स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय त्रिलोक सिंह बृजवाल

स्वर्गीय त्रिलोक सिंह बृजवाल हमारे क्षेत्र के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका जन्म 17 सितम्बर 1903 को बिल्जू, जोहार के गाँव में श्री हिम्मत सिंह बृजवाल के घर में हुआ था। जो बचपन से ही जुझारू व समाज के प्रति समर्पित रहते थे। सेवा की भावना उनमें कूट कूट कर भरा हुआ था। ज़रूरतमंदों के लिए वे हमेशा तत्पर तैयार रहा करते थे।
श्री त्रिलोक सिंह बृजवाल ने सन् 1936 में कांग्रेस संगठन में प्रमुख भाग लेना आरम्भ किया, सार्वजनिक सुधार-कार्यो में भी भाग लेते रहे। एक पुस्तकालय की स्थापना की। जिला कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। जिन्होंने 2 फ़रवरी 1941 को अंग्रेजों के खिलाफ तिरंगा उठाकर, स्थान तेजम में तहसील पिथौरागढ़ के  नामक जगह से हमारे पहाड़ों में स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रख कर इस आंदोलन की अलख जला, प्रथम सत्याग्रही के रूप में सत्याग्रह किया।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजवाल की हिम्मत व हौसला को देखकर एकबारगी अंग्रेज भी सकपका गये। उन्होंने इनको समझाने की बहुत कोशिश की पर वह नहीं माने।
श्री त्रिलोक सिंह बृजवाल को देखने के लिए तेजम नामक स्थान में जन सैलाब उमड़ पड़ा था, अंग्रेजों ने त्रिलोक सिंह बृजवाल के हाथों से तिरंगा छुड़ाने की अथक कोशिश की पर वे छुड़ा नहीं पाये। लिहाज़ा उन्होंने बृजवाल को बुरी तरह से लाठी, डंडों व बूटों से पीट पीटकर अधमरा कर दिया। तत्पश्चात् गिरफ़्तार कर अपने साथ ले जाकर अल्मोड़ा जेल में डाल दिये। अल्मोड़ा जेल में उनको काफ़ी यातनायें दी गयी, जहाँ पर वे 7 जून 1941 तक रहे, तत्पश्चात् उनको बरेली जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। जहाँ वे 25 अगस्त 1941 तक रहे। उनके ऊपर आर्थिक दंड के रूप रुपया 150/- भी लगाया गया। तभी से तहसील सत्याग्रह संचालक का कार्य करते रहे। थल में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की।
जब वे युवाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से क्षेत्र के भ्रमण कर रहे थे व “अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन” को सफल बनाने के उद्देश्य से नामिक से दानपुर होते हुए अल्मोड़ा के राह में खाड़बगड़ स्थान पहुँचे थे तब उन्हें 10 अक्तूबर 1942 को खाड़बगड़ से गिरफ्तार कर पुनः जेल में डाल दिया गया था। वे 13 अक्तूबर 1942 से 22 जून 1943 तक अल्मोड़ा जेल में रहे उसके बाद उनको सीतापुर कारागार में स्थानांतरित किया गया, जहाँ वे 23 जून 1943 से 23 मई 1944 तक रहे, और उनको काफ़ी यातनायें देकर शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनपर अर्थदण्ड के रूप में जुर्माना भी लगाया गया था। वे जेल में रहते हुए भी नियमित रूप से सुबह ही सुबह स्नान इत्यादि कर, व्रत रखते थे। जेल में ही हर रोज गीता का पाठ नियमित रूप से किया करते थे। जो देश आजाद होने के पश्चात भी नियमित रूप से जारी रखा था।
अल्मोड़ा ज़िले में तब उनका क्षेत्र जोहार मुनस्यारी आता था, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण, अल्मोड़ा में तब त्रिलोकी दिवस को बड़े ही धूमधाम से मनाया गया।
