पत्रकार ऐसे ही नहीं बन जाते हैं

स्व.कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि पर सम्पादकीय
आज जब पत्रकारिता की बात होती है तो इसे बहुत हल्के में लिया जाता है, कारण इसे बना ही ऐसा दिया गया है। पत्र और पत्रकार जन चेतना के अग्रदूत होते हैं। उनसे आन्दोलन और आन्दोलन से वह होते हैं। उनका पठन-पाठन और उनके संस्कार उनकी कलम में दिखाई देते हैं। वर्तमान में जब समाचार-संदेश देने के लिये द्रुतगामी व्यवस्थायें हैं पत्रकारिता जगत में हलचल मच चुकी है। होड़ में जल्द से जल्द समाचार परोसने और कारोबार को बढ़ाने के लिये विज्ञापनों के लिये सर माथा पीटने का अभियान चल पड़ा है। समाचार पत्रों की दयनीयता इससे ही समझी जा सकती है कि उन्हें बाजार में स्थापित होने के लिये नित नये अभियान चलाने पड़ रहे हैं। प्रबुद्ध पाठक चर्चा करने लगा है कि अखबार में समाचार पढ़ें या विज्ञापन। कई पेजों के विज्ञापन का पुलिन्दा और उपर से सैकड़ों नामों से भरी कोई सूचना या चटपटी प्रस्तुति को आज का युवा पत्रकार पत्रकारिता बता रहे हैं। यदि कोई पत्रकारिता के ज्ञान को लेकर प्रयोग करना चाहे तो उसके लिये शायद ही किसी मीडिया घराने के दरवाजे खुलें, क्योंकि भीड़ में अपनी मुंडी उपर निकालने के लिये सार्टकट रास्ता तलाशा जा रहा है। ऐसे में साहित्य की पत्रकारिता वाली धारा की बात हो ही नहीं सकती है। यदि कोई अपने आप से हिम्मत करता है तो वह छोटे या मझले समाचार पत्रों की श्रेणी में है। ऐसे समाचार पत्रों के सामने चुनौती ज्यादा हैं। तुरन्त लाभ के लिये कोई भी सरकार उन समाचार पत्रों को चुनने लगी है जिसे वह तत्काल विज्ञापन देकर अपनी बात मनवा सके। ऐसा ही लाभ निजी संस्थान व धन्धेबाज भी चाहने लगे हैं। यदि नहीं चाहते हैं तो उन्हें विज्ञापन के लिये मजबूर किया जा रहा है। सोचनीय है कि आजादी के 70 साल बाद भी भीड़ में खड़े रहने के लिये इतना ही साहस बटोर सके हैं हम।

पत्र और पत्रकारिता के लिये मिशन का होना जरूरी है। इस मिशन को यदि हम स्वीकारते हैं तो पूरी ईमानदारी जरूरी है। लेकिन क्या हमारी व्यवस्था का ढांचा ऐसा होने दे रहा है? वह कागजों में उलझाये रखना चाहता है और सारे मीडिया घराने चिल्लाते हैं- ‘नम्बर वन’। इन सबके बाद भी पत्रकारिता के मिशन को बनाये रखने के लिये दुनिया में बहुत से महानुभाव संकल्पित हैं। उन्हीं में से थीं- कमला उप्रेती। किसी की जिन्दगी पूरी तरह संग्राम बन जाती है और इस संग्राम में जो लड़ता है वह योद्धा है। ऐसी ही योद्धा थी ईजा। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उसने जुड़ी अनगिनत यादें हैं। ‘पिघलता हिमालय’ को बनाने में ईजा का घोर संग्राम रहा है। यह कहानी 1964 से शुरु हो जाती है जब स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी ने छापाखाना खोला। पहले छापाखाने की बहुत इज्जत हुआ करती थी। ‘शक्ति प्रेस’ नाम से खुले छापाखाना में बाईडिंग, परफेटिंग, रूलिंग, कम्पोजिंग, प्रिंटिंग हर प्रकार का काम होता था। इसी छापेखाने में बहुत बड़ी टेªडिल मशीन हुआ करती थी, पूरे ट्रक के बराबर। जिसमें दैनिक पिघलता हिमालय भी छपा। बाद में