जलद का शीतकालीन पड़ाव तेजम

केदार सिंह रावत से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती

जोहार के ‘खड़कू गीता’ के बारे में पिघलता हिमालय ने अपने पुराने अंक में जानकारी दी थी। इसी परिवार के श्रीमान केदार सिंह रावत एयरइण्डिया में रहते हुए दुनिया के आलौकिक नजारों को महसूस करने वालों में से हैं। एकदम सीधा सच्चा जीवन जीने में विश्वास करने वाले रावत जी से बातचीज करने से पहले इनके बारे में जानते हैं- मिलम के तिब्बत व्यापारी खड़क सिंह रावत गीता, रामायण का रुचिपूर्ण पाठ करने के अलावा वैद्यगिरी में माहिर थे, जिस कारण ‘खड़कू गीता’ या ‘गीता’ नाम से उन्हें पहचान मिल गई। आयुर्वेद के जानकार होने के कारण यह इलाज भी कर देते। व्यापारी होने के नाते दिल्ली में भी इनका सम्पर्क था, जिससे यह दवाई की खुराक मंगवा लिया करते थे। वैद्यगिरी में स्थानीय जड़ी-बूटी का प्रयोग करते। धर्मपरायण होने के कारण इन्होंने अपने पुत्रों के नाम- देवराम सिंह, हरीराम सिंह, दयाराम सिंह, श्रीराम सिंह रखा। आज भी तेजम में इनके कुनबे की पहचान ‘गीता’ या ‘खड़कू गीता’ का परिवार के रूप में है। इन चार भाईयों में श्रीराम सिंह रावत के सुपुत्र हुए- डॉ. जी.एस. रावत (देहरादून) और के.एस. रावत (हल्द्वानी)।
जोहार-मुन्स्यार के जलद में रहने वाले रावत परिवारों को शीत कालीन पड़ाव तेजम हुआ करता था, जिस कारण यह तेजम में भी बस गये। जलद में ही केदार सिंह का जन्म 1955 में हुआ। बचपन बीतने के बाद बीएससी करने के लिये यह अल्मोड़ा आ गये, इसी कक्षा का पार्ट-2 करने के लिये नैनीताल का चयन किया क्योंकि उस समय इनके भाई भीमताल में थे। इसके बाद इन्होंने आगे एमए करने की तैयारी की लेकिन इनके मामा श्री लक्ष्मण सिंह पांगती ने लखनउ से एक विज्ञापन की सूचना इन्हें भेज दी, जो एयरइण्डिया की थी। रावत जी दिल्ली चले गये और चयन, टेनिंग के बाद 1978 में एयरइण्डिया में लग गये। बात लक्ष्मण सिंह पांगती की करें तो लखनउ में रहते हुए श्री पांगती जी का दिशा-निर्देश हमेशा अपने समाज के लिये रहा है। जोहार की लोक संस्कृति और इतिहास पर लिखने वाले और समाज सुधारक बाबू राम सिंह की सुपुत्री तुलसी देवी का विवाह श्रीराम सिंह रावत से हुआ था (केदार सिंह जी माता)। इनके सुपुत्र लक्ष्मण सिंह ने भी जोहार के इतिहास और संस्कृति को सहेजने का काम किया है। साथ ही युवाओं को आगे बढ़ाने में प्रोत्साहित भी किया।
हाँ, तो बात तेजम और रावत जी की हो रही थी। एयरइण्डिया में नौकरी भले ही के.एस.रावत जी करने लगे थे लेकिन इनके मन-मस्तिष्क में अपना बचपन अपना पहाड़ कौंधता रहता। हवाई यात्राओं में दुनिया के आलौकिक नजारे बहुत देखे लेकिन अपनी जड़ों को कैसे भूल सकते थे। दिल्ली में सारी सुख-सुविधाओं के बीच भी इनका जुड़ाव अपने पहाड़ से बना रहा है। इनकी पत्नी श्रीमती कुसुमलता रावत दिल्ली में ही न्यू इण्डिया इंश्योरेंश कम्पनी में थीं। जो हल्द्वानी में इसी कम्पनी की डप्टी मैनेजर के पद से 2021 में सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। इससे पूर्व श्री रावत जी 2013 में एयरइण्डिया से मैनेजर पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे लेकिन एक हादसा उन्हें परेशान करने वाला रहा वह 2011में हुआ जब वह पैदल घूमने निकले थे किसी मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मारी जो उनके पैर को बुरी तरह घायल कर गई। ऐसे में चाह कर भी लम्बी यात्राओं से बचाव करना होता है। इनके सुपुत्र विजेन्द्र सिंह और सुपुत्री रुचि दिल्ली में ही कार्यरत हैं जबकि रावत दम्पत्ति हल्द्वानी के छड़ायल नयाबाद क्षेत्र में निवास कर रहे हैं।
श्री रावत को एयरइण्डिया में सेवा के दौरान खासे अवसर मिले जब वह देश के शीर्षतम लोगों की फ्लाइट जानी होती थी। सन् 1981 में पहली बार जब प्रधनमंत्री राजीव गांधी चायना गये, तब रावत जी को साथ जाने का मौका मिला। इसी प्रकार राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के साथ साउथ अमेरिका, ब्राजील, मैक्सिको, प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह के साथ जर्मनी दौरे किया। 2010 के कामनवेल्थ गेम्स के लिये मिली बड़ी जिम्मेदारी इन्होंने निभाई जब आस्ट्रेलिया के करीब दस छोटे-छोटे देशों के खिलाड़ियों को एकत्रित कर गेम्स के लिये दिल्ली जाया गया। इन प्रकार की जिम्मेदारियों को बेहतरीन तरीके से निभाना और अपनी जड़ों के साथ जुड़े रहने वाले रावत जी आज भी युवाओं के लिये प्रेरणा हैं कि यदि इच्छा हो तो किसी भी जगह पर आप अपनी खूबियों को दिखा सकते हो।