देश आज़ाद होने के पश्चात भी उन्होंने अपना पूरा समय व ध्यान समाज सेवा करने में ही लगा दिया। मुख्यतः वे युवाओं को शिक्षा की ओर  आकर्षित करने की कोशिश करते थे। उन्होंने क्षेत्र में अनेक विद्यालय खुलवाये उनमें प्रमुख था मुनस्यारी का राजकीय इण्टर कॉलेज। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाकर ही दम लिया। राजकीय कन्या इंटर कालेज, नमजला पिथौरागढ़ भी उन्हीं के कोशिशों की देन है।
उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए भी अहम भूमिका को निभाया जिसमें मुख्य है। तेजम मोटर मार्ग, शामा मोटर मार्ग, कपकोट डाकखाना, सुरिंगगाढ़ में झूला पुल एवं सुरिंगगाढ़ में पन बिजली योजना। वे भ्रष्टाचार को रुकवाने के लिए भी लड़ते रहते थे। युवाओं को शिक्षित करना व नशा मुक्ति के लिए लगातार आवाज उठाते रहते थे। तराई में जगह जगह आश्रम पद्धति विद्यालयों को खुलवाने में भी उन्हीं का हाथ होता था, जहाँ वे समय समय पर जाकर विद्यालयों के हालातों का जायज़ा लिया करते थे। प्रदेश गये अपने बच्चों से रूबरू होकर उन सभी से एक अभिभावक के रूप में मिलते थे। संग में उन बच्चों का हौसला अफजाई भी किया करते थे।

शौका बोली व भाषा

गजेन्द्र सिंह पांगती
जोहार से विस्थापन के बाद शौका संस्कृति जिस तरह विलुप्ति के कगार पर पहुँच गयी है उससे युवा व वृद्ध सभी शौका चिन्तित है। अन्य लोगों की तरह मैं भी मौका मिलते ही शौका संस्कृति के संरक्षण और समवर्धन की आवश्यकता पर अपने विचार प्रकट करता रहता हूँ। लेकिन अभी तक इस विषय में कुछ जागरूकता पैदा होने के अतिरिक्त कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पायी है। इसका बहुत बड़ा कारण भी है। यह कार्य उतना ही दुरूह है जितना सूखे जड़ वाले पेड़ को पुनर्जीवित करना लेकिन यह असम्भव भी नहीं है। आवश्यकता है तो केवल इस बात की कि प्रयाश सुनियोजित हो और उसमें निरन्तरता हो, प्रयास सार्थक हो इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि संस्कृति के वे मूल तत्व और कारक कौन है जिनके छूटने से संस्कृति बिलुप्त हो गयी/हो जाती है।
संस्कृति के मूल तत्व है भाषा, धर्म, परम्पराएं, आस्थाएं, रीतियाँ, कुरीतियाँ, विश्वास, अंधविश्वास, आर्थिक क्रिया कलाप, पहनावा, खानपान आदि आदि। ऐतिहासिक कारणों से शौका भाषा जहाँ कुमाउंनी की सहोदर रही है वहीं शौकाओं का धर्म वैदिक धर्म का सरलीकृत रूप रहा है। तिब्बत व्यापार बन्द हो जाने से शौकाओं का परम्परागत आर्थिक क्रियाकलाप पुनर्जीवित करना असम्भव है। जोहार की ठण्डी आबोहवा में उपयोगी पहनावे का अनुपयोगी हो जाना भी स्वाभाविक है. परम्पराए, आस्थाएं, रीतियाँ, कुरीतियाँ, विश्वास व अंधविश्वास, खान-पान आदि समय के साथ बदलती रहती हैं। संस्कृति के समवर्धन के किये इसके मूल तत्वों को संरक्षित करने के साथ ही कुरीतियों व अन्ध् विश्वासों को दूर करते रहना आवश्यक है। संस्कृति में भाषा व ध्र्म सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इन दोनों में भाषा का स्थान गुरुतर है। ध्र्म बदलने के बाद भी संस्कृति के संरक्षित रहने के कई उदाहरण मिल जायेंगे लेकिन भाषा छूटने के बाद संस्कृति के बचे रहने का शायद ही कोई उदाहरण मिल पाए। बंगाली मुसलमानों ने धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी भाषा नहीं बदली। यही कारण है कि उनमें बंगाली संस्कृति अब भी जीवित है। यही बात कुछ हद तक पंजाबी मुसल्वानों के लिए भी कहा जा सकता है। इसीलिए कहा जाता है, ‘भाषा छूटी तो संस्कृति छूटी।’ पलायन के साथ ही शौका अपनी भाषा पीछे छोड़ आये है। अब उनकी संस्कृति भी भूतकाल की बात होने के कगार पर है तो इसमें आश्चर्य ही क्या है।
