
डाॅ.पंकज उप्रेती
अपनी जन्मभूमि के प्रति कुछ करने की ललक हो तो बहुत कुछ किया जा सकता है। बच्चों को दिशा दी जा सकती है और बेसहाराओं को सहारा। जोहार-मुन्सयार का ‘दिगड़ी’ग्रुप भी कुछ करने
की ललक के साथ बना है। इस चर्चित ग्रुप का उद्देश्य भी अपनी जन्मभूमि और अपनों के लिये कुछ करना है।
इसके बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। तय हुआ कुछ करो यारो और बन गया दिगड़ी ग्रुप। दिगड़ी किस प्रकार से अपने कार्यों को अंजाम देता है इससे जोहारवासी भली भांति परिचित हैं। इसके सदस्यों के नाम उन्हें मौखिक याद रहते हैं। इस ग्रुप का शुभारम्भ होने की कहानी नवराज पांगती बेहतर बता सकते हैं। बातचीज मे वह बताते हैं कि सन् 1995 में वह बरेली आये थे। नरेन्द्र जंगपांगी भी 1997 में बरेली आ गये। एक सायं हम लोग बैठे थे और मन में आया कुछ करें। गर्मी के दिनों में मुनस्यारी में टूर्नामेंट हुआ करता है। उसके लिये फुटवाल, पम्प सहयोग के रूप में दिये। तब तक ‘दिगड़ी’ नाम का ग्रुप नहीं था। 1999 में एक ग्रुप बनाने की सोची गई। सुरेन्द्र मर्तोलिया, भूपेन्द्र पांगती, कैप्टन भूपेन्द्र पांगती को इस ग्रुप से जोड़ा गया। यह पूरा ग्रुप आपसी तालमेल और विश्वास पर आधारित है। किसी एक की बात पूरे ग्रुप की होती है। उस दौरान डाॅ.शेरसिंह पांगती बरेली आये हुए थे और डाॅ.प्रहलाद पांगती भी बरेली में थे। सबने आपस में बैठक ग्रुप का नाम सोचा। दोस्त से दिगड़ी, दगड़ी जैसे नाम सोचते-सोचते ‘दिगड़ी प्रफाम जोहार’ बन गया। जोहार के दोस्तों
का यह ग्रुप पर्यावरण सन्देश को जोड़ते हुए अपने कार्य करने लगा। सन् 2000 के नववर्ष पर जोहार सांस्कृतिक संगठन बरेली का आयोजन करते हुए ‘उत्तराखण्ड में शौकाओं का भविष्य’ विषय पर परिचर्चा भी की गई। उस समय तक ग्रुप के सारे सदस्य लगातार मुनस्यारी जाते थे। सीमान्त क्षेत्र के दो स्कूलों में जाकर बच्चों को ड्रेस, कापी-किताब बांटने का अभियान चलाया। प्रधान, अध्यापकों के साथ मिलकर यह कार्य किया जाता था। बाद में एक स्कूल गोद लेने का निर्णय लिया गया। चूंकि दरकोट में पूरे ग्रुप का मिलना आसान था इसलिये उसे केन्द्रित करते हुए कक्षा में प्रथम बच्चे को 500, द्वितीय को 300 व तृतीय को 200 देने का प्रावधन किया। यह सारे कार्य ग्रुप के सदस्य अपने स्वयं के सहयोग से करते हैं। बाद में ग्रुप के सदस्यों को लगा हम काफी दूर-दूर हैं इसलिये स्थानीय प्रतिनिधि रखे गये ताकि तत्काल के लिये उनसे सम्पर्क कर मदद की जा सके। ग्रुप ने आपदा में फंसे लोगों को तत्काल सहायता दी है। क्वीरीजिमिया के आपदा प्रभावितों को तत्काल सहायता के रूप में चाय-चावल-माचिस इत्यादि का पैकेट ग्रुप ने बंटवाया। दिगड़ी की कोशिश रही है कि जरूरतमंद को तत्काल और अतिआवश्यक सामग्री उपलब्ध् हो। श्री नवराज पांगती बताते हैं कि 2007 में उनके पिता जी का निधन हुआ, वह गाँव गये हुए थे। नवम्बर मास का समय था। एक दिन वह बालासिंह जी की कपड़े की दुकान पर बैठे थे, वहीं पर उषापति द्विवेदी भी थे। उस बीच एक परेशानहाल को उन्होंने देखा और पंडित जी कहने पर तुरन्त एक कम्बल और रुपये उस व्यक्ति को दे दिया। कम्बल और उसके उपर रखा सौ का नोट लेने के बाद उस परेशान व्यक्ति की आँखों से आँसू छलक पड़े। तब पंडित जी ने कहा यह आदमी आपको दिल से दुआ दे रहा है। श्री पांगती कहते हैं कि समाज की ऐसी घटनाएं समझने की होती हैं और सिखाती हैं कि किस प्रकार मदद की जा सकती है। वह बताते हैं कि इसके बाद दिगड़ी ने माउण्टेन मैराथन का आयोजन किया। 2007 में इस ग्रुप के साथ पुष्कर सिंह पंचपाल भी जुड़ गये। क्षेत्र के ख्यातिप्राप्त खिलाड़ी या अन्य को सम्मान देने की बात हो अथवा ‘पठौन’ के रूप में अपने पहाड़ की यादों को एक झोले में भेंट स्वरूप देने का रिवाज हो ‘दिगड़ी’ ने किया है। दिगड़ी ग्रुप के सदस्य अपने सेवाकाल के दौरान किसी प्रकार समय निकालकर
कार्य कर रहे हैं और उनका सपना है कि सेवानिवृत्ति के बाद इस कार्य को और भी वृहद रूप से संचालित किया जाये। इसके लिये उनका प्रेम-विश्वास- सहयोग बड़ी ताकत है। सीमान्त वासियों को एक आशा और उम्मीद इस ग्रुप से हो गई है और इसे सपने को साकार करने में वह तत्पर रहेंगे।
पिघलता हिमालय 16 माचर्व 2015 के अंक से

Bahut sunder.achhi jankari.
यादें हमेशा जिन्दा रहनी चाहिये। आपका प्यार बना रहे।