स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया जोहार का अनमोन नगीना

जब दुर्गा की याद में स्मृति अंक लेकर मुनस्यारी गये आनन्द

डॉ.पंकज उप्रेती
‘पिघलता हिमालय’ इस अंक के साथ ही अपनी स्थापना के 48 वर्ष पूर्ण कर चुका है। अगला अंक स्थापना के 49वें वर्ष में प्रवेश कर जाएगा। समाचार-विचार की इस लम्बी यात्रा में स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया की 86वीं जयन्ती भी है। मात्र 50साल की उम्र में वह महकता सितारा टूट गया था जिसकी यादें आज भी ‘पिघलता हिमालय’ के रूप में हैं।
समाचारों की दुनिया इस पूरी दुनिया में हिलोरे लेने लगी है और तरह-तरह के मनोरंजन के साध्नों पर लोग व्यस्त हैं परन्तु जीवन-जगत की सच्चाई तो यही है कि जब आप एकान्त या अकेले में हो तो आपकी अपनी दुनिया आपके मस्तिष्क में घूमने लगती है। अपने साथी के जाने के बाद ‘पिघलता हिमालय’ का एक विशेष अंक लेकर स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती मुनस्यारी गये थे। विश्व पर्यावरण दिवस पर जिस दिन स्व. मर्तोलिया की जन्मदिन होता है उसी दिन को याद करते हुए 1994 को दुर्गासिंह की स्मृति में यह अंक निकला था। यह केवल अंक नहीं बल्कि अपनों को जोड़ने का सीधा सा यत्न था। अंक की तैयारी के लिये नैनीताल से गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ भी हमारे घर/प्रेस ‘शक्ति प्रेस हल्द्वानी’ आए और विचार किया गया। उस दौर के संसाधनों के हिसाब से मुरादाबाद से ब्लाक बनवाना, स्क्रीन प्रिंटिग करवाना जैसे कार्य करवाए गए। इस अंक में नागार्जुन की कविता के अलावा काशीसिंह ऐरी की पहाड़ को लेकर लम्बी कविता प्रकाशित है। स्व. उमेद सिंह मर्तोलिया ने अपने भाई दुर्गा की जीवनी लिखी। सम्पादकीय मेें स्व. आनन्द बल्लभ जी ने ‘जनम अखबार का’ शीर्षक से उस सत्य को सबके सामने रख दिया जो आपाधापी में उलझे लोगों को झकझोर सकता है। कितनी पवित्रता के साथ ‘पिघलता हिमालय’ की कल्पना है इससे पता चलता है।
अंक में उम्मेद सिंह जी लेख ‘लिपू लेख पास के इस और उस पार’, श्रीराम सिंह धर्मशक्तू का लेख- ‘पिघलता हिमालय पिघलता समाज’ है। नेत्र सिंह रावत को याद करते हुए ‘पत्थर और पानी’ यात्रा संस्मरण का उल्लेख है। शेर सिंह पांगती का लेख- ‘तिब्बती शौका मित्रता’ उत्तम सिंह सयाना का जड़ीबूटियों से सम्बन्धी लेख है।
अंक की इस महक को लेकर स्व. आनन्द बल्लभ जी अपने मित्र स्व. दुर्गा सिंह की कर्मभूमि/जन्मभूमि मुनस्यारी गये। साधन/संसाध्नों की कमी अपनी जगह थी लेकिन जलाए गये दिए को बचाए रखने की जिद अपनी जगह। मुनस्यारी में उप्रेती जी के साथ पत्रकार स्व.पारसनाथ और श्री हरीश पन्त भी गये। आयोजन में ‘दुर्गा स्मृति अंक’ वितरित करने के साथ ही सभा हुई। हर कोई इस बात को कह रहा था ‘पिघलता हिमालय’ के रूप में दुर्गा सिंह की यादें जिन्दा हैं। इस सभा में गणमान्य जनों ने सीमान्त की समस्याओं के साथ ही उन क्षणों का स्मरण किया जब दुर्गा सिंह व्यवस्था के लिये शासन प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल देते थे। दुर्गा सिंह का भोलापन, फक्कड़पन, पियक्कड़ी, घुमक्कड़ी से लेकर अपने समाज को स्थापित करने के लिये जुनून का उल्लेख हुआ। इसी सभा में आनन्द बल्लभ उप्रेती ने हिमालय की गोद में बसी संस्कृति से लेकर जीवन के सच का यादगार व्याख्यान दिया था।
वर्षों की इस यात्रा में हमारे बीच पिघलता हिमालय के संस्थापक आनन्द बल्लभ उप्रेती, दुर्गासिंह मर्तोलिया और श्रीमती कमला उप्रेती नहीं हैं लेकिन उनकी व उनके साथ अनन्त यात्रा पर निकले तमाम साथियों की यादें धरोहर के रूप में है। यह केवल समाचार पत्र नहीं बल्कि इतिहास का भण्डार हो चुका है और जब-जब सीमान्त की वादियों पर शोध होंगे यह दस्तावेज बुनियाद होगा।

‘खड़कू लासा’ नाम से जाने जाते हैं ल्हासा जाने वाले खड़क सिंह

-डॉ.देवराज पांगती से बातचीज
-शौका समाज से वाई.एस.पांगती के बाद देवराज ने की थी पीएचडी
-डीडीहाट में अपनी संस्कृति बनाए रखने के लिये नन्दा और रघुनाथ मन्दिर बनाया
-डाक्टर ललित सिंह पांगती ने पिथौरागढ़ में खोला था पहला अस्पताल
डॉ.पंकज उप्रेती

