आर.एस.टोलिया के कार्यों को सम्मान देना चाहिये

वाई.एस.पांगती
प्रदेश सरकार द्वारा विधनसभा के विश्वकर्मा भवन के सभागार जिसका नाम डाॅ.आर.एस.टोलिया के नाम पर था, उसे बदल दिया गया। समझ नहीं आ रहा है कि किन कारणों से ऐसा किया गया जबकि स्व.टोलिया के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। उनके कार्यों को सम्मान देना चाहिये।

डाॅ. आर.एस. टोलिया, आईएएस उत्तराखण्ड मूल के प्रथम मुख्य सचिव व उत्तराखण्ड राज्य के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त का उत्तराखण्ड राज्य में किये गये उल्लेखनीय कार्यों का संक्षिप्त विवरण- जब उत्तराखण्ड राज्य का शीघ्र निर्माण होना था, तो उ.प्र. में चर्चा हुई कि कौन राज्य की व्यवस्थाओं को सम्भाल सकेगा? सर्व सम्मत्ति से डाॅ. आर.एस. टोलिया को दायित्व सौंपने पर विचार हुआ और 23 अक्टूबर, 1999 को मुख्य सचिव, उ0प्र0 का आदेश आया, तब डाॅ. टोलिया उप्र प्रशासनिक अकादमी नैनीताल में कार्यरत थे। उनके द्वारा तुरन्त 24 अक्टूबर, 1999 का प्रमुख सचिव उत्तराखण्ड शासन का पदभार ग्रहण किया गया और उसी रोज बैठक कर राज्य का कार्य सचिवालय में कार्मिकों को सम्ब( कर प्रारम्भ किया गया। उनके द्वारा सचिवालय से सभी प्रकार के कार्यों के साथ-साथ राजभवन, हाई कोर्ट, विभागों के निदेशालयों का ढांचा, लोक सेवा आयोग, विधान सभा आदि स्थापित करने के कार्य किये गये।
प्रथम अन्तरिम सरकार को डाॅ. टोलिया द्वारा शपथ ग्रहण कराया गया और नव राज्य का संचालन उनके द्वारा रात दिन कड़ी मेहनत व लगन से प्रारम्भ किया गया। अन्य आवंटित अधिकारीगण राज्य की पूर्ण जानकारी लेकर आराम से 2001 के बाद ही जब सभी कार्यालय कर्मचारियों को सम्ब( कर रूटीन कार्य प्रारम्भ कर दिया गया तभी कार्यभार ग्रहण करना प्रारम्भ हुआ। उप्र से उत्तराखण्ड आवंटित कार्मिकों को यथाशीघ्र मुक्त करने हेतु लिखा गया और आवंटित आईएएस/पीसीएस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पफोन कर कार्यभार ग्रहण करने की अपेक्षा की गयी, परन्तु लचर शासन की कार्य प्रणाली के कारण जो इच्छुक थे, उनके द्वारा उत्तराखण्ड में योगदान दिया गया और जिनकी रुचि नहीं हुए और उप्र सरकार ने भी उदारता दिखा दी और तो और पर्वतीय मूल के आईएएस/पीसीएस व अन्य विभागों के अध्किारियों ने आज तक कार्यभार ग्रहण नहीं किया और शक्ति करने पर कोर्ट से स्टे लेकर योगदान नहीं दिया। जब 9 नवम्बर 2000 के दिन नजदीक आने लगा अस्थाई राजथानी के निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो पाये, जिसका दायित्व आयुक्त बीएन वोहरा को दिया गया था। कार्य की गति को धीमी देखकर अन्तिम क्षणों में डा.टोलिया को दायित्व सौंपा गया। उन्होंने चुनौती स्वीकार करते हुए रात-रात भर बैठकर स्वंय निर्माण कार्य को 8 नवम्बर तक पूर्ण कराया। जब टोलिया बैठते थे तो अन्य अधिकारियों की हिम्मत नहीं थी कि कोई बहाना बनाकर जाये एवं अधिकारीगण जिनकी ड्यूटी लगायी गयी थी उनको भी रात भर बैठाकर निर्माण कार्य में योगदान देना पड़ा। पर्वतीय क्षेत्र में वन क्षेत्रा अधिक होने के कारण उनके द्वारा कृषि उत्पादन आयुक्त के समकक्ष पद एफआरडीसी बनवाया गया, जिसके अधीन 23विभाग आते थे, जिसकी भूमिका जनपद में मुख्य विकास कार्यालय व विकास खण्ड कार्यालय जो सामुदायिक विकास विभाग के रूप में कार्य करते थे। अब तो एफआरडीसी का स्वरूप समाप्त करने से एकीकृत ग्राम्य विकास विभाग छिन्न भिन्न हो गया और अन्य विभाग सिंगल विण्डो सिस्टम में चल रहे है। वर्तमान में विकास खण्ड केवल ग्राम्य विकास विभाग रह गया है। जहाँ आज की तारीख में अन्य विभाग की न सूचना है व न विकास के आंकड़ों का रखरखाव है। जब उत्तराखण्ड में अध्किारियों में टोटा होने से डाॅ. टोलिया के पास 20-25 विभाग थे वे अकेले सम्पादित करने में सफल रहते थे। बायोफ्रयूल योजना ;जैट्रोपफा को प्रारम्भ करने का श्रेय उन्हीं को जाता है जो आज ईधन के रूप में हवाई जहाज संचालित करने से देश में उसके महत्ता को समझा जा रहा है। जिसको आगे बढाने की आवश्यकता थी। उक्त के अलावा हल्द्वानी मेडिकल काॅलेज की स्थापना, बीज प्रमाणीकरण विभाग, लाईफ स्टोक अभिकरण, एससीएपी/टीएसपी योजनाओं का बजट का काट कर समाज कल्याण विभाग को सौंपा गया। डाॅ. टोलिया द्वारा पर्वतीय क्षेत्रा के गाँवों को सड़क मार्ग से जोड़ने हेतु भारत सरकार की महत्वपूर्ण योजना पीएम वीआई का प्रदेश में गठन कर केन्द्र सरकार से राज्य सरकार को मिलने वाली सहायता राशि प्राप्त कर कई सड़कों के प्रस्ताव भारत सरकार को भिजवाये।
उत्तराखण्ड विकल्पधरियों के पदोन्नति हेतु उप्र से प्रवष्टियां प्राप्त न होने से पदोन्नतियां प्रभावित हो रहे थे। डाॅ. टोलिया के संज्ञान में बात लाते ही उन्होने शीघ्र आदेश दिया कि जिन कार्मिकों की गोपनीय प्रविष्टियों उप्र से उपलब्ध् नहीं है उनसे एक शपथ पत्र प्राप्त करें, जिसमें अपने विरूद्ध कोई ऐसा तथ्य नहीं है, जिससे पदोन्नति प्रभावित हो। अतः उस आदेश के आधार पर निरन्तर पदोन्नतियां हुई। यहीं नहीं उनके द्वारा कार्मिकों के हित में यह आदेश पारित किया कि नित्य मुझे 5 बजे बाद देख लिया जाय यदि में उपलब्ध् हूँ तो डीपीसी की जाय, ताकि पदोन्नतियां प्रभावित न हो सकें। जबकि यह काम कार्मिक विभाग का था। बीस सूत्राी कार्यक्रम के योजनाओं के भौतिक लक्ष्य को प्रत्येक माह मानकों के अनुसार पूर्ति व उनके गुणवत्ता को कायम रखने के लिए उनके द्वारा कड़े निर्देश व गहनता से अनुश्रवण कर क्रियान्वयन कराया गया जिससे उत्तराखण्ड राज्य देश में लगातार 3 वर्ष बीस सूत्राी कार्यक्रम में प्रथम स्थान प्राप्त करने में सपफल रहा और सरकार द्वारा राज्य स्तर पर एक आयोजन कर उत्सव के रूप में मनाया गया और प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले जनपदों के अध्किारियों को ट्राफी व प्रशस्ति पत्रा देकर सम्मानित किया गया। और डाॅ. टोलिया ने एक रनिंग ट्राफी को भी चलवाया था जिसका उददेश्य में जो जनपद प्रथम आयेगा उसको यह ट्राफी प्रदान किया जायेगा। और सचिव, नियोजन को बीस सूत्री कार्यक्रम का विभागाध्यक्ष नामित किया गया था, जिससे शासन स्तर पर निरन्तर अनुश्रवण किया जाता था, परन्तु अब एक सचिव नियोजन ने बीस सूत्राी कार्यक्रम के विभागाध्यक्ष का पद अपने स्तर से निदेशक, अर्थ एवं संख्या को सौंप दिया है। तब से शासन स्तर पर बीस सूत्राी कार्यक्रम की समीक्षा नहीं हो पा रही है।
