चीन की बदमाशी और नेपाल के दावे के बाद उठे कदम

कार्यालय प्रतिनिधि
उत्तराखण्ड से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर चाौकसी बढ़ा दी गई है। चीन की बदमाशी और नेपाल के दावे के बाद भारत की ओर से सीमा पर सख्ती की गई है। चीन तो भरोसे लायक कतई नहीं है इसे पूरी दुनिया जानती है लेकिन नेपाल के साथ भारत के रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। ऐसे में सीमा पर रहने वालों को नेपाल के कदम से असहजता बनी हुई है। नेपाल की नेशनल असेम्बली ने देश के राजनीतिक एवं प्रशासनिक नक्शे में भारत के तीन क्षेत्रों को शामिल करने के लिये संविधन संशोध्न विधेयक को पारित किया है। लिपुलेख, कालापानी और लिपिंयाध्ुरा इलाकों पर भी वह दावा कर रह रहा है। भारत और नेपाल के बीच उस समय तनाव पैदा हो गया था जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने आठ मई को प्रदेश में लिपुलेख दर्रे को धरचूला से जोड़ने वाली रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 80 किमी लम्बी सड़क का उद्घाटन किया था। नेपाल इस सड़क के उद्घाटन के समय से क्षेत्रा पर अपना दावा कर रहा है जबकि भारत ने स्पष्ट किया है कि यह सड़क पूरी तरह उसके अपने भू-भाग पर स्थित है।
चीन की हरकत के बाद सीमा पर भारतीय जवान सक्रिय हैं। वहीं नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्रा को अपना बताकर नक्शा जारी करने के बाद से सीमा पर गश्त बढ़ा दी गई है। झूलाघाट, जौलजीवी, धारचूला, बनबसा सहित सारे रास्तों पर एसएसबी के जवान चप्पे-चप्पे पर हैं। अन्तर्राष्ट्रीय झूला पुलों की निगरानी के साथ ही महाकाली नदी के किनारे बल बढ़ाया है। नेपाल की कार्रवाई से बुद्धिजीवियों ने नाराजी जताई है। रोटी-बेटी का सम्बन्ध् होने के बावजूद इस प्रकार की फितरत नेपाल में कैसे पनपी इसके पीछे चीन की साजिश की बू को माना जा रहा है। नेपाल के फैसले से सीमा क्षेत्र के लोगों में रोष है क्योंकि नेपाल से हजारों लोगों की रोटी भारत में ही है। साथ ही आम जनता हर प्रकार के दुःख-दर्द में एक-दूसरे के साथ सहभागी हैं। शादी-विवाह, पूजा-पाठ से लेकर रश्मों को साथ-साथ निभाया जाता है। पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखण्ड एवं मुख्य केन्द्रीय संरक्षक नृपसिंह नपलच्याल ने नेपाल की एकतरफा कार्रवाई को अचरज भरा बताते हुए कहा कि दोनों राष्ट्रों को मैत्राीपूर्ण वातावरण में वार्ता से विवाद का समाधान निकालना चाहिये। श्री नपलच्याल ने सीमान्त के सभी भारतीय व नेपाली बन्ध्ुओं से अपील की कि वह भड़काउ बयाजबानी न करें।
पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी पर चीन के सम्प्रभुता के दाबे को भारत ने पूरी तरह खारिज किया है और चीन की हरकतों को देखते हुए सीमाओं पर हाईअलर्ट किया है। अकड़ में रहने वाले चीन ने भारत के रुख और उसके उत्पादों के बहिष्कार की बात सुनकर बातचीत में सकारात्मकता दिखाई है। लेकिन वह धोखेबाज के रूप में है। ऐसे में उत्तराखण्ड की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर भी कड़े इन्तजाम कर दिये गये हैं। उल्लेखनीय है कि सन् 1962 मंे चीन द्वारा छल किया गया था। उस युद्ध में उसकी हड़प नीति सबने समझ ली थी। तिब्बत को पूरी तरह अपने कब्जे में करने वाले चीन के कारण तिब्बतियों को परेशान होना पड़ा है। उत्तराखण्ड की सीमान्त घाटियों के व्यापारियों का पूरा कारोबार तिब्बत पर केन्द्रित था और तिब्बती व्यापारियों के साथ उनकी अच्छी मित्रता रही है। चीन की हरकत के बाद तिब्बत व्यापार बन्द हो गया और सीमान्तवासियों के कारोबार भी बदले, पलायन हुआ। तिब्बत से बड़ी संख्या में लोग भारत आ गये।