आज का बाजार रसोईघर तक घुस चुका है और मिलावट का सामान चारों ओर सजा है। उन दिनों की सुनहरी यादें इतिहास बन चुकी हैं जब व्यापारी घोर यात्राओं के बाद भी रचते-बसते थे और विशुद्ध वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था। भारत-तिब्बत व्यापार में शुरुआती व्यापार में जाने वाले खड़क सिंह पांगती ‘खड़कू लासा’ परिवार के डॉ.देवराज सिंह पांगती के साथ प्रस्तुत है आज की वार्तालाप और रोचक जानकारियां। इससे पहले परिवार के बारे में बताते हैं।
खड़क सिंह पांगती जोहार घाटी के बड़े व्यापारियों में थे। 19वीं सदी के अन्त 20 वीं सदी के शुरुआत में इनकी सक्रियता थी। जोहार से तिब्बत-ल्हासा जाने वाले शुरुआती भारतीय व्यापारियों में से एक थे। मिलम-उंटाधुरा-तकलाकोट के रास्ते होने वाले व्यापार में उन, नमक, पश्मीना इत्यादि ले जाते और बदले में अनाज, गुड़, कपड़ा लाते थे। सदियों का यह व्यापार 1962 के चीन-भारत युद्ध थम गया। शुरुआती दौर में ‘ल्हासा’ जाने के कारण खड़क सिंह जी को लोक परिवेश मेें ‘खड़कू लासा’ नाम से जाना जाता था, जो वर्तमान तक भी प्रसिद्ध है। खड़क सिंह जी के तीन सुपुत्र हुए- जोत सिंह, खुशाल सिंह, ललित सिंह। जोत सिंह पांगती के परिवार में देवराज पांगती, गंगा, गीता, विमला। खुशाल सिंह के परिवार में सुशील पांगती। डॉ. ललित सिंह पांगती का असमय निधन हो गया। यह इलाहाबाद में शिक्षा ग्रहण करने के बाद पिथौरागढ़ लौटे और स्वास्थ्य व्यवस्था को देखते हुए सबसे पहला अस्पताल खोला था।
शिक्षावविद् डॉ. देवराज सिंह पांगती अपने परिवार की पृष्ठभूमि के अनुरूप गहरे व्यक्तित्व के हैं। पिथौरागढ़ मुख्यालय में निवास करने वाले पांगती जी के परिवार में श्रीमती रीता पांगती, सुपुत्र डाक्टर सौरभ पांगती हैं। जबकि विवाहित पुत्रियों में विनीता और मनीषा हैं। सन् 1955 में डीडीहाट में जन्मे पांगती जी बताते हैं कि बूबू खड़क सिंह 1947 में डीडीहाट आ गये थे। उन दिनों जबकि भारत-तिब्बत व्यापार बदस्तूर जारी था, बूबू की दूरदृष्टि थी वह डीडीहाट आएऔर दुकान खोली। इन्हंे देखा-देखी जोहार से अन्य परिवार भी डीडीहाट आए। तब इसे दिगतड़ ही कहते थे और पशुचारक अपने अनुरूप जगह चयन कर बैठते। शौका समाज ने अपनी बसासत के साथ अपनी संस्कृति को यहाँ स्थापित किया। नन्दा माई और रघुनाथ जी का मन्दिर बनाया गया। नन्दा मन्दिर स्थापना के समय तत्कालीन एसडीएम वर्मा जी का काफी योगदान रहा है।
