई। इनके चार पुत्र बाला सिंह, खड़क सिंह, गोविन्द सिंह और उत्तम सिंह और चार पुत्रियां- देवी (धर्मशक्तू), दानी(बृजवाल), गंगोत्री (जंगपांगी), कौशल्या/कोसी (रावत) हुए।
बाला सिंह जी की अगली पीढ़ी मेे वीरेन्द्र सिंह, ईश्वर सिंह, दीक्षा (धनी) और लक्ष्मी हैं। खड़क सिंह जी के बाद पीढ़ी में डॉ.हरीश, पुत्रियां ललिता, सुमन, बीना व रेखा हैं। गोविन्द सिंह जी के आगे पीढ़ियों में पुत्र सतीश सिंह, पुत्रियां गीता, हीरा, जानकी, अनीता व किरन हुए। इसी प्रकार उत्तम सिंह जी के बाद पीढ़ी में सुपुत्र शैलेन्द्र, सुपुत्री सीमा (बृजवाल) केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षिका हैं।
दूरदृष्टि धरम राय ने तिब्बत व्यापार समाप्ति के समय 1962 में मल्ला घोरपट्टा में 15 नाली जमीन खरीद के बाद अपने परिवार को वहाँ शिफ्ट किया। अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिये दिल्ली कलकत्ता दूरदृष्टि धरम राय ने तिब्बत व्यापार समाप्ति के समय 1962 में मल्ला घोरपट्टा में 15 नाली जमीन खरीद के बाद अपने परिवार को वहाँ शिफ्रट किया। अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिये दिल्ली कलकत्ता तक सम्पर्क बनाए रखा। हल्द्वानी रामनगर के बनियों से भी उनकी प्रगाढ़ता रही। अपने कारोबार में उन्होंने परिवार के सदस्यों सहित कई अन्य लोगों को शामिल कर लिया। इस पूरे व्यापारिक तन्त्रा के बीच भी शिक्षा के प्रति उनकी जागरुकता ही थी कि बच्चों को शिक्षित बनाने में आगे रहे।
उत्तम सिंह जी अपने बचपन की यादों में लौटते हुए कहते हैं- 1941 में मिलम में जन्म लेने से वही सब देखा जो सीमान्त के तत्कालीन बात-व्यवहार में समाया था। तिब्बत व्यापार के उन दिनों में सारे परिवार सक्रिय रहते। पिता जी की धार्मिक कार्यों में रुचि होने से वह कैलास यात्रियों के सहयोग के लिये तत्पर रहते थे। मौसम के अनुरूप माइग्रेशन में पूरा परिवार मिलम-दरकोट-भैंसखाल रहता। इसी अनुसार बच्चों की पढ़ाई होती थी। कक्षा पाँच की बार्ड परीक्षा कव्वाधार हुई। नमजला से हाई स्कूल किया। बोर्ड का सेन्टर काण्डा (बागेश्वरद्) हुआ करता था। मुनस्यारी से दो दिन में काण्डा पहँुचते थे। इस पैदल यात्रा में पढ़ने वाले युवा कमरा किराये पर लेकर रहते, एक कमरे में चार लोग लैम्प जलाकर पढ़ते थे। पढ़ाई की धुन में लैम्प बीचों बीच रखा जाता और रातभर पढ़ते। 1957-58 में अल्मोड़ा फिर इलाहाबाद जाना हुआ। वहाँ भी पढ़ाई की यही धुन थी। पठन-पाठन का माहौल मिला तो दिन-रात एक कर दिया। उस समय के मनोहर पांगती आईएएस, कल्याणसिंह मर्तोलिया सीबीआई, लक्ष्मण सिंह जंगपांगी व्यवसाय क्षेत्र में अग्रणीय रहे हैं। उत्तम सिंह जी एलएलबी करने बाद कुछ वर्षों तक सहायक अभियोजना अधिकारी रहे। उसके बाद न्यायिक सेवा में प्रवेश किया और अतिरिक्त जिला जज के पद से सेवानिवृत्त हुए। वे उच्च न्यायिक सेवा में चयनित होने वाले पहले शौका हैं। इनका विवाह कारखेत बाला सिंह मर्तोलिया की सुपुत्री गंगोत्राी जी से हुआ। वर्तमान में जोहार नगर, भोटिया पड़ाव हल्द्वानी में निवासरत हैं। हल्द्वानी के पुराने बाशिन्दे होने के अलावा पिघलता हिमालय परिवार से इनकी बेहद घनिष्ठता है। पांगती जी बताते हैं- मुन्सिपफ मजिस्ट्रेट की पोस्टिंग के समय भोटिया पड़ाव क्षेत्र में प्लाटिंग हो रही थी, तब आधा बीघा ले लिया। अपनों के बीच रहते हुए बचपन की खट्टी-मीठी यादों के साथ जज साहब हमेशा उर्जावान बातें करते हैं। उनका मानना है जब हम सकारात्मक कार्य और सोच रखते हैं तो इससे अपनी संस्कृति और संस्कार को पोषित कर सकते हैं।
