तहजीब-ए-मुनस्यार

जगदीश बृजवाल
हिमालय की गोद में बसा हिमनगरी, जिसे ‘सारा संसार एक मुनस्यार’ भी कहते है। उत्तर में हिमालय के तलहटी के मिलम ग्लेश्यिर से उदगम गोरी नदी निचले घाटी के में उतरकर वार-पार के बीचों बीच बहते मवानी-दबानी तक तथा पश्चिम में हीरामणि ग्लेशियर निकलने वाली नदी रामगंगा सीमा रेखा बनाते नाचनी, नौलड़ा तक मुनस्यारी तहसील का सीमांकन क्षेत्र है।
मुनस्यारी तहसील क्षेत्रफल की दृष्टि से कई जिलों से भी बड़ा है। जैसे जिला हरिद्वार। क्योंकि इस तहसील क्षेत्र की सीमा तिब्बत (चीन) तक जा लगती है। प्राचीन समय जोहार के शौका जनजाति तथा मुनस्यारी के मूल बरपटिया जनजाति के लोग जो यक्ष, किन्नर, किरात, नागवंशी तथा मंगोलियाड, मुख मुद्रा व तिब्बती बर्मी भाषा के समावेश से कुछ-न-कुछ सम्बन्ध अवश्य उनसे भी रहा है।
जोहार के इतिहास में तीनों कालखण्डों का अनुशासित वर्णन दिखने को नहीं मिलता, ऐसे में पाठकों को कुछ भ्रम की आशंका बनी रहती है। जबकि जोहार का इतिहास तीन कालखण्ड में वर्गीकृत दिखाई स्पष्ट है-
प्राचीन काल- हल्दु्वा-पिङंगलवा युग, मध्य काल पनज्वारी युग, आधुनिक युग धामू रावत का जोहार घाटी में प्रवेश व पंनज्वारियों का अवसान। तीन काल खण्ड जोहार के समग्र इतिहास की जानकारी देते हैं। इनमें आपस में रक्त सम्बन्ध भी स्थापित र्है अर्द यायावरी जनजाति मौसम के अनुसार अपने प्रवास बदलते रहते थे किन्तु सन 1962 में तिब्बत पर चीन का अधिपत्य हो जाने के कारण शौकाओं का व्यापार बन्द हो गया था, सभी लोग बेरोजगार हो गये। नए रोजगार की तलाश में अब एक स्थान पर स्थायी भी रहने लगे थे। शिक्षा, नौकरी, पद प्राप्त कर आज पुनः अच्छी स्थिति में देश के कौने कौने में बस गये हैं।
यहाँ के लोगों का व्यापार समाप्ति के वाद धीरे-धीरे लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया था। वर्तमान में अब शौकाओं की जनसंख्या क्षेत्र में न्यून है, कुछ ही गाँव तक सीमित परिवार निवास करते हैं।
व्यापारी जो सदैव अपनी व्यापार को उन्नत बनाने के लिए मृदु भाषा, व्यवहार कुशल, मिलनसार बनने का प्रयत्न करता है सुबह से शाम तक अपनी वाणी में संयम, भाषा की सौहार्दता का विशेष ध्यान रखते है जो बाद में उसकी आदत व्यवहार में अवश्य शुमार हो गया होगा। किसी भी घर, परिवार में कोई भी व्यक्ति जो घर के लिए आर्थिक योगदान देता है वह घर का मुख्य व्यक्ति हो सकता है इस कारण घर परिवार में उनकी बातों को हमेशा परिवार तबज्जू देता है, उनकी बातों को लोग अमल में भी लाते हैं। व्यक्ति की वाणी की सौम्यता, व्यवहार में मधुरता परिवार के लिए भी तथा व्यवसाय के लिए भी संजीवनी का काम करता है। शायद कोई अनुमान न लगा पाये, पर उनकी तहजीब सबके लिए जीवनोपयोगी सिद्ध हो चुका था।
