उत्तराखण्ड में लोकरंग पर आधारित पर्यटन

धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक तहजीब से आकर्षित हो सकेंगे पर्यटक
डाॅ.पंकज उप्रेती
देवभूमि उत्तराखण्ड का धार्मिक पर्यटन यहाँ की आजीविका का बड़ा आधार है, इसमें यदि सांस्कृतिक तहजीब को जोड़ दिया जाए तो पर्यटन का यह ग्राफ ऊँचाईयों को छू सकता है। इस दिशा में कुछ प्रयोग होने भी लगे हैं। विश्व के पर्यटन स्थलों की पहचान वहाँ के लोकरंगों से होती है। लोक का यह रंग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ होता है। उत्तराखण्ड के पर्यटन में भी ऐसा है परन्तु इस दिशा में अभी काफी कार्य होना है।
      उत्तराखण्ड में पर्यटन के लिये सुरम्भ वादियाँ तो हैं ही, आध्यात्म-योग-संगीत जैसे विषयों को लेकर पहले से यहाँ आवत रही है। ऋषि-मुनियों द्वारा साधना के लिये हिमालय को सबसे प्रिय माना गया है। मध्य हिमालय के पहाड़ इनके पड़ाव रहे हैं और कैलास-मानसरोवर जैसी यात्राएं इनके जीवन का हिस्सा रही हैं। चारधाम यात्रा, पूर्णागिरी दर्शन, महाकाली-पातालभुवनेश्वर में उपस्थिति हो या जागनाथ-बागनाथ को पूजना हो………..देश-दुनिया के लोगों ने स्वीकारा है। ऐसे में क्यांे न सुविधाओं के साथ इन यात्राओं को सरल बना दिया जाए और सुविधाएं जुटाकर पर्यटन को बढ़ावा दें। धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक तहजीब की जुगलबन्दी से उत्तराखण्ड बहुत विकसित हो सकता है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम और गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने होम-स्टे योजना से इस दिशा में एक कदम बढ़ाया है। इस योजना के तहत पलायन से खाली हो चुके गाँवों को पर्यटकों के लिहाज से तैयार किया जा रहा है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम ने कैलास-मानसरोवर यात्रियों को ठहराने के लिये इस प्रकार की तैयारी की, जिसके सुखद परिणाम भी दिखाई दिये हैं। सीमान्त क्षेत्र के खाली हो चुके ग्रामों में लोगों ने अपने पैतृक मकानों को सुधार कर यात्रियों के लिये तैयार किया। इस प्रकार उनकी आमदनी भी बढ़ सकती है। रोजगार होने से एक ओर भागने वाली भीड़ में नियंत्रण लगेगा और खाली होते गाँवों का विकास होगा। होम स्टे की यह योजना मानसरोवर रूट के अतिरिक्त अन्य यात्रा पथों पर भी संचालित की जा सकती है। इससे यात्रियों को नई जानकारियां भी मिलेंगी। इस बीच उत्तराखण्ड सरकार ने धर्मिक तीर्थयात्रा को बढ़ावा देने के लिये ध्यान केन्द्रित किया है। इसके लिये पैदल मार्गों की यात्रा को जीवन्त किया जायेगा। सरकार ने पूर्व के पैदल मार्गों को खोजने का निर्णय लिया है, इससे साहसिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। इस खोज के लिये ग्यारह सदस्यीय दल ने सर्वे किया। उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद द्वारा नेहरू पर्वतारोहण संस्था, उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष केन्द्र तथा वन विभाग के सहयोग से चारधम पैदल मार्ग को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से ग्यारह सदस्यीय दल को एक माह के सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण का उद्देश्य पैदल यात्रा मार्ग के स्थानीय पड़ावों और चट्टियों को पुनर्जीवित करना है। ताकि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सके। साथ ही वहाँ की जैव विविध्ता सम्पदा एवं संस्कृति का अभिलेखीकरण भी किया जाएगा। चारधम यात्रा को पैदल मार्ग के रूप में विकसित किये जाने से तीर्थयात्रियों की संख्या में वृद्धि भी होगी। इसके लिये मार्ग मंे हर प्रकार से जरूरी सुविधएं भी सरकार उपलब्ध् कराएगी। इसके लिये इन पैदल मार्गों का प्रचार प्रसार भी किया जायेगा।
    पिघलता हिमालय की रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘सर्वेक्षण दल देहरादून से स्याना चट्टी होते हुए पैदल मार्ग से गया इसके बाद जानकी चट्टी, दरवा पास, डोडीताल, संगमचट्टी और गंगोत्री तक सर्वे किया। इसके बाद दल ने लाटा, बेलक, बूढ़ाकेदार, भैरों चट्टी, घुत्तू पंवाली कांठा, त्रियुगीनारायण और गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ जायेगा। यहाँ से श्वेत पर्वत, कलउफं, मन्दानिया, द्वाराखाल, मार्डंग गंगा, काश्नी खर्क, ग्लेशियर कैम्प होते हुए नीलकंठ बेस से बद्रीनाथ पहँुचा। दल में एनआईएम के प्रधनाचार्य कर्नल बिष्ट के अतिरिक्त वन विभाग के चार प्रशिक्षक, एसडीआरएफ तथा एक भू वैज्ञानिक शामिल थे।’ इसी प्रकार अन्य पैदल मार्गों की खोज कर उन्हें विकसित किया जाए तो रोजगार के नये अवसर बढ़ेेंगे। यह चुनौतीपूर्ण कार्य है परन्तु सरकार और हम सबने मिलकर इसे साकार करना चाहिये।
 
      होम-स्टे के साथ ही उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक ढांचे को भी पूरी तहत इससे जोड़ दिया जाना चाहिये। अभी तक संस्कृति के नाम पर छोलिया नर्तकों के साथ यात्रियों को नचा देना और रंगवाली-पिछौड़ा पहनी महिलाओं द्वारा स्वागत करवा देना संस्कृति मान लिया गया है। इससे संस्कृति की मौलिकता नहीं रह जाती। सांस्कृतिक पर्यटन के पूरे स्वरूप में हमारा संगीत, हमारी कला, हमारा रहन-सहन, खानपान सभी है, जो पर्यटकों को लुभायेगा। सीधी सी बात है कि मेहमानों का स्वागत सड़क में नाचकर करने के बजाय घर बुलाकर किया जाए। रंगोली-पिछौड़ा हमारे धार्मिक अनुष्ठानों में पहना जाता है। इसका प्रदर्शन हर मौके पर शोभा नहीं देता है। आजकल तमाम नृत्यगीतों से लेकर सड़कों पर निकलने वाले जुलूस में इसे पहन कर पर्वतीय संस्कृति का उत्थान मान लिया गया है। इसी प्रकार पहाड़ के अन्य समुदायों द्वारा भी उनके जो परम्परागत वस्त्राभूषण हैं, उनकी शोभा स्थान विशेष पर दिखाई देती है। मिलावट के इस दौर में जिस प्रकार का प्रस्तुतिकरण किया जाने लगा है वह हमें हमारी संस्कृति से बहुत दूर कर देगा, इसलिये जागरुकता जरूरी है। लोक की इन तमाम परम्पराओं से अनभिज्ञ लोग निर्माता-निर्देशक बनकर फिल्म रूप में भी समाज के सामने अजीबोगरीब परोस रहे हैं। जिसका प्रभाव नई पीढ़ी में होने लगा है। नई पीढ़ी जो कुछ देख रही है, उसे  अपनी संस्कृति मानकर उसी रंग में ढल रही है।

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