मुख्य सचिव रहते हुए सभी विभागों में निरीक्षण करना उनकी समस्याओं को सुनना व विकास कार्यों में तेजी लाने के सम्बन्ध् में निर्देश दिये गये। मुख्य सचिव रहते हुए पूरे प्रदेश का भ्रमण कर विकास कार्यों की प्रगति का जिला स्तर पर बैठक कर उनमें आ रही कठिनाईयों को वहीं पर हल किया गया। डाॅ. टोलिया जब 1991 में गन्ना आयुक्त थे, वित्तीय अनियमितता पर एक संयुक्त आयुक्त को निलम्बित कर दिया था, बाद में उन पर सरकार का दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा कि मैंने राज्य हित में निलम्बन किया है, परन्तु सरकार का दुबारा दबाव डालने पर उन्होंने 2 वर्ष के लिए अध्ययन अवकाश ले लिया 6 माह बाद मुख्य सचिव टीएसआर सुब्रमन्यम जो कैबिनेट सेक्रेटरी भारत सरकार से सेवा निवृत्त हुए, उनके द्वारा कार्यभार ग्रहण करने के लिए आग्रह किया गया, तो डाॅ. टोलिया ने पर्वतीय क्षेत्र में ही सेवा करने की इच्छा व्यक्त की गयी। और मुख्य सचिव ने तत्काल उनको सचिव पर्वतीय विकास नियुक्त किया। जबकि यह विभाग वरिष्ठ प्रमुख सचिव को सौपी जाती थी, परन्तु उनकी योग्यता, ईमानदीरी व क्षमता के आधार पर पर्वतीय विकास विभाग का दायित्व सौंपा गया था। सर्वप्रथम उन्हांेने जनपदों के जिला योजना संरचना जो बनायी गयी थी उन सभी का स्वयं अध्ययन कर विभागवार कमियां निकालकर प्लान जनपदों को लौटा दिया गया और कड़े निर्देश के साथ पुनः प्लान बनाने हेतु कहा गया शायद ही ऐसा मेहनत कोई अधिकारी करता हो। इससे पूर्व पर्वतीय विकास विभाग में काफी भ्रष्टाचार चल रहा था, बिना दिये फण्ड रीलिज नहीं होता था, अधिकारी स्वयं पत्र लेकर लखनऊ से फण्ड अवमुक्त करने जाते थे। यह बात टोलिया जी के संज्ञान में आते ही उन्होंने सारे वित्तीय अधिकार स्वयं के पास रखा और उन्होंने समय पर प्लान बनाने के साथ-साथ वार्षिक बजट पारित करते हुए प्रत्येक वर्ष 4/12 बजट अप्रैल प्रथम सप्ताह में फैक्स के माध्यम से जनपदों को विभागवार/मदवार/रिलीज कर दिया इस प्रकार योजनाओं की धन राशि जनपद के अधिकारियों को फण्ड रिलीज करने हेतु शासन में आने के लिये रोक लगा दिया गया, जिससे पर्वतीय विकास विभाग में एकदम भ्रष्टाचार पर विराम लग गया। पर्वतीय विकास विभाग के नोडल अधिकारियों को बिना अनुमति के शासन में जाने का अधिकार नहीं था और उनके द्वारा उप्र के अधिकारियों को भी पर्वतीय क्षेेत्रा में शासकीय कार्य हेतु केवल गर्मियों में ही दौरे में नहीं आने की हिदायत दी थी। उनके द्वारा प्लान/नाॅनप्लान/जिला सेक्टर/राज्य सेक्टर व केन्द्र पुरोनिधनित योजनाओं का मदवार पृथक-पृथक विकास पुस्तिका योजनावार/लक्ष्यवार प्रकाशित किया गया ताकि किसी को योजना की जानकारी लेने व रिपोर्ट देने में दुविधा न हो।पर्वतीय विकास सचिव रहते हुये उन्होनें विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रा में जितने भी भवन व योजनायें बनायी गयी थी, उनकी स्थिति की पूर्ण जानकारी लेकर अपूर्ण कार्यों को पूर्ण कराने के उपरान्त सम्बन्धित विभाग को हस्तान्तरित करने के लिये निरन्तर समीक्षा करते थे क्योंकि व्यवहार में विभाग में छोटी-मोटी कमियों के कारण हस्तान्तरण करने में विलम्ब करते थे जिससे भवन/योजनाओं उपयोग न करने पर पुनः क्षतिग्रस्त हो जाते थे। वे प्रायः जन समस्याओं का निदान अविलम्ब करते थे। इसी प्रकार उनके कार्यशैली को देखते हुये वर्ष 92-93 में चैखुटिया क्षेत्रा अल्मोड़ा में जन समस्याओं से सम्बन्धित एक बहुत बड़ा आन्दोलन हुआ। क्षेत्रवासियों की मांग थी कि सचिव टोलिया ही हमारी बातें सुनें, अन्य पर भरोसा नहीं था और उन्होने चैखुटिया समय पर पहुंच कर पूरे दिन व रात भर बिन्दुबार समस्याओं का निराकरण करते- करते सुबह चमोली को रवाना हो गये जबकि रातभर अधिकारियों को नींद आते रहे परन्तु टोलिया जी रात भर नहीं सोये। इस प्रकार सचिव उत्तराखण्ड का कार्यकाल पर्वतीय क्षेत्रा के लिए अच्छा रहा। जब वे दौरे में रहते थे तो नित्य लखनऊ से डाक का बक्शा मंगाते थे और कार में सफर करते समय फाईल करते थे और उसी शाम को डाक बक्शा लखनउ भेजते थे और फैक्स से लखनऊ निरन्तर फील्ड से ही आगे क्या कार्य करना है, निर्देश भेजते थे और पर्वतीय क्षेत्र के नोडल अधिकारियों को अपने सम्पर्क में रखते थे। ताकि क्षेत्रा के कार्य में तेजी लाये जा सके। जब टोलिया बनारस के डीएम थे उनके द्वारा विकास भवन की परिकल्पना कर सर्व प्रथम विकास भवन वाराणसी में बनाया गया और तत्पश्चात उप्र राज्य के प्रथम ग्राम्य विकास आयुक्त पद का कार्य भार सम्भालकर उन्होंने पूरे प्रदेश में विकास भवन बनाने का प्रस्ताव दिया। आज प्रदेश के विकास भवन बनाने का श्रेय उनको जाता है। उनके द्वारा ग्राम्य विकास विभाग के निरीक्षण सम्बन्धी विस्तृत प्रारूप पूर्ण रूप से तैयार कर मण्डल/जनपद/विकासखण्ड स्तर पर परिपालन हेतु लागू करवाया गया। यदि आज भी उनके निरीक्षण प्रारूप का उपयोग किया जाय तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं रहेगी। विभिन्न विश्व विद्यालयों में भी उन्होंने विभिन्न विषयों पर समय-समय पर आयोजित गोष्टी व सेमीनार में प्रतिभाग कर अनेक शोध् पत्र तैयार कराकर प्रकाशित करवाये गये। गढ़वाल विश्वविद्यालय के बुद्धीजीवी वर्गों द्वारा उनके कार्यों से प्रभावित होकर मरणोपरान्त उनके परिवार को शौर्य पुरस्कार भेंट किया गया। पर्वतीय विकास सचिव रहते हुये उन्होनें ग्राम बलढौढी अल्मोडा कुष्ठ आश्रम में डाॅ.रीच द्वारा उनके उपयोगार्थ एक हैण्डपम्प स्थापित करवाया जो सपफल रहा। इस प्रकार उनके द्वारा डाॅ.रीच के तकनीकि व साहित्य को समस्त पर्वतीय क्षेत्र के सम्बन्ध्ति अध्किारियों को प्रेषित कर उनसे प्राप्त प्रस्ताओं को शासन से मंजूरी देकर पर्वतीय क्षेत्र में हैण्डपम्प को स्थापित करवाया।डाॅ. टोलिया ने निदेशक, ग्राम्य विकास प्रशिक्षण संस्थान, बंक्शी का तालाब लखनउ के दौरान उनके द्वारा भारत सरकार को कपाट योजना की 5 करोड़ लागत तक के अधिकार मांगने का प्रस्ताव भेजकर निदेशक, ग्राम विकास को प्रशासनिक व वित्तीय अधिकार प्राप्त करा कर मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश राज्य को लिये इस योजना से लाभान्वित कर रोजगार मुहैया कराये गये।