इसलिए यदि शौका संस्कृति को संरक्षित करना हो तो हमें सबसे पहले उनकी भाषा व बोली को पुनर्जीवित व प्रचलित करना होगा। हमें उन कारकों का विश्लेषण करना होगा जिनकी वजह से शौका भाषा में लिखित साहित्य की रचना नहीं की जा सकी और उनकी बोली प्रचालन से बाहर हो गयी। कुमाउनी का सहोदर होने के कारण शौका भाषा को हिन्दी की उपभाषा कहा जा सकता है। मैं अपनी रचनाओं में इसका कई बार उल्लेख कर चुका हूँ कि यह कैसे बंगाली और नेपाली से मिलती है। कुमाउनी से इसमें जो भिन्नता है उसके मूल में उक्त दोनों भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। मैं तो यहाँ तक कहता रहा हूँ कि यदि बंगाली शब्दों में ओ की जगह अ का उच्चारण किया जाय या शौका बोली में अ की जगह ओ का उच्चारण किया जाय तो इन दो भाषी लोगों को एक दूसरे की भाषा समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यह मैं अपने कलकत्ता प्रवास के अनुभव के आधार पर दावे के साथ कह सकता हूँ। दुर्भाग्य से अबसे पूर्व राजस्थानी की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। दुर्भाग्य इसलिए कि जोहार के मूल पुरुष धम सिंह रावत के राजस्थान से होने पर भी मैं इस पर गौर नहीं कर सका। इसका एक कारण सम्भवतय यह भी रहा है कि जब मैं 2 वर्ष के लिए जयपुर में था तो मेरा कार्य क्षेत्र मध्य और पूर्व राजस्थान था जहाँ हिन्दी खड़ीबोली का अधिक प्रभाव है जबकि पश्चिम व दक्षिण राजस्थान में शुद्ध राजस्थानी बोली व भाषा का प्रभाव है। यही कारण है कि महान लेखक व साहित्यकार बिजयदान देथा ने जब अपना रचना साहित्य राजस्थानी में लिखने का निर्णय लिया तो उन्होंने जो पहला कार्य किया वह था जयपुर से जोध्पुर जाना और अपने मूल गाँव में रहना ताकि वे मूल राजस्थानी भाषा की आत्मा में रच-बस सकें। उन्होंने राजस्थानी में अनेकानेक उपन्यास, लेख, समालोचनाएँ, संस्मरण आदि और हजारों कहानियां लिखीं है. मुझे पूर्व में उनकी एक-दो रचनाएं पढने का सौभाग्य मिला था. उनके कथानकों की रोचकता और रचना की सरलता व सुन्दरता से मैं अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाया। इसलिए उनकी और रचनाएं पढ़ने की तमन्ना मेरे दिल में थी। कोरोना ने मेरी यह तमन्ना पूरी कर दी। इस महामारी से बचने के लिए मैं अपने पुत्र नवीन के आवास ‘मनाकार’, सल्ला, कसारदेवी, अल्मोड़ा आ गया। नवीन के भी बिजयदान देथा का प्रशंसक होने के कारण उसके पुस्तकालय में उनकी कई रचनाएँ उपलब्ध् थीं। उनमें से तीन-चार रचनाएं पढ़ने पर मुझे इस बात का आभास हुआ कि शौका भाषा व बोली राजस्थानी से अत्यधिक प्रभावित है। कई राजस्थानी शब्द, शब्दों का स्पेलिंग व उच्चारण, वाक्यों की संरचना आदि हिन्दी से भिन्न लेकिन हूबहू शौका बोली जैसी है। मुझे पक्का विश्वास है कि जब भी हम शौका बोली को संरक्षित करने का सुनियोजित प्रयाश करेंगे और शौका भाषा में लेखन के लिए उसके ब्याकरण, उच्चारण, स्पेलिंग आदि का मानकीकरण करेंगे तब मूल राजस्थानी भाषा से हमें बहुत मदद मिलेगी।
