
भरत कुमार मिश्र
पं. शीतल प्रसाद मिश्र का जन्म उत्तरी बिहार के मिथिला प्रान्त के मधुबनी मिथिला के एक सांगीतिक घराने में हुआ। इनके पूर्वज, काशीराज के कथाकार, गायक, कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित थे। काशीराज नरेश, रीवां नरेश एवं दरभंगा नरेश मैत्री के पफलस्वरूप आदान-प्रदान के कारण काशी से कुछ कलाकार मिथिला आये। इन्हें दरभंगा, मधुबनी राज्य से गाँव-जमीन आदि देकर बसाया गया। इनमें से भरत कुमार मिश्र ;लेखक लगभग सातवीं पीढ़ी के कलाकार हैं।
पं. शीतल प्रसाद मिश्र के बाल्यकाल का नाम घूरन मिश्र था। पं. शीतल जी अपने परिवार के सबसे कनिष्ठ पुत्र हैं। सबसे बड़े भाई स्मृति शेष पं.दुर्गा प्रसाद मिश्र, कमशः उमा देवी;पत्नी पं. गामा महाराज, श्याम देवी ;पत्नी पं. बद्री महाराज, पं. दिनेश मिश्र, स्वयं पं. शीतल प्रसाद मिश्र हैं। कहा जाता है कि पं.शीतल प्रसाद मिश्र के जन्म के समय इनकी माता जी ;दादी श्रीद्ध मूर्छित हो गई थीं। काफी समय तक लोग इन्हें मृत समझकर इस शिशु को अशुभ जानकर घूरे पर, जहाँ कूड़ा-करकट झाड़-बुहार कर रखा जाता है, खिसका दिया…….। काफी देर बाद, दादी जी की चेतना वापस आने पर इन्होंने शिशु की खोज की और महिलायें घूरे पर से वापस ले लाईं, और इस कारण पं.शीतल जी को घूरन पुकारा जाने लगा। गाँव में अभी भी घूरन बाबू, दुर्गा बाबू, दमन बाबू उर्फ दिनेश मिश्र नाम प्रचलन में हैं।
पं.शीतल जी के पिता स्मृति शेष पं. अनन्त मिश्र जी, स्वयं भी एक अच्छे एवं छिपे हुए लोग संगीत के कलाकार थे। ताउ जी पं.आद्या मिश्र भी शास्त्रीय गायक थे, चाचा पं. हरिशंकर ;लल्लू जी एक कुशल तबला वादक थे। पं. अनन्त मिश्र के पिता शेष स्मृति पं. परमेश्वरी मिश्र, दरभंगा, मधुबनी के रियासत के तहसीलदार पद पर कार्यरत थे। उस समय, इन्हें घोड़े की सवारी मिली थी। उस जमाने में महिलायें घोड़ों की बग्घी-गाड़ी में पर्दे में सवारी करती थीं।
भावातिरेक में कभी पिता श्री शीतल जी ने भी अपने बारे में कहा था जैसा कि इन्होंने अपनी दादी, नानी से सुना था कि पैदाइश के समय माता श्री जी का मूर्छित होना, चार वर्ष की आयु में दादा पं. परमेश्वरी जी का एवं पाँच वर्ष की आयु में पिता पं.अनन्त मिश्र जी का निधन और तत्पश्चात परिवार का विघटन…..यह सब मेरी अभाग्यता का सूचक ही तो है। उसके बाद यह परिवार अपने मायके अर्थात पं.शीतल जी अपने ननिहाल, जो कि उत्तर प्रदेश के बनारस जिले के मोंढ़ जिला भदोही स्थित नाना पं.शम्भू मिश्र एवं मामा पं. बेचन मिश्र जी के यहाँ पले बढ़े। यह सौभाग्य बन गया कि छः वर्ष की अल्प आयु में इन्हें ;पं.शीतल जी को बड़े बहनोई पं. गामा महाराज जी के साथ कबीर-चैरा, वाराणसी भेज दिया गया। कालान्तर में पं. गामा महाराजा जी, आरा बिहार प्रदेश में शिक्षक के रूप में प्रतिष्ठत हुए। यहाँ बनारस में इनकी देखरेख पं. बद्री महाराज जी, जो कि स्वयं कंठे महाराज जी के शिष्य थे, उनकी देखरेख में प्रारम्भिक कायदे-पल्टे विस्तार से अभ्यास कराया गया। तत्पश्चात गुरु पूर्णिमा के अवसा पर वे अपने गुरु पं. कंठे महाराज ;वाद्य शिरोमणि जी से गंडा-बंधन करवाया। इस प्रकार, प्रारब्धवश, पं.शीतल प्रसाद जी के पूर्वज वाराणसी काशीराज से बिहार के मिथिलांचल घराने की छाप लेते हुए पुनः बनारस घराने के गंडा-बंध् शिष्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