देवराज जी की हाईस्कूल तक की शिक्षा डीडीहाट में ही हुई। 1960 में यहाँ तहसील बनी और स्कूल स्थापित होने लगे। उस समय नारायण नगर में शिक्षण की व्यवस्था थी जहाँ भागीचौरा, डीडीहाट, गर्खा तमाम जगह से विद्यार्थी आकर शिक्षा ग्रहण करते लेकिन इन्होंने सीमान्त छात्रावास में रहते हुए पिथौरागढ़ से इण्डरमीडिएट किया। इसके बाद स्नातकोत्तर भी वहीं रहते किया। डॉ. डी.सी. पाण्डे के निर्देशन में राजनीति विज्ञान विषय से पीएचडी की। तब तक जोहार घाटी से प्रोफेसर वाई.एस.पांगती पहले पीएचडी करने वाले थे जो विज्ञान वर्ग थे। इसके बाद कला वर्ग से पहले व्यक्ति प्रोफेसर देवराज सिंह पांगती हुए। इनको देखादेखी हाल के समय में कुछ युवा उच्चशिक्षा में पर्दापण कर चुके हैं।
अपनी शिक्षा के बाद 1982 में डॉ. देवराज पिथौरागढ़ कालेज में नियुक्त हुए। 1998 में नारायण नगर कालेज में प्राचार्य रहे, बलुवाकोट कालेज भी इनकी देखरेख में था। प्रमोशन होने पर 2009 में लोहाघाट गये और 2011 में पुनः पिथौरागढ़ आए और फरवरी 2020 में यहीं से सेवानिवृत्त हुए। ऐसे दौर में जब कालेजों में राजनीति हाबी हो चुकी है और निरंकुशता है, इन्होंने बहुत ही कुशलता के साथ संचालन किया। इसी अनुरूप इनका विदाई समारोह भी दिखाई दिया था।
डॉ. देवराज जी अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि डीडीहाट छोटा सा बाजार था। इसमें पुराने व्यापारियों में धनसिंह बूबू का ‘पांगती बुक भण्डार’ आज तक प्रतिष्ठित है। पूरन सिंह टोलिया बेहद सक्रिय थे और उनकी कन्ट्रोल की दुकान थी। बाद में देखादेखी कई लोग माइग्रेट होकर यहाँ बसे। रामलीला मैदान क्षेत्र मैदान था जिसमें बच्चे खेलते थे। इलाके के मुख्य व्यापारी जोहार के थे, जो अब अन्य स्थानों को जाने लगे हैं।
बातचीज के इस क्रम में श्रीमान दुष्यन्त सिंह पांगती बताते हैं कि डॉ. देवराज के पिता जोत सिंह जी रामलीला कलाकार भी थे। दशरथ, जनक की भूमिका में उन्हें आज भी याद किया जाता है। इस प्रकार बूबू खड़कू लासा की पीढ़ियां अपने कारोबार के साथ अपनी संस्कृति को बनाए हुए हैं।

तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

तिब्बत व्यापार के वो दिन और खाजा-खजूरे

श्रीमती पार्वती रावत-श्रीमती हेमा बृजवाल से बातचीज

डॉ. पंकज उप्रेती

भारत-चीन व्यापार की वर्तमान स्थितियां एकदम अलग हैं। इस बार लम्बे अन्तराल के बाद यह व्यापार होने वाला है, जो कोरोना कारणों से स्थगित था। इसकी तैयारी हो रही है। लेकिन हमारे सीमान्त क्षेत्र से इस व्यापार की असल परम्परा इतिहास और संस्कृति का आधार है। सीमान्त के व्यापारी अपने तिब्बत मित्रों के साथ किस प्रकार से व्यवहार रखते थे वह जानना बहुत शिक्षाप्रद है क्योंकि दुर्गम स्थानों पर प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए जो कुछ किया जाता था वह त्यौहार सा माहौल बन जाता था। ऐसी ही रोचक जानकारियों के लिये आज श्रीमती हेमा बृजवाल और श्रीमती पार्वती रावत से बातचीज प्रस्तुत है। हेमा बृजवाल और पार्वती रावत आपस में समधन हैं। इन दोनों को ही बचपन में वह अवसर देखने का सौभाग्य है जब इनके घरों से तिब्बत व्यापार के लिये जाते थे और सारे ग्रामवासी व्यापारियों को जाते समय विदाई करते और आने पर स्वागत। बताते हैं- रास्ते के लिये भरपूर खाजा-खजूरे बनाये जाते थे। बातचीज का सिललिसा चलता रहे इससे सबसे पहले हेमा बृजवाल जी के बारे में बताते हैं। दरकोट में पिता जीवन सिंह सयाना माता श्रीमती खिमुली देवी के घर इनका जन्म हुआ। तल्ला दुम्मर बृजवाल परिवार में इनका विवाह हुआ। स्व. प्रताप सिंह बृजवाल के सुपुत्र थे स्व. जसवन्त सिंह जी। हेमा देवी का विवाह जसवन्त सिंह जी के साथ हुआ। इनकी अगली पीढ़ी में स्व. केदार सिंह, मनोहर सिंह, प्रेम सिंह, वीरेन्द्र सिंह और अंजू पांगती हैं। तिब्बत व्यापारी परम्परा में प्रत्येक परिवार से कोई न कोई जाता था जब 12 साल की उम्र में जसवन्त सिंह जी भी अपने परिवार से व्यापार में गये।
हेमा देवी का बचपन दरकोट, मल्ला दुम्मर में बीता। इनके बचपन की सखियों में रुकमणि देवी, पानुली देवी, हरकी देवी रहे हैं। अपने मायके में व्यापार की जिस परम्परा को इन्होंने देखा वही सब ससुराल में भी था। विवाह के बाद एक वर्ष तक यह मल्ला दुम्मर रहीं और फिर पति संग अल्मोड़ा आ गई। 1951 में जसवन्त सिंह बृजवाल ने यहाँ कारपेट एण्ड जनरल स्टोर खोला। थोक का व्यापार बेहतर चल निकला क्योंकि बृजवाल दम्पत्ति अथाह मेहनती थे। पहले यह गंगोला मोहल्ले में रहते थे, बाद में धर की तूनी शैल गाँव में अपना मकान बना लिया। हेमा बृजवाल अपनी उनी कारोबार की परम्परा को अल्मोड़ा में भी बनाए हुए थीं और इन्होंने एक सेन्टर चलाया जिसमें दन गलीचे, पंखी, पसमीना बनाया जाता था। बकायदा बालिकाओं को इसकी ट्रेनिंग दी जाती थी। सेन्टर चलाने के लिये शुरू में लखनउफ से सरकारी इन्तजाम भी हुए जो साल तक थे, इसके बाद अपने आप से आठ वर्ष तक इस सेन्टर को इन्होंने चलाया। सेन्टर में बनने वाले विभिन्न आकार के गलीचेे व उनी सामग्री को लेने लोग इनके पास आने लगे थे। इसके अलावा उत्तरायणी मेले में बागेश्वर और व्यापारिक मेले जौलजीवी में तक यहाँ से सामान जाता था।
