
स्व.आनन्द बल्लश्रभ उप्रेती
प्रो0देवसिंह पोखरिया
‘प्रेरणा’ स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती ;संस्थापक/सम्पादक पिघलता हिमालयद्ध की कविताओं का संग्रह है। ये उनकी 1965 से 1995 के बीच लिखी गई कविताएं हैं। विश्व प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डाॅ.हेम चन्द्र जोशी के सानिध्य में रहे उप्रेती जी अक्सर नैनीताल में उनके साथ का उल्लेख करते थे। डाॅ.जोशी को गुरु के रूप में मानने वाले उप्रेती जी उनसे पर्याप्त प्रभावित हुए थे, वे उनके प्रेरणा स्रोत थे। सुमित्रानन्दन पन्त जैसे महान कवि का जीवनवृत्त व कृतित्व उनकी साहित्यक अभिरुचि को गहरा करता रहा है। युवावस्था में अपने मित्रा अच्छेलाल ‘पथिक’ के साथ रुद्रपुर में ‘प्रेरणा’ नामक कविता संग्रह प्रकाशित करने वाले उप्रेती जी ने इससे पूर्व अल्मोड़ा में अपने शिक्षार्जन के दौरान काव्य रचनाकारों की संगत की। अल्मोड़ा से आगरा और फिर लौटकर तराई के दानपुर-रुद्रपुर तक के सफर में काका हाथरसी जैसे कवियों का साथ उन्हें लगातार लिखने को उकसाता रहा। हल्द्वानी में भी कविता-पाठ का दौर चलता रहा और उन्होंने इस बीच कई कविताओं की रचना की।
स्व. आनन्द बल्लभ उ्रप्रेती जी के सुपुत्र डाॅ.पंकज उप्रेती ने उक्त कालखण्ड में लिखी गई उनकी कविताओं को ‘प्रेरणा’ के दो खण्डों में विन्यस्त कर इस संग्रह को रूपाकार दिया है। खण्ड-एक में 25 तथा खण्ड-दो में 23 कविताएं संगृहीत हैं। आनन्द उप्रेती बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार थे। कहानी, उपन्यास,व्यंग्य, कविता और पत्रकारिता कोई भी विध उनकी कलम से अछूती नहीं रही। एक पत्रकार की पैनी दृष्टि सम्पूर्ण कटाक्ष के साथ हमेशा हर विध में उनके साथ चलती उसी में अंतरनुस्यूत मिलती है। उप्रेती साहित्य को ईमानदारी से जीते हुए एक भुक्तभोगी के यथार्थ में लपेट कर उसे प्रस्तुत करते हैं।
इस संग्रह के खण्ड-एक की कविताओं में प्रकृतिपरकता, भावुकता, स्वाभाविकता, जिज्ञासा, सुकोमलता, मनुष्य मात्रा को उद्बुद्ध करने के भाव व्यक्त हुए हैं। दुख ही सुख को मापने का पैमाना है। कहीं जयशंकर प्रसाद जैसी भावाकुलता है, तो कहीं ‘मैं बजरी की बेटी हँू’ कविता निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ कविता की याद ताजा कर देती है, इसमें मानवीय सम्वेदना की चरम परिणति परिलक्षित होती है-
‘‘माँ बजरी ने बजरी मैं पैदा कर बजरी बना दिया,
बजरी में ही खेल-खेल कर बजरी कूटा करती हँू।
‘जंगल और वीरानों में’ कविता में अध्किारियों से लेकर संसद तक की देश की बदहाल स्थिति का चित्राण हुआ है। कवि दुखी है कि समाज के असली लुटेरे अब जंगलों में नहीं समाज के बीच ही रह कर सभ्यता का मुखौटा पहन कर उसे लूट रहे हैं।
‘सब कुछ लिख कर भेजना भाई’ जैसी कविता ग्रामीण जीवन के अभावों और समस्याओं को सिद्दत से चित्रित करती है। बेशर्मों पर कवि ने निर्मम एवं निष्ठुर व्यंग्य किया है-
‘‘मेरे दरवाजे के ठीक सामने
नंग धड़ंग प्रजातंत्र लेट गया है
उसकी नाक पर उग आया दरख्त
अपनी बाहें फैलाता…..’’