कौशिक समिति द्वारा डाॅ. टोैलिया को उत्तराखण्ड राज्य की राजधनी स्थापित करने का कार्य सौंपा गया था उनके द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों के बुद्विजीवियों से प्रश्नावली तैयार कर उनकी राय के अनुसार रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपी गयी। जब प्रशासनिक अकादमी नैनीताल में कार्यरत थे उनके द्वारा अन्य राज्यों के अध्किारियों को भी समय समय पर विभिन्न विषयों पर प्रशिक्षण हेतु आमंत्रित किये और अपने राज्य में केवल प्रशासनिक अधिकारियों व अन्य राजपत्रित अधिकारियों की ही नहीं अपितु अराजपत्रित अधिकारियों की भी समय-समय पर सेमीनार व गोष्ठी आयोजित कर आवश्यक प्रशिक्षण दिया गया। उनके द्वारा अकादमी में क्षेत्रा प्रमुख, ग्राम प्रधन, ग्राम पंचायत सदस्यों, स्व सहायता समूह, वन पंचायत के सरपंचों व स्वैच्छिक संस्थाओं व अन्य जन अधिकारियों को भी विभिन्न विकास कार्यों से सम्बन्धित समय-समय पर प्रशिक्षित किया गया ताकि वे जागरूक होकर अपने क्षेत्रा के विकास कार्यों में भली-भाॅति कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।
प्रशासनिक अकादमी में कार्यरत रहते हुए विश्व बैंक की ग्राम स्वजल योजना का संचालन पर्वतीय क्षेत्रा में किये जाने हेतु ध्नावंटन का कार्य किया गया तथा उक्त योजना में कार्यरत अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था करायी गयी।
निदेशक प्रशासन अकादमी रहते हुए उनके द्वारा महत्वपूर्ण पुस्तकें/लेख एवं विभागों में अधिकारियों के उपयोगार्थ कई प्रकाशन किये गये जो आज भी प्रशासन अकादमी नैनीताल में उपलब्ध् है। मुख्य सचिव रहते हुए उनके द्वारा कई पुस्तकें लिखी गई जो आज भी व्यावहारिक हैं।विभिन्न पदों पर रहते हुए उनके द्वारा विभागों द्वारा किये जा रहे महत्वपूर्ण कार्यों का डाक्यूमेंटेशन कराया गया। उ.प्र. में दुग्ध् आयुक्त रहते हुए उनके द्वारा राज्य में डेरी विभाग एवं महिला डेयरी का गठन कर प्रदेश को डेयरी उद्योग के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाया गया। उत्तराखण्ड राज्य में जड़ी बूटी का प्रचार एवं प्रसार कर राज्य की वित्तीय स्थिति को देखते हुए उनके द्वारा राज्य में स्थापित जड़ी बूटी शोध् संस्थान को सशक्त बनाया गया तथा किसानों को प्रशिक्षित करने हेतु सेलाकुई में एक सेंटर की व्यवस्था भी करायी गई। डा. टोलिया द्वारा उत्तराखण्ड में चाय बगान विकास को पुर्नजीवित कर प्रारम्भ किया गया जिससे हजारों लोगों को आज रोजगार प्राप्त हो रहा है। वन एवं ग्राम विकास आयुक्त रहते हुए उनके द्वारा भारत सरकार को हिमालयी राज्य की परिकल्पना का प्रस्ताव भी भेजा गया। डाॅ.टोलिया की नियुक्ति सचिव भारत सरकार में होने पर तत्कालीन सरकार द्वारा उनको मुख्य सूचना आयुक्त का कार्य सम्भालने का आग्रह किया गया। उनके द्वारा अविलम्ब सचिव भारत सरकार के पद से त्याग पत्रा देकर राज्य के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यभार ग्रहण कर प्रदेश के जनता को सूचना के अध्किार के महत्व की जानकारी विभिन्न स्तरों पर गोष्ठी व अनेक पुस्तकें प्रकाशित कर और प्रचार-प्रसार के माध्यम से दी। यहीं नहीं प्रत्येक विभाग में विभागीय सूचनाओं व शासनादेशों के रख रखाव के लिए मैनयुल तैयार करवाया गया, जिससे विभागों को भी शासनादेशों का संकलन व विभागीय सूचना प्रत्येक स्तर पर रखने व उसका उपयोग करने की सुविध हुई, यहीं नहीं उनके द्वारा आयोग के सचिव को प्रत्येक विभाग के कार्यालय का निरीक्षण कराकर सूचना का अध्किार 2005 का निर्देशों के परिपालन व मूल्यांकन करा कर विभागों के कार्यों के स्तर के आधर पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। और अच्छे कार्यों करने वाले विभागों का प्रशस्ति पत्रा प्रदान किया गया। इस प्रकार राज्य में सूचना के अधिकार 2005 का आम जन को सरकारी सूचनाओं का लाभ पहुँचाने से राज्य में ही नहींे अपितु देश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कराने से राज्य गौरवान्वित हुआ। उन्होंने सेवाकाल में दक्षिण एशिया में आयोजित सेमिनार बालश्रम ;आईएलओद्थाईलैण्ड, सहकारिता की पुनः संरचना;आईसीए द्जापान और कोरिया, संतुलित पर्वतीय विकास ;आईसीमोड नेपाल, जनसंख्या नियंत्राण ;वीकेके  इण्डोनेशीया, प्रशिक्षण केन्द्रों का प्रबन्धन, थाईलैण्ड में आयोजित सेमीनारों में तथा प्रफांस एवं कनाडा स्थित राष्ट्रीय व अन्र्तराष्ट्रीय प्रशिक्षण अकादमियों का अध्ययन भ्रमण किया। डाॅ.टोलिया की अभिरुचि के क्षेत्रा ग्राम विकास प्रसार, समन्वित पर्वतीय विकास, सहकारिता, प्राकृतिक संसाध्न, प्रबन्ध, लोक प्रशासन और मानव संसाध्न विकास एवं प्रशिक्षण था। डाॅ.टोलिया के प्रथम नियुक्ति संयुक्त मजिस्टेट उत्तरकाशी, एडीएम पौडी, आयुक्त कुमायूं मण्डल, सचिव/प्रमुख सचिव पर्वतीय विकास विभाग, निदेशक उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अकादमी नैनीताल और राज्य के प्रमुख सचिव, एपफआरडीसी, मुख्य सचिव व प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त रहें। इस प्रकार डाॅ. टोलिया ने शासकीय कार्य पूर्ण लगन व तत्परता से निर्वहन किया। उनके द्वारा हिमालयी राज्यों के विकास, राज्य योजना आयोग व नीति आयोग, भारत सरकार और विभिन्न क्षेत्रों के विकास कार्य व शोध् कार्यों में विशेष योगदान दिया गया।