अब श्रीमती पार्वती रावत जी के बारे में बताते हैं। इनके बूबू प्रेम सिंह जंगपांगी और पिता मेघ सिंह जी हुए। थल, मल्ला दुम्मर और बुर्फू तक माइग्रेशन परम्परा मेें परिवार की घुमन्तु व्यवस्था थी। साथ ही तिब्बत व्यापार का कारोबार। पार्वती देवी की शिक्षा माइग्रेशन स्कूलों की उस परम्परा में हुई है। तिकसैन मुनस्यारी में रहते हुए नमजला जाकर उन्होंने पढ़ाई की। वह बताती हैं गुरुजन अपने शिष्यों के लिये बहुत मेहनत करते थे। बच्चों द्वारा भी अपने गुरुजनों के लिये बहुत आदर था और बारी-बारी से खाद्य सामग्री, आटा-गुड़-घी, चूल्हा जलाने को लकड़ी उन्हें देते थे। ऐसे में शिक्षकों को माइग्रेशन जैसी शिक्षा व्यवस्था भी नहीं अखरती और वह चित्त लगाकर मेहनत करते थे।
कुशाग्र बुदिृध की पार्वती देवी शिक्षा के बाद शिक्षा विभाग में ही नौकरी करने लगी। नौकरी में वह अल्मोड़ा से धारचूला भी गईं लेकिन विवाह के बाद नौकरी छोड़ दी और एनटीडी, अल्मोड़ा अपने ससुराल में हैं। किशन सिंह रावत परिवार से इनका सम्बन्ध है। किशन सिंह जी के सुपुत्रों में विंग कमाण्डर नौसेना ज्योति सिंह, कर्नल रणजीत सिंह, कर्नल थल सेना खुशाल सिंह, विंग कमाण्डर वायु सेना प्रतिमन सिंह हैं।
खुशाल सिंह की सुपुत्री हुईं स्व.प्रोमिला देवी इनकी अगली पीढ़ी में नेहा बृजवाल जो दिल्ली में पीएनबी में मैनेजर हैं। इस पारिवारिक ताने-बाने के बीच पार्वती रावत अपने बचपन को याद करते हुए बताती हैं- तिब्बत यात्रा पर जाने वालों के लिये खाजा-खजूरे, सत्तू तैयार कर रखते थे। एक दिन पहले आसपास सारे लोगों को बुलाकर आयोजन होता था। आलू-पूरी ज्या जैसे व्यंजनों के साथ सब बैठक करते। ढोल वादक भी बुलाए जाते थे। रात्रि के इस आयोजन के बाद अगले दिन जब तिब्बत यात्रा पर व्यापारी निकलते तो उन्हें छोड़ने के लिये दूर तक जाते। जब व्यापार करके हूणदेश से लोग वापस आते थे तो तब भी घर लीपघीस कर खूब सजाया जाता था। व्यापारियों के आने का स्वागत किया जाता था। बचपन की यादगार बातों में वह बताती हैं- बूबू और पिता जी जब तिब्बत व्यापार से लौटकर आते थे तो अपने साथ लाए सामान को देखते और सबको दिखाते। इसके अलावा एक कमरे में पैसोें का हिसाब जोड़ते, तब बच्चों को वहाँ से हटा देते लेकिन हम छोटे बच्चे दीवारों के औने-कौने से देखते क्या हो रहा है। उस कमरे में चाँदी के सिक्कों के ढेरों को अलग-अलग कर लगाते हुए गिनती होती थी। एकआना, दोआना से लेकर अलग-अलग चाँदी के सिक्कों के ढेर बच्चों के लिये कौतूहल था, जो कि व्यापारियों ने दुर्गम यात्रा करते हुए जान जोखिम में डालकर अपने व्यापार में जुटाए थे।

पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं, आधा किलो तक की हसुली बनती थी

नवीन चन्द्र वर्मा से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती
उत्तराखण्ड सरकार में वरिष्ठ नागरिक कल्याण परिषद के उपाध्यक्ष श्री नवीन वर्मा भले ही राज्यमंत्री का दर्जा रखते हैं लेकिन उनकी कार्यशैली और समाज के लिये सोच उन्हें काफी आगे पहले से बनाए हुए है। व्यापारी नेता, उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के अलावा स्वच्छ छवि के चलते उन्हें सरकार में भी जो अवसर मिला है उनके अनुभवों का लाभ समाज को होना ही है। मूलरूप से स्वर्णाभूषण के कारोबारी परिवार से होते हुए भी नवीन वर्मा जी सोच केवल व्यापारी बनकर रहने की नहीं रही और वह सामाजिक कार्यों में हाथ बंटाते रहे हैं। उत्तराखण्ड की राजनीति और यहाँ के व्यापारी नेता के रूप में वह कितने मजबूत हैं यह जानने से पहले वर्मा परिवार के बारे में आपको बताते हैं।
यह वर्मा परिवार मूलरूप से चम्पावत के तल्लीहाट का हुआ जो रीठासाहिब (रीठा) में चला गया था। श्री नवीन वर्मा के दादा कृपालाल वर्मा के चार पुत्रा, दो पुत्रियां हुईं- हीरा लाल, मोहन लाल, विशन लाल, देवीलाल, मोहनी और जयन्ती। इसके बाद हीरा लाल जी परिवार में राजेन्द्र लाल, प्यारेलाल, सुरेश वर्मा, कलावती वर्मा। मोहन लाल जी परिवार में नवीन चन्द्र, पूरन चन्द्र, स्व. विपिन, दिनेश चन्द्र, कुसुम वर्मा। विशन लाल जी के परिवार में प्रेमा वर्मा, स्व. गिरीश, भुवन चन्द्र, विमला वर्मा, मीना वर्मा, सुध्ीर, दीपा वर्मा, ललित। देवीलाल जी के परिवार में स्व. किशन वर्मा, स्व. किशोर, दीप चन्द्र, सुनील वर्मा।
सन् 1967 तक कृपालाल जी के इस संयुक्त परिवार का एक पड़ाव हल्द्वानी का भाबर था। जाड़ों में परिवार रीठा से हल्द्वानी आ जाता था। सन् 1968 के बाद हल्द्वानी में स्थायी रूप से निवास करने लगा। हल्द्वानी के पटेल चौक में ही नवीन वर्मा का जन्म हुआ। अपने नैनीहाल पहाड़पानी में रहकर जूनियर हाईस्कूल, चम्पावत से हाईस्कूल, एमबी कालेज हल्द्वानी से इण्टर, अल्मोड़ा में बीएससी, नैनीताल में एमएससी करने वाले श्री वर्मा जी का पैतृक कार्य स्वर्णाभूषण से जुड़ा था लेकिन इनकी रुचि खेल, घुमक्कड़ी, सामाजिक कार्यों में रही है। वर्तमान में तिकोनिया के गुरुतेगबहादुर मार्ग में उनका अपना आवास है। उनके साथ सौ वर्षीय माता श्रीमती माधुरी वर्मा का आशीर्वाद है। उनकी सामाजिक अभिरुचि में साथ देने वाली पत्नी श्रीमती बीना वर्मा हैं। वर्मा जी की अगली पीढ़ी में पुत्री अमिता वर्मा, दीपक वर्मा, तनुज वर्मा हैं।