छोटे आकार की टैªडिल मशीन वगैरह भी प्रेस में लगाई गईं। इन मशीनों में अनगिनत मशीनमैन, कम्पोजिंग में अनगिनत कम्पोजिटर रहे हैं। छापाखाने मे प्रतिस्पद्र्धा नहीं थी और शादीकार्ड, बिलबुक इत्यादि के ग्राहकों के अलावा लिखने-पढ़ने वालों का अड्डा छापाखाने ही हुआ करते थे। आजकल तो प्रिंटिंग प्रेस लिखना आसान हो चुका है। और प्रतिद्वंद्वी अपने ग्राहकों को ढूंढने के लिये दौड़ते हैं, सरकारी काम के लिये तिकड़मबाजी करनी पड़ती है। पहले पोस्टर, पर्चे, कार्ड छपवाने वालों में आन्दोलनकारी, समाज सेवी, पुस्तकें-फोल्डर-पर्चे छपवाने के लिये लेखक, कुछ खास-खास लोग शादीकार्ड छपवाने के लिये छापेखाने तक आते थे। प्रेस की बड़ी जिम्मेदारी थी और लोगों को भरोसा था कि उनकी गलतियों को भी सुधर कर छापा जायेगा। तब एफएस, एफोर, एथ्री जैसे कागज साइजों को नहीं जानते थे बल्कि रिमों के साइजों के बाद कागज कटिंग होती थी। आज भी बड़े छापेखानों में यही होता है। खैर, बात पिघलता हिमालय की हो रही थी। 1978 में पिघलता हिमालय शुरु हुई, बहुत उत्साह था आनन्द बल्लभ उप्रेती जी और दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी में। इनका जोश अखबार को दैनिक में तक बदल गया। लेकिन जीवन के संग्राम में यह उलझ कर रह गये। दुर्दिनों की वह कहानी बहुत लम्बी है………….

कमला उप्रेती ने अपने पति के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर छापाखाना और अखबार सींचा। लोहे की उन भारी मशीनों की खटखट आवाजों में कागज को मशीन में लगाने और उठाने में सावधनी चाहिये। कई ऐसे अवसर थे जब कमला जी मशीनमैन आनन्द बल्लभ जी के साथ हैल्पर बनी। तब आजकल की तरह सुविधाएं और साधन भी नहीं थे। डाक से जाने वाले अखबारों में पते लिखने में भी वह सहायक थी। अखबार की प्रूफरीडिंग का काम भी वह करती और कभी लिखने बैठ जाती। पत्रकार बनने की शुरुआत ही पठन-पाठन के अलावा कम्पोजिंग से होती थी जैसे आजकल कम्प्यूटर की जानकारी जरूरी है। उप्रेती जी के निधन के बाद उन्होंने पत्र का सम्पादन किया। समय बदला है लेकिन हमारे मूल्य और संस्कार बने रहने चाहिये। पत्रकारिता के कोई मायने होते हैं। इसकी पवित्रता बनी रहे, इसका मिशन बना रहे, इसका आन्दोलन चलता रहे। इसके लिये आम पाठकगण को भी विचार करना चाहिये। आज ईजा स्व. कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि में उनका स्मरण हमें खुशी और आँसू के साथ साहस दे रहा है। उसकी जिद, उसकी लगन, उसका संघर्ष हमें याद दिलाता रहेगा कि योद्धा संग्राम में विचलित नहीं होते।

उनका संस्कार, धैर्य, साहस बनाने वाला था

मथुरादत्त मठपाल
स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती जी से मेरा परिचय कोई 37-38 वर्ष पूर्व हुआ था। मैं एक कुमाउनी काव्य समारोह में भाग लेने हेतु हल्द्वानी आया हुआ था। एक अति साधरण सा दिखने वाला व्यक्ति वहाँ एक मकान की छत लगाई गई रसोई में भोजन व्यवस्था में संलग्न था। पास ही एक दुबली-पतली सी महिला बैठी उनका हाथ बटा रही थी। उन्होंने अपना परिचय स्वयं ही दिया कि वे आनन्द बल्लभ उप्रेती हैं, ये कमला जी हैं। मैंने मजाक में कहा, ‘आप दोनों एक ही पार्टी के लगते हैं।’ हम तीनों ही हँस पड़े। तब से मैं जब भी हल्द्वानी आता प्रायः उनके ‘शक्ति प्रेस’ में कुछ देर अवश्य बैठता था। वही सैंतिस-अड़तिस वर्ष पूर्व देखे गये आनन्द जी-कमला जी में कोई फर्क मैंने कभी अनुभव नहीं किया। भीतर के अंधेरे कमरे में उनका ट्रेडिल प्रेस चलता रहता, बाहर के कमरे में ‘पिघलता हिमालय’ साप्ताहिक पत्र का काम चलता रहता। दो-तीन अति साधरण सी कुर्सियाँ-एक बैंच और कोने पर सटा कर रखा हुआ एक बड़ा सा बैंच। आगे चलकर जब कम्प्यूटर- फोटोस्टेट का काम खोला कमरे का हुलिया वही रहा। हाँ भीतर के कमरे में खटर-पटर अब नहीं होती थी। बहुत धीरे से स्वर में आनन्द जी बतियाते- प्रायः कुमाउंनी में ही। ‘ओहो, और्री है गो’ जैसा कोई तकिया कलाम बीच-बीच में लगता रहता।
समय के साथ-साथ ज्यों-ज्यों आनन्द जी से मेरा परिचय गहराता गया मुझे उनके अन्दर एक बालक की तरह सरल-निष्कपट- सपाट व्यक्ति के दर्शन होते गये। एक पत्राकार की उनकी गहरी ईमानदारी, आर से पार तक और बहुत दूर तक देखने की सामथ्र्य वाली उनकी दृष्टि, बिना लाग- लपेट या कोई मुलम्मा चढ़ाये पत्रकारिता के अपने मिशन के प्रति कर्तव्य निष्ठता, सुख-दुःख में समभाव रख सकने की उनकी चारित्रिक विशेषता, अपने समकालीन समाज और राजनीति की गहरी समझ रखने वाले एक जागरूक मनीषि की सी मेध से सम्पन्न व्यक्तित्व आदि गुणों के कारण में उत्तरोत्तर उनके व्यक्तित्व का कायल होेता गया। लेकिन उनके जीवन के अनेक पहलू मेरी नजरों में तब उजागर हुए जब मैंने उनके विस्तृत साहित्य का अध्ययन किया। अपने प्रारम्भिक प्रकाशन तो उन्होंने स्वयं ही मुझे दिये थे, बाद वाली कृतियाँ उनके परिजनों ने मुझे सुलभ करवायीं थीं। मुझे सुखमय विस्मय होता है कि आनन्द जी जितने प्रखर पत्रकार थे उतने ही मेधावी रचनाकार भी। वे एक भावुक कवि, मानव मन के सफल चितेर कहानीकार, एक सतत यायावर, निबन्धकार आदि बहुत कुछ थे।
कमला जी के साथ आनन्द जी का विवाह फरवरी 1971 में हुआ था। कमला जी रानीखेत के एक सम्भ्रान्त परिवार की कन्या थी। मुझे याद है वर्षों पहले रानीखेत सदर बाजार में ज्वाला प्रसाद एण्ड सन्स में हम लोग जाया करते थे, जो इन्हीं परिवार का है। प्रतिष्ठित व्यवसायी ज्वालाप्रसाद जी स्वयं गद्दी पर बैठे दिखाई देते थे। शहर में रहने के कारण कमला जी ने गाँव का जीवन कम ही देखा था। उप्रेती जी का जीवन एक फक्कड़ का जीवन था। ‘काम-क्रोध्-मद-मान न मोहा’ वाली स्थिति थी। सौभाग्य से उन्हें जीवन-संगिनी के रूप में एक ऐसी महिला मिली जो उनके साथ पग से पग मिला कर चलीं। इससे एकदम अकेले संघर्ष कर रहे उप्रेती जी को जीवन का एक स्थायी सम्बल प्राप्त हुआ। वे हल्द्वानी में अपना प्रेस चलाते, पत्र निकालते और सामाजिक- सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी करते रहते थे।