किसी भी भाषा व संस्कृति को जीवन्त रखने के लिए उसके मुहावरों व लोकोक्तियों का प्रचलन में रहना अति आवश्यक है क्योंकि इनमें उस संस्कृति की आत्मा बसती है। इनमें सम्बन्धित समाज का इतिहास, उसका अनुभव, उसका विस्वास, मान्यताएं, वर्जनाएं आदि का संकलन होता है। इसी प्रकार भाषा के जीवन्त रहने के लिए आवश्यक है उसका सरल व मध्ुर ;कर्णप्रियद्ध होना और उसका व्याकरण की शु(ता की परिध् िमें बोला और लिखा जाना। इसी अभीष्ट के लिए शौका लोग जब अपनी बोली में लिखते थे तो कुमाउनी शब्द और वाक्य रचना का सहारा लेते थे। इसके लिए बाबू राम सिंह के लेखों को पढ़ा जा सकता है। मेरे पिता जी भी मुझे हमेशा इसी तरह की शौका भाषा में पत्रा लिखा करते थे। अपनी बोली के प्रचलन और अपनी भाषा में स्वतंत्रा व उच्च कोटि के लेखन के लिए मूल भाषा का विश्लेषण, ब्याकरण का मानकीकरण, मुहावरों व लोकोक्तियों का संकलन, शब्दों का सरलीकरण आदि के लिए परिचर्चाओं, गोष्ठियों, शोधें आदि को आगे के लिए छोड़ते हुए मैं अभी केवल इस पर चर्चा करना चाहूँगा कि राजस्थानी भाषा में किस तरह हमारी भाषा से साम्यता है और राजस्थानी भाषा कैसे हमारे अभीष्ट में सहायक हो सकती है। जिन साम्यताओं का मैं उल्लेख करूंगा उनको पढ़ने और उन पर मनन करने के लिए यह बात हमेशा याद रखना होगा कि भाषा के सरल और मधुर (;कर्णप्रिय) होने के लिए संयुक्ताक्षरों के प्रयोग में नियंत्रण के साथ-साथ शब्दों के छोटे स्वरूपों का प्रयोग करना वांछनीय है। जैसे सुरेन्द्र दाज्यू और लक्ष्मण बूबू के स्थान पर सुरिदा व लछ्बू लिखना जितना सरल है उतनी ही मिठास है उसको बोलने और सुनने में। इस भूमिका के बाद अब बढ़ते हैं राजस्थानी और शौका संस्कृति और उनकी भाषा के अनेकानेक शब्दों में समानता ओर, साथ ही विचार करते हैं शौका बोली व भाषा को सरल तथा मध्ुुर बनाने के लिए राजस्थानी भाषा की कुछ विशेषताओं को अपनाने की आवश्यकता पर।
दोनों समाजों में समानताएं-
1-परदा प्रथा
2-महिलाओं द्वारा बिनाई वादन
3-हुक्के का प्रचलन
4-सत्तू का सेवन आदि आदि
दोनों भाषाओं में समान रूप से बोले व लिखे जाने वाले शब्द-
राजस्थानी शौका राजस्थानी शौका टिपण्णी
दीठ दीठ अदीठ —– अपनाए जाने योग्य
अदेर अबेर —– —– विपरीत अर्थ
मनचीती मनचितै,मनचैन अचीता —– अपनाने योग्य
कुछ वैसे ही शब्द-
अचैन, अच्यौत
बखत बखत, बखद ठौर ठोर जगह के अर्थ में
लच्छन लच्छन दरसन दरसन
भरम भरम दरद दरद
धरमी धरमी कौर कौर कौरगास के अर्थ में
बरस बरस जतन जतन
जत्ती जदी उनमान उनिजस उनमान अपनाने योग्य
जस तस जसे तसे किचकिच किचकिच
गार गारा, गौरो. लीपना लीपना
लोग बाग लोग बाग मुरकि मुरकि झुमका
चैमास चैमास ढील ढील देरी के अर्थ में
नौकर-चाकर नौकर-चाकर
राजस्थानी भाषा की शौका बोली-भाषा में अपनाए जाने योग्य विशेषताएं व शब्द-
राजस्थानी भाषा में संयुक्ताक्षरों का प्रयोग बहुत कम है। इस के कारण इसमें मिठास व सरलता है। शौका बोली में संयुक्ताक्षरों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इससे यह लिखने में कठिन तथा बोलने में कर्णकटु लगता है। राजस्थानी भाषा की मिठास का एक और कारण है उसे उसी रूप में लिखना जिस रूप में उसे बोला जाता है। जैसे श और ष का कम से कम प्रयोग और उसके स्थान पर स का प्रयोग। हमें भी यही करना होगा क्योंकि हमारी बोली में भी स का ही अधिक प्रयोग होता है। यही नहीं ड़ के स्थान पर जिस तरह हम र बोलते हैं उसी तरह उसे लिखना भी होगा। ऐसा न किया जाना भी शौका बोली-भाषा के चलन से बाहर होने का एक प्रमुख कारण है। यही वह कारण है जिसकी वजह से हमारे पूर्वज अपनी भाषा में लिखने के लिए अल्मोड़े की कुमाउनी जैसी शैली का प्रयोग करते थे।
