दशौली गाँव भी जाते थे माइग्रेसन में

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्तवासियों की घुमन्तू जीवनचर्या में दशौली भी एक पड़ाव था। थल से आगे पुंगराउ घाटी में वृजवाल परिवार जाड़ों में आया करते थे और धरमघर में पंचपाल। उसी प्रकार पांखू के दशौली में गनघरिया परिवार भी आये, जिनकी काफी जमीन आज भी गाँव में है। इन जानकारियों के साथ अल्मोड़ा में जोहार सिंह गनघरिया से बातचीत प्रस्तुत है-
जोहार घाटी के गनघर में व्यापारी धनसिंह गनघरिया हुए। तिब्बत व्यापार सहित स्थानीय व्यापार में यह सक्रिय थे। कहते हैं इस रौबीले व्यापारी के घोड़े-बकरियां जब जाते थे तो अन्य रुक जाते थे। इनकी पत्नी मालती देवी बहुत दयालु प्रवृत्ति की थी और ग्रामीणों को सहयोग में आगे रहती। धनसिंह जी के पुत्र हुए केशर सिंह। फिर इनके तीन पुत्र हुए- त्रिलोक सिंह ;इनके पुत्र हैं- चन्दन और कन्हैया, जगत सिंह ;इनके पुत्र हैं धीरेन्द्र और जोहार सिंह सिंह ;इनके पुत्र हैं राहुल। गनघर से थाला ;बागेश्वर आकर भी गनघरिया परिवार बसे हैं। माइग्रेसन के उस दौर गनघर, तल्लाघोरपट्टा मुनस्यारी और थाला में यह परिवार रहते थे। जोहार सिंह जी बताते हैं कि दशौली में करीब ढाई सौ नाली भूमि उनके परिवार की है। इनके पिता पीएसी में थे, इनके बचपन में ही उनका निधन हो गया। ऐसे में दादी मालती देवी, माता गोपुली देवी, भाईयों के संरक्षण में इनका जीवन बीता। घोरपट्टा में रहकर बचपन की पढ़ाई के बाद पिथौरागढ़ कालेज से पढ़ाई की। बाक्सिंग व फुटबाल के बेहतरीन खिलाड़ी के अलावा यह छात्रासंघ के अध्यक्ष भी चुने गये। अल्मोड़ा आकर बीएड किया।
गनघरिया परिवार स्थित-परिस्थिति में अल्मोड़ा सहित कई जगह फैल चुका है परन्तु इनका मन आज भी अपने गनघर पर है। वाकेई अपने मूल ग्राम के विकास में योगदान के लिये जुड़ना अपनी संस्कृति से सच्चा प्यार है।

तय हुआ कुछ करो यारो और बन गया ‘दिगड़ी’ ग्रुप

 

 

