बायांगढ़ को बौंगाड़ कहने लगे, कभी चन्द राजाओं का कोट था

पि0हि0प्रतिनिधि
थल। पुंगराउ घाटी का खूबसूरत गाँव है- बौंगाड़। पांखू कस्बे से आधा किमी दूरी पर स्थित इस ग्राम पर कभी बायांगढ़ कहा जाता था। इलाके के बड़े-बुजुुर्ग बताते हैं कि चन्द राजाओं के समय में यहाँ कोट था। आज भी एक टीले के उपर कोट के निशान हैं और मान्यता है कि पुराने समय में अपने विरोधियों को साधने के लिये राजा टीले से हमला कर देते थे। गाँव में कार्की परिवारों की बहुलता है। कई परिवार बाहर बस चुके हैं लेकिन ग्राम की परम्पराओं को शानदार तरीके से बनाया हुआ है।
सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती हरिप्रिया कार्की बताती हैं कि उन्होंने भी अपने बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि उनके पूर्वज नेपाल से यहाँ आये थे। चार भाई बौंगाड़, लोहाथल, दंतौला, चैंसला में रहने लगे। वैसे भी इलाके में शुरु से ही कहा जाता है- ‘‘चार राठ पाठक, चार राठ कार्की।’’
पहले इस ग्राम में प्राचीन ताम्रपत्र प्रधान त्रिलोक सिंह जी के वहाँ पाया जाता था। वर्तमान में व अन्यत्र है। बौंगाड़ की आवादी करीब चार सौ है। प्रधनमंमंत्री सड़क से जुड़े गाँव में शौचालय, कूड़ेदान, पेयजल की उचित व्यवस्था है। इस गाँव के 33 परिवार हल्द्वानी बस चुके हैं। फौज के अलावा अन्य क्षेत्रों में यहाँ के लोग हैं।
इस ग्राम पंचायत में 6 ग्राम आते हैं जिसमें खंडार, नायल, उप्रेतीखोला, बौंगाड़, बोकलकटिया, बंतोला। ग्रामपंचायत से लगा हुआ फल्याटी, तोराथल ग्राम है जहाँ से पैदल रास्ते होते हुए चकौड़ी घूमा जा सकता है। पांखू क्षेत्र के कई ग्रामों में जोहार के वृजवाल परिवार रहते हैं। तिब्बत व्यापार के दिनों में पैदल यात्रा के समय कई परिवार यत्र-तत्र बस थे जो यहाँ भी हैं। पास के इलाके ध्ररमघर में भी जोहार के काफी परिवार हैं। माइग्रेशन के दौरान स्कूल भी यहाँ चलता था, जो वर्तमान की स्थितियों में सरकारी स्कूल के रूप में जारी है।
बौगाड़ ग्राम से थल के लिये पुराना रास्ता भी है, जिसमें अब आवागमन नहीं होता है। पहले ग्रामवासी नियमित रूप से श्रमदान कर मार्ग की सफाई और रख-रखाव करते थे। सर्वोदय संस्था भी यहाँ बहुत सक्रिय रही है। राध बहिन, गोपाल सिंह सहित तमाम लोग बराबर ग्राम विकास के लिये कार्य करते रहे हैं। वर्तमान में युवा प्रधन द्वारा भी लगातार कार्यों किये जा रहे हैं। धन- धन्य से भरपूर इस ग्राम की उन्नति होती रहे और यह दूसरों के लिये भी प्रेरणा बने, ऐसी कामना है।