राजस्थानी से अपनाए जाने योग्य कुछ शब्द-
ऐसे अनेकानेक शब्द है। उनमें से कुछ शब्द शौका बोली में प्रयुक्त होते रहे हैं। आवश्यकता है तो केवल उनको चलन में रक्खे रहना। नीचे कुछ उदाहरण मात्र दिए गये हैं-
राजस्थानी शौका हिंदी
दरसन दरसन दर्शन
बरस बरस वर्ष
भरम भरम भ्रम
परियाप्त कापफी पर्याप्त
नितनेम रोजक नियम नित्य का नियम
दीठ दीठ दृष्टि
उछाह उछाल उत्साह
बरसा बारिस वर्षा
दरसाना देखौन दर्शाना
दिसावर दिसावर देश
चंदरमा जोन चन्द्रमा
बिणज ब्योपार वाणिज्य
सरूप समान स्वरूप
पिरास्चित परास्चित प्राश्चित
मानुस मनख मनुष्य
बिरमांड बरमांड ब्रह्माण्ड
बिरछ रूख वृक्ष
आदि आदि
पुनश्चः- हामर बोलि पेंल औले या हामर संस्कृति पेंल बचुल? मुर्गी पेंल औले या आन। ते बतौ ते बतौ हनेरे भे। ‘‘ते ठग में ठग द्वार कु ढग’’ क्वेले त बौटो लैने भे। सुरिदा, लछ्बु और डाक्टर हरू आछ्याल ‘‘किछ ला’’ (Whats App) मा आबन बोलि में लेखी बेर बौट लैन में लैगि रन। आमा, बाबा, दादा, भूली सबे औस्या। ऊनि दाकारै हिटा। लेकिन मलि में मेंल जू लेखी रछुं वीक खयाल कया। यदि यस कलात तमर लेख व बोलि मो धे मिठु हे जौल। फिर चाया हामर बोलि कस के सबनक मूख व कलम में औंछ. आब ढील क्याक छ ला? -गजे पांगती

जल विद्युत परियोजना को लेकर सीमावासी मुखर

मुनस्यारी।
चीन सीमा पर जिले की पहली प्रस्तावित बहुप्रतिक्षित जल विद्युत परियोजना को लेकर सीमावासी मुखर हो गए है. इसी के चलते निगम की 120 मेघावाट की रुपसियाबगड़ – सरकारी भेल जल विद्युत परियोजना को वित्तीय स्कीकृति दिए जाने की मांग तेज हो गई है. जिपं सदस्य जगत मर्तोलिया ने आज प्रदेश के मुख्यमंत्री को इस आशय का पत्र भेजकर इस मांग को हवा दे दी है. कहा कि इस वित्तीय वर्ष में सीएम नहीं माने तो चीन सीमा क्षेत्र के लोग आंदोलन करेंगे.
उत्तराखंड जल विद्युत निगम ने इस चीन सीमा पर बनने वाले बहुप्रतिक्षित परियोजना का डीपीआर तैयार कर शासन को भेज दिया है. पिथौरागढ़ जिला चीन सीमा से लगा हुआ है. जिले के व्यास, चौदास, रालम व जोहार क्षेत्र चीन सीमा से लगा हुआ है. चीन सीमा के जोहार क्षेत्र से लगे इस क्षेत्र में प्रस्तावित यह परियोजना चीन सीमा पर भारत की पहली विद्युत परियोजना होगी.
जिपं सदस्य जगत मर्तोलिया ने कहा कि इस परियोजना के बनने के बाद चीन सीमा से लगे लास्पा, रिलकोट, मर्तोली, ल्वां,पांछू, गनघर, मापा, मिलम, बिलजू, बुर्फू, टोला, खिलांच,रालम सहित सेना व अर्द्ध सैनिक बलो की अंतिम चौकियों को भी बिजली मिलने का रास्ता सांफ हो जाएगा. इससे बेरोजगारी कम होगी तथा चीन सीमा क्षेत्र से पलायन भी कम होगा.
मर्तोलिया ने कहा कि चीन सीमा क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भी इस परियोजना का निर्माण किया जाना बेहद जरूरी है. कहा कि राज्य सरकार को इस परियोजना के संचालन से राजस्व मिलेगा.
जिपं सदस्य मर्तोलिया ने कहा हम क्षेत्रवासी इस वित्तीय वर्ष सरकार के फैसले का इंतजार करेंगे, उसके बाद चीन सीमा क्षेत्र के लोग आंदोलन कर सरकारो पर दबाव बनायेंगे.