डाॅ.पंकज उप्रेती

अपनी जन्मभूमि के प्रति कुछ करने की ललक हो तो बहुत कुछ किया जा सकता है। बच्चों को दिशा दी जा सकती है और बेसहाराओं को सहारा। जोहार-मुन्सयार का ‘दिगड़ी’ग्रुप भी कुछ करने
की ललक के साथ बना है। इस चर्चित ग्रुप का उद्देश्य भी अपनी जन्मभूमि और अपनों के लिये कुछ करना है।
इसके बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। तय हुआ कुछ करो यारो और बन गया दिगड़ी ग्रुप। दिगड़ी किस प्रकार से अपने कार्यों को अंजाम देता है इससे जोहारवासी भली भांति परिचित हैं। इसके सदस्यों के नाम उन्हें मौखिक याद रहते हैं। इस ग्रुप का शुभारम्भ होने की कहानी नवराज पांगती बेहतर बता सकते हैं। बातचीज मे वह बताते हैं कि सन् 1995 में वह बरेली आये थे। नरेन्द्र जंगपांगी भी 1997 में बरेली आ गये। एक सायं हम लोग बैठे थे और मन में आया कुछ करें। गर्मी के दिनों में मुनस्यारी में टूर्नामेंट हुआ करता है। उसके लिये फुटवाल, पम्प सहयोग के रूप में दिये। तब तक ‘दिगड़ी’ नाम का ग्रुप नहीं था। 1999 में एक ग्रुप बनाने की सोची गई। सुरेन्द्र मर्तोलिया, भूपेन्द्र पांगती, कैप्टन भूपेन्द्र पांगती को इस ग्रुप से जोड़ा गया। यह पूरा ग्रुप आपसी तालमेल और विश्वास पर आधारित है। किसी एक की बात पूरे ग्रुप की होती है। उस दौरान डाॅ.शेरसिंह पांगती बरेली आये हुए थे और डाॅ.प्रहलाद पांगती भी बरेली में थे। सबने आपस में बैठक ग्रुप का नाम सोचा। दोस्त से दिगड़ी, दगड़ी जैसे नाम सोचते-सोचते ‘दिगड़ी प्रफाम जोहार’ बन गया। जोहार के दोस्तों
का यह ग्रुप पर्यावरण सन्देश को जोड़ते हुए अपने कार्य करने लगा। सन् 2000 के नववर्ष पर जोहार सांस्कृतिक संगठन बरेली का आयोजन करते हुए ‘उत्तराखण्ड में शौकाओं का भविष्य’ विषय पर परिचर्चा भी की गई। उस समय तक ग्रुप के सारे सदस्य लगातार मुनस्यारी जाते थे। सीमान्त क्षेत्र के दो स्कूलों में जाकर बच्चों को ड्रेस, कापी-किताब बांटने का अभियान चलाया। प्रधान, अध्यापकों के साथ मिलकर यह कार्य किया जाता था। बाद में एक स्कूल गोद लेने का निर्णय लिया गया। चूंकि दरकोट में पूरे ग्रुप का मिलना आसान था इसलिये उसे केन्द्रित करते हुए कक्षा में प्रथम बच्चे को 500, द्वितीय को 300 व तृतीय को 200 देने का प्रावधन किया। यह सारे कार्य ग्रुप के सदस्य अपने स्वयं के सहयोग से करते हैं। बाद में ग्रुप के सदस्यों को लगा हम काफी दूर-दूर हैं इसलिये स्थानीय प्रतिनिधि रखे गये ताकि तत्काल के लिये उनसे सम्पर्क कर मदद की जा सके। ग्रुप ने आपदा में फंसे लोगों को तत्काल सहायता दी है। क्वीरीजिमिया के आपदा प्रभावितों को तत्काल सहायता के रूप में चाय-चावल-माचिस इत्यादि का पैकेट ग्रुप ने बंटवाया। दिगड़ी की कोशिश रही है कि जरूरतमंद को तत्काल और अतिआवश्यक सामग्री उपलब्ध् हो। श्री नवराज पांगती बताते हैं कि 2007 में उनके पिता जी का निधन हुआ, वह गाँव गये हुए थे। नवम्बर मास का समय था। एक दिन वह बालासिंह जी की कपड़े की दुकान पर बैठे थे, वहीं पर उषापति  द्विवेदी भी थे। उस बीच एक परेशानहाल को उन्होंने देखा और पंडित जी कहने पर तुरन्त एक कम्बल और रुपये उस व्यक्ति को दे दिया। कम्बल और उसके उपर रखा सौ का नोट लेने के बाद उस परेशान व्यक्ति की आँखों से आँसू छलक पड़े। तब पंडित जी ने कहा यह आदमी आपको दिल से दुआ दे रहा है। श्री पांगती कहते हैं कि समाज की ऐसी घटनाएं समझने की होती हैं और सिखाती हैं कि किस प्रकार मदद की जा सकती है। वह बताते हैं कि इसके बाद दिगड़ी ने माउण्टेन मैराथन का आयोजन किया। 2007 में इस ग्रुप के साथ पुष्कर सिंह पंचपाल भी जुड़ गये। क्षेत्र के ख्यातिप्राप्त खिलाड़ी या अन्य को सम्मान देने की बात हो अथवा ‘पठौन’ के रूप में अपने पहाड़ की यादों को एक झोले में भेंट स्वरूप देने का रिवाज हो ‘दिगड़ी’ ने किया है। दिगड़ी ग्रुप के सदस्य अपने सेवाकाल के दौरान किसी प्रकार समय निकालकर
कार्य कर रहे हैं और उनका सपना है कि सेवानिवृत्ति के बाद इस कार्य को और भी वृहद रूप से संचालित किया जाये। इसके लिये उनका प्रेम-विश्वास- सहयोग बड़ी ताकत है। सीमान्त वासियों को एक आशा और उम्मीद इस ग्रुप से हो गई है और इसे सपने को साकार करने में वह तत्पर रहेंगे।