तुलसी देवी का उनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है

हीरा सिंह पंचपाल से बातचीज

पि.हि. प्रतिनिधि
ग्वालदम। तुलसी देवी मर्तोलिया ऐसा नाम है जिसने उनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उपेक्षित लोगों को अवसर दिलाने के लिये उन्होंने अपनों का विरोध् भी सहन किया था। इन्हीं तुलसी देवी की याद में आज मूर्ति स्थापित है और लोग उनकी कर्मठता को याद करते हैं।
अपनी पुरानी यादों के साथ बातचीत करते हुए 70 वर्षीय हीरा सिंह पंचपाल बताते हैं कि करीब 1936 में जोहार के व्यापारी गरुड़ में आकर रहने लगे। ठण्डे स्थान में रहने वाले इन व्यापारियों को गरुड़ में भी गर्म लगने लगा और 1946 में ग्वालदम आ गये। इसमें उनके नाना मोहन सिंह रावत भी थे, जो पौड़ी-चमोली जिले के सम्मानित व्यक्तियों में थे। पिता स्व.राजेश सिंह पंचपाल भी व्यापार के सिलसिले में यत्र-तत्र जाते थे। देवाल, वाण, थराली, नारायणबगड़ दूरस्थ क्षेत्रों तक तत्कालीन ढुलान का कारोबार इन लोगों के पास था। श्री पंचपाल बताते हैं कि उनकी बुआ जी बेटी तुलसी देवी के पति की भाबर में मृत्यु के बाद वह असहाय सी महसूस करने लगी थी। तब नाना मोहन सिंह जी उन्हें ग्वालदम ले आये और वह उनी कारोबार करने लगी। तुलसी दीदी के साथ माँ गंगादेवी पंचपाल भी उनी फैक्ट्री में सहयोगी थी। 1954 में यू.पी. स्मोल स्केल इंडस्ट्रीज में पांचवे नम्बर का रजिस्ट्रेशन इनकी फैक्ट्री का ही था। तब उनी कपड़ों का बहुत चलन था और गढ़वाल के दूर-दूर क्षेत्रों तक इनकी धाक थी। तुलसी दीदी जिला बोर्ड की सदस्य के अलावा महिला कांग्रेस चमोली की संयोजिका थी। भारत सरकार के प्रोग्राम कल्याण विस्तार परियोजना के 16 स्थानों में चलने वाले स्कूलों को वह देखती थी। आगनबाड़ी में कताई-बुनाई जैसे कार्य भी सिखाये जाते थे। उस समय यह लोग अवैतनिक कार्यकर्ता होते थे। मात्र यात्रा भत्ता इन्हें मिलता था।
तुलसी दीदी ने कई धर्मिक अनुष्ठान यहाँ करवाये। साथ ही उपेक्षित लोगों को आगे बढ़ाने के लिये जुटी रहीं। बच्चों की रुचि पढ़ाई-लिखाई की ओर करने, ग्रामीणों को स्वावलम्बी बनाने, किसानों को कृषि औजार दिलाने जैसे कार्य में वह लगी रहती थी। 1985 में उन्होंने विद्याभारती संस्था को अपनी फैक्ट्री दान कर दी, जिसमें आज सरस्वती स्कूल चल रहा है। 1985 में तुलसी देवी का निधन हुआ। उनकी प्रेरणा से प्रेरित कई लोग आज काफी आगे हैं। ऐसी प्रेरणादायक की याद में स्कूल के पास ही उनकी मूर्ति स्थापित की गई है।
हीरा सिंह जी पुरानी शिक्षा व्यवस्था को गुणवत्तायुक्त मानते हुए बताते हैं कि तब हर कोई नहीं पढ़ता था। लगनशील बच्चे आगे बढ़ते थे और श्रम करते थे। तब पढ़ाने वाले पण्डित जी बहुत कम मेहनताने में योग्य शिष्यों को तैयार करते थे। समाज का भी उत्तरदायित्व गुरु की ओर ध्यान देने का था। स्कूल जाते समय बच्चे एक लकड़ी जरुर ले जाते थे और गुरुजी की घर के पास डाल देते, ग्रामीण महिलाएं उनके घर की लिपाई-घिसाई कर देती, कोई घी-सब्जी देता, कोई पानी ला देता। यानी कि बड़े ही शुद्ध भाव से गुरु सेवा होती थी और गुरुजन भी समाज को बनाने और सुधारने के लिये समर्पित थे। उनकी इलाके भर में प्रतिष्ठा होती थी, वह स्कूल की छुट्टी के बाद गाँव में घूमकर बकायदा बच्चों के बारे में उनके माता-पिता से बातचीत करते थे। गुरुजी पिटाई भी बहुत करते थे, जो हमें सुधार के लिये ही थी।

कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं डीआईजी पंचपाल

आईटीबीपी में डीआईजी रहे हीरा सिंह पंचपाल दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं। 1968 में भर्ती हुए श्री पंचपाल 2009 में सेवानिवृत्त हुए। सेवा के दौरान श्रीनगर में युद्धभूमि में यह काफी घायल हो गये थे लेकिन हौंसला नहीं छोड़ा और लड़ते हुए जीते। इकोलाॅजी के लिये कार्य करते हुए इन्हें सन् 2000 में ‘मैती’ पुरस्कार से भी नवाजा गया। श्री पंचपाल आज भी सैन्य अकादमी में पढ़ाने मसूरी जाते हैं। साथ ही सामाजिक गतिविधयों में सक्रिय हैं।

पिघलता हिमालय 11 जुलाई 2016 के अंक से

लद्दाख से उत्तराखण्ड तक फैले हिमालयी दर्रों को नाप रहे हैं तीन पर्वतारोही

केशव भट्ट
भारत में हिमलयी क्षेत्रा में बसे गाँवों को पर्यटन से जोड़ उनकी आर्थिकी मजबूत करने के इरादों से से तीन युवा पर्वतारोही लद्दाख से उत्तराखण्ड तक फैले पश्चिमी हिमालयी दर्रों को नाप रहे हैं। यह दल अपने यात्र अभियान में बीस दर्रे, जिसमें 5950 मीटर उँचे कालिंदी पास को पार कर लगभग 870 किमी की पैदल यात्रा कर चुके हैं। वेस्टर्न हिमालयन ट्रेवर्स का यह दल अब अपने अभियान के अन्तिम चरण में है। अगले कुछ दिनों में नेपाल के बार्डर धरचूला में पहँुचेंगे। जहाँ इनकी ये यात्रा समाप्त होगी।
पर्वतारोही भारत भूषण ने ट्रवर्स यात्रा मार्ग में जोहार घाटी के बुंई गाँव से फोन से बताया कि वेस्टर्न हिमालयन ट्रेवर्स के इस अभियान में उनके अलावा प्रणव रावत और शेखर सिंह शामिल हैं। उन्होंने लद्दाख के मार्खा वैली में चिलिंग ब्रिज से 27 अगस्त को अपनी यह यात्रा शुरु की। रूमसे, शोकर लेक, सुमररी लेक तथा 5580 मीटर उँफचे परंगला को पार कर उनके दल ने हिमांचल की घाटी में प्रवेश किया। मुद से काफलू गाँव, करछम होते हुए सांगला निकले और लमखागा होते हुए उत्तराखण्ड के हर्षिल में पहँुचे। यहाँ से गंगोत्री होते हुए हर्षिल में आये। यहाँ से पाणा, आला, सिथेल, कनोल, वान, अली बुग्याल, हिमनी गाँव होते हुए दानपुर घाटी में सोराग होते खाती गाँव में प्रवेश किया। इसके बाद जोहार घाटी में लीलम होते हुए उनकी यात्रा जारी है। इस दल के युवा पर्वतारोही उत्तराखण्ड में हिमालय के सीमान्त गाँवों में होते हुए जा रहे हें। अपने पड़ाव में वे गाँव में रुक कर ग्रामीणों समेत स्कूलों में इस यात्रा के महत्व के बारे में सन्देश देते जा रहे हैं कि किस तरह से पर्यटकों की आवाजाही से उनकी आर्थिकी मजबूत होगी। भारत भूषण ने कहा कि विदेशों में कई तरह के हिमालयी यात्रा मार्ग हैं, जिन्हें ट्रेल कहा जाता है। नेपाल में में ग्रेट हिमालियन ट्रेल विश्व प्रसिद्ध है।