अतः इनकी शिक्षा-दीक्षा वाराणसी में हुई। आदर्श सेवा विद्यालय में कक्षा 8 की पढ़ाई के समय कभी-कभी पं.गोपाल जी मिश्र एक उद्भट्ट सारंगी वादक, अपने बैठक में रियाज करते थे और पं.शीतल जी के शब्दों में- ‘‘मैं उनकी सारंगी के आलाप, बंदिश और तानों की झड़ी-लड़ी में खो जाता और पंडित जी ‘गोपाल मामा’ एवं पं. हनुमान प्रसाद मिश्र ‘हनुमान मामा’ अपने बैठक से देखते और बुला लेते, फटा सा ढीला बायां दे देते और कहते कि तिताला ठको लगाव। मैं देखता विस्मय से, खाली ढीले बायें से ठको कसे बजाई? तो खुद बायां लेक बेताया ‘ना ध्े ध्े ना। ना ध्े ध्े ना। ना क के नो। ना ध्े ध्े ना।’ बस हम शुरु हो जाते, घंटों अभ्यास करते और कराते भी, यह हमारे ध्ैर्य की परीक्षा, आदर की भावना की परीक्षा थी और इस प्रकार हमें पीतल की इकन्नी देते और कहते कि पिफर आये। पं. हनुमान मिश्र एवं पं. गोपाल मिश्र मामा द्वय, पं. राजन एवं साजन मिश्र बन्ध्ु के पोते एवं चाचाची थे। इन्हीं के घर मेरे बहनोई पं. बदरी महाराज जी उपनाम खदेर जी ने प्रथम प्रदर्शन के रेपू में सोलो तबला वादन कराया था। गत फरद, टुकड़ा, बांट आदि का खूब अभ्यास करक ले गये थे। उसके बाद राजन-साजन मिश्र बन्ध्ु का युगल गान बंदिश, ‘सुमरन कर मनु राम नाम को’ आज भी कानों में गुंजायमान होता है।’’
पं.शीतल जी आगे बताते हैं कि शायद आज पद्मभूषण पं. राजन जी एवं पद्मभूषण साजन जी को याद हो और प्रथम प्रदर्शन के फलस्वरूप मैंने ठेका लगाया था। पं.शीतल जी के शब्दों में, ‘‘स्वर साम्राज्ञी श्रीमती गिरिजा देवी जी के यहाँ तीन रुपये महिने की ट्यूशन करने जाते थे…….कभी-कभी लय लय बढ़ जाने पर दीदी ‘गिरिजा दीदी’ टोकती रहती थीं…….इस प्रकार हमें अच्छे- अच्छे धुरंधर कलाकारों का सहयोग, आशीर्वाद व मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ।’’
गुरु सेवा में तत्पर……किसी प्रकार की सेवा जो लोग न कर पाये, वह करने में कभी भी ‘ना’ शब्द से इनको लगाव नहीं था। जूता पालिश, तेल मालिश, कपड़े धेना, लंगोट आदि……बाजार से सामान ढूंढकर जहाँ से भी हो, ले आते, कभी-कभी ‘गुरुवर’ कह देते कि फलनवां का नाहीं मलिल, तै कहाँ से लै अइले….., वाह बेटा, हनुमान जी जैसन ढूंढ के लैै अइले खुश रह ;बनारसी बोली में।
गुरु गृह में शिक्षा के दौरान पं. पूरन मिश्र सुपुत्र पद्म विभूषण पं. किशन महाराज, पौत्रा पं. कंठे महाराज जी के पूछने पर ओस्ताद, हम लोग गुरुवर को ओस्ताद सम्बोधन से पुकारते……..कि शीतल नाम गुरुवर के खानदान में किसी का न था, अतः बार-बार किसी बुजुर्ग का नाम न दुहराया जाय, अतः पूरन जी ने अपने बब्बा से पूछा इनके हम का कही?………पहले लोगबाग, नाउ-काका धोबी-चाचा, दर्जी-मामा आदि नाम से सम्बोधित करते थे। अतः गुरुवर ने शीतल नाम बदल के ‘सार’ नाम दे दिया कि फलनवां ;बद्री के के तू भैय्या कहल और इ ओकर सार हौ, अतः तोहू इनके ‘सार’ कहल कर…….इस प्रकार घरभर ‘सार’ नाम से सम्बोधित करते, बचपन से छोटे-छोटे जीव जंतु भी पैर से न कुचल जाय, अतः ये जमीन देखकर चलने के कारण गुरुवर कभी-कभी कहते भुइंतक्का ‘जमीन देखके चलने वाला।’
