चाय बागान के नाम से मचता रहा हल्ला और बस गया शहर

पुराना चाय कारखाना

 

बेरीनाग चकोड़ी

पि.हि. प्रतिनिधि
सुरम्य नगरी बेरीनाग और चैकोड़ी के चाय बागान की भूमि को अपने कब्जे में लेने की सरकार की घोषणा के बाद से क्षेत्र में हलचल मची है। यह हलचल भय के साथ उम्मीदों भरी है। भय इस मायने में कि जो लोग अतिरिक्त जमीन दबाकर बैठे हैं उन्हें हिसाब देना होगा। और उम्मीद इसलिये जग रही है कि चाय बागान के नाम दर्ज भूमि के बाहर होते ही इस पर काबिज हो चुके लोग सरकार पर दबाव बना सकते हैं। इसकी तैयारी भी की जा रही है। विधयक मीना गंगोला भी जनता के इस पक्ष पर खड़ी हैं। सरकार के पफैसले से सहमे लोगों को तब ध्ैर्य हुआ जब विधायक ने कहा कि चाय बगान के कब्जेदारों को मालिकाना हक मिलेगा। सरकार ने भी इसी मंशा से फैसला लिया है। विधायक के बयान के बाद बेरीनाग और चकोड़ी में जमीन कब्जेदारों में राहत है और अनुमान लगाया जा रहा है कि जमीन की लीज समाप्त होने के बाद बागवान की भूमि से मालदार परिवार का नियंत्राण पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। सरकार के अधिपत्य में आने के बाद लोगों को मालिकाना हक मिलने में कोइ रुकावट पैदा नहीं होगी। सरकार जनहित में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाकर यहाँ रह रहे पन्द्रह हजार से अधिक परिवारों को मालिकाना हक दे सकती है।
विधयक भले ही लोगों के बीच जाकर आश्वासन दे चुकी हैं लेकिन यह देखने की बात है कि चाय बागानों पर मालदार परिवार का नियंत्रण है होने के कारण इस पर बसे लोगों को मालिकाना हक देने के मामले में हमेशा से ही पंेच फंसता रहा है। सरकार के फैसले के बाद लोगों को बेघर होने का भय भी सता रहा है। सरकार के फैसले से मचे हड़कम्प के बाद लोग विधायक से मिले। भाजपा के मण्डल अध्यक्ष ध्ीरज बिष्ट कहते हैं कि भूमि विवाद पर नया फैसला ऐतिहासिक है। विश्वास है कि सरकार लोगों के हितों को देखते हुए मालिकाना हक जरूर देगी।
उल्लेखनीय है कि कभी चाय बागानों के लिये मशहूर बेरीनाग व चैकोड़ी में दानसिंह-मोहनसिंह बिष्ट मालदार के परिवार का दबदबा रहा था और बेसकीमती जमीन पर चाय का कारोबार होने के साथ ही विदेश तक चाय सप्लाई होती थी। ग्रामीण परिवेश में रहने वालों का और चाय बागान के मालिक के बीच तालमेल ही ऐसा था कि भूमि से किसी को कोई परेशानी नहीं। समय के साथ-साथ मालदार परिवार फैलता गया और गाँव भी तरक्की के लिये फैलने लगे। कई लोगों ने मालदार परिवार के सम्पर्क में रहकर बेरीनाग व चैकोड़ी मुख्य जगहों पर अपने रहने का ठिय्या बना लिया। आगे चलकर कुछ ने खरीद की और कुछ को दान में भूमि दे दी गई। जमीन की इस बांट में चायबागान का हल्ला मचता रहा और समानान्तर शहर बसता चला गया। मालदार परिवार की शाखाएं भी इतनी ज्यादा फैल गईं कि किस जमीन पर क्या होने जा रहा है, सारा हिसाब-किताब रखना आसान नहीं था। बाद के कुछ समय में कुंवर महिराज सिंह ने चैकोड़ी में जमीन को खूब बांटा। बहुत से लोग उनके प्रशंसक बन गये। आज बेरीनाग ठसाठस भर चुका है और चकौड़ी में शिक्षा का केन्द्र बनने के साथ ही रिसोर्ट, होटल, रेस्टोरेंट, आवास बन चुके हैं।
सरकार ने बेरीनाग और चैकोड़ी में चाय बागान की करीब 1047 हेक्टेयर भूमि वापस ले ली। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत ने इसके लिये आदेश जारी किये। उनका कहना है कि यह भूमि चाय बागान के लिये दी गई थी लेकिन इसका उपयोग चाय उत्पादन के लिये नहीं हुआ और इस भूमि पर अवैध् कब्जे हो रहे हैं।
इसी भूमि को लेकर कोर्ट में वाद चल रहे हैं। चाय बागान के लिये दी गई भूमि सीलिंग एक्ट में नहीं थी। राजस्व ने इसे फी सिंपल इस्टेट ;ऐसी भूमि जिसके स्वामी को भू उपयोग के अधिकार प्राप्त हो माना और पाया कि चाय बागान के विकास के लिये ही यह भूमि गाँव के लोगों को दी गई थी। यह भी पाया गया कि अधिकतम स्रोत सीमा आरोपण अधिनियम ;सीलिंग एक्ट के तहत इस भूमि के लिए राज्य सरकार ने छूट भी प्रदान की थी। बेरीनाग प्रशासन ने मामले की जाँच की तो पाया कि भूमि पर कब्जे हो रहे हैं और मकान-दुकान तक बना लिए गए। प्रशासन ने भूमि की खरीद- फरोख्त पर रोक लगाई तो मामला हाईकोर्ट पहँुचा। बताया जाता है कि जिन खातेदारों के पास चाय के बगान के लिए भूमि थी, उन्होंने अन्य लोगों को यह जमीन रजिस्ट्री, दाननामा और स्टाम्प पेपर पर इकरारनामा कर बेच दी। इसके लिये राज्य सरकार की अनुमति नहीं ली गई। भूमि की खरीद- फरोख्त पर रोक के लिये जिला और उच्च न्यायालय में मामले पहँुच गये।

