
वाई.एस.पांगती
प्रदेश सरकार द्वारा विधनसभा के विश्वकर्मा भवन के सभागार जिसका नाम डाॅ.आर.एस.टोलिया के नाम पर था, उसे बदल दिया गया। समझ नहीं आ रहा है कि किन कारणों से ऐसा किया गया जबकि स्व.टोलिया के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। उनके कार्यों को सम्मान देना चाहिये।
डाॅ. आर.एस. टोलिया, आईएएस उत्तराखण्ड मूल के प्रथम मुख्य सचिव व उत्तराखण्ड राज्य के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त का उत्तराखण्ड राज्य में किये गये उल्लेखनीय कार्यों का संक्षिप्त विवरण- जब उत्तराखण्ड राज्य का शीघ्र निर्माण होना था, तो उ.प्र. में चर्चा हुई कि कौन राज्य की व्यवस्थाओं को सम्भाल सकेगा? सर्व सम्मत्ति से डाॅ. आर.एस. टोलिया को दायित्व सौंपने पर विचार हुआ और 23 अक्टूबर, 1999 को मुख्य सचिव, उ0प्र0 का आदेश आया, तब डाॅ. टोलिया उप्र प्रशासनिक अकादमी नैनीताल में कार्यरत थे। उनके द्वारा तुरन्त 24 अक्टूबर, 1999 का प्रमुख सचिव उत्तराखण्ड शासन का पदभार ग्रहण किया गया और उसी रोज बैठक कर राज्य का कार्य सचिवालय में कार्मिकों को सम्ब( कर प्रारम्भ किया गया। उनके द्वारा सचिवालय से सभी प्रकार के कार्यों के साथ-साथ राजभवन, हाई कोर्ट, विभागों के निदेशालयों का ढांचा, लोक सेवा आयोग, विधान सभा आदि स्थापित करने के कार्य किये गये।
प्रथम अन्तरिम सरकार को डाॅ. टोलिया द्वारा शपथ ग्रहण कराया गया और नव राज्य का संचालन उनके द्वारा रात दिन कड़ी मेहनत व लगन से प्रारम्भ किया गया। अन्य आवंटित अधिकारीगण राज्य की पूर्ण जानकारी लेकर आराम से 2001 के बाद ही जब सभी कार्यालय कर्मचारियों को सम्ब( कर रूटीन कार्य प्रारम्भ कर दिया गया तभी कार्यभार ग्रहण करना प्रारम्भ हुआ। उप्र से उत्तराखण्ड आवंटित कार्मिकों को यथाशीघ्र मुक्त करने हेतु लिखा गया और आवंटित आईएएस/पीसीएस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पफोन कर कार्यभार ग्रहण करने की अपेक्षा की गयी, परन्तु लचर शासन की कार्य प्रणाली के कारण जो इच्छुक थे, उनके द्वारा उत्तराखण्ड में योगदान दिया गया और जिनकी रुचि नहीं हुए और उप्र सरकार ने भी उदारता दिखा दी और तो और पर्वतीय मूल के आईएएस/पीसीएस व अन्य विभागों के अध्किारियों ने आज तक कार्यभार ग्रहण नहीं किया और शक्ति करने पर कोर्ट से स्टे लेकर योगदान नहीं दिया। जब 9 नवम्बर 2000 के दिन नजदीक आने लगा अस्थाई राजथानी के निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो पाये, जिसका दायित्व आयुक्त बीएन वोहरा को दिया गया था। कार्य की गति को धीमी देखकर अन्तिम क्षणों में डा.