तहजीब, जिसे हम कहते हैं किसी भी संस्कृति, सभ्यता के अवयव आचरण, आचार-व्यवहार, सदभाव, प्रेम गुण-धर्म की सीख व्यक्ति को घर या समाज से ही मिलता है। परिवार बालक की सर्व प्रथम पाठशाला होता है जहाँ से बच्चा संस्कारवान बनकर बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है। आपकी सहिष्णुताता आपके कई कामों को आसान बना देती है। शौकाओं का अपना व्यापार करने के एवज में उसे कई लोगों के साथ अपनी अच्छे सम्बन्धों को बढ़ावा देना पड़ता होगा, जिस कारण घर के सदस्य के साथ हो या बाहर के, वाणी में मधुरता यथावत रखनी पड़ती होगी, व्यापारी की मजबूरी सदैव तहजीब को बनाये रखना ही है। अन्यथा व्यापार में अवरोध आने की आशंका बनी रहती थी जिस कारण शौका व्यापारी को दैनिक जीवन में भी अपने पशुओं से लेकर परिवार व बाहर के लोगों से भी अच्छे व्यवहार सम्बन्धों को बनाये रखना आवश्यक था। इस कारण उसने अपने पास-पड़ोस, अपने बन्धु-बान्धवो के साथ मैत्राीपूर्ण व्यवहार बनाकर अच्छे वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान अवश्य किया होगा।
जोहार घाटी में अतीत में निवास करने वाले लोग सभी जोहारी कहलाये जाते थे। किसी भी जाति धर्म का क्यों न हो, जोहार में निवास करने के बाद जोहारी ही कहलाए, अपनी बुद्धि, क्षमता अनुसार कार्य कर आपसी सामंजस्यता प्रेम सदभाव से अपने कार्यों में मशगूल रहे, अनुमान/कल्पना तो आज के लोगों का कथन और सोचना है, उसी प्रकार तहजीब, संस्कार अग्रिम पीढ़ी को तथा पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार समाज को हस्तांतरण करते रहे हैं।
मुनस्यारी क्षेत्र के लोगों की ईमानदारी, विश्वास, स्वाभिमानी होने का प्रमाण तो सिद्ध है, यहाँ के लोग जुवान व उसूल के पक्के होते थे। सच्चाई, ईमानदारी, विश्वास के लिए कभी समझौता नहीं करते थे। तिब्बत व्यापार हेतु जाने वाले मार्ग में एक स्थान बोगडियार पड़ाव है, उससे कुछ नीचे दक्षिण दिशा की तरपफ रारगारी नामक अति दुर्गम स्थल माना जाता है, सत्यता यह भी है कि शौका लोग व्यापार के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री जो अपने पशुओं के पीठ पर लादकर तिब्बत तक पहुँचाते थे यदा-कदा उन्हें इन स्थानों में कहीं सड़क किनारे, गुफा आदि स्थान पर सुरक्षित मोटे कपड़े से (तिरपाल) ढक कर रख देना पड़ता था। अगले वर्ष उसे सुरक्षित सामान मिल जाता था, जो उस समय के समाज की अच्छी स्थिति की जानकारी देता है कि झूठ, चोरी-चकारी, बईमानी, अविाश्वास को समाज में कोई भी स्थान नहीं दिया गया था।
मुनस्यारी क्षेत्रा में रहने वाले सभी जाति विरादरी के बीच जो प्रेम, मित्राभाव अतीत में दिखाई देती देती है वो अब कहाँ! हमेशा आपस में एक दूसरे की प्रति अटूट विश्वास व सम्बन्ध बनाए रखना अपना परम कर्तव्य समझते थे तथा सम्बन्धों की प्रागढ़ता पीढ़ी दर पीढ़ी भी निरन्तर चलती रही। अतिथि सत्कार करना इस क्षेत्र के लोगों को कहीं से सीखने की आवश्यकता न थी। अपने गुण की पहिचान वह बखान अपने मुँह से कभी नहीं किया।
आपसी सामंजस्यता, खाना-पीना, उठना-बैठना, बोलचाल जिसने आपसी समानता को बनाये रक्खा, क्षेत्रा में सभी जाति धर्म के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य तहजीब-ए-मुनस्यार ने किया था तथा आपस में सदैव एक दूसरे का सहयोग कर काम आते रहे हैं, इस कारण मुनस्यारी क्षेत्रा की लोगों की वाणी ने लोगों को ध्यान आकर्षित कर अच्छी परम्परा की नींव रख दी। इस बात की समझ अनुमान/कल्पना आज करते हैं तो क्षेत्र में आने वाली बाहरी लोग जो सरकारी कार्मिक, अध्यापक गण नियुक्ति, पदोन्नति में आकर दूर दराज गाँव में लम्बे समय तक ठहराव करते हैं तो उन्हें यहाँ के लोगों का आचार-व्यवहार में अपनत्वता झलकता है तभी यहाँ से अन्यत्रा जाने के पर यदा-कदा जब उनके सन्देश मिलते तथा कभी मिलन हो जाने पर क्षेत्रा तथा वहाँ रहने वाले लोगों की प्रशंसा करते नहीं थकते हैं।
