
डाॅ.पंकज उप्रेती
इस बार उत्तराखण्ड के हल्द्वानी महानगर में 2 से 4 अक्टूबर 2018 ‘देशज’ उत्सव का आयोजन बहुत कुछ सिखाने वाला था। इसमें ऐसी छटपटाहट देखने को मिली, जिसका पहले से अहसास था। आयोजनों को लेकर कलाकारों में थिरकने और दर्शकों में उत्साह की फड़पफड़ाट अच्छी लगती है लेकिन जब अनुशासन न मानने वाले आयोजन में अपने जिद कर दें तो ऐसा महसूस होता है जैसे उन्हें उनके जीवित होने का प्रमाण पत्र लेना हो। ऐसा ही देशज में भी हुआ।
दरअसल इस आयोजन का क्षेत्रीय समन्वयक मुझे बनाया गया था और हिमालय संगीत शोध् समिति के युवा कार्यकर्ताओं की टीम पूरी व्यवस्था को सम्भाले हुए थी। संगीत नाटक अकादमी की अधिकारी-कर्मचारी पैनी नज़र रखते हुए चारों ओर जुटे थे। ऐसे में आयोजन का भव्य होना तय हो चुका था। हुआ भी ऐसा कि तीन दिन तक कार्यक्रम स्थल पर सैकड़ों की तायदात में भीड़ उमड़ पड़ी। लद्दाख से लेकर कर्नाटक तक का लोक संगीत श्रोताओं के कानों में रस घोल रहा था और बहुत से सजीव प्रसारण देख रह थे। देश की 18 टीमों ने जितनी आकर्षक प्रस्तुतियां दीं उससे भी ज्यादा संयम दर्शकों ने बनाया। इसके बावजूद उन तत्वों के लिये क्या कहा जाए जो अनुशासन तोड़ने पर आमदा थे। वह तो ईश्वर की कृपा ही थी कि सब कुछ कुशलता से हुआ। पूरे आयोजन को यथा समय शुरु करने से लेकर उसकी मर्यादा बनाये रखने के लिये हिमालय संगीत शोध् समिति के युवा जुटे रहे।
आयोजन के दौरान मैं स्वयं एक क्षण के लिये भी कुर्सी पर नहीं बैठा और चक्कर लगाते हुए व्यवस्थाओं को देख रहा था। मैंने देखा ढलती उम्र में भी कुछ सिर्फ इसलिये अनुशासन तोड़ने वाले सक्रिय हो उठे क्योंकि मंच से उनका नाम नहीं लिया जा रहा था। कलाकार होने का दम्भ भरने वाले कतिपय युवा भी उच्छृंखलता करते रहे। समारोह स्थल की प्रथम कुर्सी घेरने से लेकर मंच संचालक तक बार-बार चक्कर लगाने की होड़ इनमें थी परन्तु मंच का अनुशासन बनाये रखने के लिये इन्हें तीन दिनों तक रोके रखा गया। इनकी छटपटाहट बढ़ने लगी और पिछले दरवाजे से घुसकर अराजकता करने वाले फिर भी सक्रिय थे लेकिन सजीव प्रसारण के भय के कारण मंच तक नहीं फटक सके। हे प्रभु! सबको सद्बुद्धि दे। किसी भी आयोजन की मर्यादा को बनाये रखना बहुत जरूरी है