कवि कहीं सरस्वती के वरद् पुत्रा सुमित्रानन्द पन्त को नमन करता है और कहीं नये काव्य और छन्द ज्ञान शून्य अकवियों पर व्यंग्य करता कहता है-
‘‘जब से नागपफनी घर आई, तुलसी का विरवपा जंगल में
तब से मेरी चुभन नई है, उखड़ी सी हर सांस नई है
नागफनी पर गीत लिख रहे, छन्द लिख रहे नये अकवि हैं
तुलसी का सूना बृन्दावन, नई उदासी नया दर्द है….।’’
हताशा, निराशा, अभाव और संघर्षों के बीच भी उप्रेती दुधर््र्ष जिजीविषा के साथ कुछ नया करने की चाह रखते हैं। उनके इस दर्शन को ‘मेरा हर दिन नया वर्ष है’ कविता रूपायित करती है।
मुक्तिबोध् की फंतासी और नागार्जुन का लोक जीवन का चित्राण कवि की अंधेरे ने निगल लिया’ कविता में एकत्र एकसाथ अन्तर्भूत-सा लगता है। और यह भी कि दलित-दुर्बल-दीन-हीन के साथ सूरज भी छल करता है-
‘‘लाख मशालें लिये ढूंढता रहा आसमान
रमजनियां बरसतिया की झोपड़ी में
फुटपाथ पर लेटे
अनाम दुदमुंहे छोरे के सूखे होंठो में
किसी बहसी दरिन्दे द्वारा
उघेड़ी लिजलिजी टागों में
उसे सूरज नहीं मिला
मशालें बुझा कर
थका-हारा सोने को ही था आसमान
ठगिनी के अड्डे से सूरज बाहर निकल आया….’’
पर सूरज के उगने की बलवती आशा कवि को कमजोर नहीं पड़ने देती। ‘वातायन के बंद न कर तू द्वार बावरी’ कविता गीतात्मकता एवं ग्राम्य चित्रण की दृष्टि से नागार्जुन की कविताओं की टक्कर की है। ‘बिदका हुआ सांड’ में कवि ने सांड को निद्र्वंद्व अराजक गुण्डे के और तितली को आम आदमी के नव्य प्रतीक के रूप में चित्रित किया है। कुछ कविताएं स्वार्थलिप्सु, अपना घर भरने वाले लोभी डाॅक्टरों पर लिखी गई हैं। कुछ समर्थ लोग ‘दिशाहीन सूरज’ को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं। कुछ कविताएं सम्वाद करती-सी लगती हैं। इनमें ‘कब्र का हाल’, ‘आसमान कहाँ है?’ आदि उल्लेखनीय हैं। सामयिक परिवेश के जीवंत चित्राण की दृष्टि से ‘बोलना छोड़ दिया है’ कविता छोटी होते हुए भी प्रभावशाली है। बसंत में मिनिस्टर के दौरे के कारण कोयल तक बोलना छोड़ देती है। असहिष्णुता के माहौल में दहशतजदा लोग व्यर्थ की अफवाहों से खौपफ के मंजर में जिन्दगी बसर करते हैं, पर कवि हताश नहीं होता। आक्रोश है, किन्तु आशा भी कम बलवली नहीं, कवि को हँसती धूप का जमीन में उतर आने का इंतजार है।
कवि नए प्रतीकों के द्वारा वन बिल्लों के शाकाहारी होने और तुलसी के वृंदावन में नागफनी के पलने की बात स्वीकार करता है। वह पत्रकार के व्यंग्य-कौशल को कविता में प्रविष्ट करा कर उसे और धरदार बना देता है। प्रजातंत्रा में वैयक्तिक स्वातंत्रय और अध्किारों के बदले सौदेबाजी को लेकर वह तंज है, आज शेरों के बाड़े में ‘कुत्तों का पहरा’ है। भगतसिंह को याद करते हुए वह वर्तमान प्रजातंत्र पर सवाल खड़े करता हुआ कहता है कि आज भगतसिंह होते, तो वे डाकू और आतंकी घोषित होते और जेल में होते। आज लोग जिन्दा लाश हो गए हैं। उनमें दीन-ईमान शेष नहीं रह गया है, न प्रतिरोध् की कोई ताकत रह गई है। ‘भ्हगत सिघा’ कविता में आज के नेताओं पर व्यंग्य किया गया है। खण्ड-एक की कविताओं में श्रृंगार तिरोहित-सा है।