तिब्बत में हुई कहासुनी से समान छोड़कर आना पड़ा था

हरीशचन्द्र सिंह लस्पाल

पि.हि.प्रतिनिधि
भारत-तिब्बत व्यापार के पुराने दिनों में सीमान्त क्षेत्र से जाने वाले व्यापारियों और तिब्बतियों के मधुर सम्बन्ध् रहे हैं। व्यापारी अपने मित्रों को पहचानते थे और एक-दूसरे की आवाभगत में कोई कमी नहीं करते। इसके बावजूद कई ऐसे अवसर आये हैं जब किन्हीं कारणों से मनमुटाव या कहासुनी हुई तो व्यापारियों को जान बचाकर भागना भी पड़ा। इसके अलावा कज्जाकी लुटेरों की कहानी बुजुर्ग बताया करते थे।
मानसिंह लस्पाल बूबू ;बुरांठ राठ परिवार के सदस्य हरीशचन्द्र सिंह पांगती से बातचीत के बाद कुछ जानकारी यहाँ दी जा रही है। बूबू मानसिंह जी अपने जमाने के बहुत रौबीले व्यक्ति थे और घुड़सवारी में भी पारंगत। इनके तीन पुत्र नाथू सिंह, दयान सिंह और डा.एम.एस. लस्पाल तथा तीन विवाहित पुत्रियां हैं जिसमें रमेश जंगपांगी, प्रेम सिंह जंगपांगी व श्री मडवाल परिवार में हैं। पीएसी से सेवानिवृत्त दयान सिंह के पुत्र पुष्कर, तीन विवाहित पुत्रियां पुष्पा पांगती, नीरु मर्तोलिया, आशु मर्तोलिया हैं। चिकित्सा विभाग में मुख्य चिकित्साधिकारी पद से सेवानिवृत्त और सामाजिक गतिविधियों में बेहद सक्रिय डा.एम.एस.लस्पाल के पुत्रा डा.राहुल चिकित्सा सेवा में और रोहित एफसीआई में हैं।
पिता स्व.नाथू सिंह व माता श्रीमती लक्ष्मी देवी के पुत्रों में ईश्वर सिंह, हरीश सिंह, मनोज सिंह हैं। हरीशचन्द्र सिंह लस्पाल का जन्म माइग्रेसन में जाते समय बोगड्यार में हुआ था। 52 वर्षीय हरीशचन्द्र सिंह बताते हैं कि जोहार के लास्पा में उनका मूल है। साईं में रहने वाले लस्पाल परिवार छोरीबगड़ भी आ गये थे। श्री लस्पाल की बचपन की पढ़ाई छोरीबगड़ में ही हुई। जहरीखाल जाकर पढ़ने का अवसर भी मिला पिफर हल्द्वानी और अल्मोड़ा से इण्टर किया। पढ़ाई के साथ तैयारी करते हुए यह एलआईसी से जुड़ गये और वर्तमान में इसी में प्रशासनिक अध्किारी के पद पर हैं। डोटिला, कपकोट के स्व.बहादुर सिंह रावत व रुकमणि देवी की पुत्राी चित्रा से 1993 में इनका विवाह हुआ। श्रीमती चित्रा लस्पाल भी एलआईसी में हैं और उत्कृष्ट खिलाड़ी के रूप में उनकी पहचान है जो उत्तर मध्य क्षेत्र से अखिल भारतीय स्तर पर खेलती हैं। कैरम उनका मुख्य खेल है। इसके अलावा चैस, टीटी भी खेलती हैं। पिछले नौ सालों से वह नेशनल खेल रही हैं। पारिवारिक व सामाजिक दायित्व के चलते चित्रा जी ने पदोन्नति का लाभ नहीं लिया। हरीशचन्द्र सिंह लस्पाल जी से कुछ बचपन की सुनी कुछ यादगार पूछने पर वह बताते हैं कि एक बार पिता जी और चाचा दयानसिंह जी तिब्बत गये थे। व्यापारी आवत-जावत में अपने मित्रों को खोजते थे और सौदा होता था। उस बार सौदे में न जाने कौन दूसरे लोग आ गये थे और भाषाई दिक्कत भी थी। तिब्बत में हुई कहासुनी के बाद पिता और चाचा को सारा सामान छोड़कर आना पड़ा था।

तड़ागी परिवार ने सम्भाला था बेरीनाग-चकौड़ी टी-स्टेट का मैनेजमेंट

टी स्टेट की फैक्ट्री का खण्डहर

डाॅ.पंकज उप्रेती
बेरीनाग सुरम्य नगरी के रूप में विख्यात है लेकिन अब इसमें रम्य वातावरण ने इसे दूषित कर दिया है। कभी अपने चाय बागानों के लिये मशहूर रहे बेरीनाग के लोग ही अब बाहर से आने वाली चायपत्ती का इस्तेमाल कर रहे हैं। अनियंत्रित और अनियोजित दौड़भाग ने बेरीनाग की सूरत को बदल दिया है।

अंग्रेजों के जमाने में यहाँ से चाय की सप्लाई विलायत तक होती थी। दानसिंह मालदार परिवार के कारोबार ने बेरीनाग और चकौड़ी तक को विस्तार दिया था और इस स्टेट का मैनेजमेंट संभाल रखा था तड़ागी परिवार ने। अब सबकुछ बदल सा गया है, बागान के पास चाय फैक्ट्री का खण्डहर दिखाई देता है और पास ही में तड़ागी परिवार का आशियाना। मालदार परिवार के वटवृक्ष की शाखाएं जितनी ज्यादा फैलती गई, यहाँ की जमीन भी उतनी ही बंटती चली गई और स्टेट की खूबसूरती कम होती रही।
वर्तमान में तड़ागी परिवार की सदस्या श्रीमती नर्मदा तड़ागी यहाँ रहती हैं और बातचीत में पुराने समय के बेरीनाग का स्मरण कर यादों में खो जाती हैं। वह समय जब दानसिंह जी थे और उनके ससुर और पति ने कारोबार को सम्भाला। वह कहती हैं कि चारों ओर दूर-दूर तक चाय के बागान थे और गुलबहार, अप्रैलिया सहित तरह-तरह के फूल खिलते थे। खुमानी, पुलम, नारंगी कई प्रकार के फल होते थे। ऐसे प्राकृतिक वातावरण को देखने के लिये बाहर से लोग बेरीनाग आया करते थे।

अब बात तड़ागी परिवार की ही कर लेते हैं। मूल रूप से चम्पावत के इस परिवार का ताल्लुक मालदार परिवार से है। मोहनसिंह जी के सालेसाहब गोविन्द सिंह जी हुए। कुंवर महिराज की माता सरस्वती बिष्ट गोविन्द सिंह तड़ागी की दीदी थीं । अपने समय में कानपुर विश्वविद्यालय से बीकाॅम पढ़े तड़ागी जी को मालदार साहब ने चकौड़ी-बेरीनाग टी-स्टेट का मैनेजर नियुक्त किया। पढ़े-लिखे होने के  साथ ही पूरी स्टेट की गतिविधियों को जानने-समझने वाले तड़ागी जी ने 25 साल नौकरी के बाद अपना चार्ज पुत्र  हर्षबद्र्धन तड़ागी को दे दिया और टी-स्टेट का गतिक्रम बना रहा लेकिन समय के साथ बहुत कुछ इतिहास बन चुका है। गोविन्द सिंह के ज्येष्ठ पुत्र राजकिशोर आर्मी में भर्ती हो गये,  हर्षबद्र्धन तड़ागी ने 35 साल  तक टी-स्टेट को सम्भाला, पुत्री रजनी हल्द्वानी और रीता बरेली में अपने परिवार के साथ है। पिता के बाद 35 साल तक स्टेट को सम्भालने वाले हर्षबद्र्धन के पुत्र कीर्तिबद्र्धन आसाम टी कम्पनी  में मैनेजर हैं। इन्होंने सिलगुड़ी में कोर्स और ट्रेनिंग कर बेरीनाग में चाय कारोबार को बढ़ाने की सोची थी किन्तु संयोग से आसाम में चाय कम्पनी में जुड़ गये। तड़ागी जी की पुत्री दीप्ति ने जयपुर से संगीत विषय में एमफिल किया है जबकि ज्योति ने बायोटेक किया। परिवार के ताने-बाने पर चर्चा के साथ ही श्रीमती नर्मदा जी बताती हैं कि सन् 1982  में उनका विवाह हर्षबद्र्धन जी के साथ हुआ। उस समय बेरीनाग में इण्टर कालेज का भवन के अलावा दूर-दूर कुछ नहीं था। कुछ अंग्रेजों के समय के बने भवन थे। चाय फैक्ट्री को ससुर गोविन्द सिंह जी देखते थे, जिसमें 80 लोगों का स्टाफ था, सीजन के समय ग्रामीण आ जाते थे और 250 लोग तक हो जाते थे। फैक्ट्री के पास गेटपास जरूरी था, तीन प्रकार के इंस्पेक्टर जाँच के लिये आते थे और चाय विलायत तक को जाती थी। गाड़ी व यातायात के साधन नहीं थे, श्रमिक पीठ में चाय के बाक्स लादकर चम्पावत, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ ले जाते थे। घोड़ों में भी सामान दूर-दूर तक जाता था। स्वास्थ्य खराब होने के बाद ससुर जी ने हर्षबद्र्धन जी को स्टेट का कारोबार देखने को कह दिया। समय बीतता गया और स्टेट की ओर पुरानी पीढ़ी की तरह ध्यान देने वाले नहीं रहे। फैक्ट्री की मशीनें खराब हो गई और चाय  के बाग कुम्हला से गये। अप्रैल की चाय अच्छी मानी जाती थी, पर  सम्भालना कठिन होता जा रहा था। स्टेट के हालातों को देखकर पति हर्षबद्र्धन जी भी उदास रहने लगे थे। यही नहीं मालदार परिवार के सम्वेदनशील सदस्यों को भी स्टेट के वर्तमान हाल देखकर जरूर दर्द होगा, क्योंकि जिस बेरीनाग की चर्चा इनके बिना अधूरी रह जाती है, उसमें नई पीढ़ी के बच्चे इन बातों को नहीं जानते हैं। कुछ लोगों ने सूझबूझ कर कुंवर महिराज की मूर्ति जरूर बाजार के चैराहे पर लगा दी है।