पिघलता हिमालय 16 माचर्व 2015 के अंक से

बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण स्थान का नाम पड़ा टिमटिया

पि.हि.प्रतिनिधि 
थल-मुनस्यारी मार्ग पर स्थित तेजम का टिमटिया क्षेत्र माइग्रेसन काल में धर्मशक्तूओं का पड़ाव हुआ करता था। मिलम, दरकोट और नंगर यानी गरम घाटी में तीन-तीन माह करीब यह लोग रहा करते थे।
केदार सिंह धर्मशक्तू बातचीत करते हुए बताते हैं कि मिलम में मूल रूप से रावत, पांगती, सयाना हुए जिन्हें मिल्मवाल कहते हैं। धर्मशक्तू में से ही सयाने को सयाना कहा गया। तिब्बती में इन्हें च्यूंवायारता कहते हैं। तिब्बत व्यापार के समय से जब व्यापारियों का आना-जाना होता था तब मौसम के अनुसार वह अगल-अलग स्थानों पर रहते थे। नंगर यानी की गरम घाटी के रूप के रूप में नाचनी का यह क्षेत्र भी चुना गया होगा। बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण इस स्थान का नाम टिमटिया पड़ गया। पहले से इसी प्रकार से कई नाम पड़ गये। भैंसखाल में तालाब सा है जिसमें भैंसें जाती थीं, नाम पड़ा भैंसखाल। बुजुर्गवार के नाम पर स्थान का नाम पड़ा- जब्बूखरक। श्री धर्मशक्तू बताते हैं- तेजम तो कोट रहा है, जहाँ रावत लोगों के हाथ में न्याय व्यवस्था थी।
अपने बुजुर्गों से कहे-सुने के अनुसार श्री केदार सिंह जी बताते हैं कि किसी समय टिमटिया में आसा जसपाल आये थे। इन्हीं के बंशज विभिन्न राठों के नाम से जाने जाते हैं। बाद में कुछ लोग माले चले गये और कुछ टिमटिया रह गये। टिमटिया रहने वालों को टिमटिया राठ कहने लगे। पाँच भाईयों का एक राठ हुआ जो शामा के पास ढोलढूंगा गये थे। माले राठों में गिरधर सिंह धर्मशक्तू के परिवार जन आदि हैं। टिमटिया राठों में डाॅ.नारायण सिंह धर्मशक्तू परिवार जन आदि हैं। पाँच भाई राठों में बलवन्त सिंह धर्मशक्तू परिजन आदि हैं।
श्री केदार सिंह बताते हैं कि किन्हीं कारणों से यत्र-तत्र जाकर रहने लगे राठों की नई पीढ़ी भी नौकरी-पेशा के सिलसिले में दूर-दूर तक निकल चुकी है किन्तु अवसर विशेष पर सभी मिलते जुलते हैं। आज भी टिमटिया में अपनी यादों के साथ बने हुए श्री धर्मशक्तू चाहते हैं कि उनके परम्परागत हुनर को नई पीढ़ी बचाये रखे।

