मथुरादत्त मठपाल
स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से मेरा परिचय कोई 37-38 वर्ष पूर्व हुआ था। मैं एक कुमाउनी काव्य समारोह में भाग लेने हेतु हल्द्वानी आया हुआ था। एक अति साधरण सा दिखने वाला व्यक्ति वहाँ एक मकान की छत लगाई गई रसोई में भोजन व्यवस्था में संलग्न था। पास ही एक दुबली-पतली सी महिला बैठी उनका हाथ बटा रही थी। उन्होंने अपना परिचय स्वयं ही दिया कि वे आनन्द बल्लभ उप्रेती हैं, ये कमला जी हैं। मैंने मजाक में कहा, ‘आप दोनों एक ही पार्टी के लगते हैं।’ हम तीनों ही हँस पड़े। तब से मैं जब भी हल्द्वानी आता प्रायः उनके ‘शक्ति प्रेस’ में कुछ देर अवश्य बैठता था। वही सैंतिस-अड़तिस वर्ष पूर्व देखे गये आनन्द जी-कमला जी में कोई फर्क मैंने कभी अनुभव नहीं किया। भीतर के अंधेरे कमरे में उनका ट्रेडिल प्रेस चलता रहता, बाहर के कमरे में ‘पिघलता हिमालय’ साप्ताहिक पत्र का काम चलता रहता। दो-तीन अति साधरण सी कुर्सियाँ-एक बैंच और कोने पर सटा कर रखा हुआ एक बड़ा सा बैंच। आगे चलकर जब कम्प्यूटर- फोटोस्टेट का काम खोला कमरे का हुलिया वही रहा। हाँ भीतर के कमरे में खटर-पटर अब नहीं होती थी। बहुत धीरे से स्वर में आनन्द जी बतियाते- प्रायः कुमाउंनी में ही। ‘ओहो, और्री है गो’ जैसा कोई तकिया कलाम बीच-बीच में लगता रहता।
समय के साथ-साथ ज्यों-ज्यों आनन्द जी से मेरा परिचय गहराता गया मुझे उनके अन्दर एक बालक की तरह सरल-निष्कपट- सपाट व्यक्ति के दर्शन होते गये। एक पत्राकार की उनकी गहरी ईमानदारी, आर से पार तक और बहुत दूर तक देखने की सामथ्र्य वाली उनकी दृष्टि, बिना लाग- लपेट या कोई मुलम्मा चढ़ाये पत्रकारिता के अपने मिशन के प्रति कर्तव्य निष्ठता, सुख-दुःख में समभाव रख सकने की उनकी चारित्रिक विशेषता, अपने समकालीन समाज और राजनीति की गहरी समझ रखने वाले एक जागरूक मनीषि की सी मेध से सम्पन्न व्यक्तित्व आदि गुणों के कारण में उत्तरोत्तर उनके व्यक्तित्व का कायल होेता गया। लेकिन उनके जीवन के अनेक पहलू मेरी नजरों में तब उजागर हुए जब मैंने उनके विस्तृत साहित्य का अध्ययन किया। अपने प्रारम्भिक प्रकाशन तो उन्होंने स्वयं ही मुझे दिये थे, बाद वाली कृतियाँ उनके परिजनों ने मुझे सुलभ करवायीं थीं। मुझे सुखमय विस्मय होता है कि आनन्द जी जितने प्रखर पत्रकार थे उतने ही मेधावी रचनाकार भी। वे एक भावुक कवि, मानव मन के सफल चितेर कहानीकार, एक सतत यायावर, निबन्धकार आदि बहुत कुछ थे।
कमला जी के साथ आनन्द जी का विवाह फरवरी 1971 में हुआ था। कमला जी रानीखेत के एक सम्भ्रान्त परिवार की कन्या थी। मुझे याद है वर्षों पहले रानीखेत सदर बाजार में ज्वाला प्रसाद एण्ड सन्स में हम लोग जाया करते थे, जो इन्हीं परिवार का है। प्रतिष्ठित व्यवसायी ज्वालाप्रसाद जी स्वयं गद्दी पर बैठे दिखाई देते थे। शहर में रहने के कारण कमला जी ने गाँव का जीवन कम ही देखा था। उप्रेती जी का जीवन एक फक्कड़ का जीवन था। ‘काम-क्रोध्-मद-मान न मोहा’ वाली स्थिति थी। सौभाग्य से उन्हें जीवन-संगिनी के रूप में एक ऐसी महिला मिली जो उनके साथ पग से पग मिला कर चलीं। इससे एकदम अकेले संघर्ष कर रहे उप्रेती जी को जीवन का एक स्थायी सम्बल प्राप्त हुआ। वे हल्द्वानी में अपना प्रेस चलाते, पत्र निकालते और सामाजिक- सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी करते रहते थे।वे किसी दल, धड़े या मोर्चे से कभी नहीं जुड़े। एक ईमानदार पत्रकार की भाँति वे आम जन के सुख-दुःखों को ही अपनी लेखनी से उजागर करते रहे। उधर कमला जी को अपनी ससुराल गंगोलीहाट में अपने बड़े परिवार के साथ रहना था। ग्रामीण परिवेश में रहकर उन्होंने ग्राम्य जीवन के सारे काम-काज सम्भाल लिये थे। बड़े पुत्र के जन्म के पश्चात पति-पत्नी एक माह के नन्हें शिशु को लेकर हल्द्वानी चले आये। ‘शक्ति प्रेस’ भवन में गृहस्थी जम गई। छोटे पुत्र और कन्या के जन्म के पश्चात कमला जी अस्वस्थ रहने लगीं। घर-गृहस्थी और व्यवसाय की सारी जिम्मेदारी आनन्द जी के कन्धें पर आ पड़ी। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने अपने पत्र ‘पिघलता हिमालय’ का प्रकाशन बनाये रखा। कमला जी अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही थीं। इस अन्धकार में प्रकाश की किरण के रूप में उनके सामने तीनों बच्चे ही थे। समय बीता, कमला जी भी कुछ स्वस्थ हो गईं, ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एवं उन्हें संस्कारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ‘पिघलता हिमालय’ भी गति पकड़ चुका था। नन्हा पंकज भी पिता के कामों में हाथ बटाने लगा था।
समय ने अपने कितने ही रूप दिखाये- रंग दिखाये लेकिन उप्रेती दम्पत्ति ने न अपना धैर्य छोड़ा और न अपना पत्रकारिता का मिशन ही छोड़ा। वे स्वयं में एक संस्था थे- एक आन्दोलन थे। कुछ पँूजी का प्रबन्ध् हुआ तो उन्होंने जे.के.पुरम्, सेक्टर-डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में अपने परिवार की आवश्यकता भर की पूर्ति कर सकने में सक्षम एक छोटे से आशियाने को बनाया। इसी बीच 22 फरवरी 2013 ई. के दिन वे आनन्द जी एकाएक चिरनिद्रा में सो गये। ऐसे में उनकी अद्र्धांगिनी कमला जी ने साहस के साथ उनके मिशन को संभाला और अपने बच्चों को सौंपकर 15 सितम्बर 2018 को वह भी विदा हो गईं। उनका संस्कार, धैर्य, साहस बनाने वाला था। सामाजिक कार्यों में उनका हस्तक्षेप दिशा देने वाला था।