कबीर चैरा से चैकाघाट लकड़ी का गट्ठर लाद के मजदूर लाता पैदल……..उसके सिर से कुछ लकड़ियां गिरती, उसे उठाकर घर आते-आते उस समय तक मेरे पास भी 6-7 लकड़ियां हो जातीं, यह सेवाभाव था।
नौकरी सन् 1967 ई. में भातरखण्डे संगीत महाविद्यालय लखनउफ में तबला संगतकर्ता पद वेतनमान रु. 100-160 पर रु. 04/- वेतन वृद्धि का नियुक्ति का पत्र पाकर गुरुवर से आज्ञा लेकर अमीनाबाद श्री हनुमान मन्दिर, लखनउ, जहाँ पं. रमाकान्त पाठक जी मेरे अयोध्या कार्यक्रम के दौरान मैत्री हुई थी, के पास पहँुचे, कुछ दिन वहीं रहे……..बाद में किराया रु. 30/- माह पर अलग निशातगंज लखनउ में निवास बना। पहला वेतन रु. 150/- प्राप्त हुआ, वेतन तो काफी कम था, पर यहाँ गुणी गायक-वादक-नर्तक कलाकारों का सानिध्य प्राप्त किया, उसी के कारण यहाँ टिक गया। स्वनामधन्य पं. हरिशंकर ;चाचा जी, पं.रंगनाथ मिश्र जी जिनसे मैं कबीरा चैरा, वाराणसी से परिचित था, पं. रंगनाथ मिश्र के सुपुत्र पं. गामा महाराज जी के कारण ये मेरे रिश्ते के भांजे थे, पर ये उम्र मं बड़े थे, अतः भांजे वैसे भी आदरणीय होत हैं। और भी प्रधनाचार्य श्री श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर, उपप्रधनाचार्य श्री गोविन्द नारायण जी ;नातू जी, श्री मोहनराव शंकर कल्याण पुरकर जी एवं श्री विक्रम सिंघे क्रमशः प्रोफेसर एवं सहायक प्रोफेसर कथक नर्तक, उस्ताद इलियास खाँ साहब प्रोफेसर सितार स्वर वाद्य………उसके बाद पं. गणेश प्रसाद मिश्र ;भैया एवं डाॅ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी जी ने पदभार संभाला………शनैः शनैः और भी साथियों सहयोगियों के साथ-साथ 42 वर्ष समय बीत गया और पता नहीं चला।
पं. शीतल जी के शब्दों में मंत्र मूलं गुरूर्वाक्यम् से संगीत समाज की भूरि-भूरि प्रशंसा प्राप्त की। पं. शीतल जी को उनके उत्कृष्ट वादन ;एकल, युगल, नृत्य, गायन, वादन-तंत्रा, गज, सुषिर हेतु अनेकानेक उपाधियां मान-सम्मान प्राप्त हुए। इसमें हैं- सुरसिंगार संसद;मुम्मई द्वारा तालमणि तबला, लालमणि वाद्या ‘पखावज’ सुरसिंगार संसद ;मुम्मई बहुत विरले लोगों मंे से किसी एक को अलग-अलग वाद्यों मंे तालमणि प्राप्त होती है। पं. शीतल जी को तबला एवं पखावज दोनों ही वाद्यों में तालमणि प्राप्त हुई। आईसीसीआर के मानित कलाकार हैं। संस्कार भारती एवं गुरुपूर्णिमा ;व्यास पूर्णिमाद्ध पर व्यास सम्मान। ‘तबला पारंगत’ स्वामी हरिदास संस्था द्वारा। व्यावसायिक कलाकार वर्ग में पं. शीतल जी ने प्रथम विशिष्ट स्थान प्राप्त किया, उ.प्र. संगीत नाटक अकादमी, लखनउ। वर्ष 1994 में अकादमी अवार्ड प्राप्त, उ.प्र.