खण्ड-दो की पहली कविता ‘प्रेरणा’ है। इस कविता के आधर पर ही प्रस्तुत संग्रह का नामकरण किया गया है। गीत-योजना एवं विरहाकुल भावाभिव्यंजना की दृष्टि से यह कविता महादेवी वर्मा की कविताओं का स्मरण दिलाती है। प्रिय की पे्ररणा दग्ध्-अंगारों में चल कर कवि के कर्मपथ की राह प्रशस्त करती है। इस खण्ड की कविताओं में भावप्रवणता का अतिरेक दिखता है। प्रकृति में कवि मिलन के दृश्य देखता है, उसके कल्पना-प्रसून प्रकृति के उपवन में ही खिलते हैं, वह ‘प्रेम का भूखा’ है। ‘हलचल’ आदि कई कविताओं में छायावादी भावाकुलता दिखती है, साथ जीवन-सत्यों का उद्घाटन भी होता है। मांसलता और भोग के प्रति सावधनी भी बरती गई है। ‘कौन यह बाला’ एक लम्बी प्रेमपरक प्रबन्धात्मक कविता है। इसमें इंदु-बाला का रूपक बांधते हुए कवि ने सूर्य और इंदु के प्रेम को व्यंजित किया है, चाँदनी के पट से नभ रूपी सेज पर वह प्रिय सूर्य को निहारा करती है। वसुध, उषा, संध्या, रात्रि आदि का मानवीकरण कर कवि द्वारा इन सबका मनोहारी वर्णन किया गया है। कवितांत में नित्य मिलन की आशा में दो प्रेमी हृदय नित्य प्रतीक्षा में रहते हैं। क्या इन प्रेमियों का कभी मिलन होगा? क्या सूर्य का आत्म-समर्पण सार्थक होगा? इसका उत्तर पूरी कविता को पढ़कर ही मिलता है। कवि का विश्वास है कि जीवन में प्यार ही सब कुछ है, संसार की सम्पूर्ण शान्ति प्यार में ही निहित है। यह प्यार केवल प्रिय-प्रिया का प्यार नहीं अपितु प्यार के वृहत्तर अर्थ को व्यंजित करता है। विछोह, प्रियतम से मिलन की आकांक्षा, नयनों का व्यापार- उन्मीलन- निमीलन सुखद प्रेम की मध्ुर स्मृति की व्यक्तिनिष्ठता समष्टिगत प्रेम में पर्यवसित होकर उदात्त रूप ग्रहण कर लेती है। तब कवि ओज और वीरता के भावों से ओतप्रोत होकर ‘होइए तैयार’ कहता राष्ट्र प्रेम के गीत गा उठता है-
देखंे कौन हमारे सन्मुख
अब पल भर भी टिकता है।
हम सपूत, इस पावन-भू पर-
बलिदानी बेड़ा उठता है।
इस हरित-धरा के शुभ्र-क्रीट पर
आघात वक्ष पर झेले हैं।
बलिदानों के खिलवाड़ हुए नित
तन मिट्टी से मिले हुए हैं।
मनुष्य के विकास की कहानी केवल भौतिकजन्य ही नहीं, सचेतन भी है। अपने समाज के चैतन्य का जागरूक प्रहरी साहित्यवेत्ता ही होता है। वह मनुष्य मात्र को जागरण संदेश देता है, साथ ही मनुष्य की अन्तर्दृष्टि जगाने का आह्वान करता है। उप्रेती की ‘खोल रे कपाट खोल’ कविता इसी सत्य को समुद्घाटित करती है। कवि प्रकृति के आलम्बन चित्राण को माध्यम बना कहता है-
‘‘खोल रे कपाट खोल
रे मनुज कपाट खोल,
लाल हो उठे कपोल-
भोर के विभोर छोर।
तम दिया झकोर घोर
नागरी उषा विभोर।’’