वे किसी दल, धड़े या मोर्चे से कभी नहीं जुड़े। एक ईमानदार पत्रकार की भाँति वे आम जन के सुख-दुःखों को ही अपनी लेखनी से उजागर करते रहे। उधर कमला जी को अपनी ससुराल गंगोलीहाट में अपने बड़े परिवार के साथ रहना था। ग्रामीण परिवेश में रहकर उन्होंने ग्राम्य जीवन के सारे काम-काज सम्भाल लिये थे। बड़े पुत्र के जन्म के पश्चात पति-पत्नी एक माह के नन्हें शिशु को लेकर हल्द्वानी चले आये। ‘शक्ति प्रेस’ भवन में गृहस्थी जम गई। छोटे पुत्र और कन्या के जन्म के पश्चात कमला जी अस्वस्थ रहने लगीं। घर-गृहस्थी और व्यवसाय की सारी जिम्मेदारी आनन्द जी के कन्धें पर आ पड़ी। ऐसी स्थिति में भी उन्होंने अपने पत्र ‘पिघलता हिमालय’ का प्रकाशन बनाये रखा। कमला जी अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही थीं। इस अन्धकार में प्रकाश की किरण के रूप में उनके सामने तीनों बच्चे ही थे। समय बीता, कमला जी भी कुछ स्वस्थ हो गईं, ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एवं उन्हें संस्कारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ‘पिघलता हिमालय’ भी गति पकड़ चुका था। नन्हा पंकज भी पिता के कामों में हाथ बटाने लगा था।
समय ने अपने कितने ही रूप दिखाये- रंग दिखाये लेकिन उप्रेती दम्पत्ति ने न अपना धैर्य छोड़ा और न अपना पत्रकारिता का मिशन ही छोड़ा। वे स्वयं में एक संस्था थे- एक आन्दोलन थे। कुछ पँूजी का प्रबन्ध् हुआ तो उन्होंने जे.के.पुरम्, सेक्टर-डी, छोटी मुखानी, हल्द्वानी में अपने परिवार की आवश्यकता भर की पूर्ति कर सकने में सक्षम एक छोटे से आशियाने को बनाया। इसी बीच 22 फरवरी 2013 ई. के दिन वे आनन्द जी एकाएक चिरनिद्रा में सो गये। ऐसे में उनकी अद्र्धांगिनी कमला जी ने साहस के साथ उनके मिशन को संभाला और अपने बच्चों को सौंपकर 15 सितम्बर 2018 को वह भी विदा हो गईं। उनका संस्कार, धैर्य, साहस बनाने वाला था। सामाजिक कार्यों में उनका हस्तक्षेप दिशा देने वाला था।

आप तो हमारे साथ ही रहोगी हमेशा हमेशा!

हरीश पन्त
कहते हैं तूफान में जब दिशा बोध् असम्भव हो जाता है तो दीप स्तम्भ की बत्ती अपने स्थान से उठ जहाज के आगे पानी में तैरते हुए नाविकों का मार्ग दर्शन करती है। कुछ ऐसी ही व्यक्तित्व था पिघलता हिमालय परिवार के लिए स्व. कमला उप्रेती का।
अस्वस्थ्य होने के बावजूद विषम परिस्थितियों में आनन्द बल्लभ उप्रेती जी के सारे संघर्षों, उपलब्धियों और पारिवारिक सामाजिक कार्यों को संवारने की विलक्षणता उनमें अद्वितीय थी।
वेदना में एक शक्ति है जो दृष्टि देती है और जो वेदना में है वही दृष्टा हो सकता है। सन् 1977-78 के दौरान नैनीताल समाचार के प्रकाशन शुरू होने के बाद ही पिघलता हिमालय परिवार यानि उप्रेती जी के संसर्ग में कालाढूंगी रोड शक्ति प्रेस से सम्पर्क हुआ तो आज तक वह अपना ही लगता है बावजूद न उप्रेती जी रहे न कमला जी! पर वह आत्मीयता आज भी पंकज, धीरज व परिवार के साथ यथावत है।
स्व. उप्रेती दम्पति के साथ औपचारिक दाज्यू-भाभी वाला सम्बोधन न हो कर आनौपचारिक साहब! और काँ छाँ हो, कै कर्न छा हो! ही रहा।
90 के दशक में गम्भीर बीमार हो कर हल्द्वानी में चैकअप के दौरान एक महीने तक जिस ममत्व से उन्होंने मेरी देखभाल की उससे उरिण तो मैं ता जिन्दगी नहीं हो पाउँगा पर उनका यह भाव बिना किसी लाग लपेट के सभी आगंतुक परेशानी में घिरे लोगों के साथ निस्वार्थ रहता था।