उत्तराखण्ड में लोकरंग पर आधारित पर्यटन

धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक तहजीब से आकर्षित हो सकेंगे पर्यटक
डाॅ.पंकज उप्रेती
देवभूमि उत्तराखण्ड का धार्मिक पर्यटन यहाँ की आजीविका का बड़ा आधार है, इसमें यदि सांस्कृतिक तहजीब को जोड़ दिया जाए तो पर्यटन का यह ग्राफ ऊँचाईयों को छू सकता है। इस दिशा में कुछ प्रयोग होने भी लगे हैं। विश्व के पर्यटन स्थलों की पहचान वहाँ के लोकरंगों से होती है। लोक का यह रंग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ होता है। उत्तराखण्ड के पर्यटन में भी ऐसा है परन्तु इस दिशा में अभी काफी कार्य होना है।
      उत्तराखण्ड में पर्यटन के लिये सुरम्भ वादियाँ तो हैं ही, आध्यात्म-योग-संगीत जैसे विषयों को लेकर पहले से यहाँ आवत रही है। ऋषि-मुनियों द्वारा साधना के लिये हिमालय को सबसे प्रिय माना गया है। मध्य हिमालय के पहाड़ इनके पड़ाव रहे हैं और कैलास-मानसरोवर जैसी यात्राएं इनके जीवन का हिस्सा रही हैं। चारधाम यात्रा, पूर्णागिरी दर्शन, महाकाली-पातालभुवनेश्वर में उपस्थिति हो या जागनाथ-बागनाथ को पूजना हो………..देश-दुनिया के लोगों ने स्वीकारा है। ऐसे में क्यांे न सुविधाओं के साथ इन यात्राओं को सरल बना दिया जाए और सुविधाएं जुटाकर पर्यटन को बढ़ावा दें। धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक तहजीब की जुगलबन्दी से उत्तराखण्ड बहुत विकसित हो सकता है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम और गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने होम-स्टे योजना से इस दिशा में एक कदम बढ़ाया है। इस योजना के तहत पलायन से खाली हो चुके गाँवों को पर्यटकों के लिहाज से तैयार किया जा रहा है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम ने कैलास-मानसरोवर यात्रियों को ठहराने के लिये इस प्रकार की तैयारी की, जिसके सुखद परिणाम भी दिखाई दिये हैं। सीमान्त क्षेत्र के खाली हो चुके ग्रामों में लोगों ने अपने पैतृक मकानों को सुधार कर यात्रियों के लिये तैयार किया। इस प्रकार उनकी आमदनी भी बढ़ सकती है। रोजगार होने से एक ओर भागने वाली भीड़ में नियंत्रण लगेगा और खाली होते गाँवों का विकास होगा। होम स्टे की यह योजना मानसरोवर रूट के अतिरिक्त अन्य यात्रा पथों पर भी संचालित की जा सकती है। इससे यात्रियों को नई जानकारियां भी मिलेंगी। इस बीच उत्तराखण्ड सरकार ने धर्मिक तीर्थयात्रा को बढ़ावा देने के लिये ध्यान केन्द्रित किया है। इसके लिये पैदल मार्गों की यात्रा को जीवन्त किया जायेगा। सरकार ने पूर्व के पैदल मार्गों को खोजने का निर्णय लिया है, इससे साहसिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। इस खोज के लिये ग्यारह सदस्यीय दल ने सर्वे किया। उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद द्वारा नेहरू पर्वतारोहण संस्था, उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष केन्द्र तथा वन विभाग के सहयोग से चारधम पैदल मार्ग को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से ग्यारह सदस्यीय दल को एक माह के सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण का उद्देश्य पैदल यात्रा मार्ग के स्थानीय पड़ावों और चट्टियों को पुनर्जीवित करना है। ताकि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सके। साथ ही वहाँ की जैव विविध्ता सम्पदा एवं संस्कृति का अभिलेखीकरण भी किया जाएगा। चारधम यात्रा को पैदल मार्ग के रूप में विकसित किये जाने से तीर्थयात्रियों की संख्या में वृद्धि भी होगी। इसके लिये मार्ग मंे हर प्रकार से जरूरी सुविधएं भी सरकार उपलब्ध् कराएगी। इसके लिये इन पैदल मार्गों का प्रचार प्रसार भी किया जायेगा।
    पिघलता हिमालय की रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘सर्वेक्षण दल देहरादून से स्याना चट्टी होते हुए पैदल मार्ग से गया इसके बाद जानकी चट्टी, दरवा पास, डोडीताल, संगमचट्टी और गंगोत्री तक सर्वे किया। इसके बाद दल ने लाटा, बेलक, बूढ़ाकेदार, भैरों चट्टी, घुत्तू पंवाली कांठा, त्रियुगीनारायण और गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ जायेगा। यहाँ से श्वेत पर्वत, कलउफं, मन्दानिया, द्वाराखाल, मार्डंग गंगा, काश्नी खर्क, ग्लेशियर कैम्प होते हुए नीलकंठ बेस से बद्रीनाथ पहँुचा। दल में एनआईएम के प्रधनाचार्य कर्नल बिष्ट के अतिरिक्त वन विभाग के चार प्रशिक्षक, एसडीआरएफ तथा एक भू वैज्ञानिक शामिल थे।’ इसी प्रकार अन्य पैदल मार्गों की खोज कर उन्हें विकसित किया जाए तो रोजगार के नये अवसर बढ़ेेंगे। यह चुनौतीपूर्ण कार्य है परन्तु सरकार और हम सबने मिलकर इसे साकार करना चाहिये।
 