क्षणभंगुरता यदि क्षणिक और सुगंध् प्रफुल्लता प्रदान करे तो वह आनन्द कई जन्मों से भी श्रेष्ठ है। कवि की खण्ड-दो की कविताएं गम्भीरता, उदादत्ता, संप्रेषणीयता एवं भाव-सौंदर्य की दृष्टि से अधिक अर्थपूर्ण हैं। ‘तम हृदय कगार पर’ जलद-नयन उमड़-घुमड़ कर विद्युत दीप बुझा देते हैं, पर ‘बचपन की याद’ अल्हड़ता की सुमधुर स्मृतियों का स्मरण करा जाती हैं। ‘कलियों की चाह’ के बहाने किशोर और युवा हृदय खिल उठता है, मन-भ्रमर पिंग पराग के लिए पुष्प-पुष्प पर जाकर डोलने लगता है। ‘जैसे सैंध् लगाने चल बैठा हँू’ थोड़ी लम्बी कविता है। इसमें सूर्य का मानवीकरण और आलम्बन चित्राण हुआ है। निशि सूर्य से उषा सुन्दरी की माँग भरवाती है। शशि, उषा पात्रा के रूप में कविता चित्रित है। कविता में सम्वाद, अलग-अलग स्थान, स्थितियां और बिम्ब चलचित्र की भाँति देखते ही बनते हैं।
वस्तुतः कविता मानव के सुख-दुखात्मक जीवन की जीवित अनुभूति का मूर्त रूप होती है, सम्वेदन ही व्यक्ति के अंतःकरण से सामंजस्य स्थापित कर उसे हृदयग्राही बनाते हैं। ‘एक भारतीय सैनिक की आत्मा’ कविता इसी प्रकार के संवेदनों से संवेदित है। यह राष्ट्रीयता एवं देशभक्ति से परिपूर्ण एक प्रभावशाली कविता है। चीनी चैकी पर तैनात सैनिक अपनी परिवेशगत स्थिति का चित्रण करता अपनी वृद्ध माँ को एक भावपूर्ण पत्रा लिखता है। यह कविता सैन्य-जीवन की एक बलिदान गाथा है। एक सैनिक किन विषम परिस्थितियों में सीमा पर अटल प्रहरी बन कर देश की रक्षा करता है, इसका चित्रण करते कवि लिखता है-
‘‘पर्वत की चोटी पर
छोटा सा टैण्ट है
बहता समीर झकझोर कर-
जाड़ों का,
हिलता है टैण्ट तो,
हिल जाता दिल भी
काँपते हैं हाथ
काँप जाती लेखनी भी।
वह वृद्ध माँ, तरुणी पत्नी को अपना अन्तिम बलिदानी ओजपूर्ण सन्देश इस प्रकार भेजता है-
‘‘होगा कलंकित
कैसे तुम्हारा दूध्,
जब तक तुम्हारा पूत
जीता जगत में।
यह एक उदात्त प्रबन्धत्मक लम्बी कविता है, जिसे भाषा, भाव और वर्णित लय की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद की ‘शेर सिंह का शस्त्र समर्पण’ कविता के समकक्ष रखा जा सकता है।
‘कविते तेरा साथ न होता’ इस खण्ड की एक अन्य महत्वपूर्ण कविता है, जिसमें काव्य की व्यापकता और उसका महत्व प्रतिपादित करते हुए कवि कहता है- फूलों में मध्ु व सुवास, शशि में प्रकाश, वन में मध्ुट्टतु, कलियों में विकास, सरिता में लहर, सागर में उछाह, निर्झर में नीर, यौवन में सौन्दर्य, वनस्पतियों व फूलों में रंग, पपीहे की ‘पिउ’, कोयल की मल्हार सब कविता के कारण ही- उसके सानिध्य में ही सम्भव हुई है। कविता न होती, तो विहँसती भोर, सरसों का स्पंदन, सम्पूर्ण जगत का व्यापार और मनुष्य में मनुष्यता कुछ भी न होती। इस कविता में जीवन की समग्रता में कविता का मूल्यांकन हुआ है।
‘किसान बाला’ सुमित्रानन्दन पन्त की ग्राम्य बाला जैसी सुन्दर, सरल हृदय युवती का चित्राण है। यह एक लम्बी प्रबन्धत्मक कविता है। अभावग्रस्त होने पर भी कवि ने जीवन को सबसे मध्ुमय, सबसे सुखमय माना है। कवि ‘किसान बाला’ का चित्राण इन शब्दों में करता है- ‘‘गेहँू की बाली बोल उठी-
‘तू सजल सरोवर में विकसे,
मकरन्द, कुमुदनी की सारी,
तू बता कौन है इस जग में,
तुम सी पुनीत सुन्दर नारी?
फूलों की शैय्या पर सोना,
क्या इस को ही कहते जीवन?’’
