
डाॅ.पंकज उप्रेती
सुरम्य स्थान बेरीनाग का शहरी क्षेत्र अपनी जमीन के मामले में उलझा है किन्तु आस-पास के गाँवों को मिलाकर नगर पंचायत की तैयारी है। तैयारी तो बहुत है और बसासत का हिस्सा बन चुके चाहते भी हैं कि किसी प्रकार टी-स्टेट के नाम पर मचा हल्ला कम हो और उन्हें जमीन पर मालिकाना
हक मिल जाए।
बेड़ीनाग के नाम पर विख्यात बेरीनाग में को कंक्रीट का जंगल बनाने की होड़ है लेकिन इसके प्राचीन अवशेषों को भुला दिया गया है। विख्यात चाय के बाग हों, मैदान हों, जसुली शौक्याणी का धर्मशाला
हो या प्राचीन नागमन्दिर का क्षेत्र। महाविद्यालय के पास एक टीले में प्राचीन मन्दिर के अवशेष हैं। प्राचीन मन्दिर और इसका नौला अब महाविद्यालय की सीमा के भीतर हैं। नौला तो आस-पास के कुछ परिवारों के लिये सुखद बना हुआ है लेकिन कुछ दूरी पर मन्दिर का खण्डहर झाड़ियों से ढक चुका है। बताया जाता है कि अंग्रेजी शिकारी द्वारा पक्षी को गोली मारी गई जो इस मन्दिर के उपर गिर पड़ा, अंग्रेज उसे लेने के लिये जूते सहित मन्दिर के उपर चढ़ गया। इस घटना के बाद अंग्रेज के
परिवार में वज्र पड़ने से कापफी नुकसान हुआ और वह बेरीनाग छोड़कर ही चला गया। ;पि0हि0के पिछले अंक में भवानी लाल वर्मा के साथ बातचीत में भी इस अंगे्रज परिवार का उल्लेख आया था। मन्दिर के पुजारी भटीगाँव के पन्त जी को स्वप्न में मन्दिर केनये स्थल के बारे में पता चला तो इस मन्दिर को छोड़ कर नागदेवता की स्थापना दूसरे स्थान पर की गई। स्थानीय महाविद्यालय से कुछ आगे पर नाग का प्रसिद्ध मन्दिर है। समय के साथ-साथ पुरानी घटना भुला दी गई और इतिहास बन चुका मन्दिर का खण्डहर भी झाड़ियों के बीच मलवा बनने लगा। यह पहाड़ में बनने वाले पुराने मन्दिरों के डिजायन का है, जिसमें भीतर जाने को छोटा सा मार्ग है। कम उचाई वाले मन्दिर के कमरे में खिड़की भी है। कहा जाता है मन्दिर में पूजा इत्यादि के लिये पानी निकट वाले नौले से आता था।
पिघलता हिमालय 1 दिसम्बर 2014 के अंक से