      होम-स्टे के साथ ही उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक ढांचे को भी पूरी तहत इससे जोड़ दिया जाना चाहिये। अभी तक संस्कृति के नाम पर छोलिया नर्तकों के साथ यात्रियों को नचा देना और रंगवाली-पिछौड़ा पहनी महिलाओं द्वारा स्वागत करवा देना संस्कृति मान लिया गया है। इससे संस्कृति की मौलिकता नहीं रह जाती। सांस्कृतिक पर्यटन के पूरे स्वरूप में हमारा संगीत, हमारी कला, हमारा रहन-सहन, खानपान सभी है, जो पर्यटकों को लुभायेगा। सीधी सी बात है कि मेहमानों का स्वागत सड़क में नाचकर करने के बजाय घर बुलाकर किया जाए। रंगोली-पिछौड़ा हमारे धार्मिक अनुष्ठानों में पहना जाता है। इसका प्रदर्शन हर मौके पर शोभा नहीं देता है। आजकल तमाम नृत्यगीतों से लेकर सड़कों पर निकलने वाले जुलूस में इसे पहन कर पर्वतीय संस्कृति का उत्थान मान लिया गया है। इसी प्रकार पहाड़ के अन्य समुदायों द्वारा भी उनके जो परम्परागत वस्त्राभूषण हैं, उनकी शोभा स्थान विशेष पर दिखाई देती है। मिलावट के इस दौर में जिस प्रकार का प्रस्तुतिकरण किया जाने लगा है वह हमें हमारी संस्कृति से बहुत दूर कर देगा, इसलिये जागरुकता जरूरी है। लोक की इन तमाम परम्पराओं से अनभिज्ञ लोग निर्माता-निर्देशक बनकर फिल्म रूप में भी समाज के सामने अजीबोगरीब परोस रहे हैं। जिसका प्रभाव नई पीढ़ी में होने लगा है। नई पीढ़ी जो कुछ देख रही है, उसे  अपनी संस्कृति मानकर उसी रंग में ढल रही है।