टोलिया को दायित्व सौंपा गया। उन्होंने चुनौती स्वीकार करते हुए रात-रात भर बैठकर स्वंय निर्माण कार्य को 8 नवम्बर तक पूर्ण कराया। जब टोलिया बैठते थे तो अन्य अधिकारियों की हिम्मत नहीं थी कि कोई बहाना बनाकर जाये एवं अधिकारीगण जिनकी ड्यूटी लगायी गयी थी उनको भी रात भर बैठाकर निर्माण कार्य में योगदान देना पड़ा। पर्वतीय क्षेत्र में वन क्षेत्रा अधिक होने के कारण उनके द्वारा कृषि उत्पादन आयुक्त के समकक्ष पद एफआरडीसी बनवाया गया, जिसके अधीन 23विभाग आते थे, जिसकी भूमिका जनपद में मुख्य विकास कार्यालय व विकास खण्ड कार्यालय जो सामुदायिक विकास विभाग के रूप में कार्य करते थे। अब तो एफआरडीसी का स्वरूप समाप्त करने से एकीकृत ग्राम्य विकास विभाग छिन्न भिन्न हो गया और अन्य विभाग सिंगल विण्डो सिस्टम में चल रहे है। वर्तमान में विकास खण्ड केवल ग्राम्य विकास विभाग रह गया है। जहाँ आज की तारीख में अन्य विभाग की न सूचना है व न विकास के आंकड़ों का रखरखाव है। जब उत्तराखण्ड में अध्किारियों में टोटा होने से डाॅ. टोलिया के पास 20-25 विभाग थे वे अकेले सम्पादित करने में सफल रहते थे। बायोफ्रयूल योजना ;जैट्रोपफा को प्रारम्भ करने का श्रेय उन्हीं को जाता है जो आज ईधन के रूप में हवाई जहाज संचालित करने से देश में उसके महत्ता को समझा जा रहा है। जिसको आगे बढाने की आवश्यकता थी। उक्त के अलावा हल्द्वानी मेडिकल काॅलेज की स्थापना, बीज प्रमाणीकरण विभाग, लाईफ स्टोक अभिकरण, एससीएपी/टीएसपी योजनाओं का बजट का काट कर समाज कल्याण विभाग को सौंपा गया। डाॅ. टोलिया द्वारा पर्वतीय क्षेत्रा के गाँवों को सड़क मार्ग से जोड़ने हेतु भारत सरकार की महत्वपूर्ण योजना पीएम वीआई का प्रदेश में गठन कर केन्द्र सरकार से राज्य सरकार को मिलने वाली सहायता राशि प्राप्त कर कई सड़कों के प्रस्ताव भारत सरकार को भिजवाये।
उत्तराखण्ड विकल्पधरियों के पदोन्नति हेतु उप्र से प्रवष्टियां प्राप्त न होने से पदोन्नतियां प्रभावित हो रहे थे। डाॅ. टोलिया के संज्ञान में बात लाते ही उन्होने शीघ्र आदेश दिया कि जिन कार्मिकों की गोपनीय प्रविष्टियों उप्र से उपलब्ध् नहीं है उनसे एक शपथ पत्र प्राप्त करें, जिसमें अपने विरूद्ध कोई ऐसा तथ्य नहीं है, जिससे पदोन्नति प्रभावित हो। अतः उस आदेश के आधार पर निरन्तर पदोन्नतियां हुई। यहीं नहीं उनके द्वारा कार्मिकों के हित में यह आदेश पारित किया कि नित्य मुझे 5 बजे बाद देख लिया जाय यदि में उपलब्ध् हूँ तो डीपीसी की जाय, ताकि पदोन्नतियां प्रभावित न हो सकें। जबकि यह काम कार्मिक विभाग का था। बीस सूत्राी कार्यक्रम के योजनाओं के भौतिक लक्ष्य को प्रत्येक माह मानकों के अनुसार पूर्ति व उनके गुणवत्ता को कायम रखने के लिए उनके द्वारा कड़े निर्देश व गहनता से अनुश्रवण कर क्रियान्वयन कराया गया जिससे उत्तराखण्ड राज्य देश में लगातार 3 वर्ष बीस सूत्राी कार्यक्रम में प्रथम स्थान प्राप्त करने में सपफल रहा और सरकार द्वारा राज्य स्तर पर एक आयोजन कर उत्सव के रूप में मनाया गया और प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले जनपदों के अध्किारियों को ट्राफी व प्रशस्ति पत्रा देकर सम्मानित किया गया। और डाॅ. टोलिया ने एक रनिंग ट्राफी को भी चलवाया था जिसका उददेश्य में जो जनपद प्रथम आयेगा उसको यह ट्राफी प्रदान किया जायेगा। और सचिव, नियोजन को बीस सूत्री कार्यक्रम का विभागाध्यक्ष नामित किया गया था, जिससे शासन स्तर पर निरन्तर अनुश्रवण किया जाता था, परन्तु अब एक सचिव नियोजन ने बीस सूत्राी कार्यक्रम के विभागाध्यक्ष का पद अपने स्तर से निदेशक, अर्थ एवं संख्या को सौंप दिया है। तब से शासन स्तर पर बीस सूत्राी कार्यक्रम की समीक्षा नहीं हो पा रही है।