कार्की समाज के इतिहास व वंशावली पर पुस्तक
बौगाड़ निवासी लोकमान सिंह कार्की ने कार्की लोगों के इतिहास पर पुस्तक लिखी है। चम्पावत जिले में गाँव के नाम तक खर्ककार्की, मंचकार्की सुनाई देते हैं। तमाम रोचक जानकारियों के साथ बनी पुस्तक में 1970 से कार्की उपजाति का इतिहास इसमें दिया गया है। साथ ही इनकी बंशावली। बताया है कि कार्की कोंकण रिसायत के राजा थे। 12वीं शताब्दी में कार्की लोग नेपाल चले गए। कुमाउॅ मंे लोगों के आदि पुरुष को वह संग्राम सिंह बताते हैं। संग्राम सिंह नेपाल में गोरखा शासन से तंग आकर चम्पावत और लोहाघाट के मध्य कन्यूरी गाँव में रहने लगे। संग्राम सिंह के दो विवाह थे। उनके वंशवृक्ष के लोग बौगाड़, चैसाला, लोहाथल, दंतोला, बैराजुबर, मसूरिया, थर्प, चनकाना, भूलधरा, जजोली, ससिखेत, मुवानी, गणाई, रानीखेत, मनान, गगास समेत कई गाँव में कार्की रहते हैं। कार्की कुमाउँ के राजपूत हैं।
पुस्तक का विगत दिवस जिलाधिकारी पिथौरागढ़ डाॅ. रंजीत सिन्हा ने विमोचन किया। लोकमान सिंह का कहना है कि उक्त पुस्तक नई पीढ़ी को उनकी जड़ों को जानने में मददगार होगी। पुस्तक सामग्री पहले एकत्र हो चुकी थी किन्तु धनाभाव के कारण यह देरी से बन पाई।

पिघलता हिमालय 27 मार्च 2017 अंक से

यज्ञ स्थली था जगथली गाँव

पि.हि.प्रतिनिधि
गाँव की ओर स्तम्भ में आज हम आपको ग्राम जगथली का परिचय करवा रहे हैं। पहाड़ के खाली होते गाँवों की तरह इसकी भी पीड़ा है। महानगर में बस चुके कुछ परिवार अपनी मातृभूमि के लिये सजग हैं किन्तु अधिकांश पलायन का दर्द दिखाई देता है। थल से 14 किमी और बेरीनाग से 15 किमी दूरी पर स्थित है गाँव जगथली। इस ग्रामसभा की बात करें तो लगभग ढाई हजार की आबादी है। गाँव में प्राइमरी और इण्टर कालेज है। वर्तमान में सड़क बनने से यहाँ रहने वालों में उम्मीद जगी है।
जगथली के बारे में कहा जाता है कि यह यज्ञ स्थली हुआ करती थी और दूर-दूर से लोग एकत्रित होकर यज्ञ में भाग लेते थे। यहाँ प्राचीन शिवालय है, बाद में जिसका जीर्णेद्धार कर दिया गया है। मन्दिर के पास वाले खेत को ‘कुन’ ;कोना कहा जाता है और पास में ही ‘ज्यूनारपाट’। कहते हैं ज्योनार बनाकर कुन उतारने के के कारण इनका नाम रखा गया। यह भी मान्यता है कि मन्दिर के पास खेतों के बीचोंबीच विशालकाय पत्थर से शंखध्वनि होती थी, जिसे आज भी ‘बिलाड़ीढंुग’ कहा जाता है।
जगथली में चन्दोला परिवार सहित कई जातियां रहती हैं। बताते हैं चन्दोला लोग गढ़वाल से आकर यहाँ बस गये थे। इन परिवारों में अधिकांश अब शहरों में यत्रा-तत्रा रहने लगे हैं। गाँव के 53 वर्षीय केवलानन्द चन्दोला बताते हैं कि काण्डे में रहने वाले पन्त, लालुका के बिष्ट और उनके बुजुर्ग एकसाथ इस स्थान पर आये थे। जगथली ग्राम सभा में गराउॅ के शाह, उडियारी के महरा, कालिटी के कार्की, किरौली के पन्त, काण्डे के पन्तों की जमीनें हैं। कभी सभी के पूर्वज यज्ञ के लिये यहाँ आते रहे होंगे।
जगथली के सूनेपन को चीरते हुए दुलखोला-सकनोली-गराउॅ तक सड़क बन रही है जो देवीनगर तक मिलेगी, इससे आवत-जावत में राहत मिलेगी। उम्मीद की जानी चाहिये कि बन्द पड़े कई घरों में फिर से चहल-पहल होगी। ग्राम में 12 प्रकार की जातियों का निवास रहा है। जिसमें से खौला गाँव के जोशी परिवार अब हल्द्वानी के पास बिन्दुखत्ता बस चुका है। महरौड़ी का बसखेती परिवार था, जिसमें एकमात्र बुजुर्ग के निधन के बाद कोई नहीं बचा है। जगथली के पहले पूर्वज के रूप में घंघोला जाति यहाँ है। चन्दोला, भट्ट, नौर्की;जोशी लिखने लगे हैंद्ध, कार्की, मेहता, पन्त, बोरा, दुनखोला के जोशी, बिष्ट, मनराल, लोहार, शिल्पकार सभी हिलमिल इसे संवारते रहे हैं। आशा है बनने वाली सड़क रौनक लौटायेगी।

