
महेश पांगती से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
हल्द्वानी महानगर के रूप में फैलता जा रहा है लेकिन इसके शुरुआती दिनों में को देखें तो पता चलता है कि किस प्रकार हल्दू के पेड़ से इसका नाम हल्द्वानी पड़ा। (हल्द्वानी: स्मृतियों के झरोखे से पुस्तक में है इतिहास) इसी हल्द्वानी के भोटिया पड़ाव क्षेत्र में शौका समुदाय का सबसे पहला परिवार डीएफओ हीरा सिंह पांगती जी का आया था। वर्तमान की चकाचौंध में हर कोई पगड़ी पहने सड़कों पर नाच रहा है लेकिन शहर, आदमी और यात्राओं की वह सच्चाई उस दौर में झांकने से पता चलती है। असल में बीहड़ जंगल से घिरा हल्द्वानी भाबर क्षेत्र चारों ओर से आने वालों का केन्द्र बना। सीमान्त क्षेत्रा के शौका समुदाय के बड़े व्यापारी महिमन सिंह पांगती ने एक बंगला बनाया था। ह्यून (जाड़ों) के दिनों में आने वाले जगह-जगह अपना ठहराव स्थल देखते थे, हल्द्वानी भी मुख्य पड़ाव बन चुका था। व्यापारी महिमन सिंह जी के सुपुत्र हुए हीरा सिंह पांगती जी। उस दौर के डीएफओ साहब का मायने ही विराट था। इनके सुपुत्रा हुए- हमेन्त सिंह, महेश सिंह, भूपेन्द्र सिंह, गगन सिंह।
आज की बातचीत श्री महेश पांगती के साथ ही है। वह बताते हैं कि दादा महिमन सिंह के समय ही हल्द्वानी मं 1938 में मकान बन चुका था। जाड़ों में रहने के लिये इस स्थान को चुना गया। बंगले के अलावा आठ बीघा जमीन इसमें थी। दादा जी का सीमान्त में व्यापार था लेकिन उन्होंने गरुड़ में अपना कारोबार शुरू कर दिया। पचास के दशक में गरुड़ क्षेत्र में भी बड़ा कारोबार था। हल्द्वानी व अन्य जगहों के लिये उनके ट्रक आते थे। 1970 में स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने गरुड़ का कारोबार समेट कर हल्द्वानी मंे रहना शुरु कर दिया।
महिमन सिंह जी के सुपुत्र हीरा सिंह जी एसडीओ नन्धौर, कोटद्वार तमाम जगह रहे। पिता के साथ जंगलों की खूब सैर महेश पांगती जी ने की है। सैलापानी, रामनगर, ढिकाला, गढ़वाल, लालढांग चारों ओर घूमने की यादों के साथ श्री महेश पांगती बताते हैं कि हल्द्वानी में हमारा बीस कमरों का बंगला था, जिसकी निचली मंजिल कमरे खाली थे और आने-जाने वालों का विश्रामस्थल भी। तब दोनहरिया तक बीहड़ था और गौला तक की आवाज आती थी। रात्रि में यह आवाज और भी भयंकर सुनाई देती थी। श्री पांगती बताते हैं की भोटिया पड़ाव में उनके परिवार के बाद धीरे-धीरे लोगों का आना शुरु हुआ। पहले शंकर मामा, मंगल मामा आए। उस दौर में किसी नेपाली कब्जेदार की बहुत चर्चा थी। बाद में उसे हटाया गया। दोनहरिया के अलावा अन्य जगहों पर पर भी जंगल होने से आबादी कम थी।
अपने बचपन के दिनों की यादों में खोते हुए श्री महेश पांगती बताते हैं पिता का ज्यादातर जंगलात सम्बन्धी दौरा होता रहता था, माता श्रीमती सरस्वती पांगती घर की व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखती थीं। एमबी कालेज घर के बगल में होने से हम भाईयों की शिक्षा यहीं से हुई। कालेज में ‘त्रिवेणी छात्रावास’ के 5 कमरे थे, जिसमें बाहर से आकर छात्र रहते थे। मैदान में फुटबाल खेलते थे और फल-फूलों के पेड़ों की हरियाली थी। एमबीपीजी कालेज से ही बीएससी करने के बाद महेश जी ने जेएनयू में प्रवेश लिया। इस बीच बैंकिग सेवा में जुड़ गये। पंजाब नेशनल बैंक में लम्बी सेवा के बाद 2017 में जनरल मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हुए। 5 साल तक महाप्रबन्धक रहे पांगती जी की सेवाएं मेरठ व दिल्ली में भी रही हैं। उत्तराखण्ड के महानगरों में गिने जा रहे हल्द्वानी की वर्तमान चकाचौंध से पहले इसकी बुनियाद को जानना हो तो पांगती जी के परिवार का चर्चा होना ही है। इनके परिवार में पत्नी श्रीमती ईला पांगती हैं। जबकि सुपुत्र मोहनीस और रजत अपने कार्यसफर में हैं।

