तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

श्रीमती पार्वती रावत-श्रीमती हेमा बृजवाल से बातचीज

डॉ. पंकज उप्रेती

भारत-चीन व्यापार की वर्तमान स्थितियां एकदम अलग हैं। इस बार लम्बे अन्तराल के बाद यह व्यापार होने वाला है, जो कोरोना कारणों से स्थगित था। इसकी तैयारी हो रही है। लेकिन हमारे सीमान्त क्षेत्र से इस व्यापार की असल परम्परा इतिहास और संस्कृति का आधार है। सीमान्त के व्यापारी अपने तिब्बत मित्रों के साथ किस प्रकार से व्यवहार रखते थे वह जानना बहुत शिक्षाप्रद है क्योंकि दुर्गम स्थानों पर प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए जो कुछ किया जाता था वह त्यौहार सा माहौल बन जाता था। ऐसी ही रोचक जानकारियों के लिये आज श्रीमती हेमा बृजवाल और श्रीमती पार्वती रावत से बातचीज प्रस्तुत है। हेमा बृजवाल और पार्वती रावत आपस में समधन हैं। इन दोनों को ही बचपन में वह अवसर देखने का सौभाग्य है जब इनके घरों से तिब्बत व्यापार के लिये जाते थे और सारे ग्रामवासी व्यापारियों को जाते समय विदाई करते और आने पर स्वागत। बताते हैं- रास्ते के लिये भरपूर खाजा-खजूरे बनाये जाते थे। बातचीज का सिललिसा चलता रहे इससे सबसे पहले हेमा बृजवाल जी के बारे में बताते हैं। दरकोट में पिता जीवन सिंह सयाना माता श्रीमती खिमुली देवी के घर इनका जन्म हुआ। तल्ला दुम्मर बृजवाल परिवार में इनका विवाह हुआ। स्व. प्रताप सिंह बृजवाल के सुपुत्र थे स्व. जसवन्त सिंह जी। हेमा देवी का विवाह जसवन्त सिंह जी के साथ हुआ। इनकी अगली पीढ़ी में स्व. केदार सिंह, मनोहर सिंह, प्रेम सिंह, वीरेन्द्र सिंह और अंजू पांगती हैं। तिब्बत व्यापारी परम्परा में प्रत्येक परिवार से कोई न कोई जाता था जब 12 साल की उम्र में जसवन्त सिंह जी भी अपने परिवार से व्यापार में गये।
हेमा देवी का बचपन दरकोट, मल्ला दुम्मर में बीता। इनके बचपन की सखियों में रुकमणि देवी, पानुली देवी, हरकी देवी रहे हैं। अपने मायके में व्यापार की जिस परम्परा को इन्होंने देखा वही सब ससुराल में भी था। विवाह के बाद एक वर्ष तक यह मल्ला दुम्मर रहीं और फिर पति संग अल्मोड़ा आ गई। 1951 में जसवन्त सिंह बृजवाल ने यहाँ कारपेट एण्ड जनरल स्टोर खोला। थोक का व्यापार बेहतर चल निकला क्योंकि बृजवाल दम्पत्ति अथाह मेहनती थे। पहले यह गंगोला मोहल्ले में रहते थे, बाद में धर की तूनी शैल गाँव में अपना मकान बना लिया। हेमा बृजवाल अपनी उनी कारोबार की परम्परा को अल्मोड़ा में भी बनाए हुए थीं और इन्होंने एक सेन्टर चलाया जिसमें दन गलीचे, पंखी, पसमीना बनाया जाता था। बकायदा बालिकाओं को इसकी ट्रेनिंग दी जाती थी। सेन्टर चलाने के लिये शुरू में लखनउफ से सरकारी इन्तजाम भी हुए जो साल तक थे, इसके बाद अपने आप से आठ वर्ष तक इस सेन्टर को इन्होंने चलाया। सेन्टर में बनने वाले विभिन्न आकार के गलीचेे व उनी सामग्री को लेने लोग इनके पास आने लगे थे। इसके अलावा उत्तरायणी मेले में बागेश्वर और व्यापारिक मेले जौलजीवी में तक यहाँ से सामान जाता था।