मुख्य सचिव रहते हुए सभी विभागों में निरीक्षण करना उनकी समस्याओं को सुनना व विकास कार्यों में तेजी लाने के सम्बन्ध् में निर्देश दिये गये। मुख्य सचिव रहते हुए पूरे प्रदेश का भ्रमण कर विकास कार्यों की प्रगति का जिला स्तर पर बैठक कर उनमें आ रही कठिनाईयों को वहीं पर हल किया गया। डाॅ. टोलिया जब 1991 में गन्ना आयुक्त थे, वित्तीय अनियमितता पर एक संयुक्त आयुक्त को निलम्बित कर दिया था, बाद में उन पर सरकार का दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा कि मैंने राज्य हित में निलम्बन किया है, परन्तु सरकार का दुबारा दबाव डालने पर उन्होंने 2 वर्ष के लिए अध्ययन अवकाश ले लिया 6 माह बाद मुख्य सचिव टीएसआर सुब्रमन्यम जो कैबिनेट सेक्रेटरी भारत सरकार से सेवा निवृत्त हुए, उनके द्वारा कार्यभार ग्रहण करने के लिए आग्रह किया गया, तो डाॅ. टोलिया ने पर्वतीय क्षेत्र में ही सेवा करने की इच्छा व्यक्त की गयी। और मुख्य सचिव ने तत्काल उनको सचिव पर्वतीय विकास नियुक्त किया। जबकि यह विभाग वरिष्ठ प्रमुख सचिव को सौपी जाती थी, परन्तु उनकी योग्यता, ईमानदीरी व क्षमता के आधार पर पर्वतीय विकास विभाग का दायित्व सौंपा गया था। सर्वप्रथम उन्हांेने जनपदों के जिला योजना संरचना जो बनायी गयी थी उन सभी का स्वयं अध्ययन कर विभागवार कमियां निकालकर प्लान जनपदों को लौटा दिया गया और कड़े निर्देश के साथ पुनः प्लान बनाने हेतु कहा गया शायद ही ऐसा मेहनत कोई अधिकारी करता हो। इससे पूर्व पर्वतीय विकास विभाग में काफी भ्रष्टाचार चल रहा था, बिना दिये फण्ड रीलिज नहीं होता था, अधिकारी स्वयं पत्र लेकर लखनऊ से फण्ड अवमुक्त करने जाते थे। यह बात टोलिया जी के संज्ञान में आते ही उन्होंने सारे वित्तीय अधिकार स्वयं के पास रखा और उन्होंने समय पर प्लान बनाने के साथ-साथ वार्षिक बजट पारित करते हुए प्रत्येक वर्ष 4/12 बजट अप्रैल प्रथम सप्ताह में फैक्स के माध्यम से जनपदों को विभागवार/मदवार/रिलीज कर दिया इस प्रकार योजनाओं की धन राशि जनपद के अधिकारियों को फण्ड रिलीज करने हेतु शासन में आने के लिये रोक लगा दिया गया, जिससे पर्वतीय विकास विभाग में एकदम भ्रष्टाचार पर विराम लग गया। पर्वतीय विकास विभाग के नोडल अधिकारियों को बिना अनुमति के शासन में जाने का अधिकार नहीं था और उनके द्वारा उप्र के अधिकारियों को भी पर्वतीय क्षेेत्रा में शासकीय कार्य हेतु केवल गर्मियों में ही दौरे में नहीं आने की हिदायत दी थी। उनके द्वारा प्लान/नाॅनप्लान/जिला सेक्टर/राज्य सेक्टर व केन्द्र पुरोनिधनित योजनाओं का मदवार पृथक-पृथक विकास पुस्तिका योजनावार/लक्ष्यवार प्रकाशित किया गया ताकि किसी को योजना की जानकारी लेने व रिपोर्ट देने में दुविधा न हो।