कठिन दौर के लोग- भवानी देवी पंचपाल

बा बोक बोकबेर जांछि
डाॅ.पंकज उप्रेती
कठिन दौर हमें बहुत कुछ सिखा जाता है। वर्तमान की आरामतलब पीढ़ी को यदि कठिन दौर के किस्से सुनाये जाएं तो वह आश्चर्य करती हैं लेकिन उन्हें यह जरूर बताये जाने चाहिये ताकि वह अपनी जड़ों से जुड़े रहेें। और जान सकें कि जितना भी वह आज बन पाये हैं इसके पीछे संघर्षों की लम्बी गाथा है। कठिन दौर सबका होता है, हर युग में होता है लेकिन किसी की परीक्षा ज्यादा ही होती है। कई दुश्वारियों के साथ कुछ लोग रास्ता बना लेते हैं और कुछ हार मानकर टूट जाते हैं। हमारे सीमान्त क्षेत्रा में तो यह स्थिति और भी विकट रही है। सड़क, बिजली, अस्पताल, स्कूल, संचार से दूर रहकर भी हौंसले के साथ रहना पहाड़ की आदत रही है परन्तु यदि इसमें भी आपदा-विपदा हमें घेर ले तो परीक्षा कई गुना हो जाती है। इसी प्रकार की तमाम परेशानियों में घिरकर आगे बढ़ी हैं- भवानी देवी पंचपाल। मुनस्यारी के तल्लाघोरपट्टा से अपने परिवार के साथ यह ध्रमघर की होकर रह गई। 82 वर्षीय भवानी देवी अतीत के उस दौर को याद कर फफकते हुए रो पड़ती हैं। पति के निधन के बाद जिन परेशानियों से वह घिरी उससे उबरने का साहस उन्हें हिमालय ने दिया। वह हिमालय जो दृढ़ रहता है, अटल रहता है, पिघल कर भी जीवन देता है।
भवानी देवी कहती हैं- ‘‘बा बोक बोकबेर जांछि।’’ कनोल ;नाचनी के पास निवासी पिता केशर सिंह धर्मशक्तू व माता कुशा धर्मशक्तू के घर में जन्मी भवानी देवी का सात वर्ष की आयु में तल्ला घोरपट्टा निवासी रामसिंह पंचपाल के साथ विवाह हो गया था। तब छुटपन में ही विवाह का रिवाज था। इनके ससुर रतन सिंह छुटपुट कारोबार करते थे। परिवार के सदस्य अपने जानवरों सहित जोहार यात्रा पर जाता था और परिवार की गुजर-बसर चल रही थी। घोड़ा, भेड़-बकरी, गाय-बैल सहित परिवार एक छोर से दूसरे छोर परम्परागत माइग्रेशन क्रम से अपने में जुटा था। रामसिंह पत्थर तक तोड़कर मजदूरी करने में पीछे नहीं थे। कठोर लेकिन प्रकृति के करीब की इस दिनचर्या में भी परिवार खुश था लेकिन एक दिन अचानक राम सिंह का निधन हो गया। इस समय परिवार में चार छोटे-छोटे बच्चे अपनी माँ भवानी के साथ थे। इसमें बसन्ती पांगती, प्रेमा बृजवाल, जगत सिंह पंचपाल ;बैक से सेवानिवृत्त, डी.एस. पंचपाल ;वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी भा.कृषि अनुसंधान केन्द्र अल्मोड़ा हैं। वर्षों के संघर्ष के बाद परिवार ने समाज में अपनी जगह अपने आप से बनाई।
भवानी देवी बताती हैं कि पति रामसिंह जी के निधन के समय सबसे छोटो पुत्र देबू; देवसिंह चार साल का था। परिवार को नानी गोविन्दी पांगती ने पाला। मुनस्यारी तल्ला घोरपट्टा छोड़कर परिवार धरमघर आ गया। सबलोग मिलकर उन के कारोबार, दन-चुटके बनाने से लेकर कृषि कर्म में जुट गये। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी इधर-उधर कई जगह हुई लेकिन साहस के साथ उन्होंने पढ़ाई भी की। बाद के दिनों मंे बहन बसन्ती अपने भाई जगह-देवेन्द्र की संरक्षक के रूप में सक्रिय हो गई और पठन-पाठन में यह आगे बढ़ गये।
भवानी देवी पंचपाल आज अपने भरेपूरे परिवार के साथ है लेकिन उन घटनाओं का स्मरण करती है जब कठिन दौर में उन्हें किसी ने संरक्षण दिया। साथ ही उन घटनाओं को भी नहीं भूली है जिन लोगों ने उन्हें चुनौती दी और दूरी बना ली। बचपन के श्रम और जीवन की सच्चाई से दो-चार हुए डी.एस. पंचपाल कहते हैं कि स्कूल जाने से पहले वह धान कूटते थे।
सचमुच संघर्ष की कहानी आनन्ददायी होती है, जो हमें अपनों से जोड़े रखती है। जीवन-जगह का सत्य पहचाने में मदद करती है।

मर्तोली में भी है नैनीताल

गोपालसिंह मर्तोलिया

पि.हि.प्रतिनिधि
बहुत कठिन दौर था वह जब दुनिया से कटे हुए क्षेत्र के लोग अपनी दिनचर्या में हसरतें लिये हुए आगे बढ़ रहे थे। लेकिन उन हसरतों ने ही हौंसला दिया और लोग कामयाब हुए। मल्ला जोहार के मर्तोली में ज्वाला सिंह मर्तोलिया और श्रीमती मोतिमा देवी के घर जन्म हुआ था- गोपालसिंह मर्तोलिया का। 73 वर्षीय गोपाल सिंह जी बताते हैं कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर बहुत जोश होता था बच्चों में। मर्तोली गाँव की गली-गली में बच्चे अपने हाथ का बनाया तिरंगा लेकर गाते थे- ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’। जोहार में जन्मे गोपालसिंह उन पुराने दिनों के गवाह हैं और बताते हैं कि मुनस्यारी से जोहार में माइग्रेशन में जाना-आना होता था। शिक्षक गुलाबराम जी उनके गोठ में ही रहा करते थे। प्रत्येक बच्चे की ड्यूटी थी वह बारी-बारी से राशन उनके घर पहँुचाते थे। एक बार शायद सन् 1955 में बरफ की लहर में उनका स्कूल टूट गया। प्रकृति के करीब रहने वालों ने हौंसला बनाये रखा और दूसरा स्कूल भवन बनाया गया। हमारे परिवार के पास पधानचारी थी। पिता ज्वाला सिंह जी प्रधान थे। मर्तोली में नैनीताल नामक स्थान पर हमारा मकान है। यह स्थान नैनीताल से मिलता-जुलता है। सामने दृश्य और भी मनमोहक। बुर्फू में मल्ला जोहार का पटवारी रहता था और प्रधान से टैक्स वसूली के लिये पटवारी का आना होता था। तब एक टैक्स पटवारी को देना होता था और दूसरा बागेश्वर उत्तरायणी मेले में देते थे। नन्दाष्टमी तक सारे परिवार जोहार में रहने के बाद मुनस्यारी आते थे। तब नन्दाष्टमी मेले के लिये प्रत्येक परिवार से एक बकरा बलि के लिये जाता था। वेदान्ताचार्य पुण्डरीकाक्ष महाराज के कथा प्रवचन का प्रभाव ही था कि यहाँ बलि प्रथा बन्द हो गई। अब तो पचास साल से भी ज्यादा समय हो चुका है जब बलि प्रथा बन्द है।
गोपाल सिंह बताते हैं कि आज पलायन का रोना-पीटना मचा है लेकिन पुराने कठिन समय में सारे गाँव आबाद थे। बोझा ढोकर यात्राओं पर निकले परिवारों ने ठाना था कि वह कुछ करेंगे। तब सुरिंग से मर्तोली जाने तक चार पड़ाव होते थे। खेतीबाड़ी के लिये हर साल ‘इज्जर’ बंजर भूमि खोदने का काम होता था। बंजर खोद-खोद कर आलू, सरसों, फाॅफर/उगल की खूब पैदावार होती थी। एक बार मर्तोली में घट खराब हो गया था, तब आटा पिसवाने के लिये बुर्फू तक जाते थे।
अपने बचपन की याद में भावुक होते हुए श्री मर्तोलिया कहते हैं- जोहार के बड़े ग्रामों में मर्तोली है। गाँव के बीच में कच्हरी लगती थी और सयानों के बैठने की जगह थी। नन्दाष्टमी से पहले नैनीताली पुजाई होती थी, जिसमें प्रधान पिता जी को दो बकरों का सिर मिलता था, फिर सादी पुजाई होती थी जिसमें तीन बकरों का सिर मिलता था। इसके बाद नन्दाष्टमी की पूजा होती थी। मन्दिर के पास मैदान में लगातार खेल होते थे। किसी भी विशेष सूचना के लिये छत में चढ़कर एक व्यक्ति उँफची आवाज में बोलता था, जिसे आजकल एनाउंसर के रूप में समझा जा सकता था। मेले के अवसर पर ढुस्का-चांचरी के लिये सारे ग्रामीण जुटते थे। हिलमधर में हम सभी अपनी ध्यैनियों-परिचितों को देखने जाते थे कि कौन-कौन मर्तोली आ रहे हैं। जोहार से माइग्रेसन में वापस आने से पहले सारा कामकाज समेटा जाता था। खेतों में फसल कटाई के बाद नींममुचाई याने जानवरों को छोड़ दिया जाता था ताकि रहा-बचा वह भी चर लें। उस समय के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में स्व.