इस प्रकार भले ही तल्लीहाट फिर रीठा से वर्मा परिवार का आगमन इस भाबर में हुआ है लेकिन नवीन वर्मा तो पूरी तरह जन्म से लेकर हल्द्वानी की पहचान हैं। यही कारण है शहर में नियोजित विकास को लेकर उनकी पुरानी मुहीम रही है। कारोबार के रूप में उनका ज्वैलरी का प्रतिष्ठान है लेकिन उनकी दौड़धूप से कोई नहीं कहेगा वह व्यापारी हैं। अपने पम्परागत कार्य पर चर्चा करते हुए वर्मा जी कहते हैं- पर्वतीय आभूषणों का कोई सानी नहीं। पहाड़ों में जिस प्रकार की ज्वैलरी का चलन रहा है, हम जैसे-जैसे चीन सीमा की ओर को जाएंगे वहाँ चाँदी का ज्यादा चलन है। मैदान को आते-आते इनका प्रकार बदल जाता है और सोने के आभूषण दिखाई देते हैं। पहले 250 ग्राम तक के सूते/सुतले गले के बनते थे। हाथ के धागुले 200 ग्राम तक और हसुली लगभग आधा किलो तक की होती थी। कमरबन्ध तो 500 ग्राम से कम के बनते ही नहीं थे। पहाड़ों में सोना उतना नहीं था लेकिन चाँदी के चलन ने सारे रिवाज पूरे किये, जो आज तक भी बने हुए हैं।
अपनी पढ़ाई के साथ खेल व टेªकिंग में अभिरुचि रखने वाले वर्मा जी ने पैदल यात्रा करते हुए दो बार कैलास मानसरोवर और 5 बार आदि कैलास यात्रा की है। वह कहते हैं- यात्राओं मेें बहुत कुछ देखने और सुनने-सीखने को मिलता है। मालपा में प्रकृति के कोहराम से पहले उन्होंने कह दिया था कि मालपा से बूदी के बीच गरमपानी के कई स्रोत हैं जिससे विस्फोट हो सकता है। अपनी यात्राओं में वह केवल जाना-जाना नहीं करते बल्कि हर यात्रा के पीछे अध्ययन भी होता रहा है। हल्द्वानी के भवानीगंज स्थित डॉ. निर्मल मुनगली के वहाँ किराये पर रहते हुए 1968 में इन्होंने अपना मकान बनाया। साथ ही शहर की हर भली गतिविधियों में जुड़े रहे। 1986 में व्यापार मण्डल से जुड़ गए। नगर उपाध्यक्ष, महामंत्री, प्रदेश मंत्राी रहे। पृथक राज्य बनने के बाद 2004 में व्यापार मण्डल के संयुक्त महामंत्री, 2009 से 2018 तक महामंत्री और 2018 से प्रदेश अध्यक्ष हैं।
राज्य आन्दोलनकारी के रूप में इनकी अग्रणीय भूमिका रही है। राज्य आन्दोलनकारी छात्रा संघर्ष समिति की टीम में 5 प्रमुख लोग थे जिसमें एन.सी.तिवारी संयोजक, हेमन्त बगड्वाल, दीवान सिंह बिष्ट, हुकुम सिंह कुंवर और वर्मा जी। 1998 में जमरानी बांध निर्माण संघर्ष समिति बनी, उसमें भी ये नेतृत्व की भूमिका में थे। जमरानी बांध आन्दोलन को लेकर बंशीधर भगत शुरुआत से रहे हैं लेकिन आन्दोलन को आगे बढ़ाने में इस समिति का योगदान गिना जाता है।
खेलों में रुचि के कारण नवीन वर्मा इससे जुड़े रहे हैं। 2004 सुरेन्द्र रावत जी ने स्पोटर््स एसोसिएशन बनाई थी। 1998-99 में विविधवत रूप से हल्द्वानी महोत्सव की नींव रखी। इस प्रकार शहर व इससे बाहर भी हर प्रकार से समर्पित रहते हुए नवीन वर्मा ने जिस प्रकार का मुकाम पाया है वह हमेशा सूझबूझ मार्ग दिखाने वाला रहा है। पार्टियों के झण्डे एक तरफ, इनकी स्वयं की ईमानदारी सकारात्मक उर्जा देती है।