पर्वतीय विकास सचिव रहते हुये उन्होनें विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रा में जितने भी भवन व योजनायें बनायी गयी थी, उनकी स्थिति की पूर्ण जानकारी लेकर अपूर्ण कार्यों को पूर्ण कराने के उपरान्त सम्बन्धित विभाग को हस्तान्तरित करने के लिये निरन्तर समीक्षा करते थे क्योंकि व्यवहार में विभाग में छोटी-मोटी कमियों के कारण हस्तान्तरण करने में विलम्ब करते थे जिससे भवन/योजनाओं उपयोग न करने पर पुनः क्षतिग्रस्त हो जाते थे। वे प्रायः जन समस्याओं का निदान अविलम्ब करते थे। इसी प्रकार उनके कार्यशैली को देखते हुये वर्ष 92-93 में चैखुटिया क्षेत्रा अल्मोड़ा में जन समस्याओं से सम्बन्धित एक बहुत बड़ा आन्दोलन हुआ। क्षेत्रवासियों की मांग थी कि सचिव टोलिया ही हमारी बातें सुनें, अन्य पर भरोसा नहीं था और उन्होने चैखुटिया समय पर पहुंच कर पूरे दिन व रात भर बिन्दुबार समस्याओं का निराकरण करते- करते सुबह चमोली को रवाना हो गये जबकि रातभर अधिकारियों को नींद आते रहे परन्तु टोलिया जी रात भर नहीं सोये। इस प्रकार सचिव उत्तराखण्ड का कार्यकाल पर्वतीय क्षेत्रा के लिए अच्छा रहा। जब वे दौरे में रहते थे तो नित्य लखनऊ से डाक का बक्शा मंगाते थे और कार में सफर करते समय फाईल करते थे और उसी शाम को डाक बक्शा लखनउ भेजते थे और फैक्स से लखनऊ निरन्तर फील्ड से ही आगे क्या कार्य करना है, निर्देश भेजते थे और पर्वतीय क्षेत्र के नोडल अधिकारियों को अपने सम्पर्क में रखते थे। ताकि क्षेत्रा के कार्य में तेजी लाये जा सके। जब टोलिया बनारस के डीएम थे उनके द्वारा विकास भवन की परिकल्पना कर सर्व प्रथम विकास भवन वाराणसी में बनाया गया और तत्पश्चात उप्र राज्य के प्रथम ग्राम्य विकास आयुक्त पद का कार्य भार सम्भालकर उन्होंने पूरे प्रदेश में विकास भवन बनाने का प्रस्ताव दिया। आज प्रदेश के विकास भवन बनाने का श्रेय उनको जाता है। उनके द्वारा ग्राम्य विकास विभाग के निरीक्षण सम्बन्धी विस्तृत प्रारूप पूर्ण रूप से तैयार कर मण्डल/जनपद/विकासखण्ड स्तर पर परिपालन हेतु लागू करवाया गया। यदि आज भी उनके निरीक्षण प्रारूप का उपयोग किया जाय तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं रहेगी। विभिन्न विश्व विद्यालयों में भी उन्होंने विभिन्न विषयों पर समय-समय पर आयोजित गोष्टी व सेमीनार में प्रतिभाग कर अनेक शोध् पत्र तैयार कराकर प्रकाशित करवाये गये। गढ़वाल विश्वविद्यालय के बुद्धीजीवी वर्गों द्वारा उनके कार्यों से प्रभावित होकर मरणोपरान्त उनके परिवार को शौर्य पुरस्कार भेंट किया गया। पर्वतीय विकास सचिव रहते हुये उन्होनें ग्राम बलढौढी अल्मोडा कुष्ठ आश्रम में डाॅ.रीच द्वारा उनके उपयोगार्थ एक हैण्डपम्प स्थापित करवाया जो सपफल रहा। इस प्रकार उनके द्वारा डाॅ.