केशवदत्त अवस्थी अग्रणीय शिक्षकों में रहे हैं



अस्कोट राजा के दीवान परिवार से सम्बन्ध्
स्व. केशवदत्त अवस्थी अस्कोट गर्खा के उन बुद्धिजीवियों में रहे हैं जिन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिये अपने को समर्पित किया। इनका सम्बन्ध् अस्कोट राजा के दीवान अवस्थी परिवार से है। इनके पिता मोतीराम अवस्थी राजा के दीवान थे। इसी परम्परा में इनके बड़े भाई भी पदवी संभाले हुए रहे। केशवदत्त बचपन से ही बिलक्षण प्रतिभा के थे और शिक्षा में विशेष रुचि के कारण इन्हें उसी प्रकार की सुविधा दी गई।
   केशवदत्त जी का जन्म अस्कोट गर्खा इलाके के नरेत ग्राम में सन् 1902 को हुआ था। इनके पिता स्व. मोतीराम अवस्थी व माता स्व. श्रीमती हंसा अवस्थी थे। बाल्यकाल से ही प्रखर बुद्धि के केशव ने मिडिल की परीक्षा जूनियर हाईस्कूल बजेटी में प्राप्त की। हाईस्कूल व इण्टर की परीक्षा रैमजे इण्टर कालेज अल्मोड़ा से पूर्ण की। स्नाकत की पढ़ाई 1927 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। पढ़ाई के साथ-साथ बेहतर खिलाड़ी केशवदत्त जी मेरठ यूनिवर्सिटी की फुटबाल टीम का नेतृत्व किया। इनके बड़े भाई हरिबल्लभ अवस्थी अस्कोट राजा के दीवान थे।

   केशवदत्त अवस्थी ने स्नातक उत्तीर्ण करने के बार काशीपुर के एक विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक नियुक्त हो गये। एक वर्ष बाद इनका स्थानान्तरण लोहाली ;नैनीताल में हो गया। उसके बाद भाॅतड़ ;थल, दशाईथल में रहे। गंगोलीहाट के जाह्नदेवी नौले के पास इन्होंने संस्कृत पाठशाला की स्थापना की। बाद में गर्खा जनता कालेज के प्रथम प्रधानाध्यापक बने। अवस्थी जी गणित, अंग्रेजी, संस्कृत, इतिहास, उर्दू के प्रकाण्ड विद्वान थे।
    इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इनके इतिहास के गुरु सी.आर.गोरखपुरी व ईश्वरी प्रसाद थे। एक बार नारायण नगर ;डीडीहाट में नारायण स्वामी ने इन्हें अपने विद्यालय में आने का प्रस्ताव किया लेकिन स्वतंत्रात प्रकृति के केशवदत्त जी ने जाने से मना कर दिया। सन् 1942 में  अंग्रेज पता लगाते हुए इनके ग्राम नरेत पहँुचे और पूछा- यहाँ कौन व्यक्ति ग्रेजुएट करके आया है। जानकारी मिलने पर कि केशवदत्त ग्रेजुएट हैं उन्हें प्रस्ताव दिया गया कि अंग्रेजी सेना में सीध्े लेफ्रिटनेंट बनाया जायेगा लेकिन अवस्थी जी ने अंग्रेजों के साथ जाने से मना कर दिया। उन्होंने आजीवन शिक्षण कार्य को ही अपनाया।
    सेवानिवृत्ति के बाद नेपाल सरकार ने उन्हें अपने बुलावा भेजा और वह दो वर्ष नेपाल के थाराकोट में प्रधानाध्यापक रहे। इनके प्रमुख शिष्यों में मोती लाल चैधरी, वंशीलाल विश्वकर्मा, फकीर दत्त ओझा, महिपाल सिंह भैसोड़ा, कृपाल सिंह भैसोड़ा, भुवनचन्द्र गुणवन्त आदि रहे। इनके दो पुत्र थे। बड़े पुत्र स्व. गोविन्द बल्लभ अवस्थी एमईएस पिथौरागढ़ में एसडीओ के पद पर रहे तथा छोटे पुत्र जगदीश चन्द्र अवस्थी काॅपरेटिव बैंक से सेवानिवृत्त हो गए हैं। अवस्थी जी का का 13 जून 1979 को अपने पैतृक निवास नरेत में निधन हुआ। इनके तीन पौते हैं- सी.एम.अवस्थी डहरिया हल्द्वानी, प्रदीप अवस्थी विवेकानन्द इण्टर कालेज पिथौरागढ़, दिनेश अवस्थी मीडिया से जुड़े हैं। स्व.अवस्थी के भतीजे ध्रणीध्र जी लखनउ विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान विभाग में रीडर थे और छोटे भाई आनन्दमोहन नाॅर्थ जोन देहरादून ओएनजीसी में जनरल मैनेजर से सेवानिवृत्त हुए।
    इस प्रकार हम देखते हैं कि अवस्थी परिवार की शाखाएं तमाम जगह फैल चुकी हैं लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े भाई बन्ध्ु परम्पराओं को बरकरार रखे हुए हैं