संगीत नाटक अकादमी लखनउ। ‘संगीत कला रत्न’ आगरा, विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जयन्ती के सुअवसर पर। विदेशी छात्रों को भी पंडित जी ने सिखया और फ्रंास, बर्लिंन, पेरिस, जर्मनी आदि की यात्रा की। ‘तबला मनीषी’, ‘संगीत साधक’ निखिल बनर्जी पुरस्कार प्राप्त शीतल प्रसाद जी ने देश के अनेक चोटी के नामचीन कलाकारों के साथ संगीत सम्मेलनों में सुसंगत की। आप आकाशवाणी के ए ग्रेड के उच्च श्रेणी के कलाकार हैं। आप भातखण्डे संगीत संस्थान लखनउ में ताल वाद्य विभाग में विभागाध्यक्ष रहे एवं वर्ष 1967 से 2009 तक लगभग 42 वर्ष तक संगीत की सेवा करते हुए 2009 मंे सेवानिवृत्त हुए।
गुरु समर्पण- पं. कंठे महाराज जी की पे्ररणा से उन्होंने कई नवरात्रों की जागरण-साधना-अराधना की सिद्धि की है, उनकी कृपा से वर्ष 1978 में प्रतिपदा गुरु जी की जन्मतिथि शारदीय नवरात्रि की प्रथम तिथि मेें पं. ब्रजभूषण मिश्र ‘ग्रामवासी’ जी के निवास स्थान पर कृपाल स्वर संस्थान में 15 घंटे 18 मिनट तक एकल वादन का अनूठा रिकार्ड बनाया जो शास्त्राीय संगीत जगत, लखनउ में एक उपलब्धि है। उसी याद में, प्रतिवर्ष अपने निवास स्थान ;सेक्टर 19/260, इन्दिरा नगर लखनउ पर शारदीय नवरात्रि में 9 रात्रि तक शास्त्राीय एवं सुगम संगीत का उत्सव हर्षोल्लास से मनाते हैं, जिसमें देश के कई नामी कलाकारगण स्वेच्छा से अपनी सांगीतिक कला का प्रदर्शन कर चुके हैं एवं करते हैं।
कठोर-अनुशासक प्रिय, निष्कपट गुरु, छल प्रपंच रहित शिक्षक, मितभाषी, सरल स्वभाव, आत्म सम्मानी, ताल विद्या में दक्ष लयकारी में निपुण, संगत में सि(, वाहब, गायक या नर्तक के साथ एकाकार होकर, बोलों में स्पष्टता, दायें-बायें का सुन्दर सामंजस्य कवित्त, छंदों में शुद्ध उच्चारण करने वाले पं.शीतल जी यथा नाम तथा गुण हैं।
मृदुभाषी पं.शीतल जी के दो पुत्र- भरत मिश्र तबला वादक, भातखण्डे संगीत संस्थान सम विश्वविद्यालय लखनउ में कार्यरत एवं अनुज मिश्र गायक व सारंगी वादक तथा एक पुत्री अब श्रीमती ज्योत्सना दुबे सितार वादिका, गायिका एवं तबला वादिका हैं। पं.शीतल जीे के शिष्यों में उदय शंकर मिश्र, सचिन वर्मा, प्रदीप द्विवेदी, उदय नाटू, मुकेश, कृष्णानन्द, विभा मिश्रा, कुसुम श्रीवास्तव, रजनीश मौये व पुत्रा भरत मिश्र संगीत के क्षेत्रा में अग्रणी पंक्ति के तबला वादक हैं।
जिन ख्यातिनाम कलाकारों के साथ पं.शीतल जी ने संगत की व सानिध्य रहा उनमें से डाॅ.श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर, गोविन्दनारायण नाटू, पं.जसराज, पं.हरिशंकर मिश्र, पं.गणेशप्रसाद मिश्र, पं.महादेव प्रसाद, सुमति मुठाटकर ध्ु्रपद, असगरी बेगम, सविता देवी, के.जी.गिंडे, वाणी जयराम, पं.काशीनाथ शंकर बोडस, वी.जी.जोग, डी.के.दातार, बुद्धदेवदास गुप्त, श्रीमती एन. राजम, इन्द्रनील भट्टाचार्य, गिरिराज, भजन सपोरी, पं.शम्भू महाराज, पं.लच्छू माहाराज, पं.बिरजू महाराज, सितारा देवी, वन्दना सेन, उर्मिला नागर, तरुणकांत, वासंती सुब्रमण्यम, नरेन्द्रनाथ धर, अभयशंकर मिश्र। शोधर्थियों का मार्गदर्शन, मूल्यांकन सहित आज भी वह सक्रिय हैं।