रीच के तकनीकि व साहित्य को समस्त पर्वतीय क्षेत्र के सम्बन्ध्ति अध्किारियों को प्रेषित कर उनसे प्राप्त प्रस्ताओं को शासन से मंजूरी देकर पर्वतीय क्षेत्र में हैण्डपम्प को स्थापित करवाया।डाॅ. टोलिया ने निदेशक, ग्राम्य विकास प्रशिक्षण संस्थान, बंक्शी का तालाब लखनउ के दौरान उनके द्वारा भारत सरकार को कपाट योजना की 5 करोड़ लागत तक के अधिकार मांगने का प्रस्ताव भेजकर निदेशक, ग्राम विकास को प्रशासनिक व वित्तीय अधिकार प्राप्त करा कर मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश राज्य को लिये इस योजना से लाभान्वित कर रोजगार मुहैया कराये गये।
कौशिक समिति द्वारा डाॅ. टोैलिया को उत्तराखण्ड राज्य की राजधनी स्थापित करने का कार्य सौंपा गया था उनके द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों के बुद्विजीवियों से प्रश्नावली तैयार कर उनकी राय के अनुसार रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपी गयी। जब प्रशासनिक अकादमी नैनीताल में कार्यरत थे उनके द्वारा अन्य राज्यों के अध्किारियों को भी समय समय पर विभिन्न विषयों पर प्रशिक्षण हेतु आमंत्रित किये और अपने राज्य में केवल प्रशासनिक अधिकारियों व अन्य राजपत्रित अधिकारियों की ही नहीं अपितु अराजपत्रित अधिकारियों की भी समय-समय पर सेमीनार व गोष्ठी आयोजित कर आवश्यक प्रशिक्षण दिया गया। उनके द्वारा अकादमी में क्षेत्रा प्रमुख, ग्राम प्रधन, ग्राम पंचायत सदस्यों, स्व सहायता समूह, वन पंचायत के सरपंचों व स्वैच्छिक संस्थाओं व अन्य जन अधिकारियों को भी विभिन्न विकास कार्यों से सम्बन्धित समय-समय पर प्रशिक्षित किया गया ताकि वे जागरूक होकर अपने क्षेत्रा के विकास कार्यों में भली-भाॅति कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।
प्रशासनिक अकादमी में कार्यरत रहते हुए विश्व बैंक की ग्राम स्वजल योजना का संचालन पर्वतीय क्षेत्रा में किये जाने हेतु ध्नावंटन का कार्य किया गया तथा उक्त योजना में कार्यरत अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था करायी गयी।
निदेशक प्रशासन अकादमी रहते हुए उनके द्वारा महत्वपूर्ण पुस्तकें/लेख एवं विभागों में अधिकारियों के उपयोगार्थ कई प्रकाशन किये गये जो आज भी प्रशासन अकादमी नैनीताल में उपलब्ध् है। मुख्य सचिव रहते हुए उनके द्वारा कई पुस्तकें लिखी गई जो आज भी व्यावहारिक हैं।विभिन्न पदों पर रहते हुए उनके द्वारा विभागों द्वारा किये जा रहे महत्वपूर्ण कार्यों का डाक्यूमेंटेशन कराया गया। उ.प्र. में दुग्ध् आयुक्त रहते हुए उनके द्वारा राज्य में डेरी विभाग एवं महिला डेयरी का गठन कर प्रदेश को डेयरी उद्योग के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाया गया। उत्तराखण्ड राज्य में जड़ी बूटी का प्रचार एवं प्रसार कर राज्य की वित्तीय स्थिति को देखते हुए उनके द्वारा राज्य में स्थापित जड़ी बूटी शोध् संस्थान को सशक्त बनाया गया तथा किसानों को प्रशिक्षित करने हेतु सेलाकुई में एक सेंटर की व्यवस्था भी करायी गई। डा. टोलिया द्वारा उत्तराखण्ड में चाय बगान विकास को पुर्नजीवित कर प्रारम्भ किया गया जिससे हजारों लोगों को आज रोजगार प्राप्त हो रहा है। वन एवं ग्राम विकास आयुक्त रहते हुए उनके द्वारा भारत सरकार को हिमालयी राज्य की परिकल्पना का प्रस्ताव भी भेजा गया। डाॅ.