पिघलता हिमालय 7 दिसम्बर 2015 के अंक से

हरि प्रदर्शनी की तैयारी

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि

मुनस्यारी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरि सिंह जंगपांगी की याद में मल्ला दुम्मर में प्रतिवर्ष होने वाली हरि प्रदर्शनी इस बार ठीक दीपावली के मौके पर होनी है। इसके लिये हरि स्मारक समिति ने तैयारी कर ली है। आयोजन को लेकर ग्रामीणों में उत्साह है। ऐसे में दीपावली के पटाखे फूटेंगे और प्रदर्शनी में ग्रामीण थिरकेंगे।
उल्लेखनीय है कि आजादी के बाद से मल्ला दुम्मर में हरिसिंह ज्यू की याद में होने वाली इस प्रदर्शनी पर जोहार घाटी के समस्त स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण किया जाता है। साथ ही ग्रामीण प्रतिभाओं को खेलकूद, सांस्कृतिक मंच के माध्यम से अवसर मिलता है। घरेलू एवं कुटीर उद्योग प्रदर्शनी ग्रामीणों को उत्साहित करने वाली है। जिसमें घरेलू उत्पाद, कृषि, पुष्प, उनी वस्त्र, दन-पंखी कालीन, जड़ी-बूटी की प्रदर्शनी लगाई जाती है। जानकारों द्वारा इनका निरीक्षण कर विजेताओं को पुरस्कृत किया जाता है। मुख्य रूप से जंगपांगी बन्धुओं द्वारा इस आयोजन को मनाया जाता है परन्तु क्षेत्र के सभी लोगों को इसमें सादर निमंत्राण होता है और सभी के सहयोग से इस प्रदर्शनी को विस्तार दिया जाता है। आजादी के बाद से निरन्तर बिना किसी सरकारी सहायता के इस प्रदर्शनी को करवाना साहस की बात है। अपने बुजुर्गों, स्वतंत्रा सेनानियों का स्मरण के साथ युवा प्रतिभाओं को सम्मान और आपसी भाईचारे के लिहाज से यह अनुकरणीय उदाहरण भी है। समय के साथ कई प्रकार के उत्सव-महोत्सव शहरी ढब में रंगे आयोजन हो रहे हैं लेकिन अपने लोक की खुशबू के साथ होने वाली हरि प्रदर्शनी का सानी नहीं। जिसमें मल्ला दुम्मर, तल्ला दुम्मर, दरकोट, दरांती, रांथी, जलद, तिकसैन से लेकर दूर-दूर तक के लोग पहुंचते हैं। महिला मंगल दलों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देखने लायक होती हैं। यह प्रस्तुतियां उन कलाकारों से ज्यादा उम्दा होती हैं जिन्हें स्टार नाइट का ठेका शहरों में दिया जाता है या जो ग्लैमर के साथ शो करने के आदी हो चुके हैं।
हरि प्रदर्शनी को लेकर समिति के अध्यक्ष ललित सिंह जंगपांगी, गंगा सिंह जंगपांगी, किशन सिंह जंगपांगी, लोकबहादुर सिंह जंगपांगी, नरेन्द्र सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह पांगती, प्रधान पंकज बृजवाल, देवेन्द्र सिंह, हरीश धपवाल, मनोज धर्मशक्तू, गोकर्ण सिंह मर्तोलिया, चन्द्र सिंह लस्पाल, मंगल सिंह मर्तोलिया, मनोज जंगपांगी, राजेन्द्र सिंह मर्तोलिया, शंकरसिंह धर्मशक्तू, लक्ष्मण राम स्थानीय स्तर पर जुट हुए हैं।