 

बेरीनाग का प्राचीन मन्दिर स्थल जिसे अंग्रेज शिकारी के कृत्यों से छोड़ दिया गया

डाॅ.पंकज उप्रेती
सुरम्य स्थान बेरीनाग का शहरी क्षेत्र अपनी जमीन के मामले में उलझा है किन्तु आस-पास के गाँवों को मिलाकर नगर पंचायत की तैयारी है। तैयारी तो बहुत है और बसासत का हिस्सा बन चुके चाहते भी हैं कि किसी प्रकार टी-स्टेट के नाम पर मचा हल्ला कम हो और उन्हें जमीन पर मालिकाना
हक मिल जाए।
बेड़ीनाग के नाम पर विख्यात बेरीनाग में को कंक्रीट का जंगल बनाने की होड़ है लेकिन इसके प्राचीन अवशेषों को भुला दिया गया है। विख्यात चाय के बाग हों, मैदान हों, जसुली शौक्याणी का धर्मशाला
हो या प्राचीन नागमन्दिर का क्षेत्र। महाविद्यालय के पास एक टीले में प्राचीन मन्दिर के अवशेष हैं। प्राचीन मन्दिर और इसका नौला अब महाविद्यालय की सीमा के भीतर हैं। नौला तो आस-पास के कुछ परिवारों के लिये सुखद बना हुआ है लेकिन कुछ दूरी पर मन्दिर का खण्डहर झाड़ियों से ढक चुका है। बताया जाता है कि अंग्रेजी शिकारी द्वारा पक्षी को गोली मारी गई जो इस मन्दिर के उपर गिर पड़ा, अंग्रेज उसे लेने के लिये जूते सहित मन्दिर के उपर चढ़ गया। इस घटना के बाद अंग्रेज के
परिवार में वज्र पड़ने से कापफी नुकसान हुआ और वह बेरीनाग छोड़कर ही चला गया। ;पि0हि0के पिछले अंक में भवानी लाल वर्मा के साथ बातचीत में भी इस अंगे्रज परिवार का उल्लेख आया था। मन्दिर के पुजारी भटीगाँव के पन्त जी को स्वप्न में मन्दिर केनये स्थल के बारे में पता चला तो इस मन्दिर को छोड़ कर नागदेवता की स्थापना दूसरे स्थान पर की गई। स्थानीय महाविद्यालय से कुछ आगे पर नाग का प्रसिद्ध मन्दिर है। समय के साथ-साथ पुरानी घटना भुला दी गई और इतिहास बन चुका मन्दिर का खण्डहर भी झाड़ियों के बीच मलवा बनने लगा। यह पहाड़ में बनने वाले पुराने मन्दिरों के डिजायन का है, जिसमें भीतर जाने को छोटा सा मार्ग है। कम उचाई वाले मन्दिर के कमरे में खिड़की भी है। कहा जाता है मन्दिर में पूजा इत्यादि के लिये पानी निकट वाले नौले से आता था।