इनकी यादों में बचपन का देखा और बुजुर्गों से सुना वह सबकुछ है जो नई पीढ़ी के लिये आश्चर्यजनक कहानी होगी। किन कठिन परिस्थितियोें में पिता धरम राय अपने परिवार को जोड़े रखा। सीमान्त से लेकर भाबर तक अपने बड़े भाई तेजू के के साथ धरमु (धरम राय) कार्य योजना बनाते और जनहित के कार्य भी करते। वैद्यों से सम्पर्क कर दवा व जड़ी बूटी अपने पास रखते और दूरस्थ क्षेत्र में स्वास्थ्य कारणों से परेशान लोगों को इसका वितरण करते और परामर्श देते। स्वयं के खर्चे पर उन्होंने यात्रा मार्ग व पुलों के सुधार का कार्य करवाया। तल्ला जोहार में रामगंगा नदी के पश्चिम में लाचुली के दूसरी ओर रमारी की चढ़ाई में पानी की कमी देखते हुए धरम राय जी ने बांखरधार में अपने खर्चे पर एक प्याउ लगाया, जहाँ यात्रियों को पानी पिलाने के लिये एक आदमी नियुक्त किया। इसी प्रकार मापांग की रोड बनाने के बाद अपनी ओर से चना औरे चाय का इन्तजाम किया ताकि यात्रियों को इस दुर्गम में कुछ राहत मिल सके। (जोहार का जनसेवक, श्री गजेन्द्र सिंह पांगती की कृति में विस्तार से दिया गया है।)
धरम राय जी के बंशज अपने-अपने तरीके से समाजिक कार्यों में पुरजोर जुटे हैं, इन सबके प्रेरणापुंज के कार्यों का उल्लेख जरूरी है। धरम राय ने अपने समय में कुछ ऐसे कार्य किये जो असम्भव लगते थे। मापांग में सड़क निर्माण और मिलम में गोरीगंगा पार से पानी (दूधपानी) लाना ऐसे ही कार्य हैं। जब मुनस्यारी मिलम मार्ग खुला तो एकदम खड़ी चट्टान के पास गोरीगंगा का बहाव डरावना लगता था। नदी के पुल बनाकर जैसे तैसे यात्रा की जाती थी। उन दिनों में अपने बलबूते दुस्साहसिक कार्य करने का निर्णय धरम राय ने लिया और सीढ़ीनुमा रास्ता बनाया ताकि आने-जाने में खतरा न हो। साधनों के अभाव में भी उन्होंने कार्य करने वाले श्रमिकों का गैंग बनाया और अथाह धनराशि खर्च कर नदी की धरा बदलने का कार्य करते रहे। अपने जुनून में रहने वाले धरम राय की ख्याति उनके कार्यों से दूर-दूर तक फैली।
जब कोई जनहित कार्य होता है एकाएक कईयों के समझ में नहीं आता है। ऐसा ही धरम राय जी के समय भी हुआ। दूध की तरह दिखाई दे रही जल धारा को मिलम में लाने की इच्छा रखने वाले धरम राय ने पांगती कचहरी में इस बारे में बराबर चर्चा की। स्वयं का धन खर्च करते हुए थांगची मैदान तक गूल बनाई गई। इस प्रकार दूध की तरह स्वच्छ व मीठा जल लाने में वह सफल हो गये। पचास के दशक में जब आज की तरह संसाधनों का आभाव था, इस प्रकार के बड़े कार्यों को निस्वार्थ रूप से करना किसी पुण्यात्मा के बस की ही बात थी। बचपन की देखी-सुनी को याद करते हुए उत्तम सिंह पांगती जी बताते हैं- गाँव में पानी आने का जश्न बच्चों के लिये भारी कौतुहल था। वाकेई जज साहब की देखी-सुनी परिवार की घटना मात्रा न होकर समाज के लिये प्रेरणा है।

दोनहरिया तक बीहड़ था और गौला तक की आवाज आती थी

महेश पांगती से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