बसपाल बूढ़ा के वंशज रहते हैं मगरबला में, यहाँ होती है खुदा पूजा

पि.हि.प्रतिनिधि
गाँवों की सैर में आपको आज थल- मुनस्यारी रोड स्थित ‘बला’ ग्राम के बारे में बताते हैं। ग्राम पो. मगरबला में मर्तोली के मर्तोलिया रहते हैं। सीमान्त के मर्तोली से कई ग्रामों में जाकर लोग बसे जिसमें सुरिंग, आमथल, चुड़ियाधर, गुलेर, कारीखेत, मल्लादेश इत्यादि। इसी प्रकार मगरबला में भी एक राठ बस गया। पुराने जमाने में व्यापार के साथ घुमन्तु जीवन बसपाल बूढ़ा को यहाँ ले आया। बला ग्राम में रहने वाले बसपाल बूढ़ा के बंशज हैं। यह वह ग्राम है जहाँ खुदा पूजा का रिवाज है। गोरखा राज में अला-बला से बचाव के लिये की जाने वाली इस विशेष पूजा को अभी तक किया जाता है। मर्तोलियाओं के अलावा धमी, राणा, वृथवाल परिवार ग्राम में हैं। गाँव अधिकांश लोग बाहर हैं, वर्तमान में 35 परिवार यहाँ रह रहे हैं।
बला के पास से ही नामिक को जाने वाला पैदल रास्ता है। 27 किमी के इस मार्ग का प्रयोग पशुचारक, ग्रामीण और विदेशी पर्यटक करते हैं। नामिक में रहने वाले जैम्यिाल परिवार इस रुट से काफी आवागमन करते रहे हैं क्योंकि उनके रिश्ते हरकोट, बोना, तूनी, क्वीरिजिमिया आदि ग्रामों में होने से यही पैदल रास्ता निकट रहा है। बला से करीब 3 किमी दूरी पर विर्थी झरना है। ग्राम के बुजुर्ग दुर्गा सिंह मर्तोलिया उन उद्यमियों में से हैं जो आज भी मिलम तक जाते हैं, जिस कारण इन्हें पुराने और नये इतिहास की खासी जानकारी है। पिघलता हिमालय में इनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जगह सिंह मर्तोलिया अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि एक बार नामिक जाते समय उन्होंने गाय के गोबर में धूप/अगरबत्ती की सी खुशबू लगी। एक टुकड़ा जेब में डाल लिया, वह सुगन्ध् कई दिनों तक महकती रही। वह कहते हैं कि यह इलाका जड़ी-बूटियों का भण्डार है। जब गाय-बकरियां जड़ी-बूटी खायेंगी तो वह पौष्टिक दूध् देंगे। विदेशी छात्रों को शोध् के लिये भ्रमण पर खूब देखा है। एक बार एक दल मौसम में फंस कर उनके वहाँ रुका। वह लोग पेड़ पौधें जड़ी-बूटियों के बारे में जानकारी जुटा रहे थे। वनस्पति विज्ञान के छात्र जिस तल्लीनता के साथ जुटे थे, वैसा यहाँ नहीं हो रहा है। उपेक्षा के चलते सीमान्त को नहीं संवारा जा सका है। आज भी विदेशियों को इस इलाके के बारे में अच्छी जानकारी है क्योंकि वह पर्यटन के नाम पर केवल कूड़ा फैलाने नहीं बल्कि नामिक ग्लेश्यिर सहित अन्य सुरम्य ग्लेश्यिर व स्थानों का भ्रमण व अध्ययन करते हैं। ऐसे स्थानों को विकसित करने की दिशा में कार्य होने चाहिये।
ग्राम के रतन सिंह मर्तोलिया प्राइमरी स्कूल के बारे में बताते हैं कि व्यापार के उन दिनों में स्कूल भी माइग्रेसन के हिसाब से चलता था। मर्तोली के बाद सुरिंग फिर बला में। कई बार पढ़ाने वाले गुरु भी अलग-अलग होते थे। समय के साथ जो जहाँ रुके वहीं बस गये। अब माइग्रेसन का यह स्कूल सरकारी प्राइमरी पाठशाला के रूप में है। वह कहते हैं कि पहले समय के अनपढ़ भी ज्यादा सूझ वाले होते थे। नई पीढ़ी तो जानती भी नहीं है कि अद्ध-पव्वा-डेढ़ो- ढाम। व्यापारी लाखों का हिसाब मौखिक ही कर दिया करते थे। अब जोड़-घटाने के लिये मशीन का सहारा ले रहे हैं।
वाकेई कितना अच्छा होता हमारी शासन-प्रशासन की मशीन ग्रामों की भावनाओं को समझते हुए इनके विकास की ओर ध्यान देती। प्रत्येक ग्राम के बसने के पीछे कोरे किस्से-कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है।

स्व. दुर्गा सिंह
पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया का जन्म बला में ही हुआ था। आज जिस स्थान पर मन्दिर स्थापित है, उस स्थान उमेंदसिंह-दुर्गासिंह-मंगल सिंह इसी परिवार द्वारा ग्राम के लिये दिया गया।