पिघलता हिमालय 26 सितम्बर 2016 अंक से

बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण स्थान का नाम पड़ा टिमटिया

पि.हि.प्रतिनिधि 
थल-मुनस्यारी मार्ग पर स्थित तेजम का टिमटिया क्षेत्र माइग्रेसन काल में धर्मशक्तूओं का पड़ाव हुआ करता था। मिलम, दरकोट और नंगर यानी गरम घाटी में तीन-तीन माह करीब यह लोग रहा करते थे।
केदार सिंह धर्मशक्तू बातचीत करते हुए बताते हैं कि मिलम में मूल रूप से रावत, पांगती, सयाना हुए जिन्हें मिल्मवाल कहते हैं। धर्मशक्तू में से ही सयाने को सयाना कहा गया। तिब्बती में इन्हें च्यूंवायारता कहते हैं। तिब्बत व्यापार के समय से जब व्यापारियों का आना-जाना होता था तब मौसम के अनुसार वह अगल-अलग स्थानों पर रहते थे। नंगर यानी की गरम घाटी के रूप के रूप में नाचनी का यह क्षेत्र भी चुना गया होगा। बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण इस स्थान का नाम टिमटिया पड़ गया। पहले से इसी प्रकार से कई नाम पड़ गये। भैंसखाल में तालाब सा है जिसमें भैंसें जाती थीं, नाम पड़ा भैंसखाल। बुजुर्गवार के नाम पर स्थान का नाम पड़ा- जब्बूखरक। श्री धर्मशक्तू बताते हैं- तेजम तो कोट रहा है, जहाँ रावत लोगों के हाथ में न्याय व्यवस्था थी।
अपने बुजुर्गों से कहे-सुने के अनुसार श्री केदार सिंह जी बताते हैं कि किसी समय टिमटिया में आसा जसपाल आये थे। इन्हीं के बंशज विभिन्न राठों के नाम से जाने जाते हैं। बाद में कुछ लोग माले चले गये और कुछ टिमटिया रह गये। टिमटिया रहने वालों को टिमटिया राठ कहने लगे। पाँच भाईयों का एक राठ हुआ जो शामा के पास ढोलढूंगा गये थे। माले राठों में गिरधर सिंह धर्मशक्तू के परिवार जन आदि हैं। टिमटिया राठों में डाॅ.नारायण सिंह धर्मशक्तू परिवार जन आदि हैं। पाँच भाई राठों में बलवन्त सिंह धर्मशक्तू परिजन आदि हैं।
श्री केदार सिंह बताते हैं कि किन्हीं कारणों से यत्र-तत्र जाकर रहने लगे राठों की नई पीढ़ी भी नौकरी-पेशा के सिलसिले में दूर-दूर तक निकल चुकी है किन्तु अवसर विशेष पर सभी मिलते जुलते हैं। आज भी टिमटिया में अपनी यादों के साथ बने हुए श्री धर्मशक्तू चाहते हैं कि उनके परम्परागत हुनर को नई पीढ़ी बचाये रखे।

पिघलता हिमालय 7 दिसम्बर 2015 के अंक से