कली खिल कर जैसे फूल बनती है, वैसे ही उस युवती का स्वप्न तब साकार होता है, जब वह एक सैनिक की पत्नी बनती है। उसके समस्त अभाव भावों और सारे दुख, सुखों में पर्यवसित हो जाते हैं। ‘नयनों का व्यापार यहाँ’ कविता में कवि ने जहाँ एक ओर छलना एवं प्रवंचना को चित्रित किया है, वहीं यह भी प्रतिपादित किया है कि समस्त भोगलिप्साएं इहलोक तक ही सीमित रह जाती हैं। ‘ताजमहल’ कविता में प्रगतिवादी जीवन मूल्यों का चित्राण करते हुए कवि साहिर लुधियानवी की तर्ज पर कहता है कि यह पे्रम का प्रतीक नहीं शोषितों के खून पसीने के गारे और बेगारी से बना भवन है, जिसमें सैकड़ों गरीबों की आह दबी है। शाहजहाँ के इस कथन में कविता अपनी चरम परिणति को प्राप्त करती है-
‘‘ताज को बना करके,
मैंने जो पाप किया,
मुझ सा अधम-नीच
जग में न कोई है,
मेरी मुमताज आज
ताज में ही सोई है,
दिल में यदि होती तो
ताज क्यों बनाता मैं?’’
कविता में शाहजहाँ और मुमताज के सम्वाद उसे गत्यात्मक और नाटकीय बना देते हैं। ‘हे पूज्यनीय’ कविता विश्वप्रसिद्ध भाषाविद् डाॅ.हेमचन्द्र जोशी को समर्पित है। व्यक्तिनिष्ठ होने पर भी इस कविता में डाॅ.जोशी का स्मरण करते हुए कवि ने भाषाविद् और आलोचक का क्या दायित्व है, इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा है कि सच्चा समीक्षक ही लूले-लँगड़े साहित्यकारों को सहारा देकर उन्हें चलना सिखाता है। आलोचना की मध्ुरिम छाया में ही साहित्यकार भाषा की औषधीय घुट्टी पीकर बड़े होते हैं।
कविता न दार्शनिकों के दर्शन का विषय है,न अर्थशास्त्रिायों का यथार्थ। सत्य के समुद्घाटन, सौंदर्य के प्रस्थापन के साथ ही वह शितत्व का मार्ग प्रशस्त करती है, ‘आ अब उजली राह बना दे’ कविता मेें इसीलिए कवि प्रकाश को पुकारता है, जिससे मानवता की राह उज्जल हो सके।
‘प्रेरणा’ संग्रह के काव्य-शिल्प पर कुछ कहना प्रासंगिक होगा। इस संग्रह की कुछ कविताएं गीतात्मक हैं और कुछ मुक्त एवं गद्यच्छंद में निब( हैं। सरसी, ताटंक, वीर, पदपादाकुलक, मनोरमा आदि पारम्परिक छन्दों और उनकी लयों में कविताएं विन्यस्त हैं। गद्यच्छंदों में पद-मैत्राी और अर्थलय निहित है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि सादृश्यमूलक अलंकार कविताओं में प्रकृतितः समाविष्ट हो गए हैं। भाषा तत्समबहुला है, पर जन-प्रचलित अरबी-फारसी के शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। लाक्षणिकता भी पर्याप्त है। अवसरानुकूल मुहावरों और कहावतों का सटीक प्रयोग हुआ है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि उप्रेती जी ने जितनी ईमानदारी से अन्य विधाओं में सर्जना की है, उतनी ही ईमानदारी कविता रचना में भी दिखाई है। यश और अहंमन्यता से परे उनका समग्र व्यक्तित्व ही इन कविताओं में प्रतिफलित होता लगता है। वे एकाएक इतनी जल्दी और खड़े-खड़े हमारे बीच से चले गए, पर उनकी ‘प्रेरणा’, उनका सर्जन, हमेशा हमारा और हमारे समाज का पथ आलोकित करता रहेगा। उनकी रचनाओं के बहाने इन शब्दों में श्रद्धा-सुमन व्यक्त करते हुए मैं इस अवसर पर उन्हें नमन करता हँू। डाॅ.पंकज उप्रेती को साधुवाद देता हँू कि ‘प्रेरणा’ संग्रह के रूप में स्व.उप्रेती जी की कविताओं का विग्रह सम्मुख आया। आशा करता हँू, यह कविता संग्रह हिन्दी जगत में समादृत होगा।
पिघलता हिमालय 22 फरवरी 2016 के अंक में ‘पेरणा’ पुस्तक की समीक्षा
