स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय त्रिलोक सिंह बृजवाल

स्वर्गीय त्रिलोक सिंह बृजवाल हमारे क्षेत्र के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका जन्म 17 सितम्बर 1903 को बिल्जू, जोहार के गाँव में श्री हिम्मत सिंह बृजवाल के घर में हुआ था। जो बचपन से ही जुझारू व समाज के प्रति समर्पित रहते थे। सेवा की भावना उनमें कूट कूट कर भरा हुआ था। ज़रूरतमंदों के लिए वे हमेशा तत्पर तैयार रहा करते थे।
श्री त्रिलोक सिंह बृजवाल ने सन् 1936 में कांग्रेस संगठन में प्रमुख भाग लेना आरम्भ किया, सार्वजनिक सुधार-कार्यो में भी भाग लेते रहे। एक पुस्तकालय की स्थापना की। जिला कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। जिन्होंने 2 फ़रवरी 1941 को अंग्रेजों के खिलाफ तिरंगा उठाकर, स्थान तेजम में तहसील पिथौरागढ़ के  नामक जगह से हमारे पहाड़ों में स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रख कर इस आंदोलन की अलख जला, प्रथम सत्याग्रही के रूप में सत्याग्रह किया।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजवाल की हिम्मत व हौसला को देखकर एकबारगी अंग्रेज भी सकपका गये। उन्होंने इनको समझाने की बहुत कोशिश की पर वह नहीं माने।
श्री त्रिलोक सिंह बृजवाल को देखने के लिए तेजम नामक स्थान में जन सैलाब उमड़ पड़ा था, अंग्रेजों ने त्रिलोक सिंह बृजवाल के हाथों से तिरंगा छुड़ाने की अथक कोशिश की पर वे छुड़ा नहीं पाये। लिहाज़ा उन्होंने बृजवाल को बुरी तरह से लाठी, डंडों व बूटों से पीट पीटकर अधमरा कर दिया। तत्पश्चात् गिरफ़्तार कर अपने साथ ले जाकर अल्मोड़ा जेल में डाल दिये। अल्मोड़ा जेल में उनको काफ़ी यातनायें दी गयी, जहाँ पर वे 7 जून 1941 तक रहे, तत्पश्चात् उनको बरेली जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। जहाँ वे 25 अगस्त 1941 तक रहे। उनके ऊपर आर्थिक दंड के रूप रुपया 150/- भी लगाया गया। तभी से तहसील सत्याग्रह संचालक का कार्य करते रहे। थल में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की।
जब वे युवाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से क्षेत्र के भ्रमण कर रहे थे व “अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन” को सफल बनाने के उद्देश्य से नामिक से दानपुर होते हुए अल्मोड़ा के राह में खाड़बगड़ स्थान पहुँचे थे तब उन्हें 10 अक्तूबर 1942 को खाड़बगड़ से गिरफ्तार कर पुनः जेल में डाल दिया गया था। वे 13 अक्तूबर 1942 से 22 जून 1943 तक अल्मोड़ा जेल में रहे उसके बाद उनको सीतापुर कारागार में स्थानांतरित किया गया, जहाँ वे 23 जून 1943 से 23 मई 1944 तक रहे, और उनको काफ़ी यातनायें देकर शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनपर अर्थदण्ड के रूप में जुर्माना भी लगाया गया था। वे जेल में रहते हुए भी नियमित रूप से सुबह ही सुबह स्नान इत्यादि कर, व्रत रखते थे। जेल में ही हर रोज गीता का पाठ नियमित रूप से किया करते थे। जो देश आजाद होने के पश्चात भी नियमित रूप से जारी रखा था।
अल्मोड़ा ज़िले में तब उनका क्षेत्र जोहार मुनस्यारी आता था, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण, अल्मोड़ा में तब त्रिलोकी दिवस को बड़े ही धूमधाम से मनाया गया।
देश आज़ाद होने के पश्चात भी उन्होंने अपना पूरा समय व ध्यान समाज सेवा करने में ही लगा दिया। मुख्यतः वे युवाओं को शिक्षा की ओर  आकर्षित करने की कोशिश करते थे। उन्होंने क्षेत्र में अनेक विद्यालय खुलवाये उनमें प्रमुख था मुनस्यारी का राजकीय इण्टर कॉलेज। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाकर ही दम लिया। राजकीय कन्या इंटर कालेज, नमजला पिथौरागढ़ भी उन्हीं के कोशिशों की देन है।
उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए भी अहम भूमिका को निभाया जिसमें मुख्य है। तेजम मोटर मार्ग, शामा मोटर मार्ग, कपकोट डाकखाना, सुरिंगगाढ़ में झूला पुल एवं सुरिंगगाढ़ में पन बिजली योजना। वे भ्रष्टाचार को रुकवाने के लिए भी लड़ते रहते थे। युवाओं को शिक्षित करना व नशा मुक्ति के लिए लगातार आवाज उठाते रहते थे। तराई में जगह जगह आश्रम पद्धति विद्यालयों को खुलवाने में भी उन्हीं का हाथ होता था, जहाँ वे समय समय पर जाकर विद्यालयों के हालातों का जायज़ा लिया करते थे। प्रदेश गये अपने बच्चों से रूबरू होकर उन सभी से एक अभिभावक के रूप में मिलते थे। संग में उन बच्चों का हौसला अफजाई भी किया करते थे।

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