बेरीनाग और चकौड़ी की खूबसूरती को संवारने में यहाँ के लोगों और मालदार परिवार के सदस्यों को ही ध्यान देना होगा। केवल शहर बसा देना ही विकास नहीं होता है। साथ ही कोई रहे या न रहे, नियंत्रित व नियोजित कार्यों की महक जरूर रहती है।

पिघलता हिमालय 12 सितम्बर 2016 अंक से

झुप्पू में सामान लादकर तिब्बत से गरुड़, सोमेश्वर, दूनागिरी जाते थे

गंगा सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
तिब्बत व्यापार के दौर की कई यादों के साथ कई लोग हमारे समाज में हैं। वह व्यापार चाहे सीमा पार जाकर तिब्बत होता था या आन्तरिक शहर-कस्बे-गाँव में, उनकी स्मृतियाँ हमेशा मधुर रहेंगी। ऐसी ही मधुर स्मृतियों को सजो कर रखा है ध्रमघर में रहने वाले गंगा सिंह पांगती ने।

1951 में दरकोट, मुनस्यारी में पिता रतनसिंह माता रूमा देवी के घर जन्मे गंगासिंह का बचपन बहुत ही संघर्षमय रहा है। इनकी दो बहिनें- कोकिला देवी ;पंचपाल और प्रेमा;मर्तोलिया हैं। पिता के निधन के बाद 5-6 साल की उम्र में बालक गंगा अपने नाना दलीप सिंह पंचपाल;सयाना के घर सिमगड़ी, नाकुरी पट्टी आ गये। पिथौरागढ़-बागेश्वर जनपदों की सीमा क्षेत्रा ध्रमघर नामक स्थान में इनका परिवार रहता है।

गंगासिंह बताते हैं कि इनके नाना जी चार भाई थे- दलीप सिंह, उत्तम सिंह। व्यापार के दिनों में यह लोग अपने जानवरों सहित इधर-उधर जाते थे। झुप्पू में समान लादकर दूर तक इनकी यात्राएं होती थीं। झुप्पू याक से छोटे नश्ल का जानवर है। झुप्पू भी दो तरह के होते हैं- एक तो छोटे कद और छोटे सींग वाला और दूसरा बड़े शरीर वाला। नाना जी लोग सिमगड़ी में रहते हुए ही जोहार के पांछू और तिब्बत तक जाते। जब वे लोग नमक इत्यादि सामान लेकर वापस आते थे तब बचपन में कमेड़ीदेवी, गरुड़, बिन्ता, सोमेश्वर, द्वाराहाट जाने का मौका मिला। नाना जी के साथ दूनागिरी, पाण्डुखोली ;द्वाराहाट भी गया। सोमेश्वर, बिन्ता से वापसी में चावल लाते थे। वस्तु विनिमय में नमक इत्यादि सामान के बदले चावल मिलता था। अपने बचपन को याद करते हुए पांगती जी बताते हैं कि जिला पंचायत के अन्तर्गत माइग्रेशन का प्राइमरी स्कूल पांछू नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम सिमगड़ी स्कूल हो गया और माइग्रेशन व्यवस्था नहीं रही किन्तु उन्होंने पुराने रिकार्ड खुलवाये और इस आवाज उठाई। बाद में एक और प्राइमरी स्कूल शौक्यूड़ा नाम से खुल गया। बचपन की पढ़ाई के बाद गंगासिंह मुनस्यारी पढ़ने चले गये। चाचा सत्यवीर सिंह पांगती सहित कई लोगों ने आगे पढ़ाई के लिये सहयोग किया लेकिन कक्षा आठ की पढ़ाई करते हुए ही गंगा सिंह सीआरपीएफ में भर्ती हो गये। 1980 में हरतोला के झुब सिंह पंचपाल ;मल्ला राठ की पुत्री से इनका विवाह हुआ। अपनी स्थिति-परिस्थिति से घिरे गंगा सिंह का संघर्ष चलता रहा। नौकरी के दौरान ही अस्वस्थ्य माता जी के इलाज के लिये वह अपने अधिकारियों से तक भिड़ जाते थे। चूंकि उनकी हर आवाज उनके अन्तःकरण की थी, सो वह सपफल ही रहे। सेवानिवृत्त होने के बाद गंगासिंह जी सिमगड़ी के ग्राम प्रधान बन गये। जनहित के मुद्दों को उठाने के साथ ही एक पफौजी अनुशासन के लिये चर्चित पांगती जी को पंचायतीराज संगठन का ब्लाक अध्यक्ष बना दिया गया। संगठन के जिला, मण्डल अध्यक्ष के बाद अब वह प्रान्तीय अध्यक्ष हैं।

अपने बचपन की यादों में लौटते हुए वह बताते हैं कि उनका मूल घर तो मिलम ही है। पिता जी दरकोट आते समय बोगड्यार से टांटरू, बाख ले आते थे। टांटरू की सब्जी और बाख का आचार खूब याद आता है। संगठन की भावना के साथ सबको जोड़ने वाले श्री पांगती कहते हैं- ‘विषम परिस्थितियों में भी खुश रहना आता है पर्वतवासियों को।

पिघलता हिमालय 15 अगस्त 2016 से

सीधे और सच्चे पत्रकार थे ललितमोहन कोठियाल

उमेश डोभाल ट्रस्ट के महासचिव व वरिष्ठ पत्रकार का 7 अक्टूबर 2018 को हृदयगति रुकने से निधन हो गया। मिशन की पत्रकारिता में लगे रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान रखने वाले भाई एम.मोहन कोठियाल को पीड़ा होने पर पौड़ी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्हें श्रीनगर के लिये रेफर कर दिया। अस्पताल, दवाईयाँ, सड़क, बिजली जैसी आम जरूरतों की मांग के लिये लड़ने वाले कोठियाल जी इतनी जल्दी हमसे विदा हो जाएंगे, किसी ने सोचा ही न था। पौड़ी की समस्याओं के साथ ही उत्तराखण्ड के हर भले आन्दोलन में उनकी किसी न किसी रूप में भागीदारी थी। चकबन्दी को लोगों का हथियार बनाने की आवाज उठाने का काम उन्होंने किया। उमेश डोभाल ट्रस्ट के महासचिव होने के साथ ही उन्होंने एक कार्यकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाई और हर किसी के सुख-दुःख में सम्मिलित हुए। उन्हें पत्रकारिता की सूझ और समझ थी तभी तो वह कुरेदने वाले सवाल उठाते थे और पहाड़ के दर्द को पहचानते थे। पिघलता हिमालय स्व.कोठियाल को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करता है कि दुःख की इस घड़ी में उनके परिवार को साहस-शक्ति प्रदान करे।

