अनुकरणीय हैं अर्जुन सिंह गर्ब्याल

दुर्गम क्षेत्रवासियों के संरक्षक के रूप में रहे हैं
डॉ. पंकज उप्रेती
आर्थिक रूप से सम्पन्न और सक्षम परिवारों की नई पीढ़ी के बच्चों को वर्तमान की चकाचौंध और संसाधनों की भरमार में बहुत सी वह बातें आश्चर्य लग सकती है जब साधन कम होने पर पर भी लोगों में अपनापन और सामाजिक ज्यादा थी। लेकिन वह दिन और वह बातें एकदम सत्य हैं। आवागमन के साधन कम होना, संचार व्यवस्था न होना, चिकित्सा व शिक्षा के मुख्य केन्द्र कुछ ही जगह थे। इसके अलावा अपनों से मिलने की ललक लोगों में ज्यादा थी। ऐसे में कोई भी परिवार चाहे आर्थिक रूप से सक्षम हो या न भी हो तो किसी न किसी रूप में सब एक दूसरे की मदद करते थे। होटलों में रुकने का रिवाज कम था और पढ़ने वाले बच्चों व बीमारों को सहारा देने के लिये लोग तैयार रहते थे। दूसरों की मदद करने में दयालु लोगों का उल्लेख हमेशा होता रहेगा और यह समाज के लिये सबक भी है कि आपसी भाईचारा-एकता के लिये वह परिपाटी बनी रहे। इसमें में कुछ लोग बहुत अग्रणीय रहे हैं, इन्हीं में से एक नाम है श्रीमान अर्जुन सिंह गर्ब्याल।
सीमान्त क्षेत्र गर्ब्यांग की बात करें तो स्व. इन्द्र सिंह गर्ब्याल जी बेहद सादगीपूर्ण जीवन यापन करने वाले हिमालय से अडिग व्यक्तित्व थे। इनके पुत्र हुए- बहादुर सिंह, चन्द्र सिंह, मान सिंह, दिर्क सिंह, राय सिंह। इस बड़े परिवार में से हैं अर्जुन सिंह जी। पिता स्व. बहादुर सिंह व माता स्व. कुसुम गर्ब्याल के वहाँ अर्जुन सिंह, अशोक सिंह, अरविन्द सिंह, धर्मेन्द्र सिंह का जन्म हुआ। भाईयों में ज्येष्ठ अर्जुन गर्ब्याल ने अपनी परिवार परम्परा को बनाए रखा और यही संस्कार सभी भाईयों के रहे हैं। ऐवरेस्ट विजेता योगेश गर्ब्याल भी इन्हीं के परिवार से सम्बन्ध रखते हैं।
श्रीमान अर्जुन सिंह गर्ब्याल की की प्राइमरी शिक्षा अपने ग्राम गर्ब्यांग, गुंजी में हुई और हाईस्कूल धारचूला से किया। तिब्बत-चीन व्यापार बन्द होने के बाद जब ज्यादातर लोग नौकरी की तलाश में निकले, तभी सन् 1980 में इनकी नौकरी रिजर्व बैंक में लगी। बैंकिंग सेवा में रहने के बाद भी गर्ब्याल जी ने अपने हिमालय प्यार को बरकार रखा। लखनउ में रं कल्याण संस्था बनने के साथ जिस प्रकार की गतिविधियां होने लगीं उसमें यह अग्रणीय थे। नारायण सिंह कुटियाल, विशन सिंह बुढ़ाथोकी, सत्यवान सिंह कुटियाल जैसे चिन्तनशील लोगों ने मिलकर लखनउ में नई शुरुआत की। श्रीमान नृप सिंह नपलच्याल जब मनोरंजन कर आयुक्त के रूप में लखनउ में तैनात थे संस्था के रजिस्ट्रेश के कार्य को गति मिली। ये सभी लोग अपनी शासकीय सेवा के अलावा समाजहित में सक्रिय रहते थे। बात जब अर्जुन सिंह जी करें तो याद आता है एकदम शान्त स्वभाव के साथ यह कर्म करने पर विश्वासी रहे हैं। सन् 1986 में जब मैं और भाई धीरज संगीत शिक्षा के सिलसिले में लखनउ जाते थे रिजर्व बैंक का पूरा कार्यालय परिवर्तन चौक के पास हुआ करता था। हल्द्वानी से हावड़ा एक्सप्रेस से लखनउ पहुँचते ही सीधे केशरबाग हाते परिवर्तन चौक के पास प्रेस क्लब में हमारा अड्डा होता। यहीं से पड़ोस में रिजर्व बैंक में ‘पिघलता हिमालय’ के अपने साथियों से मिलने भी जाते थे तो श्रीमान केदार सिंह मर्तोलिया सहित सभी मिल जाते। अर्जुन सिंह जी हमेशा पूछते- कोई नई पुस्तक प्रकाश्शित हुई है, सहयोग के लिये उनका भाव सबके साथ रहा है। समाज में ऐसे अनगिनत लोग हैं जिन्होंने उनके संरक्षण में लखनउ में शिक्षण प्रशिक्षण व सुरक्षा महसूस की।
उत्तराखण्ड बनने के बाद से पहाड़ से लखनउ जाने वालों का रुख कम हुआ है वरना तो उच्चशिक्षा, मेडिकल शिक्षा व अन्य महत्वपूर्ण कार्य व तलाश के लिये लोग उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनउ, इलाहाबाद व दिल्ली सर्वाधिक जाते थे। पहाड़ से लखनउफ जाने वालों युवाओं के मुख्य अड्डे अपने क्षेत्रा के विधायकों से लेकर रिश्तेदारों तक तक हुआ करते थे। सहारा लेकर आगे बढ़े युवा उन स्थितियों को समझते हैं। लखनउ में भले ही उ.प्र. की राजधनी हो लेकिन पर्वतीय समाज का दबदबा हमेशा से रहा है। यहाँ पर्वतीय रामलीला, होली, उत्तरायणी से लेकर हर तरह के उत्सव बराबर होते हैं और पहाड़ी संस्कृति में रमे लोगों का मिलन होता रहता है। आपसी प्रेम व्यवहार के इस ताने-बाने का बना रहना ही सामाजिक सौहार्द है जिसे नई पीढ़ी को समझना चाहिये। हमारे बुजुर्गों ने किन परिस्थितियों में दुर्गम स्थान से सुदूर महानगरों में जाकर अपनी सम्मानित जगह बनाई और अपने समाज के लोगों को हमेशा उत्साहित किया। ऐसा ही संकल्प श्रीमान अर्जुन सिंह गर्ब्याल का रहा है जो कहने से ज्यादा करने पर विश्वास करते हैं।