पिघलता हिमालय 27 जून 2016 अंक से

‘तरकेब’ लगाकर होती थी हरि प्रदर्शनी

गोविन्द सिंह जंगपांगी

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्त के महान स्वतंत्रता सेनानी हरिसिंह जंगपांगी की याद में प्रतिवर्ष होने वाली प्रदर्शनी इस बार भी नवम्बर में होगी। इस प्रदर्शनी को आजादी के बाद से लगातार मल्लादुम्मर मुनस्यारी में मनाया जा रहा है। इसे बनाये रखने में क्षेत्रावासियों की श्रद्धा और लगन है। प्रदर्शनी के शुरुआती दिनों में जब कोई साधन नहीं थे ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर लोग जुटते थे। उन पुरानी यादों को बताने के लिये 69 वर्षीय गोविन्द सिंह जंगपांगी जी से बातचीत के बाद यह प्रस्तुति है-
जंगपांगियों का गाँव बुर्फू में हुआ। बूबू पद्मसिंह के पुत्रा हुए मान सिंह, पान सिंह और विजय सिंह। इन्हीं मान सिंह के पुत्र हैं- गोविन्द सिंह और मंगल सिंह। विजय सिंह के पुत्र हैं- शेरसिंह और माधे सिंह। पिता मानसिंह माता चन्द्रा जंगपांगी के घर बुर्फु में जन्मे गोविन्द सिंह ने जीवन के कष्टकर दिनों को बचपन में गुजारा है। छोटी उम्र में पिता के निधन के बाद मामा जी संरक्षण में शुरुआती शिक्षा गढ़वाल में हासिल की। लौटकर मुनस्यारी में फिर अल्मोड़ा से शिक्षा ली। 1971 में आर्मी में भर्ती होने के बाद आठ साल नौकरी की और ओंरिएटल इंश्योरेंशन में सेवा के लिये आ गये। यहीं से मण्डलीय प्रबन्धक पद से 2009 में सेवानिवृत्त हुए।
जंगपांगी परिवार भी सीमान्त के अन्य परिवारों की भांति माइग्रेशन में एक स्थान से दूसरे स्थान जाते रहे हैं। इनका परिवार बुर्फू, मल्लादुम्मर और भकुंडा;नाचनी के पास में क्रमवार रहता था। अपनी लगन और परिश्रम से मुकाम हासिल करने वाले गोविन्द सिंह जी का विवाह जोहार की महान विभूति रामसिंह पांगती की नातिनी तारा से हुआ। श्रीमती तारा जंगपांगी अध्यापिका होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में शुरु से ही बेहद अभिरुचि रखती हैं। सेवानिवृत्ति के बाद यह दम्पत्ति जोहार नगर, हल्द्वानी में निवास कर रहा है और दुम्मद की हरिप्रदर्शनी सहित सभी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय है
अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए गोविन्द सिंह जी बताते हैं कि साधन नहीं के बराबर थे लेकिन हरि प्रदर्शनी का उत्साह लोगों में बहुत था। इलाके की एकमात्र अलग तरह की इस प्रदर्शनी में लोग ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर जुट जाते थे। तब लगभग सभी परिवारों के पास तरकेब हुआ करते थे, क्योंकि मल्लाजोहार से लेकर गर्म घाटी तक यात्रा करते समय इनकी आवश्यकता होती है। पुराने लोगों में प्रेम सिंह जंगपांगी, नरसिंह जंगपांगी का नाम उल्लेखनीय है। सक्रियता की इस परम्परा को महेन्द्र सिंह ‘महन्त’ जंगपांगी ने भी निभाया। पुराने समय में नेत्र सिंह ल्वाल सांस्कृतिक प्रस्तुति और बच्चों को सिखाने के लिये आते थे। बम्मई में रहकर शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ले रहे नेत्रसिंह जी प्रत्येक वर्ष इस मौके पर दुम्मर आते थे। उनके भाई प्रताप सिंह भी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में साथ देते। प्रदर्शनी के लिये घरेलू उत्पादों का बहुत सामान आता रहा है। श्री जंगपांगी चाहते हैं कि परम्परा बन चुकी यह प्रदर्शनी हमेशा चलती रहे और नई पीढ़ियां इससे सीखें।

झुप्पू में सामान लादकर तिब्बत से गरुड़, सोमेश्वर, दूनागिरी जाते थे

गंगा सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
तिब्बत व्यापार के दौर की कई यादों के साथ कई लोग हमारे समाज में हैं। वह व्यापार चाहे सीमा पार जाकर तिब्बत होता था या आन्तरिक शहर-कस्बे-गाँव में, उनकी स्मृतियाँ हमेशा मधुर रहेंगी। ऐसी ही मधुर स्मृतियों को सजो कर रखा है ध्रमघर में रहने वाले गंगा सिंह पांगती ने।