देशज: ऐसी छटपटाहट का अहसास था

डाॅ.पंकज उप्रेती
इस बार उत्तराखण्ड के हल्द्वानी महानगर में 2 से 4 अक्टूबर 2018 ‘देशज’ उत्सव का आयोजन बहुत कुछ सिखाने वाला था। इसमें ऐसी छटपटाहट देखने को मिली, जिसका पहले से अहसास था। आयोजनों को लेकर कलाकारों में थिरकने और दर्शकों में उत्साह की फड़पफड़ाट अच्छी लगती है लेकिन जब अनुशासन न मानने वाले आयोजन में अपने जिद कर दें तो ऐसा महसूस होता है जैसे उन्हें उनके जीवित होने का प्रमाण पत्र लेना हो। ऐसा ही देशज में भी हुआ।
दरअसल इस आयोजन का क्षेत्रीय समन्वयक मुझे बनाया गया था और हिमालय संगीत शोध् समिति के युवा कार्यकर्ताओं की टीम पूरी व्यवस्था को सम्भाले हुए थी। संगीत नाटक अकादमी की अधिकारी-कर्मचारी पैनी नज़र रखते हुए चारों ओर जुटे थे। ऐसे में आयोजन का भव्य होना तय हो चुका था। हुआ भी ऐसा कि तीन दिन तक कार्यक्रम स्थल पर सैकड़ों की तायदात में भीड़ उमड़ पड़ी। लद्दाख से लेकर कर्नाटक तक का लोक संगीत श्रोताओं के कानों में रस घोल रहा था और बहुत से सजीव प्रसारण देख रह थे। देश की 18 टीमों ने जितनी आकर्षक प्रस्तुतियां दीं उससे भी ज्यादा संयम दर्शकों ने बनाया। इसके बावजूद उन तत्वों के लिये क्या कहा जाए जो अनुशासन तोड़ने पर आमदा थे। वह तो ईश्वर की कृपा ही थी कि सब कुछ कुशलता से हुआ। पूरे आयोजन को यथा समय शुरु करने से लेकर उसकी मर्यादा बनाये रखने के लिये हिमालय संगीत शोध् समिति के युवा जुटे रहे।
आयोजन के दौरान मैं स्वयं एक क्षण के लिये भी कुर्सी पर नहीं बैठा और चक्कर लगाते हुए व्यवस्थाओं को देख रहा था। मैंने देखा ढलती उम्र में भी कुछ सिर्फ इसलिये अनुशासन तोड़ने वाले सक्रिय हो उठे क्योंकि मंच से उनका नाम नहीं लिया जा रहा था। कलाकार होने का दम्भ भरने वाले कतिपय युवा भी उच्छृंखलता करते रहे। समारोह स्थल की प्रथम कुर्सी घेरने से लेकर मंच संचालक तक बार-बार चक्कर लगाने की होड़ इनमें थी परन्तु मंच का अनुशासन बनाये रखने के लिये इन्हें तीन दिनों तक रोके रखा गया। इनकी छटपटाहट बढ़ने लगी और पिछले दरवाजे से घुसकर अराजकता करने वाले फिर भी सक्रिय थे लेकिन सजीव प्रसारण के भय के कारण मंच तक नहीं फटक सके। हे प्रभु! सबको सद्बुद्धि दे। किसी भी आयोजन की मर्यादा को बनाये रखना बहुत जरूरी है

भारत की लोक, जनजातीय एवं पारम्परिक अभिव्यक्तियों का उत्सव देशज

चन्द्रशेखर जोशी
संगीत नाटक अकादमी भारत सरकार द्वारा इस बार 2 से 4 अक्टूबर 2018 हल्द्वानी महानगर में ‘‘देशज’’ भारत की लोक, जनजातीय एवं पारम्परिक अभिव्यक्तियों का उत्सव मनाया गया। गांधी जी की 150वीं जयन्ती पर तीन दिन चले इस उत्सव ने कलाकारों और दर्शकों को उत्साहित किया। महोत्सवों बाढ़ में यह अलग प्रकार का आयोजन था। उत्तराखण्ड में महोत्सवों के नाम पर बाढ़ सी आ चुकी है लेकिन अभिव्यक्तियों का ऐसा संगम जिसमें सबकुछ अनुशासन के साथ हो करना कठिन है। बावजूद ऐसा उत्सव इस बार हुआ। क्षेत्राीय समन्वयक  और हिमालय संगीत शोध् समिति की पूरी टीम दिन-रात इसमें जुटी रही जबकि नाटक अकादमी के अधिकारियों, कर्मचारियों की टीम निरीक्षण के साथ हर पल चैकस थी। आयोजन से पूर्व पत्रकार वार्ता में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग उत्तराखण्ड के उपनिदेशक डाॅ.योगेश मिश्रा ने लोक कलाओं और संयोजन कर रहे डाॅ.पंकज उप्रेती ने जनजातीय कला पर विचार रखे। अकादमी की ओर से सलाहकार अमित सक्सेना ने ‘देशज’ आयोजन पर विस्तार से जानकारी दी। हिमालय संगीत शोध् समिति के वरिष्ठ सदस्यों में डाॅ.नवीन तिवारी युवाओं की टीम में धीरज उप्रेती, संगीत बिष्ट, योगेश उपाध्याय, तनुज उपाध्याय, देवेन्द्र पाण्डे, पूजा लटवाल, मनमोहन वर्मा, आशुतोष सहयोगी रहे।
देश के विभिन्न प्रान्तों की पारम्परिक संस्कृति और कला अपना वजूद खोती जा रही है। टीवी और सोशल मीडिया पर फैल रही संस्कृति ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। रंगमंच, नृत्य वाद्य, गीत-संगीत की अनमोल ध्रोहर को बचाने और विकसत करने के लिये यह अनूठा प्रयास था, जिसके तहत उत्तराखण्ड में पहली बार देशभर की विविध् लो संस्कृतियों का संगम हुआ।
उल्लेखनीय है कि संगीत नाटक अकादमी पिछले 66 सालों से देश के विभिन्न इलाकों में लोक संस्कृति का प्रदर्शन कर रही है। प्रदर्शन कला की यह शीर्षस्थ संस्था विविध् सांस्कृतिक विरासतों, लोक कलाओं, अमूर्त परम्पराओं को जीवित करने व उन्हें आगे बढ़ाने के लिए संगीत उत्सव कराती है। पाँच साल पहले अकादमी द्वारा देश के लोक एवं जन जातीय संगीत, नृत्य और नाट्य के विविध् रूपों से जुड़े कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए देशज महोत्सव शुरू किया। संस्था अब तक दिल्ली, पटना, हैदराबाद, जमशेदपुर दरभंगा, आजमगढ़, इम्पफाल, कानपुर, कुरुक्षेत्रा समेत दर्जनों स्थानों पर देशज महोत्सव आयोजित कर चुकी है। इसी क्रम में हल्द्वानी में यह विराट आयोजन किया गया।
इस तीन दिवसीय आयोजन का उद्घाटन लोकगाथाओं पर जबर्दस्त कार्य कर चुके डाॅ.प्रयाग जोशी द्वारा दीप प्रज्जवलित कर किया गया। आकदमी के सलाहकार अमित सक्सेना, कंसलटेंश मनीष ममगई, नरेंद्र पांथरी, हिमालय संगीत के अध्यक्ष धीरज उप्रेती मंच पर थे। कार्यक्रम में पहले दिन उत्तराखण्ड, राजस्थान, पंजाब, मणिपुर, हरियाणा के कलाकारों ने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों की प्रस्तुति देख दर्शक झूम उठे। इस दौरान टिहरी गढ़वाल के नत्थीलाल नौटियाल ने घस्यारी नृत्य प्रस्तुत किया। जयपुर की मीना सपेरा ने कालबेलिया नृत्य, पटियाला के रवि कुमार की टीम ने भांगड़ा नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी। मणिपुर के प्रदीप सिंह के दल ने थाॅग-टा और ढोल चोलम की आकर्षक प्रस्तुति दी। रोहतक के सलीम कुमार की टीम ने फाग नृत्य प्रस्तुत किया। उत्तराखंड नरेंद्र पांथरी के दल ने झोड़े की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम के द्वितीय दिवस पर कुशल भण्डारी के नेतृत्व में कलाकारों ने आयोजन सलूड़-डुंग्रा के परम्परागत पूजा-अनुष्ठान का अद्भुत प्रदर्शन किया। भूम्याल देवता की यह पूजा गढ़वाल क्षेत्र में प्रचलित है। इसके बाद उत्तर प्रदेश के कलाकारों ने पफरवाई नृत्य पेश किया। आजमगढ के राजकुमार शाह के दल ने बोलों के साथ शानदार प्रस्तुति दी। असम के बीहू नृत्य ने खूब वाहवाही बटोरी। गुवाहाटी से निलिकांत दत्ता के साथ आए कलाकारों ने पैंपा, बांसुरी, ताल, ढोल के साथ पर्वते-पर्वते बोगाबो पारू मोय, लौता नु बोगाबोलय ताव गीत पर जनजातीय संस्कृति की छटा बिखेरी। तेलंगाना के राम चंद्रुडडू के दल ने की प्रस्तुति दी। हिमाचल के जोगिंदर हबबी के दल ने सिरमौरी नाटक प्रस्तुत किया। तीसरे दिन उत्तराखंड की छपेली सामूहिक नृत्य से हुई। अल्मोड़ा से आए प्रकाश बिष्ट के दल ने मसहूर छपेली नृत्य प्रस्तुत किया। इसके बाद लेह लद्दाख के लुंडब दौर्जे की टीम ने जम्मू कश्मीर का जनजातीय बोनोन लोक गीत और नृत्य की प्रस्तुति दी। उत्तराखंड के देबू पांगती के दल ने सीमांत का दुस्का नृत्य प्रस्तुत किया। त्रिपुरा का धमाइल और बीजू नृत्य संतोष सूत्रधर के दल ने प्रस्तुत किया। कर्नाटक के कलाकारों ने महालिंगप्पा के नेतृत्व में करडी मजलू जनजातीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया। अंत में उत्तराखंड के शिवदत्त पन्त की टीम ने नन्दा राजजात की आकर्षक प्रस्तुत दी। इस मौके पर सुरेन्द्र महरा, आरती जोशी, बाबूलाल गुप्ता, उमेश पांडे, प्रो. अतुल जोशी, ओ.पी.पाण्डे, हरीश पन्त, जगमोहन रौतेला, भाष्कर उप्रेती, डाॅ.दीपा गोवाड़ी, डाॅ.जयश्री भण्डारी सहित सैकड़ों की तादात में दर्शक मौजूद थे। इस तीन दिनी आयोजन से बहुत कुछ सीखने को मिला है हल्द्वानी शहर व इस प्रदेश को।