हल्द्वानी महानगर के रूप में फैलता जा रहा है लेकिन इसके शुरुआती दिनों में को देखें तो पता चलता है कि किस प्रकार हल्दू के पेड़ से इसका नाम हल्द्वानी पड़ा। (हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से पुस्तक में है इतिहास) इसी हल्द्वानी के भोटिया पड़ाव क्षेत्र में शौका समुदाय का सबसे पहला परिवार डीएफओ हीरा सिंह पांगती जी का आया था। वर्तमान की चकाचौंध में हर कोई पगड़ी पहने सड़कों पर नाच रहा है लेकिन शहर, आदमी और यात्राओं की वह सच्चाई उस दौर में झांकने से पता चलती है। असल में बीहड़ जंगल से घिरा हल्द्वानी भाबर क्षेत्र चारों ओर से आने वालों का केन्द्र बना। सीमान्त क्षेत्रा के शौका समुदाय के बड़े व्यापारी महिमन सिंह पांगती ने एक बंगला बनाया था। ह्यून (जाड़ों) के दिनों में आने वाले जगह-जगह अपना ठहराव स्थल देखते थे, हल्द्वानी भी मुख्य पड़ाव बन चुका था। व्यापारी महिमन सिंह जी के सुपुत्र हुए हीरा सिंह पांगती जी। उस दौर के डीएफओ साहब का मायने ही विराट था। इनके सुपुत्रा हुए- हमेन्त सिंह, महेश सिंह, भूपेन्द्र सिंह, गगन सिंह।
आज की बातचीत श्री महेश पांगती के साथ ही है। वह बताते हैं कि दादा महिमन सिंह के समय ही हल्द्वानी मं 1938 में मकान बन चुका था। जाड़ों में रहने के लिये इस स्थान को चुना गया। बंगले के अलावा आठ बीघा जमीन इसमें थी। दादा जी का सीमान्त में व्यापार था लेकिन उन्होंने गरुड़ में अपना कारोबार शुरू कर दिया। पचास के दशक में गरुड़ क्षेत्र में भी बड़ा कारोबार था। हल्द्वानी व अन्य जगहों के लिये उनके ट्रक आते थे। 1970 में स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने गरुड़ का कारोबार समेट कर हल्द्वानी मंे रहना शुरु कर दिया।
महिमन सिंह जी के सुपुत्र हीरा सिंह जी एसडीओ नन्धौर, कोटद्वार तमाम जगह रहे। पिता के साथ जंगलों की खूब सैर महेश पांगती जी ने की है। सैलापानी, रामनगर, ढिकाला, गढ़वाल, लालढांग चारों ओर घूमने की यादों के साथ श्री महेश पांगती बताते हैं कि हल्द्वानी में हमारा बीस कमरों का बंगला था, जिसकी निचली मंजिल कमरे खाली थे और आने-जाने वालों का विश्रामस्थल भी। तब दोनहरिया तक बीहड़ था और गौला तक की आवाज आती थी। रात्रि में यह आवाज और भी भयंकर सुनाई देती थी। श्री पांगती बताते हैं की भोटिया पड़ाव में उनके परिवार के बाद धीरे-धीरे लोगों का आना शुरु हुआ। पहले शंकर मामा, मंगल मामा आए। उस दौर में किसी नेपाली कब्जेदार की बहुत चर्चा थी। बाद में उसे हटाया गया। दोनहरिया के अलावा अन्य जगहों पर पर भी जंगल होने से आबादी कम थी।
अपने बचपन के दिनों की यादों में खोते हुए श्री महेश पांगती बताते हैं पिता का ज्यादातर जंगलात सम्बन्धी दौरा होता रहता था, माता श्रीमती सरस्वती पांगती घर की व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखती थीं। एमबी कालेज घर के बगल में होने से हम भाईयों की शिक्षा यहीं से हुई। कालेज में ‘त्रिवेणी छात्रावास’ के 5 कमरे थे, जिसमें बाहर से आकर छात्र रहते थे। मैदान में फुटबाल खेलते थे और फल-फूलों के पेड़ों की हरियाली थी। एमबीपीजी कालेज से ही बीएससी करने के बाद महेश जी ने जेएनयू में प्रवेश लिया। इस बीच बैंकिग सेवा में जुड़ गये। पंजाब नेशनल बैंक में लम्बी सेवा के बाद 2017 में जनरल मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हुए। 