पिघलता हिमालय 1 दिसम्बर 2014 के अंक से

यज्ञ स्थली था जगथली गाँव

पि.हि.प्रतिनिधि
गाँव की ओर स्तम्भ में आज हम आपको ग्राम जगथली का परिचय करवा रहे हैं। पहाड़ के खाली होते गाँवों की तरह इसकी भी पीड़ा है। महानगर में बस चुके कुछ परिवार अपनी मातृभूमि के लिये सजग हैं किन्तु अधिकांश पलायन का दर्द दिखाई देता है। थल से 14 किमी और बेरीनाग से 15 किमी दूरी पर स्थित है गाँव जगथली। इस ग्रामसभा की बात करें तो लगभग ढाई हजार की आबादी है। गाँव में प्राइमरी और इण्टर कालेज है। वर्तमान में सड़क बनने से यहाँ रहने वालों में उम्मीद जगी है।
जगथली के बारे में कहा जाता है कि यह यज्ञ स्थली हुआ करती थी और दूर-दूर से लोग एकत्रित होकर यज्ञ में भाग लेते थे। यहाँ प्राचीन शिवालय है, बाद में जिसका जीर्णेद्धार कर दिया गया है। मन्दिर के पास वाले खेत को ‘कुन’ ;कोना कहा जाता है और पास में ही ‘ज्यूनारपाट’। कहते हैं ज्योनार बनाकर कुन उतारने के के कारण इनका नाम रखा गया। यह भी मान्यता है कि मन्दिर के पास खेतों के बीचोंबीच विशालकाय पत्थर से शंखध्वनि होती थी, जिसे आज भी ‘बिलाड़ीढंुग’ कहा जाता है।
जगथली में चन्दोला परिवार सहित कई जातियां रहती हैं। बताते हैं चन्दोला लोग गढ़वाल से आकर यहाँ बस गये थे। इन परिवारों में अधिकांश अब शहरों में यत्रा-तत्रा रहने लगे हैं। गाँव के 53 वर्षीय केवलानन्द चन्दोला बताते हैं कि काण्डे में रहने वाले पन्त, लालुका के बिष्ट और उनके बुजुर्ग एकसाथ इस स्थान पर आये थे। जगथली ग्राम सभा में गराउॅ के शाह, उडियारी के महरा, कालिटी के कार्की, किरौली के पन्त, काण्डे के पन्तों की जमीनें हैं। कभी सभी के पूर्वज यज्ञ के लिये यहाँ आते रहे होंगे।
जगथली के सूनेपन को चीरते हुए दुलखोला-सकनोली-गराउॅ तक सड़क बन रही है जो देवीनगर तक मिलेगी, इससे आवत-जावत में राहत मिलेगी। उम्मीद की जानी चाहिये कि बन्द पड़े कई घरों में फिर से चहल-पहल होगी। ग्राम में 12 प्रकार की जातियों का निवास रहा है। जिसमें से खौला गाँव के जोशी परिवार अब हल्द्वानी के पास बिन्दुखत्ता बस चुका है। महरौड़ी का बसखेती परिवार था, जिसमें एकमात्र बुजुर्ग के निधन के बाद कोई नहीं बचा है। जगथली के पहले पूर्वज के रूप में घंघोला जाति यहाँ है। चन्दोला, भट्ट, नौर्की;जोशी लिखने लगे हैंद्ध, कार्की, मेहता, पन्त, बोरा, दुनखोला के जोशी, बिष्ट, मनराल, लोहार, शिल्पकार सभी हिलमिल इसे संवारते रहे हैं। आशा है बनने वाली सड़क रौनक लौटायेगी।