1951 में दरकोट, मुनस्यारी में पिता रतनसिंह माता रूमा देवी के घर जन्मे गंगासिंह का बचपन बहुत ही संघर्षमय रहा है। इनकी दो बहिनें- कोकिला देवी ;पंचपाल और प्रेमा;मर्तोलिया हैं। पिता के निधन के बाद 5-6 साल की उम्र में बालक गंगा अपने नाना दलीप सिंह पंचपाल;सयाना के घर सिमगड़ी, नाकुरी पट्टी आ गये। पिथौरागढ़-बागेश्वर जनपदों की सीमा क्षेत्रा ध्रमघर नामक स्थान में इनका परिवार रहता है।

गंगासिंह बताते हैं कि इनके नाना जी चार भाई थे- दलीप सिंह, उत्तम सिंह। व्यापार के दिनों में यह लोग अपने जानवरों सहित इधर-उधर जाते थे। झुप्पू में समान लादकर दूर तक इनकी यात्राएं होती थीं। झुप्पू याक से छोटे नश्ल का जानवर है। झुप्पू भी दो तरह के होते हैं- एक तो छोटे कद और छोटे सींग वाला और दूसरा बड़े शरीर वाला। नाना जी लोग सिमगड़ी में रहते हुए ही जोहार के पांछू और तिब्बत तक जाते। जब वे लोग नमक इत्यादि सामान लेकर वापस आते थे तब बचपन में कमेड़ीदेवी, गरुड़, बिन्ता, सोमेश्वर, द्वाराहाट जाने का मौका मिला। नाना जी के साथ दूनागिरी, पाण्डुखोली ;द्वाराहाट भी गया। सोमेश्वर, बिन्ता से वापसी में चावल लाते थे। वस्तु विनिमय में नमक इत्यादि सामान के बदले चावल मिलता था। अपने बचपन को याद करते हुए पांगती जी बताते हैं कि जिला पंचायत के अन्तर्गत माइग्रेशन का प्राइमरी स्कूल पांछू नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम सिमगड़ी स्कूल हो गया और माइग्रेशन व्यवस्था नहीं रही किन्तु उन्होंने पुराने रिकार्ड खुलवाये और इस आवाज उठाई। बाद में एक और प्राइमरी स्कूल शौक्यूड़ा नाम से खुल गया। बचपन की पढ़ाई के बाद गंगासिंह मुनस्यारी पढ़ने चले गये। चाचा सत्यवीर सिंह पांगती सहित कई लोगों ने आगे पढ़ाई के लिये सहयोग किया लेकिन कक्षा आठ की पढ़ाई करते हुए ही गंगा सिंह सीआरपीएफ में भर्ती हो गये। 1980 में हरतोला के झुब सिंह पंचपाल ;मल्ला राठ की पुत्री से इनका विवाह हुआ। अपनी स्थिति-परिस्थिति से घिरे गंगा सिंह का संघर्ष चलता रहा। नौकरी के दौरान ही अस्वस्थ्य माता जी के इलाज के लिये वह अपने अधिकारियों से तक भिड़ जाते थे। चूंकि उनकी हर आवाज उनके अन्तःकरण की थी, सो वह सपफल ही रहे। सेवानिवृत्त होने के बाद गंगासिंह जी सिमगड़ी के ग्राम प्रधान बन गये। जनहित के मुद्दों को उठाने के साथ ही एक पफौजी अनुशासन के लिये चर्चित पांगती जी को पंचायतीराज संगठन का ब्लाक अध्यक्ष बना दिया गया। संगठन के जिला, मण्डल अध्यक्ष के बाद अब वह प्रान्तीय अध्यक्ष हैं।

अपने बचपन की यादों में लौटते हुए वह बताते हैं कि उनका मूल घर तो मिलम ही है। पिता जी दरकोट आते समय बोगड्यार से टांटरू, बाख ले आते थे। टांटरू की सब्जी और बाख का आचार खूब याद आता है। संगठन की भावना के साथ सबको जोड़ने वाले श्री पांगती कहते हैं- ‘विषम परिस्थितियों में भी खुश रहना आता है पर्वतवासियों को।