अब श्रीमती पार्वती रावत जी के बारे में बताते हैं। इनके बूबू प्रेम सिंह जंगपांगी और पिता मेघ सिंह जी हुए। थल, मल्ला दुम्मर और बुर्फू तक माइग्रेशन परम्परा मेें परिवार की घुमन्तु व्यवस्था थी। साथ ही तिब्बत व्यापार का कारोबार। पार्वती देवी की शिक्षा माइग्रेशन स्कूलों की उस परम्परा में हुई है। तिकसैन मुनस्यारी में रहते हुए नमजला जाकर उन्होंने पढ़ाई की। वह बताती हैं गुरुजन अपने शिष्यों के लिये बहुत मेहनत करते थे। बच्चों द्वारा भी अपने गुरुजनों के लिये बहुत आदर था और बारी-बारी से खाद्य सामग्री, आटा-गुड़-घी, चूल्हा जलाने को लकड़ी उन्हें देते थे। ऐसे में शिक्षकों को माइग्रेशन जैसी शिक्षा व्यवस्था भी नहीं अखरती और वह चित्त लगाकर मेहनत करते थे।
कुशाग्र बुदिृध की पार्वती देवी शिक्षा के बाद शिक्षा विभाग में ही नौकरी करने लगी। नौकरी में वह अल्मोड़ा से धारचूला भी गईं लेकिन विवाह के बाद नौकरी छोड़ दी और एनटीडी, अल्मोड़ा अपने ससुराल में हैं। किशन सिंह रावत परिवार से इनका सम्बन्ध है। किशन सिंह जी के सुपुत्रों में विंग कमाण्डर नौसेना ज्योति सिंह, कर्नल रणजीत सिंह, कर्नल थल सेना खुशाल सिंह, विंग कमाण्डर वायु सेना प्रतिमन सिंह हैं।
खुशाल सिंह की सुपुत्री हुईं स्व.प्रोमिला देवी इनकी अगली पीढ़ी में नेहा बृजवाल जो दिल्ली में पीएनबी में मैनेजर हैं। इस पारिवारिक ताने-बाने के बीच पार्वती रावत अपने बचपन को याद करते हुए बताती हैं- तिब्बत यात्रा पर जाने वालों के लिये खाजा-खजूरे, सत्तू तैयार कर रखते थे। एक दिन पहले आसपास सारे लोगों को बुलाकर आयोजन होता था। आलू-पूरी ज्या जैसे व्यंजनों के साथ सब बैठक करते। ढोल वादक भी बुलाए जाते थे। रात्रि के इस आयोजन के बाद अगले दिन जब तिब्बत यात्रा पर व्यापारी निकलते तो उन्हें छोड़ने के लिये दूर तक जाते। जब व्यापार करके हूणदेश से लोग वापस आते थे तो तब भी घर लीपघीस कर खूब सजाया जाता था। व्यापारियों के आने का स्वागत किया जाता था। बचपन की यादगार बातों में वह बताती हैं- बूबू और पिता जी जब तिब्बत व्यापार से लौटकर आते थे तो अपने साथ लाए सामान को देखते और सबको दिखाते। इसके अलावा एक कमरे में पैसोें का हिसाब जोड़ते, तब बच्चों को वहाँ से हटा देते लेकिन हम छोटे बच्चे दीवारों के औने-कौने से देखते क्या हो रहा है। उस कमरे में चाँदी के सिक्कों के ढेरों को अलग-अलग कर लगाते हुए गिनती होती थी। एकआना, दोआना से लेकर अलग-अलग चाँदी के सिक्कों के ढेर बच्चों के लिये कौतूहल था, जो कि व्यापारियों ने दुर्गम यात्रा करते हुए जान जोखिम में डालकर अपने व्यापार में जुटाए थे।

पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं, आधा किलो तक की हसुली बनती थी

नवीन चन्द्र वर्मा से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
उत्तराखण्ड सरकार में वरिष्ठ नागरिक कल्याण परिषद के उपाध्यक्ष श्री नवीन वर्मा भले ही राज्यमंत्री का दर्जा रखते हैं लेकिन उनकी कार्यशैली और समाज के लिये सोच उन्हें काफी आगे पहले से बनाए हुए है। व्यापारी नेता, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के अलावा स्वच्छ छवि के चलते उन्हें सरकार में भी जो अवसर मिला है उनके अनुभवों का लाभ समाज को होना ही है। मूलरूप से स्वर्णाभूषण के कारोबारी परिवार से होते हुए भी नवीन वर्मा जी सोच केवल व्यापारी बनकर रहने की नहीं रही और वह सामाजिक कार्यों में हाथ बंटाते रहे हैं। उत्तराखण्ड की राजनीति और यहाँ के व्यापारी नेता के रूप में वह कितने मजबूत हैं यह जानने से पहले वर्मा परिवार के बारे में आपको बताते हैं।
यह वर्मा परिवार मूलरूप से चम्पावत के तल्लीहाट का हुआ जो रीठासाहिब (रीठा) में चला गया था। श्री नवीन वर्मा के दादा कृपालाल वर्मा के चार पुत्रा, दो पुत्रियां हुईं- हीरा लाल, मोहन लाल, विशन लाल, देवीलाल, मोहनी और जयन्ती। इसके बाद हीरा लाल जी परिवार में राजेन्द्र लाल, प्यारेलाल, सुरेश वर्मा, कलावती वर्मा। मोहन लाल जी परिवार में नवीन चन्द्र, पूरन चन्द्र, स्व. विपिन, दिनेश चन्द्र, कुसुम वर्मा। विशन लाल जी के परिवार में प्रेमा वर्मा, स्व. गिरीश, भुवन चन्द्र, विमला वर्मा, मीना वर्मा, सुध्ीर, दीपा वर्मा, ललित। देवीलाल जी के परिवार में स्व. किशन वर्मा, स्व. किशोर, दीप चन्द्र, सुनील वर्मा।
सन् 1967 तक कृपालाल जी के इस संयुक्त परिवार का एक पड़ाव हल्द्वानी का भाबर था। जाड़ों में परिवार रीठा से हल्द्वानी आ जाता था। सन् 1968 के बाद हल्द्वानी में स्थायी रूप से निवास करने लगा। हल्द्वानी के पटेल चौक में ही नवीन वर्मा का जन्म हुआ। अपने नैनीहाल पहाड़पानी में रहकर जूनियर हाईस्कूल, चम्पावत से हाईस्कूल, एमबी कालेज हल्द्वानी से इण्टर, अल्मोड़ा में बीएससी, नैनीताल में एमएससी करने वाले श्री वर्मा जी का पैतृक कार्य स्वर्णाभूषण से जुड़ा था लेकिन इनकी रुचि खेल, घुमक्कड़ी, सामाजिक कार्यों में रही है। वर्तमान में तिकोनिया के गुरुतेगबहादुर मार्ग में उनका अपना आवास है। उनके साथ सौ वर्षीय माता श्रीमती माधुरी वर्मा का आशीर्वाद है। उनकी सामाजिक अभिरुचि में साथ देने वाली पत्नी श्रीमती बीना वर्मा हैं। वर्मा जी की अगली पीढ़ी में पुत्री अमिता वर्मा, दीपक वर्मा, तनुज वर्मा हैं।