पिघलता हिमालय 26 सितम्बर 2016 अंक से

बीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट का है इतिहास

इन्द्र सिंह नेगी
नैनीताल। नैनीताल का बीरभट्टी क्षेत्र अतीत से ही अपने इतिहास में कई पन्ने जोड़े हुए है किन्तु त्रासदी तो यह है कि बलियानाले के ट्रीटेमेंट के नाम पर आज तक कोई ठोस कार्य नहीं हो पाया है। जिस कारण गन्दगी फैलने के साथ-साथ रानीबाग से सीधे इस इलाके को जोड़ने वाला मार्ग भी लुप्त हो चुका है और मुख्य हाइवे पर बना पुल भी मजबूत बनने के लिये मजबूर सा बना हुआ है। बलियानाले के ट्रीटमेंट के नाम पर हो रहे कार्यों को आज तक शासन-प्रशासन ने गम्भीरता से लिया होता तो इलाके में खतरा नहीं मंडराता और प्राचीन यात्रा पथ भी यहाँ के इतिहास की परख के लिये सुलभ होता।
जरा इतिहास की ओर नज़र दौड़ायें तो पता चलता है कि इस क्षेत्रा को ब्र्रेवरी कहा जाता था। अंग्रेजों के शासन काल में यहाँ वियन बनाने की भट्टी थी। 1987 में मनोरापीक के भूस्खलन का मलवा वीरभट्टी में आया, जिसमें 27 अंग्रेजों की मौत हो गई थी। अस्तबल, होटल, डाकखाना, पशु भी मलवे में दफन हो गये। तब वीयरभट्टी को भवाली खोल दिया गया। बाद में सिलीगुड़ी;आसाम में उसे शिफ्रट कर दिया गया था। यह इलाका नीमकरौली महाराज की कर्मस्थली भी रही है। पं. नेहरु सहित कई दिग्गज यहाँ आये हैं। पं.गोविन्द बल्लभ पन्त जी तो इसे घर ही मानते थे। ऐसे स्थान को मालदार परिवार ने अपनी कर्मस्थली बनाया। ठाकुर देव सिंह बिष्ट के पुत्र- दानसिंह-मोहनसिंह भाईयों ने जिस तल्लीनता के साथ वीरभट्टी क्षेत्रा में कार्य किये उनकी यादें आज भी हैं। दानसिंह जी की 6 पुत्रियां हुई और मोहन सिंह जी के तीन पुत्र 10 पुत्रियां। इनके ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज सिंह थे। इस बड़े कुनबे के परिजन यत्र-यत्र के साथ वीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट में भी रहते हैं। मोहन सिंह जी बहु रमा बिष्ट, पृथ्वीराज जी की पुत्री दीप्ति बिष्ट अपने बुजुर्गों की यादों को संजोये हुए हैं।
बिष्ट स्टेट वह क्षेत्र हैं जहाँ से उन्नति कर कई लोगों ने अपने भविष्य को संवारा है। इस प्रकार की धरोहरों को संवारने के लिये व्यक्तिगत प्रयासों के साथ सामूहिक कृत्य भी होने चाहिये। 1897 से लेकर 1922 तक यहाँ रामलीला मंचन भी हुआ है। इतिहास के गवाह इस इलाके के विकास की बात छोड़ शासन-प्रशासन अपने में ही उलझा है। यह क्षेत्रा बलियानाले का मुहाना है और रानीबाग तक दस हजार परिवार इससे प्रभावित हो रहे हैं। क्षेत्रवासी चाते हैं कि वृटिश कालीन पुराने मार्ग के सौन्दर्यीकरण सहित बलियानाले का ट्रीटमेंट कार्य ठोस हो।

