
टी स्टेट की फैक्ट्री का खण्डहर
डाॅ.पंकज उप्रेती
बेरीनाग सुरम्य नगरी के रूप में विख्यात है लेकिन अब इसमें रम्य वातावरण ने इसे दूषित कर दिया है। कभी अपने चाय बागानों के लिये मशहूर रहे बेरीनाग के लोग ही अब बाहर से आने वाली चायपत्ती का इस्तेमाल कर रहे हैं। अनियंत्रित और अनियोजित दौड़भाग ने बेरीनाग की सूरत को बदल दिया है।
अंग्रेजों के जमाने में यहाँ से चाय की सप्लाई विलायत तक होती थी। दानसिंह मालदार परिवार के कारोबार ने बेरीनाग और चकौड़ी तक को विस्तार दिया था और इस स्टेट का मैनेजमेंट संभाल रखा था तड़ागी परिवार ने। अब सबकुछ बदल सा गया है, बागान के पास चाय फैक्ट्री का खण्डहर दिखाई देता है और पास ही में तड़ागी परिवार का आशियाना। मालदार परिवार के वटवृक्ष की शाखाएं जितनी ज्यादा फैलती गई, यहाँ की जमीन भी उतनी ही बंटती चली गई और स्टेट की खूबसूरती कम होती रही।
वर्तमान में तड़ागी परिवार की सदस्या श्रीमती नर्मदा तड़ागी यहाँ रहती हैं और बातचीत में पुराने समय के बेरीनाग का स्मरण कर यादों में खो जाती हैं। वह समय जब दानसिंह जी थे और उनके ससुर और पति ने कारोबार को सम्भाला। वह कहती हैं कि चारों ओर दूर-दूर तक चाय के बागान थे और गुलबहार, अप्रैलिया सहित तरह-तरह के फूल खिलते थे। खुमानी, पुलम, नारंगी कई प्रकार के फल होते थे। ऐसे प्राकृतिक वातावरण को देखने के लिये बाहर से लोग बेरीनाग आया करते थे।
अब बात तड़ागी परिवार की ही कर लेते हैं। मूल रूप से चम्पावत के इस परिवार का ताल्लुक मालदार परिवार से है। मोहनसिंह जी के सालेसाहब गोविन्द सिंह जी हुए। कुंवर महिराज की माता सरस्वती बिष्ट गोविन्द सिंह तड़ागी की दीदी थीं । अपने समय में कानपुर विश्वविद्यालय से बीकाॅम पढ़े तड़ागी जी को मालदार साहब ने चकौड़ी-बेरीनाग टी-स्टेट का मैनेजर नियुक्त किया। पढ़े-लिखे होने के साथ ही पूरी स्टेट की गतिविधियों को जानने-समझने वाले तड़ागी जी ने 25 साल नौकरी के बाद अपना चार्ज पुत्र हर्षबद्र्धन तड़ागी को दे दिया और टी-स्टेट का गतिक्रम बना रहा लेकिन समय के साथ बहुत कुछ इतिहास बन चुका है। गोविन्द सिंह के ज्येष्ठ पुत्र राजकिशोर आर्मी में भर्ती हो गये, हर्षबद्र्धन तड़ागी ने 35 साल तक टी-स्टेट को सम्भाला, पुत्री रजनी हल्द्वानी और रीता बरेली में अपने परिवार के साथ है। पिता के बाद 35 साल तक स्टेट को सम्भालने वाले हर्षबद्र्धन के पुत्र कीर्तिबद्र्धन आसाम टी कम्पनी में मैनेजर हैं। इन्होंने सिलगुड़ी में कोर्स और ट्रेनिंग कर बेरीनाग में चाय कारोबार को बढ़ाने की सोची थी किन्तु संयोग से आसाम में चाय कम्पनी में जुड़ गये। तड़ागी जी की पुत्री दीप्ति ने जयपुर से संगीत विषय में एमफिल किया है जबकि ज्योति ने बायोटेक किया। परिवार के ताने-बाने पर चर्चा के साथ ही श्रीमती नर्मदा जी बताती हैं कि सन् 1982 में उनका विवाह हर्षबद्र्धन जी के साथ हुआ। उस समय बेरीनाग में इण्टर कालेज का भवन के अलावा दूर-दूर कुछ नहीं था। कुछ अंग्रेजों के समय के बने भवन थे। चाय फैक्ट्री को ससुर गोविन्द सिंह जी देखते थे, जिसमें 80 लोगों का स्टाफ था, सीजन के समय ग्रामीण आ जाते थे और 250 लोग तक हो जाते थे। फैक्ट्री के पास गेटपास जरूरी था, तीन प्रकार के इंस्पेक्टर जाँच के लिये आते थे और चाय विलायत तक को जाती थी। गाड़ी व यातायात के साधन नहीं थे, श्रमिक पीठ में चाय के बाक्स लादकर चम्पावत, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ ले जाते थे। घोड़ों में भी सामान दूर-दूर तक जाता था। स्वास्थ्य खराब होने के बाद ससुर जी ने हर्षबद्र्धन जी को स्टेट का कारोबार देखने को कह दिया। समय बीतता गया और स्टेट की ओर पुरानी पीढ़ी की तरह ध्यान देने वाले नहीं रहे। फैक्ट्री की मशीनें खराब हो गई और चाय के बाग कुम्हला से गये। अप्रैल की चाय अच्छी मानी जाती थी, पर सम्भालना कठिन होता जा रहा था। स्टेट के हालातों को देखकर पति हर्षबद्र्धन जी भी उदास रहने लगे थे। यही नहीं मालदार परिवार के सम्वेदनशील सदस्यों को भी स्टेट के वर्तमान हाल देखकर जरूर दर्द होगा, क्योंकि जिस बेरीनाग की चर्चा इनके बिना अधूरी रह जाती है, उसमें नई पीढ़ी के बच्चे इन बातों को नहीं जानते हैं। कुछ लोगों ने सूझबूझ कर कुंवर महिराज की मूर्ति जरूर बाजार के चैराहे पर लगा दी है।
बेरीनाग और चकौड़ी की खूबसूरती को संवारने में यहाँ के लोगों और मालदार परिवार के सदस्यों को ही ध्यान देना होगा। केवल शहर बसा देना ही विकास नहीं होता है। साथ ही कोई रहे या न रहे, नियंत्रित व नियोजित कार्यों की महक जरूर रहती है।
पिघलता हिमालय 12 सितम्बर 2016 अंक से