तहजीब की आवश्यकता तथा बनाये रखना जो शौका समाज के अच्छे संस्कारों के गुण धर्म को विकसित करना था। विरासत में मिला तहजीब व प्रकृति का अमूल्य उपहार प्राप्त कर सदैव यहाँ के वाशिन्दे अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

आधा संसार-एक मुनस्यार

देव सिंह बोरा
अनुपम सौन्दर्यमयी मुनस्यारी तहसील का पुराना नाम जीवार उर्फ जोहार है। मिलम ग्लेश्यिर के जिस स्थान से गोरी नदी निकलती है, उसके दाहिने तरफ बरफ से ढके पहाड़ का नाम जावार है। इसी जीवार पर्वत के नाम से इस क्षेत्र का नाम कालान्तर में जोहार हो गया। माना जाता है कि गोरी नदी इसी जीवार पर्वत के एक भाग को तोड़ कर हरलिंग (हंसलिंग) पर्वत को छूते हुए मुनस्यारी को दो भागों में सींचती हुई मदकोट जौलजीवी को चली जाती है। हरलिंग इतना उष्मावान है कि उसमें वर्फ टिक नहीं सकता। हरलिंग अर्थात शिवलिंग को गौरी (पार्वती) का नदी रूप में स्पर्श कर बह जाना रहस्यमीय है। शिव पार्वती की विवाह स्थली और पार्वती की तप स्थली हिमालय ही तो है। पहले जोहार एक पगरना थाा। विकट बन्दोबस्त, जो वर्ष 1863 में अल्मोड़ा जिले से प्रारम्भ हुआ था, के दौरान जोहार परगना को तल्ला देश जोहार व मल्ला देश जोहार दो पट्टियों में विभक्त किया गया। बाद में एक पट्टी गोरीपफाट बनया गया। जोहार-मुनस्यारी का एक पुराना नाम भोट प्रदेश भी है। यह भोट शब्द तिब्बत के बोध् शब्द से बना है। तिब्बत देश को वहाँ की स्थानीय भाषा में बोध् कहा जाता है।
कुमाउँ केशरी बी.डी.पाण्डे द्वारा लिखित कुमाउँ का इतिहास के अनुसार वर्ष 1790 तक मुनस्यारी में चंद वंश का शासन था। 1790 से 30 अप्रैल 1815 तक गोरखा राज (नेपालियों का) तथा 3 मई 1815 के बाद मुनस्यारी अंग्रेजों के अधीन हो गया।
प्रसिद्ध चंदवंशी राजा बाज बहादुर चंद ने वर्ष 1670 में भोट के रास्ते चल कर तिब्बतियों पर आक्रमण किया और तिब्बतियों से ताकललाखाल जीत कर आदेश जारी किए कि भोटिए लोग जो टैक्स तिब्बती राजा को देते हैं न दें। बाद में तिब्बत राजा द्वारा निवेदन करने व भविष्य में जोहारियों को रास्ते, व्यापार, धर्म के विषय में परेशान न करने का वचन देने पर पुनः टैक्स देने की सहमति बनी। राजा बाज बहादुर चंद के गाइड के रूप में जोहार भादू बूढ़ा तथा लोरू बिल्ज्वाल तिब्बत गए थे। राजा ने इनाम के रूप में इनको कुछ गाँव (पांछू, बुर्फू, पातू, धपा, तेली) जागीर में दिए। लोरू बिल्ज्वाल को कोश्यारी बाड़ा मिला।