पिघलता हिमलाय 22 फरवरी 2016 के अंक से

चैती गायन का परम्परा ही सिमट चुकी है

डाॅ.पंकज उप्रेती
थल-बेरीनाग मार्ग के बीचोंबीच का  इलाका है- काण्डेकिरौली। काण्डे, किरौली, जगथली कभी एक ही ग्रामसभा हुआ करती थी, अब यह तीन ग्राम सभाएं हैं। इसी काण्डे के मूल निवासी पनीराम परम्परागत कलाकर हैं। नागों में मुखिया पिंगलीनाथ के दास के रूप में अपनी परम्परा को आज भी पनीराम और इनता परिवार निभा रहा है। लोक गायन की कई विधओं को जानने वाले 72 वर्षीय पनीराम के शिक्षित पुत्र राजन, गोपाल, महिपाल भी इन विधओं को जानते हैं और मेलों के असल रंग में झूमने के लिये जाते हैं।
पनीराम के दादा रुद्रराम और पिता गुलाबराम जागर व अन्य गायन की अन्य लोक विधाओं के जानकार थे, इन्हीं से सीखे हुए पनीराम आज भी नित्य प्रातः और सायं अपने घर में ढोल बजाकर पिंगलीनाथ का स्मरण करते हैं। ग्रामीण भी इनके मान-सम्मान में कसर नहीं छोड़ते हैं। लोक की यह अद्भुत परम्परा में कोई भेदभाव नहीं है, सब लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं। जिसके घर में जो नई पफसल का जो होता है उसका हिस्सा अनिवार्य रूप से इस परिवार को भी दिया जाता है। ऐसा सामाजिक तानाबाना हमारी कला-संस्कृति को जोड़ने वाला रहा है लेकिन सरकारी धन से कला-कलाकारों के संरक्षण के नाम पर हो रहा खेल दिल दुःखाता है।
पनीराम गंगनाथ की जागर लगाते हैं, जिसे हुड़के पर गाया जाता है। गोल ज्यू, नौलिंग, बजेंण, छुरमल, कालसिन की बंशावली को गाते हैं, जिसे ढोल की संगत में गाया जाता है। ढोल में पिंगलनाथ का स्मरण किया जाता है। वह बताते हैं कि नागों की वंशावली नहीं गाई जाती है, अन्य देवी-देवताओं के भांति नागों के डांगर नहीं होते हैं।
ढोल-जागर के अलावा पनीराम चैती गायन में माहिर हैं। इस गायकी में ट्टतु का रंग, रोमांच और उदासी के स्वर गूंजते हैं। पहाड़ में गाई जाने वाली यह गायकी अब सिमट चुकी है। बातचीत के दौरान वह ढोलकी के साथ सुनाने लगते हैं-
‘ट्टतु औंछे पलटि बरस का दिना
ज्यूना भागी जी रौला,
सौभागी सुणला बरस की ट्टतु……
मालो जानी गबड़ी पलटी आला,
खेवी जानी मौनू पलटी आला,
चैतोलिया मासा भाई भिटोली आला।
जाको न छि भाई, कौ भिटोली आला,
दैराणी-जैठाणी का भाई भिटौली आला,
गोरीध्ना रौतेली, कौ भिटोली आला,
छाजा बैठी गोरी आँसुवा ढोललि……..।’
इसमें चैत मास का वर्णन करते हुए गायक कहता है बर्ष में यह ट्टतु भी अपने समय से आयेगी, सभी राजीखुशी रहें, सौभाग्यवती सुनेंगी, भाबर जाने वाले ग्रामीण लौट आयेंगे जैसे मध्ुमक्खी रस लेकर अपने स्थान पर लौट आती है। इस वर्णन में गायक आगे कहता है- चैत के मास में भाई मिलने आयेगा। बहुत ही कारुणिक वर्णन इसमें है जब वह कहता है- गोरीध्ना का तो भाई ही नहीं है, कौन भिटोली लेकर आयेगा। वह छज्जे में बैठकर आंसु गिरायेगी।
चैती का यह वर्णन बहुत लम्बा है जिसमें आगे बताया गया है कि गोरीध्ना का भाई नहीं था। उसके विवाह के उपरान्त घर में एक भाई हुआ, जो बाद में उसके लिये भिटौली लेकर आया। इस प्रकार पुराने समय में ट्टतु के रंग, रोमांच के साथ करुणरस के स्वरों को घोलता हुआ चैती गीत गाया जाता है। वर्तमान में इसके गायक गिनती भर के हैं, जो गाँवों में घर-घर जाकर इसे सुनाया करते थे और सुनने वाले भी बहुत ही भावपूर्ण ढंग से इसे सुनते और कलाकार को पुरस्कार स्वरूप कुछ देते थे। काण्डे के पास ही बैठोली के दलीराम और उड्यारी के चनरराम भी चैती गायकी के अच्छे जानकार थे। इन्हीं परिवारों में से दलीप राम और मोहनराम ने गणतंत्रात दिवस के अवसर पर सबसे पहले छोलिया नृत्य किया था। यहाँ की ध्नीराम एण्ड पार्टी नैनीताल, लखनउफ, दिल्ली तमाम जगह में जाया करती थी। सनेेती, सनगाड़, भनार, नागमन्दिर बेणीनाग में कभी जबर्दस्त झोड़ा-चांचरी के आयोजन होते थे और परम्परागत कलाकार अपने गाँवों से ढोल-दमुवा बजाते हुए जात्रा के रूप में जाते थे। हुड़कीबौल सामन्यतः धन रौपाई में लगाई जाती है किन्तु यहाँ मडुवा गोड़ाई के समय इसे लगाया जाता था। समय बदला और अब पनीराम के ढोल की स्वर सुनाई देते हैं।

पिघलता हिमालय 19 सितम्बर 2016 के अंक से