शक्ति प्रेस व पिघलता हिमालय की आर्थिकी को सम्भालने में कमला उप्रेती की विशेष भूमिका रहती थी जो कि उदारमना उप्रेती जी में कम ही थी।
वह बहुत ही स्पष्ट खरी-खरी कहने की वजह से शायद कुछ लोगों को खटकती हो पर वह खुली व स़ापफगोई पसन्द व्यक्तित्व की स्वामिनी थी।
उप्रेती जी के नहीं रहने के बाद जिस कुशलता और एकजुटता से पूरे परिवार को खराब होते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने संभाला वह हिमालय संगीत शोध् समिति की उत्तरोत्तर प्रगति का स्पष्ट प्रमाण है। होली आयोजन, उप्रेती जी की पुण्यतिथि के आयोजन व सम्मान समारोह, संगीत की बैठकें सब में उनका सक्रिय सहयोग, मार्गदर्शन और आतिथ्य अद्भुत व पूरे परिवार को साहस से आगे बढ़ने की प्रेरणा देता था और अब उनके ना रहने पर भी उनकी अमिट छाप पिघलता हिमालय व हिमालय संगीत शोध् समिति पर छाई रहेगी। कवि रुस्तम की कविता के साथ-
समय कुछ ढँूढता था।
समय कुछ टटोलता था।
रात को, अकेला,
शहर की गलियों में
अपने आप कुछ बोलता था।
उसकी आँखों में क्या बिम्ब होते थे?
समय क्या सोचता था?
किसे याद करता था समय?
किसी अन्य समय को?
और किसे भूलता?
मैं दूर से उसके पीछे पीछे घूमता था,
सिर्फ दूर से।
कमला उप्रेती आप तो हमारे साथ ही रहोगी हमेशा हमेशा!

वह सपने नहीं, सच्चाई को जीती थी…..

डाॅ. पंकज उप्रेती
‘‘संग्राम जिन्दगी है, लड़ना इसे पड़ेगा…..।’’ इस प्रकार के गीतों को गुनगुनाने वाली हमारी ईजा अब सिर्फ याद आती रहेगी। वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी। बीमारी, अस्पताल, मौत तो उसके निकट थे लेकिन अचानक वह चल देगी ऐसा पता नहीं था।
मुझे याद है पिता के साथ घोर संघर्षों में साथ देने वाली माता ने कितनी परीक्षाएं मौत के लिये दी। अपनी 66 साल की आयु में उन्होंने सौ प्रतिशत संघर्ष किया जिसमें मौत से संघर्ष भी था। बचपन में हम तीनों भाई बहन- पंकज, धीरज, मीनाक्षी सोचते माँ कब ठीक होगी, उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। परीक्षा के इस दौर में दैनिक पिघलता हिमालय को बन्द करना पड़ा था। चल रहे संग्राम में पहाड़ ही टूट पड़ा। मुनस्यारी में दुर्गा चाचा दुर्गा सिंह मर्तोलिया अपनी स्थितियों में बुरी तरह टूट चुके थे। थके-हारे पिता आनन्द बल्लभ ने छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ को बिकाउ होने का विज्ञापन दे डाला था। लेकिन नहीं, परमात्मा को यह मंजूर नहीं था। ईश्वर को हमारा लड़ना ही पसन्द है। पूरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। 6 साल का मैं और 4 साल का भाई धीरज गाँव गंगोलीहाट चले गये। छोटी बहन को नैनीहाल रानीखेत भेज दिया गया। माँ अस्पताल और पिता हल्द्वानी में। संघर्षों के उन सालों में जितने टोने-टोटके, पूजा-पाठ हो सकते थे सब किये पिता ने। ताकि हमारा परिवार बन सके। दो साल के अन्तराल में बिखरा हुआ पूरा परिवार एक हो गया लेकिन कुछ समय बाद ईजा पिफर से बीमार हो गई। हम तीनों बच्चे रोते थे। फिर से दो साल तक घोर संग्राम। पिता भी परेशान थे लेकिन ‘शक्ति प्रेस’ हमारी धुरी था। ‘उप्रेती ज्यू’ को मानने वाले, उनकी ईमानदारी को पहचानने वालों की कमी नहीं रही। ईजा ठीक होकर घर आ गई लेकिन बीमारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पिघलता हिमालय को पिता ने फिर से जीवन दिया और ट्रेडिल मशीन के जमाने की मशीनों पर जूझते रहे। खून में व्यापार तो था नहीं, हाँ उनकी कलम की ताकत और ईमानदारी ने परिवार को सम्मान के पद पर खड़ा रखा। बीमारियों और संघर्षों ने हम बच्चों को भी बहुत कुछ सिखाया। हमें सिखाया की दुर्दिन कैसे होते हैं, दुनिया के मेले में कितने प्रकार के चेहरे होते हैं, अपना-पराया क्या होता है………..। मुफलिसी कोई बात नहीं होती लेकिन आपकी प्रतिब(ता बनी रहनी चाहिये। अखबार निकालना हमारी प्रतिबद्धता थी। संकल्प ले रखा था इसे चलाने का। ईश्वर कभी कोई दूत भेज देता और उम्मीदें जग जाती। एक दिन हल्द्वानी बेस अस्पताल में ईजा को बाहर रख दिया गया और डाक्टरों ने कह दिया था कि भगवान ही बचा सकता है। हम बच्चे रात्रि में रोते हुए यह कहकर नींद की गोद चले गये- ‘‘हे भगवान! हमारी मम्मी को ठीक कर देना।’’ अगले दिन पता चला कि ईजा ठीक हो गई है। पिता जी अपने कुछ साथियों के साथ रातभर अस्पताल में मौत से जूझ रही ईजा के पास थे। अस्पताल में जाने से पहले मुंह का ग्रास तक छोड़कर जाना पड़ा था उन्हें। उस दिन मेरा जनमबार था और पिता ने तय किया था बहुत दिनों बाद आज इतमिनान से खाना खायेंगे। उन्होंने खाना पकाया और हम लोग खाना खाने बैठे ही थे कि हमारे पड़ौसी लाला दाउ दयाल जी बताने आ गये कि अस्पताल में चलो, हालत खराब है।
अस्पताल में बहुत समय अकेले ही काटा है ईजा ने। वह हिम्मती थी तभी इतने साल तक उसका शरीर बचा रहा। बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह थकी नहीं बल्कि परेशान इसलिये थी कि उनका परिवार परेशान है। वह कहती थी- ‘‘मैं एमबीबीएस हो चुकी हँू। बीमारियों के कारण सारी दवाईयों के नाम और बीमारियों के बारे में जान चुकी हँू।’’ कई बार मरते-मरते बची ईजा बताती थी- ‘‘यमराज के वहाँ आध्े रास्ते से लौट कर आई हँू।’’
ईजा की बातों मेें बहुतों को विश्वास नहीं हो सकता है। वह बहुत चैकन्नी थी कि किसी भी समय बुलावा आ सकता है। इसलिये वह अपने हिस्से की लड़ाई लड़ती रही। वह सपने नहीं सच्चाई जीती थी। नींद उसकी आँखों में नहीं थी और हर वक्त कुछ गुनने-बुनने-कहने-सुनने की आदी हो चुकी थी। उन्हें भरोसा था कि ईमानदार से काटा गया समय ईमानदारी लौटाता है। आने वाले कष्टों को वह पी जाती और समय का इन्तजार करती। उनकी दृढ़ता ही थी कि वह पिता जी के अखबारी मिशन, लेखन, सामाजिक आन्दोलनों में बराबर की भागीदार बनी। उन्होंने कभी भी बाबू जी से यह शिकायत नहीं की कि इन आन्दोलनों से क्या होगा, बच्चों की पढ़ाई नहीं हो रही है, सजने- संवरने के लिये साधन चाहिये, रहन-सहन के लिये बड़ी और खुली जगह चाहिये। वह ऐसे सपने कतई नहीं पालती थी। उनके यही सपने होते तो हमारा यह मिशन अध्ूरा रह जाता। यह ईजा का ही साहस था कि उन्होंने हर स्थितियों में अपना संसार बनाया। ऐसा संसार जिसमें सच्चाई हो। आम महिलाओं की तरह वह भी घर-गृहस्थी चलाती नाती-पौतों के साथ खेलती और गुनगुनाती लेकिन उससे पहले वह आन्दोलन थीं। उसने अपने को नहीं अपने मिशन को संवारा…..