टोलिया की नियुक्ति सचिव भारत सरकार में होने पर तत्कालीन सरकार द्वारा उनको मुख्य सूचना आयुक्त का कार्य सम्भालने का आग्रह किया गया। उनके द्वारा अविलम्ब सचिव भारत सरकार के पद से त्याग पत्रा देकर राज्य के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यभार ग्रहण कर प्रदेश के जनता को सूचना के अध्किार के महत्व की जानकारी विभिन्न स्तरों पर गोष्ठी व अनेक पुस्तकें प्रकाशित कर और प्रचार-प्रसार के माध्यम से दी। यहीं नहीं प्रत्येक विभाग में विभागीय सूचनाओं व शासनादेशों के रख रखाव के लिए मैनयुल तैयार करवाया गया, जिससे विभागों को भी शासनादेशों का संकलन व विभागीय सूचना प्रत्येक स्तर पर रखने व उसका उपयोग करने की सुविध हुई, यहीं नहीं उनके द्वारा आयोग के सचिव को प्रत्येक विभाग के कार्यालय का निरीक्षण कराकर सूचना का अध्किार 2005 का निर्देशों के परिपालन व मूल्यांकन करा कर विभागों के कार्यों के स्तर के आधर पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। और अच्छे कार्यों करने वाले विभागों का प्रशस्ति पत्रा प्रदान किया गया। इस प्रकार राज्य में सूचना के अधिकार 2005 का आम जन को सरकारी सूचनाओं का लाभ पहुँचाने से राज्य में ही नहींे अपितु देश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कराने से राज्य गौरवान्वित हुआ। उन्होंने सेवाकाल में दक्षिण एशिया में आयोजित सेमिनार बालश्रम ;आईएलओद्थाईलैण्ड, सहकारिता की पुनः संरचना;आईसीए द्जापान और कोरिया, संतुलित पर्वतीय विकास ;आईसीमोड नेपाल, जनसंख्या नियंत्राण ;वीकेके इण्डोनेशीया, प्रशिक्षण केन्द्रों का प्रबन्धन, थाईलैण्ड में आयोजित सेमीनारों में तथा प्रफांस एवं कनाडा स्थित राष्ट्रीय व अन्र्तराष्ट्रीय प्रशिक्षण अकादमियों का अध्ययन भ्रमण किया। डाॅ.टोलिया की अभिरुचि के क्षेत्रा ग्राम विकास प्रसार, समन्वित पर्वतीय विकास, सहकारिता, प्राकृतिक संसाध्न, प्रबन्ध, लोक प्रशासन और मानव संसाध्न विकास एवं प्रशिक्षण था। डाॅ.टोलिया के प्रथम नियुक्ति संयुक्त मजिस्टेट उत्तरकाशी, एडीएम पौडी, आयुक्त कुमायूं मण्डल, सचिव/प्रमुख सचिव पर्वतीय विकास विभाग, निदेशक उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अकादमी नैनीताल और राज्य के प्रमुख सचिव, एपफआरडीसी, मुख्य सचिव व प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त रहें। इस प्रकार डाॅ. टोलिया ने शासकीय कार्य पूर्ण लगन व तत्परता से निर्वहन किया। उनके द्वारा हिमालयी राज्यों के विकास, राज्य योजना आयोग व नीति आयोग, भारत सरकार और विभिन्न क्षेत्रों के विकास कार्य व शोध् कार्यों में विशेष योगदान दिया गया।