गोपाल सिंह और हयात सिंह ‘बनवारी’ थे। गोपाल सिंह जी यह भी बताते हैं कि पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया जब घर आते थे, उन्होंने बच्चों को गीत सिखाया था। पठन-पाठन, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम सभी में सहभागिता करते बच्चे अपनी परम्परागत पाठशाला से भी जुड़े थे। नई पीढ़ी में बहुत बदलाव आ चुका है लेकिन उन्हें अपनी जड़ों में जुड़े रहना चाहिये। अभी नन्दा माई के मन्दिर को भव्य रूप देने की तैयारी की जा रही है।

1930 में पद्मसिंह नैनीताल आये और 1958 से बना जोहार भवन

गोविन्द सिंह गड़बगी से बातचीज

डाॅ.पंकज उप्रेती
नैनीताल। सरोवर नगरी का जोहार भवन अपने आप में एक इतिहास बन चुका है। 1930 में नैनीताल आये पद्मसिंह गड़बगी ने 1958 में नवाब आॅफ छत्तारे प्रोस्पेक्ट लाॅज के नाम के इस भवन को खरीदा और फिर जोहार भवन का निर्माण शुरु किया। इस परिवार के मूल जनों के जोहार के पांछू ग्राम से माइग्रेसन समय में वह लोग धरमघर सिमगड़ी आया करते थे। गर्मी में जोहार और जाड़ों में सिमगड़ी की यह परम्परा थी। धीरे-धीरे यह पूरी परम्परा ही सिमट गई और जो जहाँ था वहीं बस गया। परिवार के वरिष्ठ सदस्य गोविन्द सिंह गड़बगी जो कि परिवहन निगम के वरिष्ठ लेखाकार पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, वह बताते हैं कि उनके पूर्वज मूल रूप से गढ़वाल के गड़बगा गाँव के थे जो जोहार आये। पुराने समय में उनके पिता पद्मसिंह जी 1930 में नैनीताल आये और तल्लीताल में किराये के मकान में रहते थे। 1954 में छत्तार नवाब के भवन को उन्होंने खरीदा और जोहार भवन नाम से इसका नवनिर्माण करवाया और यहीं के होकर रह गये। पद्मसिंह जी के तीन पुत्र स्व.उमेश सिंह, गोविन्द सिंह और रणजीत सिंह हुए। स्व. उमेशसिंह के दो पुत्र महेन्द्र और धीरज थे। गोविन्द सिंह जी के पुत्र ललितमोहन और पुत्री दीप्ति हैं। लक्ष्मण सिंह टेलीपफोन विभाग की पुत्री कंचन और हेमा हैं।
गड़बगी परिवार के पास पहले मल्लीताल में काफी सम्पत्ति थी। समय बीतने के साथ इसका स्वरूप बदला है। स्व. पद्मसिंह ने 1964 में शहीद सैनिक स्कूल को अपनी भूमि में बने हुए कमरे दान में दिये। इस विद्यालय के जमजमाव में उनका योगदान हमेशा स्मरण किया जाता रहेगा।
वर्तमान में जबकि जोहार के लोग देश भर व विश्व के तमाम देशों में फैल चुके हैं, नैनीताल के जोहार भवन सहित अपने बुजुर्गों की धरोहरों को निश्चित रूप से याद करते हैं। ऐसे में नैनीताल का जोहार भवन भी याद किया जाता है। जो जरूरतमंदों के अलावा जोहार के लोगों के लिये एक आश्रय का यह केन्द्र रहा है। नैनीताल के इतिहास में कई बदलाव होते रहे हैं लेकिन कुछ स्थान आज भी अपनी मौजूदगी को दर्शा रहे हैं। सरोवर नगरी की यह शान बनी रहे, इन्हीं कामनाओं के साथ।

पिघलता हिमालय 22 अप्रैल 2013 अंक से