 

देशज: सबसे कमजोर मंचीय प्रदर्शन उत्तराखण्ड का रहा

पि.हि.प्रतिनिधि
हल्द्वानी में हुए ‘देशज’ उत्सव में देश भर के लोक कलाकारों ने अपने फन का जादू बिखेरा और लोक के शास्त्र को इस प्रकार उकेरा कि शास्त्रीय संगीत के जानकार  दातों तले अंगुली दबा रहे थे और उनकी लय पर झूम रहे थे। कर्नाटक के लोक कलाकारों ने ‘रघुपति राघव राजा राम’ की की कर्णप्रिय धुन पर घनवाद्य झांझ, सुषिर बाद्य शहनाई, चर्म वाद्य ढोल नगाड़ों में चमत्कृत करने वाली लयकारियों की करामात दिखाई। तिहाई, पल्टे, रेले, चक्करदार……क्या कुछ नहीं था उसमें। तिहाईयों के साथ सम पर आते ही दर्शक वाह कर रहे थे। लद्दाख के नर्तकों ने परम्परागत वेशभूषा में अपने त्यौहार का जो नृत्य प्रस्तुत किया वह तो अद्भुत था। आसाम का बिहू नृत्यगीत उसकी लचक और चलक को समझाने वाला था। मणिपुर मिजोरम के कलाकारों ने नृत्यकला के साथ उनके रहन-सहन का समझाया। उन्होंने परम्परा का निर्वहन करते हुए समझा दिया कि प्रकृति के बीच वह कितने सजग हैं और आत्मरक्षा के गुर नृत्यगीत के साथ जानते हैं। बात करें उत्तराखण्ड की तो यहाँ के कलाकारों ने बेहद निराश किया। गढ़वाल से आये दल को लेकर बहुत उत्साह था लेकिन दल नायक ने दर्शकों को समझाने के लिये जो लम्बा भाषण दिया वह दर्शक सहन नहीं कर पाये। जोहार की टीम अच्छा कर रही थी लेकिन निर्धरित संख्या से अध्कि कलाकारों की भीड़ मंच पर थी। अल्मोड़ा से आये दल ने झपेली नृत्य का वही स्वरूप दिखाया जो आजकल पंजीकृत दल सामान्यता करने लगे हैं। दिल्ली से आये उत्तराखण्डी दल दल ने बहुत ही निराश किया। शिवदत्त पन्त की टीम नन्दा राजजात प्रस्तुति में कुछ सफल रही।

रामसिंह जागरुक जनों की धुरी थे, एनटीडी अल्मोड़ा को बनाया केन्द्र

लक्ष्मण सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
जोहार के इतिहास-भूगोली की समग्र जानकारी के लिये याद किये जाने वाले रामसिंह पांगती के बारे में पिघलता हिमालय डाॅ.आर.एस.टोलिया का कालम नियमित रूप से प्रकाशित हो रहा है। इस अंक में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का हवाला दिया जा रहा है। परिवार के वरिष्ठ सदस्य लक्ष्मण सिंह पांगती से बातचीत के आधार पर यह जानकारियां हैं। 80 वर्षीय लक्ष्मण सिंह पांगती भी हमेशा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। इन्होंने मिडिल मुनस्यारी से करने के बाद हाईस्कूल अल्मोड़ा से किया। आईबी में नौकरी करते हुए नैनीताल, इलाहाबाद, लेह-लद्दाख, लखनउ रहे। असि0डायरेक्टर आईबी से सेवानिवृत्त होकर अब हल्द्वानी में रह रहे हैं। अपनी सरकारी सेवा के दौरान भी सामाजिक मेल-मिलाप में रहने वाले लक्ष्मण सिंह जी ने लखनउफ में काफी समय व्यतीत किया और पहाड़ की संस्कृति से युवाओं को जोड़ने के लिये लेखन भी करते रहे। पिघलता हिमालय में भी आपके द्वारा लेख व उपयोगी सामग्रियां उपलब्ध् करवाई गई।
पिता रामसिंह पांगती व माता हिरमा देवी के कनिष्ठ पुत्रा लक्ष्मण सिंह जी बताते हैं कि उनके पिता ने परिवार से ज्यादा समय समाज के लिये दिया। रामसिंह जी जागरुक जनों की धुरी थे, उन्होंने सीमान्त क्षेत्रा के लोगों को मदद के लिये एनटीडी अल्मोड़ा में केन्द्र बनाया। 8 जून 1884 को राडागाडी तहसील मुनस्यारी में जन्मे रामसिंह मिडिल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी और 17 अगस्त 1906 में सर्वे आपफ इण्डिया देहरादून में सर्वेयर के पद पर नियुक्त हुए। कुछ वर्षों बाद नौकरी भी छोड़ दी। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आन्दोलन चलाने के साथ ही कई पुस्तकें उन्होंने लिखी। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में- जोहार का इतिहास व वंशावली ;सन् 1936 ई.द्ध, आत्म कहानी, स्त्री शिक्षा ;1910द्ध, जोहारीय उपकारक;भाग 1, भाग 2द्ध हैं। हस्तलिखित पुस्तकों में- होली का अखबार ;सन् 1935, महिला सुधर ;जोहारी बोली में 1936द्ध, देशोपकारक ;जिसमें शौका सेवक मण्डल, जोहार पंचायत, सुधरकों को आदेश, अछूतोद्धाार और मनोभिलाषा शामिल हैद्ध, भूत शंका निवारण है। इन दिनों उनकी हस्तलिखित पुस्तकों के आधर पर जोहारी बोली में ‘छितकू की कथा एवं ऐतिहासिक कथाएं’ पुस्तक तैयार हो रही है। पिता जी ने अल्मोड़ा के लाला बाजार में दुकान भी ले ली थी लेकिन वह नहीं कर सके। रामसिंह जी ने जोहार उपकारिणी महासभा, जोहार सोसाइटी ;सम्वत 1969, नौजवान पांगती पुस्तकालय, जोहार कांग्रेस मण्डल सामाजिक तथा राजनैतिक संस्थाओं के गठन में सक्रिय सहयोग दिया। महिला उत्थान के लिए 1900 से ही प्रयास करते रहे। बाल विवाह, कन्या विक्रय, अशिक्षा व महिलाओं में पर्दे का प्रचलन रोकने के लिए प्रचार तथा प्रयास किया। 1910 में महिलाओं में जागृति के लिए स्त्रीशिक्षा नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। 12 जुलाई 1951 को जोहार भवन, नारायण तेवाड़ी देवाल ;एनटीडी अल्मोड़ा में उनका निध्न हुआ था।
इस पांगती परिवार की बात करें तो सोबन सिंह, रामसिंह और नरसिंह तीन भाई थे। दरकोट में रहते हुए इन्होंने मुनस्यारी में शान्तिकुन्ज में आसियाना बनाया। शान्तिभवन नाम से बने आवास में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और वंशावली तैयारी के लिये दूर-दूर से लोग आते थे। जागरुक जनों की बैठकें और सामाजिक चेतना के लिये बनने वाली रणनीति के बीच परिवार के छोटे बच्चे लोकरंग में रंगते हुए काफी जागरुक हो चुके थे। रामसिंह के परिवार में पुत्र-पुत्री- मोहनसिंह, उत्तमसिंह, गोविन्द सिंह, तुलसी देवी, लक्ष्मण सिंह हुए। यही वंशावली आगे बढ़ते हुए मोहन सिंह परिजनों में कमला, राजकुमारी पांगती, हरीश, भगवान, राजेन्द्र सिंह। उत्तम सिंह जी के परिजनों में मुन्नी देवी, तारा जंगपांगी, पूरन सिंह। तुलसी रावत के पति श्रीराम सिंह रावत जी हैं। लक्ष्मण सिंह के पुत्र- जयन्त व तनुज पांगती।

पिघलता हिमालय 29 अगस्त 2016 अंक से