5 साल तक महाप्रबन्धक रहे पांगती जी की सेवाएं मेरठ व दिल्ली में भी रही हैं। उत्तराखण्ड के महानगरों में गिने जा रहे हल्द्वानी की वर्तमान चकाचौंध से पहले इसकी बुनियाद को जानना हो तो पांगती जी के परिवार का चर्चा होना ही है। इनके परिवार में पत्नी श्रीमती ईला पांगती हैं। जबकि सुपुत्र मोहनीस और रजत अपने कार्यसफर में हैं।

जसमलसिंह-मंगलसिंह दरकोट में थी सबसे बड़ी फर्म

डॉ. पंकज उप्रेती
आज बाजार का स्वरूप बदल चुका है, ऑनलाइन कामकाज भी होने लगे हैं। कल्पना कीजिए उस दौर की जब आने-जाने के रास्ते बीहड़ थे और सामान ढुलान के लिये पशुओं का ही सहारा था। उन स्थितियों में दुर्गम क्षेत्र में कोई फर्म चलाना और लाखों की उधारी फंसी होने के बावजूद हंसते हुए झेलना। साथ ही प्रकृति से तालमेल बनाये रखते हुए व्यापार का तिब्बत से लेकर तराई तक सामंजस्य साधारण बात नहीं है। इस तरह के हालातों में जन्म लेने वाले डॉ. कुन्दन सिंह पांगती जी से आज की विशेष बातचीज है। डॉ. पांगती उस पीढ़ी में से हैं जिन्होंने अपनी आँखों से यह व्यापार और व्यवहार देखा है। यह प्रसंग आगे बढ़े इससे पहले पहले इनके बारे में बताते हैं- डॉ.पांगती के दादा हुए चन्द्र सिंह पांगती। चन्द्रसिंह जी रायबहादुर किशन सिंह के साथी थे। चन्द्र सिंह जी तीन भाई थे, जसमल सिंह, चन्द्र सिंह और मंगल सिंह। चन्द्रसिंह पांगती के सुपुत्र हुए बाला सिंह। पिता के निधन के बाद माता श्रीमती हेमा देवी पर बालासिंह की बड़ी जिम्मेदारी थी। उस दौर में घर के इकलौते बालक को देखते हुए जल्द ही इनका विवाह डोटिला की हरकी देवी से हुआ। ;स्व.हरकी देवी पांगती निधन 101 वर्ष की में इसी साल रविवार 26 अप्रैल 2026 को हुआ। (पिघलता हिमालय ने उनकी जीवनी पर काफी जानकारी दी है।) इनका संयुक्त परिवार मिलम दरकोट और भैंसखाल तक माइग्रेशन व्यवस्था में आवत-जावत करता रहा है। मुनस्यारी के दरकोट में जसमलसिंह-मंगल सिंह सबसे बड़ी फर्म हुआ करती थी। बालासिंह-हरकी देवी के पुत्र हुए कुन्दन सिंह, जिनका जन्म जनवरी 1947 में भैंसखाल में हुआ।

कुन्दन सिंह जी अपने बचपन के दिनों और बुजुर्गों को याद करते हुए बताते हैं- ‘भैंसखाल में जन्म के समय उन्हें मन्दिर में दिया गया और फिर उन्हें माता-पिता को सौंपा, क्योंकि इनके जन्म से पहले दो बच्चों के न बचने पर सहमे परिवार ने मन्दिर में सुपुर्द कर भगवान का आशीर्वाद चाहा। बचपन में इनका नाम गिरधर रखा गया। बाद में कुन्दन कहने लगे। इस प्रकार कोई गिरधर तो कोई कुन्दन कहता।’ इनके बाद भाई-बहनों में दमयन्ती (वृजवाल), चन्द्रा (मर्तोलिया), नवराज पांगती, कवीन्द्र पांगती हुए। इस प्रकार संयुक्त परिवार में यह सारे सदस्य भी थे।