पिघलता हिमालय 15 अगस्त 2016 से

सीमान्त ग्रामों का विकास सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम से सम्भव

वाई.एस.पांगती

भारत सरकार ने सीमा क्षेत्र के विकास के लिये बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम चलाया है। सरकार की गाईड लाइन में स्पष्ट किया गया है कि सीमा क्षेत्रा में रहने वाले लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ग्रामवार प्राथमिक शिक्षा, चिकित्सा केन्द्र, सामुदायिक केन्द्र, सड़क, बिजली, सम्पर्क मार्ग, नालियां, पीने का पानी आदि व रोजगार के साध्न उपलब्ध् कराने के लिये प्रस्ताव मांगकर उनको अन्तिम रूप देने के लिये खण्ड विकास कार्यालय के माध्यम से सम्बन्ध्ति विभागों को प्रशिक्षण करने के लिये भेजा जायेगा। यदि विभाग में गाँव की योजना पूर्व से प्लान में है तो सीध् विभाग द्वारा कार्यक्रम को संचालित करने के लिये प्लान में वजट पास करेगा और जो योजना प्लान में नहीं है उसको बी.ए.डी.पी. के माध्यम से प्रस्तावित करेगा।

इस प्रकार की योजनाओं को विकास खण्ड स्तरीय कमेटी बजट के अनुसार अनुमोदन हेतु जिला विकास कार्यालय के माध्यम से शासन को भेजेगा। शासन भारत सरकार मंत्रालय से अनुमोदन प्राप्त कर ग्रामों में योजनाओं का क्रियान्वयन करेगा। इस प्रकार की कमेटी के अध्यक्ष उपजिलाध्किारी, सचिव खण्ड विकास अध्किारी और सदस्य क्षेत्रा प्रमुख के अलावा विभागों के अध्किारीगण व चयनित ग्राम प्रधन व ग्राम पंचायत के अध्किारी सदस्य नामित हैं जो प्रत्येक त्रौमास में समीक्षा/बैठक करेंगे।

हमें यह भी जान लेना चाहिये कि केन्द्रीय गृह मंत्राी भारत सरकार द्वारा अभी हाल में ही जनपदवार बी.ए.डी.पी. की समीक्षा बैठक की गई। उनके द्वारा कहा गया कि सीमान्त में रहने वाले लोग देश के लिये सामरिक लिहाज से कापफी अहम हैं और सुरक्षा की भी अहम कड़ी हैं। जिसके कारण इन इलाकों के विकास को सरकार सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। सरकार द्वारा देश के सीमावर्ती ग्रामों को माॅडल के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया गया है और भविष्य में बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम की आनलाइन मानीटरिंग  के साथ ही गाँवों के लिये चयनित योजनाओं को सीध्े आॅनलाइन सिस्टम में डालकर अनुमोदन, राज्य को बजट की अवमुक्त किया जायेगा।

पूर्व अनुभव के आधर पर बी.ए.डी.पी. योजनाओं के बजट का बन्दरबांट किया गया, जिसके कारण ग्रामों का समुचित विकास नहीं हो पाया है। जो चिन्ता का विषय है। जोहार के दुर्गम 14 ग्राम, धरचूला के दुर्गम ग्राम, चमोली, उत्तरकाशी के सीमान्त ग्रामों की टोह लेते हुए जागरुक हो जाना चाहिये। मल्ला जोहार में तो जितनी सुविध मिल पाई है उसका श्रेय मल्ला जोहार विकास समिति को जाता है, जो जागरुक रहकर कार्य कर रही है। यह जागरुकता प्रत्येक नागरिक में होनी चाहिये।

अपेक्षा है सभी लोग जागरुक रहकर विकास के लिये भागीदार होंगे। जिला विकास कार्यालय से सम्पर्क कर पूर्ण जानकारी लेकर बी.ए.डी.पी. के अन्तर्गत आने वाले गाँवों का समुचित विकास में योगदान करेंगे।

पिघलता हिमालय 30 जुलाई 2018 के अंक से