मल्ला देश जोहार समुद्र तल से 330 मीटर से 4500 की उँचाई पर स्थित है। पहले इन दोनों पट्टियों के लोगों के रहन-सहन, खान-पान यहाँ तक कि वेशभूषा में भी अन्तर था। मल्लाजोहार का कुछ भाग 5 माह तक बर्फ से ढका रहता है शेष में शीत लहर का प्रकोप रहता है। लेकिन तल्लाजोहार घाटी में होने से मौसम के हिसाब से गरम रहता है। मुनस्यारी जो कि मल्लाजोहार व गोरी फाट पट्टियों का संयुक्त नाम था, अपने आप में विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम, प्राकृतिक सौन्दर्य, नदी-झरनों, हिमाच्छादित पर्वतों, जाति, वर्ण, धर्म आदि की विविधताओं के लिए प्रसि( रहा है। जो इस कहावत से सि( होता है- आध संसार-एक मुनस्यार।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जोहार के लोग अपने क्षेत्र को बहुत बड़ा समझते थे। यानि जोहारी लोग यह मानते थे कि आधे भाग में तो ईश्वर ने मुनस्यारी-जोहार ग्राम बनाए हैं और आधे भाग में शेष संसार को। लेकिन इतिहासकारों की यह टिप्पणी या व्याख्या सही प्रतीत नहीं होती। इस उक्ति के भावार्थ को इस क्षेत्रा से सम्बन्ध्ति विविधताओं को जोड़ कर समझा जाना चाहिये। मुनस्यारी छोटा क्षेत्र होने के बावजूद संसार के अनेक प्राकृतिक संरचनाओं, जातियों, वंशों की अनेकता को अपने में समेटे हुए है। संसार के अन्य भागों में पायी जाने वाली जातियां मंगोल, शक, गोरखा नेपाली, आर्य, तिब्बती, हूण, नाग, किरात, खस, राजस्थानी, हिमाचली, गढ़वाली, गुजराती आदि जाति धर्म के लोग इस छोटे से क्षेत्रा में रहते हैं। पूर्व में जाति धर्म के अनुसार बोली, भाषा जैसे तिब्बती, गोरखाली, पहाड़ी, गढ़वाली, हिमाचली आदि बोली जाती थी और उसी के अनुरूप विविध् पहनावा भी लोग पहनते थे। वर्तमान में मुनस्यारी में चारों वर्णों के लोग निवास करते हैं। मुनस्यारी तहसील में ब्राह्मणों व ठाकुरों की ही करीब 82 जातियां रहती हैं। यहाँ के शौका व्यापार के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं। तिब्बत व नेपाल के अतिरिक्त माल के लिए देश के सभी प्रमुख शहरों तक उनका व्यापार पफैला था। वे भारत का सामान ल्हासा, ज्ञानिमा मण्डी आदि तक बकरियों, घोड़ों से पहँुचा कर तिब्बती सामान भारत लाते थे। विकट रास्तों से कबरियों द्वारा सामान ढुलान करना खतरे से खाली नहीं था। इसलिए एक बकरी-दस ढकरी की आवश्कता होती थी। इस वंश के सुनपति शौका बहुत बड़े व्यापारी माने जाते थे। मुनस्यारी में विश्वविख्यात मिलम ग्लेश्यिर एवं पंचाचूली, राजरम्भा, हरलिंग, छिपलाकेदार, नन्दादेवी, नन्दाकोट आदि हिमालय पर्वत श्रृंखलाएं हैं। उनकी उपत्यकाओं में वनोषधि अतीश, कटिक, निरविष, गुग्गल, मासी, हाथजड़ी और कस्तूरीमृग, डफिया मुनाल आदि दुर्लभ पशु-पक्षियां पाये जाते हैं। बुग्याल में अनुपम छटा बिखेरते अनेकानेक पुष्प तथा ब्रह्मकमल जैसे नन्दन वन की शोभा बढ़ाते हैं। देवदार, भोजपत्रा, थुनेर, ल्वेंट आदि अनेक ज्ञात अज्ञात पादप तथा जलचर, थलचर व नभचर पाए जाते हैं।
मुनस्यारी रिषि मुनियों की तपोभूमि रही है। शान्ति के लिए रिषि मुनि यहाँ आते थे। प्रेम कथाओं में राजुला मालूशाही की प्रेम गाथा की गिनती- रोमियो-जुलियट, मालती-माध्व, हीर-रांझा की कोटि में होती है, जो इसी धरती से सम्बन्ध् रखते हैं।
उपरोक्त प्राकृतिक व सामाजिक विविधताओं के छोटे से क्षेत्र में विद्यमान होने के कारण आध संसार-एक मुनस्यार का पुरातन कथ्य प्रचलन में आया होगा, ऐसा प्रतीत होता है।