बचपन की यादों को आगे बढ़ाते हुए डॉ. कुन्दन बताते हैं कि तिब्बत व्यापार बन्द होने से इसमें लगे लोगों की आर्थिकी खराब होने लगी थी। व्यापारियों की काफी पूंजी तिब्बत में फंसी रह गई। तब दरकोट में परिवार की फर्म ‘जसमलसिंह- मंगलसिंह’ मुख्य केन्द्र होता था। दूर-दराज से सभी लोगों को इसका आसरा था। फर्म के लिये काशीपुर से सुदामा लाल रामआश्रय, हृदयनाराण फर्म से कपड़ा आता था। इसी प्रकार हल्द्वानी की फर्म लालमणि खीमदेव से तम्बाबू सामग्री आती थी। सामान लाने के लिये पशुओं का समूह था। भेड़-बकरी भी दो प्रकार के होते हैं। 80-90 लक्खा थे और 500 से अधिक बकर। लक्खा तो सामान ढोने के लिये लगाए जाते थे और बकर अद्योली में देते थे। बकर ले जाने के लिये रिलकोटी जी, धपवाल जी और एक बसन्तकोट के थे। इसी तरह खच्चरों की देखरेख में धारचूला के श्रीराम कुटियाल और तिंकर के दिलीप सिंह भी थे। कपड़ा इत्यादि बड़ा सामान ढोने के लिये खच्चरों का उपयोग होता था। तिकसैन में पुराना ‘हयात सिंह होटल’ मशहूर हुआ करता था। डॉ.कुन्दन सिंह के पिता बाला सिंह की पधानचारी को आज भी लोग याद करते हैं। दरकोट ग्राम के लम्बे समय तक प्रधान रहे। इसके नाते भी दरकोट में दूर दराज से लोगों का जमावड़ा रहता था।
कुन्दन सिंह कक्षा 5 तक मिलम-दरकोट में पढ़ाई करने वाले बच्चों के दल में रहे हैं। तब इनके शिक्षक बासुदेव जी और बहादुर सिंह लस्पाल थे। कक्षा 5 बोर्ड परीक्षा का सेन्टर कव्वाधार में पड़ा था। मिलम जैसे सीमान्त क्षेत्र का प्राइमरी स्कूल भवन आज भी लोगों की कल्पना से परे हो सकता है। सुन्दर भवन, मुख्य द्वार, चाहरदीवारी, सुन्दर फुलवारी, फुटबाल के तीन मैदान इसमें थे। बैठने के लिये कुर्सियां। गुरुजनों के लिये बड़ी मेज। एकदम दूरस्थ में इतनी साज-सज्जा किस तरह हुई होगी। पांगती जी बताते हैं- तिकसैन का स्कूल तक नमजला में हुआ करता था। नमजला से तिकसैन बच्चों की टोली पेड़ लगाने जाती थी और घिंघारू की झाड़ से बाउण्ड्री लगाते थे। गुरुजनों की देखरेख में कालेज का सारा सामान बच्चों ने ही तिकसैन में ढोया था। छात्रावास में रहकर पढ़ाई करते थे। भोजन व्यवस्था के लिये धन सिंह कुक था। बारी-बारी से लड़के अपने घर से राशन लाते और सभी के लिये भोजन बनता था। इस प्रकार इण्टर विज्ञान का प्रथम वैच कुन्दन सिंह व साथियों का रहा। उस दौर के गुरुजनों में श्री पी.सी. पन्त एवं श्री पूरन चन्द्र पन्त जैसे विद्वान थे जिन्होंने छुट्टियों के दिनों में छात्रों को अपने घर बुलाकर तक पढ़ाया।
बचपन की इन तमाम यादों के साथ कुन्दन सिंह जी ने मेरठ मेडिकल कालेज और इलाहाबाद से पीजी किया। संयोग से टेªनिंग के लिये अल्मोड़ा आना हुआ लेकिन भाग्य में रेलवे की नौकरी थी। भारतीय रेलवे के मेडिकल में इनकी पोस्टिंग हुई। बनारस में सर्वाधिक समय 30 साल ईएनटी विशेषज्ञ के रूप में सेवा करने वाले डॉ. कुन्दन सिंह पांगती चार साल इंचार्ज रहे और अवार्ड भी मिला। दीवान सिंह टोलिया जी की सुपुत्री कुसुम जी के साथ इनका विवाह हुआ (आर.एस. टोलिया जी की बहिन हैं)। डॉ.पांगती की सफलता में श्रीमती कुसुम जी का योगदान बराबर रहा है। इनकी सुपुत्रियां रिचा, रौनी, रुचिरा भी मेडिकल क्षेत्र में योग्य हैं।
डॉ. पांगती बताते हैं- नौकरी के शुरुआती दौर में तब लखनउ से दो कोच चलती थी। टनकपुर तो रेलवे का मुख्य स्टेशन हुआ ही, चकरपुर ससुराल भी। ऐसे में बनारस से रेल का सफर पहाड़ से जोड़े रखने वाला ही था। रेलवे की ओर से मिलिट्री कैम्प का अवसर भी लगातार रहा और इन्हें मेजर पदनाम दिया गया लेकिन चिकित्सक के रूप में इन्होंने हमेशा डाक्टर पदनाम को ही सर्वोपरि रखा और सेवानिवृत्त होने के बाद भी चिकित्सा परामर्श के लिये तत्पर हैं।