इस प्रकार भले ही तल्लीहाट फिर रीठा से वर्मा परिवार का आगमन इस भाबर में हुआ है लेकिन नवीन वर्मा तो पूरी तरह जन्म से लेकर हल्द्वानी की पहचान हैं। यही कारण है शहर में नियोजित विकास को लेकर उनकी पुरानी मुहीम रही है। कारोबार के रूप में उनका ज्वैलरी का प्रतिष्ठान है लेकिन उनकी दौड़धूप से कोई नहीं कहेगा वह व्यापारी हैं। अपने पम्परागत कार्य पर चर्चा करते हुए वर्मा जी कहते हैं- पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं। पहाड़ों में जिस प्रकार की ज्वैलरी का चलन रहा है, हम जैसे-जैसे चीन सीमा की ओर को जाएंगे वहाँ चाँदी का ज्यादा चलन है। मैदान को आते-आते इनका प्रकार बदल जाता है और सोने के आभूषण दिखाई देते हैं। पहले 250 ग्राम तक के सूते/सुतले गले के बनते थे। हाथ के धागुले 200 ग्राम तक और हसुली लगभग आधा किलो तक की होती थी। कमरबन्ध तो 500 ग्राम से कम के बनते ही नहीं थे। पहाड़ों में सोना उतना नहीं था लेकिन चाँदी के चलन ने सारे रिवाज पूरे किये, जो आज तक भी बने हुए हैं।
अपनी पढ़ाई के साथ खेल व टेªकिंग में अभिरुचि रखने वाले वर्मा जी ने पैदल यात्रा करते हुए दो बार कैलास मानसरोवर और 5 बार आदि कैलास यात्रा की है। वह कहते हैं- यात्राओं मेें बहुत कुछ देखने और सुनने-सीखने को मिलता है। मालपा में प्रकृति के कोहराम से पहले उन्होंने कह दिया था कि मालपा से बूदी के बीच गरमपानी के कई स्रोत हैं जिससे विस्फोट हो सकता है। अपनी यात्राओं में वह केवल जाना-जाना नहीं करते बल्कि हर यात्रा के पीछे अध्ययन भी होता रहा है। हल्द्वानी के भवानीगंज स्थित डॉ. निर्मल मुनगली के वहाँ किराये पर रहते हुए 1968 में इन्होंने अपना मकान बनाया। साथ ही शहर की हर भली गतिविधियों में जुड़े रहे। 1986 में व्यापार मण्डल से जुड़ गए। नगर उपाध्यक्ष, महामंत्री, प्रदेश मंत्राी रहे। पृथक राज्य बनने के बाद 2004 में व्यापार मण्डल के संयुक्त महामंत्री, 2009 से 2018 तक महामंत्री और 2018 से प्रदेश अध्यक्ष हैं।
राज्य आन्दोलनकारी के रूप में इनकी अग्रणीय भूमिका रही है। राज्य आन्दोलनकारी छात्रा संघर्ष समिति की टीम में 5 प्रमुख लोग थे जिसमें एन.सी.तिवारी संयोजक, हेमन्त बगड्वाल, दीवान सिंह बिष्ट, हुकुम सिंह कुंवर और वर्मा जी। 1998 में जमरानी बांध निर्माण संघर्ष समिति बनी, उसमें भी ये नेतृत्व की भूमिका में थे। जमरानी बांध आन्दोलन को लेकर बंशीधर भगत शुरुआत से रहे हैं लेकिन आन्दोलन को आगे बढ़ाने में इस समिति का योगदान गिना जाता है।
खेलों में रुचि के कारण नवीन वर्मा इससे जुड़े रहे हैं। 2004 सुरेन्द्र रावत जी ने स्पोटर््स एसोसिएशन बनाई थी। 1998-99 में विविधवत रूप से हल्द्वानी महोत्सव की नींव रखी। इस प्रकार शहर व इससे बाहर भी हर प्रकार से समर्पित रहते हुए नवीन वर्मा ने जिस प्रकार का मुकाम पाया है वह हमेशा सूझबूझ मार्ग दिखाने वाला रहा है। पार्टियों के झण्डे एक तरफ, इनकी स्वयं की ईमानदारी सकारात्मक उर्जा देती है।